All language subtitles for subtitles - Radha Krishna season 1 episode 1 - video Dailymotion

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Original subtitles

ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

ओ ओ ओ

ओ

ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

राधा राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण।

हमारी संस्कृति में

हर देव,

हर देवी को अलग अलग भाव के लिए पूजा जाता है।

राम को मर्यादा के लिए

तो सीता को सहनशीलता के लिए,

विष्णु को संचालन के लिए।

तो लक्ष्मी को

वैभव दान के लिए।

पार्वती शक्ति का रूप है।

तो शिव वैराग्य का।

पर जब बात प्रेम के भाव की आए।

तो एक ही जोड़ा ऐसा है

जिसे साथ साथ नमन किया जाता है। वह है राधा कृष्ण राधा। पर इस धरती पर राधा कृष्ण की

अलौकिक प्रेम कथा जानने से पहले हमें जानना होगा कि वह इस धरा पर क्यों आए? क्यों प्रेम

की सही परिभाषा समझाने उन्हें अवतार लेना पड़ा? और यह सब जानने के लिए हमें जाना होगा

गोलोक।

जहां युग युगान्तर से राधा कृष्ण बसते हैं। और यह कथा प्रारम्भ तब हुई जब कृष्ण का एक

परम भक्त उनसे भेंट करने गोलोक पहुंचा।

जय श्री कृष्णा।

जय श्री कृष्णा।

जय श्री कृष्णा।

जय श्री कृष्णा।

हरे

कृष्ण।

वर्षों पश्चात

मन की इच्छा पूर्ण होगी। मेरे प्रभु श्री कृष्णा के दर्शन कर पाऊंगा मैं।

कब वो पल आएगा जब मैं गोलोक पहुंचूंगा।

देवर्षि नारद। यह अचानक विमान क्यों रोक दिया गया? क्योंकि हम गोलोक पहुँच गए। श्रीदामा

गोलोक।

और देव ऋषि यहाँ तो दूर दूर तक कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। यह गोलोक है। प्रेम और भक्ति

का लोक

गोलोक लोग देखने के लिए प्रभु का नाम तो लेना ही होगा।

जय श्री कृष्ण,

जय जय

श्री कृष्ण।

देव ऋषि।

ना कोई मार्ग ना ही कोई

कोई द्वार। नाम अधूरा लोगे तो काम कैसे पूर्ण होगा? श्री धाम। यहाँ प्रवेश करने के लिए

श्री कृष्ण से पहले

राधा का नाम लेना होगा।

पर वो तो प्रभु की

प्रेमिका है।

नहीं ले सकता मैं उसका नाम।

अपने प्रभु के नाम से पहले

ब्रह्मा जी के उस संदेश का क्या होगा जो तुम उन्हे देने आए हो?

ब्रह्मा जी का कोप सह सकता हूँ मैं।

और अपने प्रभु के नाम से पहले उसका नाम लूं।

यह मेरी भक्ति का अपमान है और मैं अपनी भक्ति का अपमान

नहीं कर सकता। विचित्र दुविधा है।

चलो

मैं ही तुम्हारे और से

इस द्वार का ताला खोल देता हूँ।

राधा

कृष्ण।

यह है गोलोक।

का

देव ऋषि।

यह सारे कहाँ जा रहे हैं? प्रभु के श्रृंगार के लिए जो राधा रानी के ही हाथों से होता

है।

पंचतत्वों से।

मंच नाद वंश रूप पंचतत्व प्रगट प्रगट जीवन आधार नीर शुचि भाव परत प्रकट प्रगट श्याम

मुख को चूम स्वयं गंगा नीर बनत बनत। वायु छू के अंग को सौभाग्यवान भव भव धरा प्राण अन्न

धान पीताम्बर रजत रजत गहन तेज अग्नि रूप श्याम गहना रजत रजत शोभित हो नटवर को और प्रखर

अनाथ बालक नभ के रंग। मिलके संग शीश लंक धरत धरत। मोर मुकुट। चन्द्र देव तिलक सूर्य।

छल छल।

राधा राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण

राधा। श्री

राधा के।

राधा जी।

राधा जी।

राधा जी

राधे।

राधा कृष्ण राधा जी।

रहस्य राधा और राधा से ही रस

बरसे। बांसुरी बजाते हो

और बहुत से

खाते भी बनाते हो।

कृष्ण का श्रृंगार

राधा के कृष्ण से।

और बांसुरी का संगीत

राधा के स्पर्श से।

परम प्रेम में

राधिका।

शीना

परम उल्लास।

मधुर मिलन के

क्षण रचे।

कण कण में

महारास।

राधा।

कृष्णा।

राधा।

कृष्णा।

श्याम रंग में रंगी राधिका। आज हुई मतवारी। कृष्ण कृष्ण दोहराये हर पल। भूल के सुध बुध

सारी। महाराज की पावन बेला। तीन लोक से न्यारी। रास रचाये गोलोक में कान्हा। कुंज बिहारी,

राधा।

कृष्ण राम।

राम राम राम।

राम

राम राम

राम

राम राम।

राम

राम

राम

राम।

राम।

जाने कृष्ण हैं ध्यान। कृष्ण हैं तन मन जीवन

प्राण कृष्ण हैं

मान। कृष्ण भी

मान। कृष्ण हैं

राधा के भगवन।

कृष्ण हैं

कृष्ण बिना कुछ और नही है राधा के जीवन में बसी हुई हैं छवि कृष्ण की राधा के नैनन में

सदा महकती हैं। राधा इन साँसों के मधुवन में आठों पहर राधा का सुमिरन है मोहन के मन

मे राधा।

कृष्णा।

राधा।

कृष्ण नाम।

सौतन है इक प्राण है दोनों अलग न इक दूजे से दोनो ही है इक रूप कोई अलग कहे न कैसे एक

दूजे से जुडे हैं दोनों। राधे और गिरधारी। राधा के संग रास रचाये राधा रास बिहारी। राधा

राधा राधा राधा कृष्ण, कृष्ण कृष्ण

राधा राधा। ध्यान से देखें श्रीदामा

ये राधा कृष्ण।

ये दोनों अलग नहीं है। दो देह हैं

परन्तु आत्मा।

राधा राधा, राधा राधा कृष्ण, कृष्ण कृष्ण

राधा राधा राधा राधा कृष्ण, कृष्ण कृष्ण

राधा राधा राधा राधा

कृष्ण कृष्ण

राधा कृष्ण राधा कृष्णा,

राधा कृष्ण,

माया राम।

की।

माया है। सब उसकी माया है। जिसने जिसने मेरे प्रभु को छला।

चलो

प्रभु से

कर दो। उनके भ्रम का अंत करूँगा।

अवश्य करूँगा। बस प्रभु एक बार मिलने का अवसर। तो हे प्रभु! सबको एक अवसर अवश्य देते।

प्रभु ने तुम्हें उनसे भेंट करने के लिए बुलाया है।

कहाँ

राधा के पास?

मेरा अर्थ है

हारा के पास।

राधा कृष्ण।

राधा

मेरे मेरे प्रभु के पद चिन्ह।

उनके चरणों को छुई हुई माटी।

उनका प्रतीक।

विचित्र है ना?

हिंदू।

भक्त

ईश्वर को पाना चाहता है

पर उसके प्रतीक चिन्हों में खो जाता है।

वर्षों तुमने मुझसे भेंट की राह देखी।

अब मैं तुम्हारे सामने हूं।

तब भी राह देख रहे हो।

कृष्णा कृष्णा

हरे हरे,

कृष्णा कृष्णा

हरे हरे।

आपके दर्शन पाकर धन्य हो गया मैं।

मन की इच्छा पूर्ण हो गयी प्रभु।

प्रभु।

तो मन का भार भी हल्का करो। श्रीदामा।

उठो।

कुछ कहने आए थे ना तुम मुझसे।

प्रभु

ब्रह्मा जी का संदेश है।

मैं ब्रह्मदेव के संदेश की नहीं।

तुम्हारे मन के संदेश की बात कर रहा हूँ।

बोलो,

क्या पीड़ा है?

प्रभु पीड़ा तो

मन से लेकर आत्मा तक है।

एक भक्त के लिए उसका भगवान ही

सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। इस पूरी सृष्टि में आपका आपका कोई भी भक्त यह सहन नहीं

कर पाएगा प्रभु कि आपसे पहले

आपकी

आपकी प्रेमिका का नाम लिया जाए।

प्रभु आपके लोक में

आपके दर्शन के लिए

आपसे पहले किसी और का नाम क्यों?

वो तो मात्र आपकी प्रेमिका है।

और

तो और प्रभु प्रेम तो माया है ना।

उसका भक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं।

कौन है यह?

यह राधा प्रभु?

और मैं क्यों हूँ उसका नाम? मेरे प्रभु श्री कृष्ण के नाम से पहले।

यह झंडा देख रहे हो श्रीदामा।

कुछ विचित्र लगा।

आश्चर्य! प्रभु ये

जलधारा

नीचे से ऊपर की ओर जा रही है।

हाँ,

जो धरती के आकर्षण से नीचे की ओर बहे

वह धारा। और जो आकर्षण तोड़ कर ऊपर जाए

वह राधा राधा, राधा राधा। जो सागर से मिल कर अपना अस्तित्व खोदे

वह धारा।

और जो अपने अस्तित्व के उद्गम तक जाये

वो

राधा

कृष्ण, कृष्ण कृष्ण राधा से हर छूटती श्वास। कृष्ण

राधा तो हर ली हुई श्वांस है राधा

राधा। श्री

राधा के जीवन का सार कृष्ण है

तो जीवन का आधार है राधा

राधा, राधा राधा, राधा कृष्ण। अब तुम ही बताओ कि

क्या आधार से बड़ा सार

हो सकता है?

राधे

राधे राधे।

क्षमा चाहता हूँ प्रभु।

पर प्रभु एक

एक नदी सागर से बड़ी कैसे हो सकती है?

जलधारा नीचे से ऊपर की और कैसे बह सकती है प्रभु?

यह सब माया है प्रभु। छल हो रहा है आपके साथ।

राधा की माया के कारण आप।

अब भक्ति से अधिक महत्व

प्रेम को दे रहे।

हैं।

हो भी सकता है।

हो सकता है

मैं भी माया में फँसा हूँ।

क्या करूँ? भक्ति यदि समस्या में हो तो भगवान से प्रार्थना कर सकता है

मैं किससे सहायता मांगू? कौन करेगा मेरे मन से?

इस माया के अंधकार को दूर।

मैं करुँगा प्रभु।

जिन प्रभु ने मुझे जीवन दिया,

उनकी बाधा को मैं दूर करूँगा।

बस एक एक अफसर मिल जाए।

भोग का समय हो गया है।

कदाचित

वहीं तुम्हें अवसर मिल जाए।

मूल प्रकृति रूपाय

मूल कारण कारिणी

गुरु आमोद

प्रमोद। आया।

मंगलम। शुभ मंगलम।

राधे कृष्णा,

राधे कृष्णा,

कृष्णा कृष्णा, राधे राधे,

राधे कृष्णा,

राधे कृष्णा,

कृष्णा कृष्णा। राधे राधे राधे।

सर्व देवाधि देवाय

तारी कामिया स्वामी जी

गोलोकवासी ने पुरातन

नित्य श्री नित्य मंगलम्।

राधे कृष्णा।

राधे कृष्णा कृष्णा कृष्णा। राधे राधे।

राधे

राधे राधे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा,

राधे

राधे कृष्णा, राधे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा, राधे राधे

राधे राधे राधे

राधे राधे

राधे कृष्णा

कृष्णा

कृष्णा कृष्णा।

बस,

बस

बस।

ये क्या कर रही है आप?

क्या है ये?

भोग।

कान्हा भोग भोग

आप मेरे प्रभु को अपनी जूठन खिला रही हो और उसे भोग कह रही है।

भोग नहीं

ये विलास है।

मैंने माखन चखा

ताकि वो खट्टा न हो।

अपने प्रिय को शुद्ध भोजन खिलाना

विलास नहीं।

प्रेमी का उल्लास

अद्भुत

है।

मेरे प्रभु श्री कृष्ण की जूठन

उनके भक्त प्रसाद समझकर ग्रहण करते हैं और आपने मेरे प्रभु को अपने जूठन खिला दी।

ये जो भक्ति का अपमान आप कर रही हैं और उसे प्रेम का नाम दे रहे हैं।

यह प्रेम नहीं है।

यह माया है माया।

माया के प्रयोग से आपने

आपने मेरे प्रभु को भटका दिया है।

मेरे प्रभु के नाम से पहले अपना नाम लेने की परंपरा शुरू की आपने।

भक्ति से प्रेम का अस्तित्व होता है। जैसे सूर्य से प्रकाश का

और प्रकाश को सूर्य से अधिक समझना

मूर्खता है। मूर्खता। मूर्खता सच में नहीं, सोच में होती है।

जब तक सूर्य की किरणें तुम पर पड़ती है तो कहते हो

सूर्य उदय हुआ। जब दूर हो जाती है तो कहते हो

सूर्य अस्त हुआ।

परंतु

सूर्य तो कभी अस्त होता ही नहीं।

हम तक सूर्य नहीं आते।

सूर्य की किरणे आती हैं।

किरणों से दूर रहोगे

तो सूर्य नहीं दिखेंगे।

अब बताओ

प्रकाश का अस्तित्व सूर्य से

या सूर्य का प्रकाश से?

मुझे तुम्हारे भक्ति मार्ग से कोई समस्या नहीं है

तो तुम क्यों प्रेम के मार्ग को निकृष्ट सिद्ध करना चाहते हो? क्योंकि भक्ति प्रेम से

श्रेष्ठ है

और यह बात आज मैं सिद्ध कर के रहूँगा।

नहीं सिद्ध कर दूंगा

कि कैसे आप सब को भ्रमित किया है गोलोक की

स्वामिनी ने।

अब आप सब मेरे साथ केवल मेरे प्रभु श्री कृष्ण का नाम जपेंगे।

जय श्री कृष्णा।

जय श्री कृष्णा। जय श्री कृष्णा।

श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेवा। श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी।

हे नाथ नारायण वासुदेवा कृष्ण हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे कृष्णा हरे कृष्ण हरे

कृष्णा हरे कृष्णा हरे हरे कृष्णा हरे कृष्णा हरे कृष्णा।

देखिए मेरे प्रभु के जाप की महिमा।

पूरी प्रकृति जाग उठी।

माटी के पात्र

स्वर्ण के हो गए।

और अंकुर

अंकुर कल्पवृक्ष बन गए।

देखिए इस कीट को।

इस कीट को लक्ष्य बनाइए और जब ये

केवल राधे राधे।

राधे राधे।

राधे राधे।

राधे।

देखिए, केवल राधा नाम जपने से कीट भस्म हो गया।

अब आप ही बताइए

कि

क्या श्रेष्ठ।

भक्ति

जो जीवन देती है

या प्रेम

जो जीवन लेता है।

उस तितली को देखिये।

उस तितली को अपना लक्ष्य बनाइए और जब ये केवल। राधे राधे।

राधे राधे। राधे राधे।

राधे।

देखिए

अब तो सत्य सामने आ ही गया होगा।

प्रकृति ने इसे पंख दिए।

नए पुष्पों को खिलाने का सामर्थ्य दिया। उसका जीवन खुद ही मुरझा गया। केवल राधा नाम

के उच्चारण से।

हा!

हा हा हा हा हा

हा हा।

हा हा

हा।

अब भी आपको मेरे तर्क पर विश्वास नहीं है।

तो देखो इस कन्या की ओर।

इसे अपना लक्ष्य बनाइए और

जब ये राधे राधे।

हां।

हां।

बोलो

बोलो राधे राधे।

हां।

यदि सत्य सामने आ गया हो तो। आज के बाद मेरे प्रभु श्रीकृष्ण के नाम से पहले

राधा का नाम मत लेना।

हा हा हा

हा हा

हा हा हा

हा हा

हा हा हा

हा हा हा

हा हा हा

हा

हा

हा हा हा हा

हा हा हा

हा हा हा हा

प्रभु

मैंने अपना तर्क सिद्ध कर दिया।

अब आप भी घोषणा कर दीजिए

कि कृष्ण

राधा से श्रेष्ठ।

हैं

कि भक्ति

प्रेम से श्रेष्ठ है।

कोई भी

महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पूर्व कुछ क्षण विचार कर लेना आवश्यक होता है। श्री राम।

मुझे विश्राम करना

ताकि उचित निर्णय ले पाऊं। जैसी आपकी इच्छा प्रभु।

राम।

राधा।

कृष्ण।

राधा

राधा।

राधा।

कृष्ण।

राधे राधे बोलो ना।

क्या

फिर से

राधे राधे।

सब पर अपनी माया का जाल फैला रखा है।

कोई समझाओ इस कन्या को

अपना विनाश पुकारने को कह रही है।

हाँ।

हाँ।

अच्छा हुआ तो

हम।

एक और सहायता चाहिए तुमसे

आज्ञा प्रभु!

तुम्हारी भक्ति सत्य है

या राधा का प्रेम माया।

यह निर्णय लेने के लिए मुझे बहुत सोचना विचारना पड़ेगा

और मैं नहीं चाहता

कि इस समय कोई भी बाधा मेरे समक्ष आए।

मेरे द्वारपाल बनोगे।

ना तेरे ना आने दें। एक भक्त के लिए इससे बड़ा सम्मान क्या हो सकता है प्रभु?

नारद

तो ठीक

है। तुम सुनिश्चित करो कि मेरे मन मंथन के मध्य में

कोई भी बाधा न आए।

आप निश्चिंत रहिए प्रभु,

मैं किसी को भी भीतर नहीं आने दूंगा।

किसी को नहीं।

किसी को भी नहीं। प्रभु!

तेरे नाम और तेरे नाम

मेरे राम

राम राम राम,

हरे राम,

हरे राम,

हरे राम

राम राम

हरे राम,

हरे राम

हरे राम,

राम

राम, हरे राम,

राम राम।

राधे राधे बोलने के लिए कहो ना

कहो ना बोलने को कोई समझता क्यों नहीं है?

मैं समझती हूँ।

राधा

इस कन्या के साथ। हे प्रभु ये कैसी भूल हो गई। हम सब से

कुछ अनर्थ घटित हो उससे पहले मुझे सब को बताना होगा।

अब क्या होगा?

अब उनकी पुकार आएगी।

राधे।

राधे।

हम सब से

हम सब से बहुत बड़ी भूल हो गई है। कैसे भूल हुई हमसे जो।

हमें शीघ्रता राधा के पास जाना चाहिए।

चलो।

रुक जाओ,

तुम भीतर नहीं जा सकती

माँ। छोड़िए श्रीदामा!

कृष्ण मुझे पुकार रहे हैं।

मैने तो उनकी पुकार नहीं सुनी।

प्रेम की पुकार बहुत तीव्र होती

है। एक लोक से दूसरे लोग सुनाई देती है।

परंतु उसे

जिसके मन में प्रेम

मार्ग छोडिए

कृष्ण ने मुझे पुकारा है।

उन्हीं प्रभु कृष्ण ने

मुझे आदेश दिया है कि किसी को भी

भीतर न जाने दिया जाए।

राधा कहाँ है?

उन्होंने पुकारा और वह चली गई। हाँ।

राधा

राधा।

कृष्ण मुझे पुकार रहे हैं।

किसी भी मूल्य पर भीतर प्रवेश नहीं करने दूंगा।

अगर तुम्हें आगे बढ़ना है

तो मेरी भक्ति के तर्क को काट कर आगे जाना होगा। जहां भक्ति होती है, वहां तर्क की आवश्यकता

नहीं होती। श्रद्धा

भक्ति में व्यक्ति अपनी इष्ट से जुड़ता है,

कुछ करता नहीं।

भक्ति का अर्थ किसी का अपमान नहीं,

सबकी भावनाओं का सम्मान है।

राधे

राधे

मुझे पुकार रही,

पुकार रहे हैं मुझे। रुक जाओ राधा

तुम्हारे द्वार के मध्य सात पगों की दूरी है। पर मैं तुम्हें दूरी पार सात जन्मों में

भी नहीं करने दूंगा।

जिनका संबंध

जन्म जन्मांतर का

उन्हें साथ नहीं रोक सकते।

श्रीदामा!

मैं तुम्हारी भक्ति का सम्मान करती हूं।

तुम मेरे प्रेम का अपमान मत करो।

सम्मान तो तुम्हारा होने वाला है। वो झूठा सम्मान

जो तुमने माया से पाया है।

बस एक बार मेरे प्रभु श्रीकृष्ण स्वीकार कर ले के तुम माया हो।

तब तुम्हें गोलोक छोड़कर जाना होगा।

तब मेरी भक्ति में कोई बाधा ना होगी क्योंकि गोलोक में

राधा ना होगी।

गोलोक इतना भी बड़ा नहीं

कि राधा और कृष्ण के मध्य दीवार बन सके।

कृष्ण। मेरी स्मृति में।

स्मृति से बढ़कर।

कुछ भी नहीं।

बहुत गर्व है ना अपनी स्मृति पर।

सावधान! एक पग भी आगे बढ़ाया तो

सहारा दे

देना होता

है।

जरा

सा आगे रहना।

होता

है।

अगला पग आगे मत बढ़ाना राधा।

अन्यथा तुम्हारी स्मृति छीन लूँगा मैं।

कृष्ण की पुकार अनसुनी करते।

बस किया तुमने। मुझे तो अब सुनो।

मैं

श्रीकृष्ण भक्त श्रीदामा।

अपनी भक्ति की शक्ति को साक्षी मानकर तुम्हें श्राप देता हूं, तुम्हें श्राप देता हूं।

मैं आशा करता हूं।

कि तुम वर्षों तक श्रीकृष्ण को भूली रहोगी। श्रीकृष्ण को भूल ही रहोगी।

और गोलोक से दूर मृत्यु लोक में रहोगी। मृत्यु लोक में रहोगी।

प्रभु।

मैंने आपकी समस्या को सरल कर दिया।

मैंने राधा को गोलोक से निष्कासित कर दिया।

ये क्या अनर्थ कर दिया श्रीदामा! मैंने वही किया जो उचित था।

उचित तो तुमने पहले किया था श्रीदामा।

अर्थात।

राधे राधे, बोलो ना।

मैं क्यों बोलूं मैं? राधे राधे।

जानती हो क्या होगा अगर मैंने कह दिया तो। राधे राधे।

हां

जानती हूं मैं।

एक छोटा सा कीट थी मैं

धरा से संघर्ष करते हुए,

सरकते हुए

अपनी मुक्ति की चाह में।

आप सबने

राधे राधे कहा और मैं कीट योनि से मुक्त हुई। अब मैं आकाश में उड़ सकती थी। पंख मिल

गए थे मुझे। मुझे लक्ष्य मान कर आप लोगों ने फिर से राधे राधे कहा और मैं मनुष्य बन

गए।

84 लाख योनियों के बाद मनुष्य जन्म मिलता है। वह मुझे।

एक नाम के दो बार पुकारने से मिल गया।

अब तो बोलो राधे राधे,

बोलो ना।

मुझे मुक्ति मिल जायेगी। आत्मा परमात्मा से मिल जायेगी। राधे राधे बोलो ना। फिर से बोलो

राधे राधे।

हा हा।

हा।

हा हा

हा

हा

हा।

हा।

हा।

क्या कर दिया?

बहुत बड़ा अनर्थ कर दिया।

बहुत बड़ा।

अनर्थ को ठीक से देखो

तो उसमें भी अर्थ छिपा होता है श्रद्धा।

उठाओ।

जो भी होता है

कृष्ण की इच्छा से।

पर

आपको गोलोक छोडकर जाना होगा।

यह बहुत बडा पाप कर दिया मैंने।

बहुत बडा पाप हो गया मुझसे।

कभी कभी जिसे हम पाप समझते हैं,

वही पुण्य का आधार होता है श्रद्धा।

तुम ब्रह्मदेव का संदेश लेकर आए थे ना?

क्या था संदेश

ब्रह्मदेव ने कहा है कि

श्री कृष्ण के धरती पर अवतरित होने का समय आ गया है।

अपनी लीला से बोलो।

तारा राणा निंदाना राणा दिन राजिंदर राणा लिंकन।

राम।

तारा राणा लिंकन। ना ना ना।

ना ना ना

ना ना।

ना

अब

आपने मुझे निमित बना

दाना राणा

और मैं

ना मैं इतनी बड़ी भूल कर बैठा।

माना।

जा रहा है।

भूल को स्वीकारना।

भूल सुधारने का प्रारंभ होता है।

संसार में ऐसे कितने मनुष्य हैं,

जो भूल स्वीकार करते हैं?

मनुष्य उसी की भक्ति करता है,

जिससे वह प्रेम करता है।

परंतु उसी भक्ति को शक्ति बनाकर अपने आराध्य पर वश पाना चाहता है।

सब भूल जाते हैं। प्रेम का अर्थ किसी को पाना नहीं,

उसमें खो जाना है।

हां, आत्म संतुष्टि नहीं।

आत्मा का विस्तार।

भक्ति का मूल

प्रेम है।

मैंने तुम्हें शब्दों से समझाया।

तुम नहीं समझे, क्योंकि संसार जो सुनता है

उसे भुला देता है

और जो देखता है

उसे स्मरण रखता है।

इसलिए हमें जाना होगा

संसार को यह समझाने की।

ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग है

प्रेम।

हर पीड़ा का अंत है

प्रेम।

हर शुभ का आरम्भ है

प्रेम।

और यह हमें साक्षात करके दिखाना होगा।

पाने को ही प्रेम करें।

जग की यह रीत।

प्रेम अर्थ समझाएगी

राधा कृष्ण की प्रीत। राधा राधा, राधा कृष्ण, कृष्ण। अब तो बोलो न राधे राधे

बोलो न।

बोलो राधे राधे

राधे राधे।

राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे। राधे राधे।

राधे।

राधे।

राम।

राम

राम।

राम।

राम

राम।

राम

राम।

क्यों खोल दी कान्हा?

पहचानने के लिए

अब यह आवश्यक तो नहीं

कि तुम धरती पर यही रूप लेकर जाओ।

मुख बदल लिया तो पहचान लूँगा और सावधान हो जाऊँगा।

सावधान!

सावधान! किसलिए?

अब यदि तुम्हारे सामने किसी

और के साथ प्रेम प्रसंग हुआ तो

ऐसा क्यों होगा भला?

राधे।

सबको प्रेम समझाने जाना धरती पर। इसलिए सावधान कर देती हूं। कान्हा अगर ऐसा किया तो।

तो क्या तुम्हें?

मैं क्या

तुम्हें। मैं कह देती हूं कि मैं क्या कह देती हूं राधा

कान्हा मैं कह देती हूं कि मैं क्या

करूंगी। क्या

तुम्हें कान्हा, मैं तुम्हें छोडूंगी नहीं।

जोर

जोर से धड़कने लगा।

नहीं।

मार खाने तुम्हें धरती पर आना होगा।

हाँ।

मैं नहीं आऊँगा।

क्यों? मैं।

तो तुम्हें मिला है।

मैं तो सब भूल जाऊँगी। कान्हा।

तुम्हें स्मरण रहेगा।

श्राप तो तुम्हें मिला है।

कितना कठिन होगा ना तुम्हारे लिए।

छोटा घर, सरल

डगर प्रेम की। हो ही नहीं सकती राधा।

अब तो खाना।

बहुत शीघ्रता जानेगी।

क्योंकि जितना जल्दी जाओगी

उतना शीघ्र। लौट के भी तो आऊँगी ना।

बिना

मैं कुछ नहीं हूँ। राधे के

प्रिया।

जो भी था मेरा समर्पित तुमको कर दिया।

तुम मुझसे

दूर नहीं।

मुझ में तुम समाई हो।

मैं हूँ अगर

काया तो

तुम मेरी परछाई हो। राधे क्यों

भला? घड़ी

विरह की आज है आई।

कैसे दूर रह सकेगी तन

से परछाई।

सागर से

लहरे भला

कैसे अलग रह पायेगी।

कृष्ण से जो

दूरी हो,

राधा कहा सह पायेगी?

कृष्णा।

राधा, राधा, राधा, राधा कृष्ण, कृष्ण कृष्ण,

राधा, राधा राधा, राधा कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, राधा कृष्ण, राधा कृष्ण, राधा कृष्ण,

कृष्ण, राधा कृष्ण, राधा कृष्ण, राधा कृष्ण, कृष्ण कृष्ण।

ओ।

ओ ओ ओ

ओ ओ ओ ओ

ओ ओ ओ ओ।

पाने को ही

प्रेम

करे।

जग की है

ये

मेरी।

प्रेम। अर्थ

समझाएगी अधूरी

राधा के।

ना।

की थी।

बधाई हो बृषभान जी। लाली हुई है

अपनी लाडली का मुख तो देखूं। लाली ने आंखें नहीं खोली है।

उसके साथ घर में आई

देवकी देखो इतने दिव्य और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया है तुमने, जिसने स्वयं आपको अपनी

मुक्ति का मार्ग दिखाया है।

वह आपको लक्ष्य तक पहुंचा ही देगा।

नारायण वासुदेव। नियति ने एक अलौकिक पुत्र दिया है मुझे। इसीलिए इसका नाम होगा कृष्ण।

कृष्ण हरे रंग का राधा

पूतना हूं मैं।

16 वर्ष का एक एक पल राधा से दूर रहने की पीड़ा में एक एक युग जैसा बीता है। अब हमारा

मिलन कुछ ऐसा होगा जिसके पश्चात हमें कभी अलग नहीं होना पड़ेगा।

राधे

राधे

राधे राधे

राधे राधे

राधे।

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