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ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
राधा राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण।
फिर से।
फिर से मेरे मार्ग में आये तुम।
यह यज्ञ देवकी के आठवें पुत्र की खोज के लिए था।
पर तुम नहीं चाहते।
कि मैं यह पता लगा सकूं
कि वह भविष्यवाणी वाला बालक कौन है,
कहां है?
इसलिए अपने खेल से मेरे यज्ञ को भंग कर दिया।
कहते हैं इस पृथ्वी के पालनहार हो तुम।
तो ठीक है,
तुम्हारे किए का दंड भी
इस पृथ्वी पर सबको मिलेगा, सबको मिलेगा।
अक्रूर आगे महाराज!
यह पात्र कहां से बन कर आया था? महाराज बरसाना के कुंभकार ने
यह पात्र बनाया था।
तुम?
जानते हो कुमार
क्या कर दिया तुमने?
तुम्हारे बनाए पात्र के कारण
मेरा यज्ञ भंग हो गया।
सौरभ परिश्रम व्यर्थ हो गया।
यज्ञ पूर्ण होता
तो वह बालक सामने आता
और
उसकी आहुति इस यज्ञ में देता
था। तुम्हारे कारण वह
आहुति हो नहीं पाई और यज्ञ बिना आहुति रह जाए
तो इससे महाराज कंस के यश को ठेस पहुंचेगी।
इसलिए यज्ञ मैं
तुम्हारी आहुति दी जाएगी।
और।
हां।
तुझे मार दिया तो मुक्त हो जाएगा
हर कष्ट से।
यह बहुत सरल दण्ड होगा।
और कंस के यज्ञ को भंग करने का दण्ड
प्रचण्ड होना चाहिए।
कुमार ग्रन्थ संगणक कुचक्र व्रत लक्षणं, देश पन्थ गामी। क्रोध रूप कंस क्रूरतम।
असभ्य अत्याचारी, अशिष्टता अभद्र, तम दुरात्मा, अनर्थ दुःखदायी। दुष्ट दुर्जन कंस हँस
हँस हँस हँस हँस
हँस हँस हँस
हँस हँस हँस।
सृजन का शत्रु है, महा विध्वंस है,
कंस है, कंस है। यह छल कपट का दंश हर
साल से
कम से कम से कम से।
कम से कम से कम ये ऐसा एक मरीज है
जिसमे लेश है मनुष्यता न शेष है। अहम है। राग द्वेष है।
अनिष्टकारी,
निर्दयी, निर्दयी, नृशंस है ये कंस है ये छल कपट का दंश है।
कंस
कुमार।
जब तक जीवन के उस क्षण के लिए पछताओगे
जब तुमने ये पात्र बनाया।
तुम्हारी भूल का दंड सिर्फ तुम्हे ही नहीं।
पूरे कुमार संघ को मिलेगा।
आज से तुम
और
तुम्हारा परिवार।
और बरसाने का पूरा कुमार। संघ
बहिष्कृत हुआ।
ना तुम पात्र बनोगे
ना बेचोगे।
यदि जीवन व्यापन के लिए किसी और राज्य में जाकर बसना चाहो।
तो यह अनुमति भी नहीं है।
एक बात और, तुमसे किसी ने पत्र खरीदा।
यह तुम्हारी सहायता करने की चेष्टा की तो महाराज कंस के कोप का भागी होगा।
अब हर क्षण मरना।
तुम्हारे बच्चों को भूख से बिलखता देखकर
तुम्हारे कुटुंब को निर्धनता से लड़ता देखकर अब तुम्हें
और पूरे बृज को समझ में आएगा कि महाराज कंस के इस यज्ञ का।
क्या महत्व था।
सत्य में बड़े ही प्यारे मामाश्री!
धन्यवाद।
मेरे और राधा के मिलन का कारण बनने के लिए।
बृज श्रृंगार श्री।
राधा रानी।
दिव्य मनोहर।
सुघर
सुहानी
निरख निरख छवि मन हर्षाये।
थिरक थिरक बृज धाम। ये गायें।
गौरवर्ण काया। असलम के बदन में जैसे बिजली चमके।
सुन्दर, सुघड़। सहज मनहारी। बृजबाला। वृषभानु दुलारी।
छन छन छन छन छन छन छन छन छन छन छन बाजे पैजनिया। रुनझुन चरनन झुनझुन चरनन। जन जन जन
की करधनी मधुवन लहराई, चली, इतराए चली बलदाऊ चली जब धानी चूनर को चोर छुआ सब सुधबुध
आज घुमाये चली।
कजरारे नैन। मिश्री से बैन मुस्कान अधर पे छाये रही कोमल कपोल। अमृत से बोल सुन्दरता
स्वयं लजाये रही।
जमुना के तीर होके अधीर नैना बिछाये। नित रात के बनवारी लाल बृज का श्रृंगार। ये रूप
देख मन आनन्द
का गाता रहा। श्री राधा राधा।
का।
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
ओ
ओ।
ओ
ओ
ओ
ओ ओ!
ओ ओ
ओ ओ ओ
ओ ओ
ओ
ओ ओ।
ओ ओ!
ओ
ओ ओ
ओ
ओ।
वैसे आश्चर्य है कि
इतने वर्षों में
पहली बार तुमने बाबा से कहा कि तुम्हें माखन के लिए मटकी खरीदने हाट जाना है?
भला इतना बड़ा परिवर्तन तुममें कैसे?
ऐसे ही
अब बडा हो गया ना?
सोचा बाबा का हाथ बंटाया करो।
अपनी बातों में भोले भाले बाबा और मैया को फंसाना
मुझे नहीं।
बडे आए हाथ बँटाने वाले।
यूँ कहो ना।
कि जिसका हाथ थामना है उसे देखने जा रहे हो।
क्यों?
राधा भी आ रही है ना?
पर होगा क्या कान्हा?
उसे याद तो आओगे नहीं तुम।
उसे याद दिलाने जा भी कौन रहा है?
मैं तो चाहता हूँ कि मुझसे मिलने के पश्चात् वह मुझे भुलाने का प्रयास करे।
अच्छा!
पर उससे क्या बदलेगा?
राधा की जीवनधारा।
क्योंकि जिसे जितना भुलाने का प्रयास करो,
वह उतना ही याद आता है।
तू।
राधा
राधा।
क्या हुआ? कुछ नहीं माँ।
माँ
इतने सारे लोग क्यों आए हैं?
मुखिया जी
आप हमारी सहायता नहीं करेंगे तो कौन करेगा?
महाराज कंस ने हमारा बहिष्कार कर रखा है। हम जीवन यापन के लिए कहाँ जाएँ? आप बताइये
महाराज कंस के महायज्ञ के लिए
पात्र हमारे यहाँ से गए थे।
आज से तुम और बरसाने का पूरा कुमार संघ बहिष्कृत हुआ।
जीवन व्यापन के लिए किसी और राज्य में जाकर बसना चाहो तो यह अनुमति भी नहीं है।
कि
तुमसे किसी ने पत्र खरीदा या तुम्हारी सहायता करने की चेष्टा की तो महाराज कंस के कोप
का भागी होगा।
छोटे छोटे बालक। बूढ़े माता पिता
कैसे पालन होगा?
हम तो भूखे मर जाएंगे मुखिया जी।
आप तो हमारे मुखिया है। विपत्ति में सहायता कीजिए। प्रयास करके देख चुके हैं,
पर कोई लाभ नहीं हुआ।
कोई और समस्या होती
तो हम उसका निदान कर देते।
क्षमा चाहते हैं।
महाराजगंज का विरोध मैं भी नहीं कर सकता।
आप ही हाथ खड़े कर लेंगे तो हमारा हाथ कौन थामेगा? आप तो हमारे मुखिया हैं,
कुछ कीजिए।
वही तो समस्या है।
मेरे पिता बरसाने के मुखिया हैं। उन पर केवल आपकी ही नहीं, पूरे बरसाने की सुरक्षा का
उत्तरदायित्व है।
उन पर पद का भार भी होगा
और कंस के गुप्तचरों की दृष्टि भी। वह आपकी सहायता नहीं कर पाएंगे।
किंतु मैं न मुखिया हूं, न ही मुझ पर किसी पद का दबाव है।
मैं करूँगी आपकी सहायता।
के लिए राधा।
समस्या विकट है।
मथुरा जनपद के अधीन है।
महाराजा कंस के विरुद्ध कोई नहीं जा सकता। हम मथुरा जनपद पर आश्रित हैं तो एक बार हम
पर आश्रित हैं। बाबा क्या दोष हैं इनका
कि महाराज की यज्ञ के लिए पात्र बनाएं।
अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी का दंड इन निर्धनों पर क्यों?
मनुष्य की साँसों का ही नहीं पता कब टूट जाए। मृत्यु आ जाने पर कोई यमराज को दंड देता
है
तो एक पात्र के टूटने का दंड इन अबोध बालकों और वृद्ध को क्यों? बाबा!
जीते जी तो मार डाला महाराजगंज ने इन्हें। यहां रहकर कोई काम कर सकते हैं। मैं यहां
से कहीं बाहर जा सकते हैं।
बरसाने में यह भूख से बिलख कर मरेंगे तो क्या मन का एक भी दाना खा पाएंगे बाबा?
आप सीमा तोड़ रही हैं राधा जी।
आप बाबा की लाडली है। इसका अर्थ यह नहीं
कि आप भरी सभा में बाबा के निर्णय के विरुद्ध जाए।
मथुरा के महाराज के विरुद्ध जाना
रीति नहीं है। मैं बाबा के विरुद्ध कभी नहीं जा सकती। दामन
पर इन असहायों का साथ देना चाहती हूं।
और रही बात रीति की,
समाज की रीति तो एक शक्तिशाली व्यक्ति ही निश्चित करता है।
निर्बल को तो बस उसे बोझ समझकर ढोना पड़ता है।
मुझे आज बोलना पड़ा क्योंकि बाबा ने ही सिखाया है कि उचित और अनुचित में अंतर करके उचित
का साथ देना चाहिए।
अब आप ही बताईये बाबा
ने भूखे मरने देना उचित होगा? सुन रे बाबा,
समझाइए जीजी को।
जीजी का यह प्रयास पूरे परिवार का मान सम्मान भंग कर देगा। और मेरा यह मानना है कि मेरे
प्रयास से ना केवल बाबा के मान सम्मान की
बल्कि उनके कर्तव्य की, उनके वचन की भी रक्षा होगी।
इस वचन किस कर्तव्य के विषय में बात कर रहा था।
यह लोग आज आपके सामने अपने जीवन की आशा लेकर आए हैं। बाबा इन लोगों की सहायता करने से
ही आपका मान सम्मान बढेगा।
हर मुखिया का कर्तव्य होता है अपने लोगों की रक्षा।
हर मुखिया पद ग्रहण करते समय अपने लोगों की सुरक्षा और समृद्धि का वचन देता है जो आपने
भी तो लिया है।
अपने वचन पर बने रहने की सीख आप ही से तो मिली है बाबा।
तो आपको वचन तोड़ते कैसे देखूं मैं?
आज तक तुम्हें आशीर्वाद देता आया हूं। मेरा
धन्यवाद। कैसे तुम सब समझ में नहीं आते।
कभी कभी माता पिता स्वयं सीख भूल जाते हैं जो जीवन भर अपनी संतान को देते आए,
तुमने वो सीख याद दिलाकर मुझे अपराध करने से रोक दिया।
बोलो राधा
कैसे करें हम इनकी सहायता? आप बस प्रयास कीजिए कि किसी प्रकार महाराजगंज तक इनकी याचना
पहुंचा सके।
इनके विकट परिस्थिति समझाकर उनका मन बदल सके
तब तक इनके बनाए पात्र हाट में बेचने मैं जाऊँगी।
असंभव।
बाबा!
विश्वास है न मुझ पर।
तुम पर है।
कंस के सैनिकों पर नहीं।
उन्हें ज्ञात ही नहीं होगा कि पात्र बरसाने से आए हैं। अनुमति दीजिए बाबा।
एक शर्त पर।
तुम्हारे साथ सुरक्षा के लिए कुछ लोग जाएँगे।
स्वीकार है।
कैसा बनाएगा की वस्तु का आकार नहीं।
उसे बनाने में लगी सोच का आधार बड़ा होता है। बिटिया इसका आकार जैसा हो। तुम्हारी ममतामयी
सोच का तेज इसमें झलक रहा है।
राधा सुनो।
हम जो कर रहे हैं वो उचित तो है न? राधा हाँ विशाखा, हम उचित कर रहे हैं। न जाने क्यों
मुझे बार बार आभास हो रहा है
कि यह घटना किसी शुभ यात्रा को जन्म देने वाली है।
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
फुर्र
फुर्र।
क्या बात है?
आज कसरत नहीं हुई। बैलों को भोजन नहीं मिला। यह बैलगाड़ी कुछ अधिक ही धीरे नहीं चल रही
है।
हां,
क्योंकि आज मेरा मन शीतल हवा खाते खाते जाने का कर रहा है।
किन्तु
तुम्हारा मन शीघ्र पहुंचने के लिए इतना क्यों मचल रहा है कान्हा? यही तो प्रेम की विशेषता
है।
अब देखिये न,
सागर से मिलने के लिए नदिया लम्बी यात्रा तय करती है।
पर जब सागर सामने हो।
धीरज का तर्क छूट ही जाता है।
बस अब और प्रतीक्षा नहीं।
अरे
ओ
ओ
ओ
ओ
ओ ओ ओ
ओ ओ ओ
ओ
ओ
ओ
ओ
ओ
ओ ओ ओ
ओ ओ कहां भागे जा रहे हो? अरे रुको
दो प्रेमियों के मिलन के बीच में बाधा नहीं बनते।
मैं आ रहा हूं राधे।
मां।
हा हा
हा
हा हा।
हा हा
हा
हा
हा हा।
हा हा
हा
हा हा।
तुम प्रेम हो।
मेरे नेत्रों में तुम्हारे रूप का प्रवेश तो हो गया है मेरी। अब समय आ गया है कि इस
कहानी में मेरा प्रवेश हो जाए।
तुम प्रेम हो, तुम प्रीत हो, मनमीत हो, राधे मेरी मनमीत हो।
मैं बरसाना की एक लड़की से प्रेम करता हूँ।
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