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हम अभी भी इस चीज़ को
समझने के शुरुआती चरणों में हैं जिसे हम मानसिक स्वास्थ्य कहते हैं।
आप चाहे किसी भी जाति, सभ्यता या वर्ग से हों,
मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ सर्वव्यापी स्वास्थ्य समस्याएँ हैं।
मैं अपने ओसीडी से जूझ रही हूँ।
मैं बढ़िया तैयार होकर बड़े से बड़े लोगों से मिल सकता हूँ,
पर अंदर से बिल्कुल टूटा हुआ महसूस कर सकता हूँ।
सब लोग सोचते हैं तुम बीमार पड़ते हो और फिर ठीक हो जाते हो।
ऐसा नहीं होता है।
मुझे नहीं लगता ऐसा कोई भी व्यक्ति होगा जिसके परिवार का
कोई ना कोई सदस्य डिप्रेशन, चिंता, मानसिक आघात से पीड़ित नहीं होगा।
यह डिप्रेशन मुझे हरा देता है...
अच्छी बात यह है कि ठीक होने के लिए कभी भी बहुत देर नहीं होती।
यहाँ पर टूटे हुए लोग आकर अपना दुःख प्रकट कर सकते हैं।
हमारे पास बहुत बड़ा अवसर है।
तुम्हें बस, केवल सही जगह पर होना है।
हर किसी पर कोई ना कोई बोझ है।
हर किसी की कोई कहानी है।
द मी यू कांट सी
दुनिया भर में बहुत से लोग
किसी ना किसी तरह का मानसिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक दर्द झेल रहे हैं...
हाँ।
...जिसे शायद उन्होंने स्वीकार ना किया हो,
ख़ासकर क्योंकि इस वर्ष ने हमें निश्चित तौर पर दिखा दिया है,
हमारी मानवता के सामने एक बड़ा सा आईना रख कर...
-हाँ। -...कि हम कौन हैं।
तो, कोविड-19 से पहले आपके सामने जो भी मसला था
वह बहुत बड़ा बन गया।
तो, मेरे विचार में, बहुत से लोगों के लिए,
एकांतवास और अकेलापन बहुत बड़ी समस्या बन गया है।
इसने निश्चित रूप से दुःख के सामने एक आईना रख दिया है,
क्योंकि दुःख केवल किसी व्यक्ति को खोने पर नहीं होता।
कोई भी चीज़ जो आपके लिए महत्वपूर्ण है, उसे खोने पर दुःख होता है।
तो इसलिए, बच्चों को अपनी हाई स्कूल ग्रेजुएशन ना हो पाने का दुःख हो रहा था
जिसका उन्हें इंतज़ार था।
-अपने दोस्तों से ना मिल पाने का दुःख। -अपने दोस्तों से ना मिल पाने का दुःख।
और अपनी सामान्य ज़िंदगी ना जी पाने का दुःख।
तो इस साल ने हमारी सभ्यता के तौर पर हम जो हैं,
उसे ऐसे तरीकों से बदला है, जिसका सामना, शायद अभी भी बहुत लोगों ने नहीं किया है।
इसकी शुरुआत में कुछ लोगों ने कहा कि यह सबको समान स्तर पर ले आया है।
-मैं इससे पूरी तरह असहमत हूँ। -यह सबको समान स्तर पर नहीं लाया।
जो लोग पहले ही कष्ट में थे, उनके कष्ट अब और बढ़ गए हैं।
-सही है। -मेरे विचार में एक चीज़,
जिस पर हम सहमत हो सकते हैं,
वह यह है कि पूरे विश्व में, हर किसी ने एक ही चीज़ का अलग-अलग रूप अनुभव किया है।
सही है। तो यह विचार कि कोविड-19 ने लोगों का क्या हाल किया है...
ऐसे-ऐसे तरीकों में नज़र आएगा...
जैसा किसी ने कभी सोचा भी नहीं होगा,
अगर आप इसके होने से पहले ही किसी तरह हिम्मत जुटा कर किसी चीज़ का
सामना करने की कोशिश कर रहे थे।
इस साल ने यह वाक़ई साबित कर दिया है कि हममें से 100 नहीं तो 99.9 प्रतिशत ने
-अब वाक़ई अनुभव कर लिया है... -किसी ना किसी तरह का सदमा।
-...किसी ना किसी तरह का सदमा। -हाँ।
या किसी तरह का शोक या किसी तरह का नुकसान।
-हाँ। -मैंने एक बार किसी को कहते सुना था,
"जिस दर्द के रूप में बदलाव नहीं आता, वह हस्तांतरित हो जाता है।"
और यह मूल रूप से, व्यक्त करना है। है ना?
लोग जिन्हें... लोग जो दुःखी हैं, स्वाभाविक तौर पर जिनके दुःख का कारण है
उनका ख़ुद का पालन-पोषण, उनका वातावरण,
उनके साथ जो हुआ, जो उनको सहना पड़ा, जो उन्होंने देखा है।
जो भी कारण हो, अगर आप उसे रूपांतरित नहीं करते, उस पर विचार कर उसका सामना नहीं करते,
तो अंत में वह विभिन्न तरीकों से बाहर निकलता है,
जिस पर आपका बस नहीं है और आपको नहीं पता यह कब होगा।
और वह अनसुलझा है, और वह, वह हमें अंदर से खाता जाता है।
पर आप यह समझ नहीं पाते। और देखो, यह...
मैं यह पहचानने वाले पहले लोगों में से होऊँगा।
पहले तो, मेरे अंदर एक डर था जब मैं सबसे पहले थेरेपी के लिए गया। डर था कहीं खो...
तुमने थेरेपी कब शुरू की?
-चार साल हो गए। -चार साल तो हाल ही की बात लगती है।
पर चार साल की थेरेपी
एक ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने कभी सोचा नहीं था कि वह थेरेपी लेना चाहेगा या लेगा,
यह... यह काफ़ी लंबा समय है।
मैं ऐसे वातावरण में भी नहीं था जहाँ ऐसी बात करने के लिए आपको प्रोत्साहित किया जाए।
उसे जैसे, एक तरह से, दबा दिया जाता था।
अच्छा, तो तुम्हें क्यों लगा तुम्हें इसकी ज़रूरत है।
मेरा अतीत। अपने अतीत से उबर कर ठीक होने के लिए।
हैरी
कई सालों तक, मैंने इस बारे में सोचा तक नहीं था।
ऐसा नहीं कि मैं उसे दबा कर बैठा था। मैं तो उससे अनभिज्ञ था।
मैं हमेशा सामान्य होना चाहता था।
वैदरबी स्कूल
"राजकुमार हैरी" के बजाय केवल "हैरी।"
वह बहुत पेचीदा ज़िंदगी थी।
पर, दुर्भाग्यवश, जब भी मैं अपनी माँ के बारे में सोचता हूँ,
दिमाग़ में आने वाली पहली चीज़ बार-बार एक ही चीज़ होती है।
कार में सीट बेल्ट से बँधे,
और कार में मेरा भाई भी साथ में,
और मेरी माँ गाड़ी चलाती हुईं, चार-पाँच मोपेड हमारा पीछा करती हुईं,
जिन पर पैपराज़ी बैठे हैं।
और फिर हमेशा आँसुओं के कारण वह गाड़ी नहीं चला पाती थीं।
कोई सुरक्षा नहीं थी।
एक चीज़ जो मुझे हमेशा महसूस होती है, वह है लाचारी की भावना।
बहुत छोटा होना। एक लड़का होना पर एक महिला की मदद करने के लिए बहुत छोटा होना।
इस मामले में, जो तुम्हारी माँ है।
और यह चीज़ हर रोज़ होती थी।
-बस, बहुत हो गया। धन्यवाद। -ठीक है।
हमें एक अच्छी सी तस्वीर लेने देंगी, कृपया?
हर रोज़ जब तक उनकी मृत्यु नहीं हुई।
हम पेरिस से आने वाली ख़बरों के साथ लगातार बने हुए हैं...
31 अगस्त, 1997
...जहाँ एक कार दुर्घटना में राजकुमारी डायना गंभीर रूप से घायल हो गई हैं।
पता चला है, उनके साथी, डोडी अल-फ़ायद की मृत्यु हो गई है।
शायद इस दुर्घटना में कुछ पैपराज़ी भी शामिल थे,
फ़ोटोग्राफ़र जो डायना का पीछा कर रहे थे।
कुछ ख़बरों के मुताबिक पता चला है, वे लोग मोटरसाइकिल पर थे,
और इस दुर्घटना का कारण शायद वे भी हो सकते हैं।
जब मेरी माँ मुझसे 12 साल की उम्र में छिन गईं,
मेरे 13वें जन्मदिन से एकदम पहले,
मुझे वह ज़िंदगी नहीं चाहिए थी।
सारी दुनिया के साथ अपनी माँ की मौत का गम बाँटना।
मेरे लिए, जो चीज़ मुझे सबसे ज़्यादा याद है,
वह था सड़क पर घोड़ों की टापों की आवाज़।
मॉल के साथ, लाल ईंटों वाली सड़क पर।
इस समय तक, हम दोनों गहरे सदमे में थे।
ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने शरीर से बाहर था
और बस साथ में चलता हुआ वह कर रहा था जो मुझे कहा जा रहा था।
जितना जज़्बा बाकी लोग दिखा रहे थे, उसका दसवाँ हिस्सा दिखाता हुआ।
चार्ल्स।
मेरा कहना था, "यह मेरी माँ हैं। तुम तो इनसे कभी मिले भी नहीं हो।"
विलियम।
और जब तुम बोल रहे थे...
मैं कोशिश करूँगी, मेरी आँखों से आँसू ना निकलें...
पर जब तुम बोल रहे थे, मैं सोच रही थी,
हममें से वे लोग जो तुम्हारी माँ के प्रशंसक थे और दूर से उन्हें प्यार करते थे,
उन्होंने शायद तुमसे ज़्यादा उनकी मौत पर चिंतन किया।
बिल्कुल सही।
उनके साथ जो हुआ, उसे लेकर मैं इतना गुस्से में था
और इस चीज़ पर कि कोई... कोई न्याय नहीं हुआ।
उसके बारे में कुछ नहीं किया गया।
वही लोग जिन्होंने उस सुरंग में उनका पीछा किया था,
उन्होंने ही उस कार की पिछली सीट पर उनकी मरते हुए की तस्वीरें खींची।
जब मुझे गुस्सा आता है, मेरा मन करता है उन सारी दुकानों को लूट लूँ।
उन सारी घटिया पत्रिकाओं को लाकर उनका बड़ा सा ढेर बना उनमें आग लगा दूँ।
मरती हुई डायना की तस्वीर पर नाराज़गी
तुम्हें शर्म आनी चाहिए
मैं उनके बारे में सोचना नहीं चाहता,
क्योंकि अगर मैं उनके बारे में सोचूँगा,
तो मुझे फिर याद आएगा कि मैं उन्हें वापस नहीं ला सकता।
वह मुझे केवल उदास करेगा। उदास चीज़ों के बारे में सोचने का क्या फ़ायदा?
उस इन्सान के बारे में सोचने का
क्या फ़ायदा जिसे आपने खो दिया है और अब कभी वापस नहीं पाएँगे?
और मैंने तय किया मैं इस बारे में बात नहीं करूँगा।
-तुम्हारे आसपास कोई इसकी बात कर रहा था? -कोई इसकी बात नहीं करता था।
तुमने बड़े ध्यान से सब तय किया है, मैंने देखा।
वह जो कुछ भी था, उस समय के बाद, कितने साल तक बस ऐसा था, जैसे,
आँख, कान सब बंद करके रखो और आगे बढ़ते जाओ।
जैसे कि, अगर लोग कहते... मैंने यह पहले भी बताया है।
अगर लोग कहते, "तुम कैसे हो?" तो मेरा जवाब होता, "ठीक हूँ।"
ना ख़ुश, ना दुखी। बस ठीक। "ठीक हूँ" मेरा... "ठीक हूँ" आसान जवाब था।
पर मानसिक तौर पर मैं बहुत अशांत था।
हर बार जब मैं सूट और टाई पहनता था और मुझे वह किरदार निभाना पड़ता था
और, एक तरह से, जैसे, बस यह सोचता था, "हाँ, गंभीर चेहरा बनाओ।"
आईने में देखो। "हाँ, ठीक है। चलो चलें।"
घर से निकलने से पहले ही, मैं पसीने से तरबतर हो जाता था। मेरे दिल की धड़कन...
मैं करो या मरो वाली हालत में होता था। पैनिक अटैक, ज़बरदस्त चिंता।
तो, 28 वर्ष से लेकर लगभग 32 वर्ष तक की उम्र का समय
मेरे जीवन में एक भयानक दुःस्वप्न की तरह था।
हर बार जब मुझे कार में कहीं जाना होता था या जब भी मुझे कैमरा दिखता था,
मैं बुरी तरह घबरा जाता था।
उस समय कैसा महसूस होता था?
मुझे पसीना आने लगता था।
मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरे शरीर का तापमान
कमरे में मौजूद बाकी सब लोगों से दो-तीन डिग्री ज़्यादा गरम है।
मैं अपने आपको यक़ीन दिला लेता था कि मेरा चेहरा एकदम लाल है,
और इसलिए हर कोई देख सकता है मैं क्या महसूस कर रहा हूँ।
पर किसी को नहीं पता होगा क्यों। तो मुझे शर्म आती थी।
तुम्हारे दिमाग़ में वह विचार बैठ जाता है
और फिर तुम्हें लगता है, जैसे, सब लोग मुझे ही देख रहे हैं।
पसीने की एक बूँद ऐसे लगती है जैसे पसीने की धाराएँ बह रही हों।
पसीने से तरबतर। और फिर, मेरे दिमाग़ में बस चलता रहता था,
"यह कितना शर्मनाक है। यह लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे?
इन्हें कुछ नहीं पता। मैं इन्हें कुछ बता नहीं सकता।"
जहाँ भी मैं जाता था, जब भी किसी से मिलता था,
ऐसा लगता था जैसे मेरे शरीर से जान निकल रही है।
दूसरे लोगों की भावना को महसूस करना।
आख़िरकार, मुझे कोई मिलता था जिसे मुझसे भी ज़्यादा पसीना आ रहा होता था,
और मैं रुक कर उनसे बात कर पाता था,
और फिर सब शांत हो जाता था, और फिर मैं आगे बढ़ पाता था।
मैं शराब पीने के लिए तैयार था। मैं ड्रग्स लेने के लिए तैयार था।
मैं ऐसी कोई भी चीज़ करने के लिए तैयार था जो मेरी इन भावनाओं को
कम महसूस करवाए।
पर धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि मैं सोमवार से शुक्रवार चाहे नहीं पी रहा था
पर मैं पूरे सप्ताह की शराब की मात्रा
एक ही दिन में, शुक्रवार या शनिवार की रात को पी जाता था।
और मैं इसलिए नहीं पीता था क्योंकि मुझे मज़ा आता था,
बल्कि इसलिए क्योंकि मैं किसी चीज़ को छिपाना चाहता था।
जब तुम यह कर रहे थे, क्या तुमको पता था
कि तुम कुछ छिपाने की कोशिश कर रहे हो?
नहीं। मुझे उसका कोई एहसास नहीं था।
जो कि मेरा दिमाग़ मुझे बता रहा था कि मेरा युद्ध चल रहा है
पर मुझे यह पता नहीं था। मुझे क्योंकर यह पता होगा?
मेरे जीवन के सबसे ख़ुशगवार दिन सेना में मेरे दस साल थे।
निस्संदेह।
क्योंकि मुझे वही वर्दी पहननी होती थी जो बाकी सब पहनते थे।
मुझे बाकी सब की तरह ही ट्रेनिंग करनी होती थी।
बाकी सब की तरह मैंने सबसे नीचे से शुरुआत की।
मैं जो था, उसके कारण मेरे साथ कोई विशेष व्यवहार नहीं हुआ।
यह कर लिया।
वहीं मैंने सबसे अधिक सामान्य महसूस किया,
और, दरअसल, अपनी युवावस्था में, सबसे अधिक शांति मैंने महसूस की
अफ़गानिस्तान में, जहाँ पर कोई मीडिया नहीं था।
पर मुझे अपने अतीत का सामना तो करना ही था क्योंकि मेरे मन में बहुत गुस्सा भरा था।
सत्ताइस-अठाइस वर्ष की आयु तक, मेरे मन में सवाल उठने शुरू हो गए थे,
"क्या मुझे सच में यहाँ होना चाहिए?"
और तब मैं अचानक सोचने लगा, "तुम सारा समय इससे बचकर नहीं रह सकते।"
परिवार के लोगों ने कहा, "जैसा चलता आया है, करते रहो, तुम्हारी ज़िंदगी आसान रहेगी।"
पर मुझमें मेरी माँ का बहुत सा अंश है।
मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं इस सारे सिस्टम से बाहर हूँ,
पर फिर भी इसमें कैद हूँ।
उसमें से निकल कर स्वयं को आज़ाद करने का एकमात्र तरीका है
सच बोल देना।
रशाद
मैं अपनी पूरी ज़िंदगी शेफ़ रहा हूँ।
जब मैं बड़ा हो रहा था, तब सबको पता था कि मैं शेफ़ बनूँगा।
कैसे हैं आप लोग? मैं शेफ़ रशाद हूँ। मैं ब्लैक फ़ूड कलेक्टिव का संस्थापक हूँ।
मैंने ब्लैक फ़ूड कलेक्टिव सन् 2017 में शुरू किया। हमारा पहला इवेंट एफ़्रो टेक था।
कृपया सब लोग यहाँ आकर ट्रक से सामान उतारने में मदद करेंगे?
-आज की कॉन्फ़्रेंस कैसी चल रही है? -अच्छी है।
यहाँ लोगों को खड़े मत होने देना।
एक चीज़ जिसकी खाद्य उद्योग में कमी है,
वह है अश्वेत लोगों के खाने के व्यवसाय।
मैं हूँ शेफ़ रशाद। यह सब मैं ही स्थापित कर रहा हूँ।
"चॉप्ड" विजेता शेफ़ रशाद
खाना हर तरह के लोगों को एक साथ ला सकता है।
-यह लो। -धन्यवाद। आभारी हूँ।
लोग हमेशा कहते थे, "तुम या तो शेफ़ बनोगे या कोई उपदेशक।"
हमारा ध्येय है, ऐसे कामों को शुरू करवा कर उन्हें आगे बढ़ाना,
उन्हें यह दिखा कर कि वे अपने परिवार और समुदाय के लिए
वास्तव में इतनी दौलत कमा सकते हैं
कि ज़िंदगी भर उनका गुज़ारा चल सके।
जब भी मैं लोगों के सामने जाकर कुछ बोलता हूँ,
लोग कहते हैं, "बाप रे। यह कितना ज़बरदस्त था, जो तुमने कहा।"
मैं कहता हूँ, "वह मैं नहीं हूँ।"
वह रशाद नहीं है।
मुझे अपने चेहरे पर मुखौटे लगाना बहुत अच्छी तरह सिखाया गया था।
तो मैं बढ़िया तैयार होकर बड़े से बड़े लोगों को मुस्कराते हुए
मिल सकता हूँ, उनके साथ बातें कर सकता हूँ,
पर अंदर से बिल्कुल टूटा हुआ महसूस कर सकता हूँ।
मेरे बचपन की छोटी-छोटी चीज़ों ने मुझ पर बहुत असर डाला।
जब मैं बहुत छोटा था, पुलिस ने हमारे घर पर छापा मारा
और मेरे पिता को जेल में डाल दिया गया।
मुझे उन्हें जेल में मिलने जाना याद है।
बड़े होने के दैरान, मैंने बहुत कुछ देखा है।
मेरे कुछ दोस्तों को नशे की लत है।
मेरे कुछ दोस्त हैं, जो ख़ुद से ही बातें करते घूमते हैं।
मेरे साथ...
यह सब लोग... मेरी जान-पहचान के यह अश्वेत आदमी
जो मुझसे छोटे या बड़े हैं और सामना कर रहे हैं...
या किसी चीज़ का सामना कर ही नहीं रहे।
तो जब मैं उन्हें देखता हूँ...
जब मैं उन्हें देखता हूँ, मुझे अपना चेहरा नज़र आता है।
समाज के लोग आज भी मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझते...
डॉ. ब्रूस पैरी की आवाज़
सीनियर फ़ैलो चाइल्डट्रॉमा अकैडमी
...लोगों को कलंक की नज़र से देखते हैं।
और विडंबना यह है कि मुझे नहीं लगता ऐसा कोई भी व्यक्ति होगा
जिसके परिवार का कोई ना कोई सदस्य
डिप्रेशन, चिंता, नशे की लत या मानसिक आघात से पीड़ित नहीं होगा।
आप यह चार चीज़ें लो लो, और शायद 80 प्रतिशत लोग इनमें मिल जाएँगे।
लोग यह कहने से पहले दो बार नहीं सोचेंगे
कि उनके बच्चे को कैंसर है और वह उसका इलाज कराने जाएँगे।
पर उन्हें यह कहने में शर्मिंदगी महसूस होती है, "मेरे बच्चे को डिप्रेशन है,
और मुझे उसे इलाज के लिए लेकर जाना है।"
तो मुझे लगता है हमारे समाज को अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है।
मुझे असुरक्षित महसूस करवाया जाता था
कि मैं उसके बारे में बोलता हूँ, खुल कर उसके बारे में बताता हूँ।
"चुप रहो।" "यह मत बोलो।" "नहीं, शांत हो जाओ।"
"अरे, नहीं, तुम बहुत बोलते हो।"
डिप्रेशन और चिंता झेलने के बाद, मेरा खाना बनाने का शौक़ ख़त्म हो गया है।
वह पूरी तरह गायब ही हो गया है।
चॉप्ड
सन् 2018 में, मैंने "चॉप्ड" जीता।
शेफ़ रशाद आर्मस्टेड, आप "चॉप्ड" के विजेता हैं।
बैंक में 10,000 डॉलर लेकर जाने से पहले एक मिनट रुक कर अपनी जीत का मज़ा लीजिए।
धन्यवाद।
मैंने अपनी "चॉप्ड" की कड़ी देखी तक नहीं।
मुझे याद है वह शो करने के दौरान मैं कितने दर्द में था।
एक साल में, मेरी तमाम ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है।
मेरा तलाक हुआ, दो रेस्तोरां बंद हुए। कार चली गई।
मेरे क्रेडिट का बुरा हाल था।
एक अश्वेत आदमी के दृष्टिकोण से कहूँ तो,
तुम इतनी सारी सही चीज़ें करने की कोशिश कर रहे हो
जो कि तुम्हें कहा जाता है तुम्हें करनी चाहिए,
और जैसा तुम्हें होना चाहिए और जैसा तुम्हें बरताव करना चाहिए
और जिस तरीके से तुम्हें रहना चाहिए,
बिना यह जाने कि कोई अन्तर्भाव भी है।
कार किराए पर देने वाले लोगों ने कहा कि मेरा हुलिया एक ऐसे आदमी से
मिलता है जो नकली क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करता है।
कुछ मिनटों के लिए मुझे रोक कर रखा गया क्योंकि मैं अश्वेत हूँ।
इस आदमी ने अवैध ढंग से गाड़ी खड़ी की है। इसे फ़ेसबुक पर डालो।
दो सेकंड के लिए खड़ी की है। फ़ेसबुक पर डालने की ज़रूरत नहीं।
यह मेरी सुरक्षा के लिए है क्योंकि तुम्हारा पुलिस बुलाना...
तुम्हारा एक आदमी के लिए पुलिस बुलाना
क्योंकि उसने दो सेकंड के लिए गाड़ी खड़ी की, घटियापन है।
-हाँ। एक से शुरू होकर ही भीड़ बनती है। -ख़ासकर क्योंकि...
और उससे कई बार सब छोड़ देने की इच्छा होती है।
कभी इच्छा होती है, और ज़ोर से मुक़ाबला करो।
मगर यह फिर भी ऐसी चीज़ों में से है जहाँ तुम्हें...
तुम्हें इस अंधेरे में आशा की किरण ढूँढनी ही होगी।
अश्वेत समुदाय में,
हमें सालों से सिखाया गया है, चर्च जाओ, सब कुछ ईश्वर को सौंप दो,
और सब कुछ ठीक हो जाएगा।
अश्वेत समुदाय में थेरेपी को वर्जित कर्म मानते हैं।
हम वह सब नहीं करते।
तो मुझे सब कुछ अपने अंदर दबा लेना पड़ा।
अब मैं डिप्रेशन और चिंता से जूझ रहा हूँ।
कई बार आत्महत्या करने का मन करता है।
मेरे जीवन का सबसे भारी एहसास।
ऐसा लगता था मेरे ऊपर काफ़ी बोझ है।
क्योंकि मैं सच में हिम्मत जुटा कर रखने की कोशिश करता था।
मेरी हालत ऐसी होती थी।
"अच्छा, ठीक है। बस आगे बढ़ते रहो, बढ़ते रहो।"
बचपन की यादें उभर आती हैं।
और मैं डर से जैसे सुन्न पड़ जाता हूँ।
पर मुझे आगे बढ़ते जाना है क्योंकि अगर मैं आगे नहीं बढ़ता रहा,
तो मैं करूँगा क्या?
मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं ट्रेडमिल पर भाग रहा हूँ।
जैसे मैं भागता जा रहा हूँ पर कहीं पहुँच नहीं रहा।
थेरेपी के लिए जाना। मुझे नहीं पता था यह इतना तनावपूर्ण होगा।
इस समय मेरे दिमाग़ में हज़ारों, लाखों चीज़ें चल रही हैं।
बस...
ख़ासकर क्योंकि आज सुबह बिस्तर से निकलना ही मेरे लिए बहुत मुश्किल था।
यह उन कुछ दिनों में से था जब मेरे लिए जाग कर
एक-एक कदम उठाना ही जैसे चुनौती होती है।
क्योंकि हर चीज़ जैसे पुकार रही थी... मुझे कह रही थी,
"अपना आज का कार्यक्रम बदल लो। बस यह करो। वह करो।
तुम यह कर लो और बिस्तर में ही रहो और तुम्हें आराम करने का हक़ है।"
और इस तरह की सारी अच्छी चीज़ें।
पर... मुझे उस सब को भूल कर आगे बढ़ना था।
मैंने सीख लिया है कि जब तुम कुछ चीज़ें बोलते हो, तो उन्हें संभव बना देते हो।
ऐसी चीज़ें जिनके बारे में मैं कभी-कभी कोशिश करता हूँ, बात ना करूँ
और ना ही दूसरों से सांझा करूँ।
थेरेपी में, तुम्हें वह सब बताना होता है
अगर तुम्हें वह वाक़ई सही तरीके से करना है।
तो मैं उसमें बहुत असहज हो जाता हूँ।
हाँ, वह, वह वाक़ई काफ़ी ज़ोरदार था,
पर वह...
बस कुछ चीज़ें जो मैं...
कुछ स्थितियाँ जो मैं उसको बता रहा था, उसकी प्रतिक्रिया थी...
"बाप रे।
यह तो सच में गंभीर चेतावनियाँ हैं।"
इस सबसे कितनी तरह की भावनाएँ उमड़ आईं।
अरे, यार।
अब यह उस स्तर तक पहुँच चुका है जहाँ अगर मैंने सब कुछ ईमानदारी से नहीं बताया,
अगर मैंने वह सब महसूस नहीं किया जो अभी कर रहा हूँ,
अगर मैंने उसके बारे में झूठ बोलने की या उसे छिपाने की कोशिश की,
वह बहुत ख़तरनाक स्थिति हो जाएगी।
उस मुखौटे को उतरना ही होगा।
यही एकमात्र तरीका है मेरे आज़ाद होने का, अगर मैं यह मुखौटा उतार फेंकूँ।
तुम्हारे दिमाग़ का स्वास्थ्य भी उतना ही
महत्वपूर्ण है जितना तुम्हारे शरीर का।
उसे एक माँसपेशी की तरह प्रशिक्षित कर पाना...
मैं जानता हूँ दिमाग़ माँसपेशी नहीं है पर उसे प्रशिक्षित कर पाना...
हम अपने शारीरिक स्वास्थ्य पर जितना ध्यान देते हैं...
-सही है। -...उतना ही ध्यान हमें...
मानसिक स्वास्थ्य पर देना चाहिए।
यह दोनों अलग नहीं हैं। हम यह जानते हैं। यह आंतरिक रूप से जुड़े हुए हैं।
पर सारे समाज में, सारी दुनिया में,
इसके साथ जो कलंक और बाकी सब जुड़ा हुआ है,
मानसिक स्वास्थ्य जैसे पीछे छूट जाता है, पर यह एक अदृश्य चोट भी है।
और जो चीज़ें हम देख नहीं पाते या समझ नहीं पाते,
उनसे हमें डर लगता है।
और ऐसी किसी चीज़ के बारे में बात कर पाना मुश्किल है
जो, शायद, बहुत से लोग महसूस नहीं करते।
बिल्कुल ठीक। अब घूँसा मारो।
ठीक कर रही हो। नीचे रहो!
ठोड़ी नीचे!
मेरे ओलम्पिक जाने में छः महीने बचे हैं।
इस समय मैं दुनिया में नंबर तीन पर हूँ,
और सब लोग मुझसे आशा लगा कर बैठे हैं...
कि मैं ना केवल टोक्यो जाऊँगी बल्कि स्वर्ण पदक लाऊँगी।
उसे रिंग में देखो तो, उसकी लड़ाई लंबी जा सकती है,
फिर बस एक घूँसा मार कर उसे जीत सकती है।
और यह जैसे... मुझे यह एक मास्टरपीस की तरह लगता है।
वर्जीनिया फ़ूक्स क्रिस्टीना क्रूज़
...विजेता,
वर्जीनिया फ़ूक्स!
जिन्नी
जब मैं छोटी थी, मैं कहती थी, "मुझे कोई बीमारी नहीं है।"
कि, "मैं बीमार नहीं हूँ।"
अपने हाथ ऊपर करो।
स्कूल के दौरान, मैं ऐनोरेक्सिक हो गई।
इसकी शुरुआत तो केवल डाइटिंग से शुरू हुई, पर फिर यह अधिक तीव्र बन गया
और मुझे उसके नतीजे बहुत अच्छे लगे।
स्थिति वहाँ तक पहुँची कि मेरा वज़न इतना कम हो गया,
मेरे डॉक्टरों और माता-पिता को चिंता हो गई कि कहीं मैं
आत्महत्या ना कर लूँ या ख़ुद को भूखा ना मार लूँ।
तो उन्होंने मुझे हस्पताल में दाखिल कर दिया।
वहाँ पर डॉक्टरों ने पता लगाया
कि ऐनोरेक्सिया का वास्तविक कारण है
कि उसे ओसीडी नामक बीमारी है।
कोलोरैडो स्प्रिंग्स ओलम्पिक सिटी यूएसए
यूएसए बॉक्सिंग का गर्वित घर
जब मैं यहाँ कोलोरैडो स्प्रिंग्स में इस कमरे में अकेली होती हूँ,
कभी-कभी यह कमरा एक जेल की तरह लग सकता है।
बॉक्सिंग के जूते साफ़ करो
दाँत साफ़
ऐसा होता है जैसे मेरा ओसीडी अब पूरी तरह हावी हो सकता है।
यहाँ और कोई नहीं है।
और मैं सुबह पाँच बजे तक सफ़ाई करने में ही फँस सकती हूँ।
ट्रेनिंग के लिए मुझे अपने बॉक्सिंग के जूते चाहिए
पर मैं वो तब तक नहीं पहन सकती जब तक वो साफ़ ना हों।
मैं अपने जूते बार-बार धोती हूँ क्योंकि, मेरे दिमाग़ में,
ये नीचे से इतने संदूषित हैं।
तो, मुझे गंदे जूते पहनने बहुत बुरे लगते हैं।
लानत है।
तो...
जूता मेरी बाँह से छू गया।
तो अब मुझे जाकर अपने हाथ धोने पड़ेंगे।
तो दुष्चक्र से मेरा यह मतलब है।
जब मैं कुछ साफ़ करती हूँ, तो उस दौरान मैं मैली हो जाती हूँ।
और फिर मैं जाकर ख़ुद को साफ़ करती हूँ।
अच्छा। मुझे मेरा साबुन चाहिए।
तो मुझे लगा इसमें दस मिनट लगेंगे, पर...
फिर से, मैं हमेशा ख़ुद से कहती हूँ, जब ऐसा कुछ होता है,
तो सब कुछ बदल जाता है।
बहुत बार, मेरे हाथों पर साबुन एक ख़ास तरीके से गिरना चाहिए नहीं तो...
नहीं तो यह वैसे साफ़ नहीं होगा जैसे मैं करना चाहती हूँ।
मुझे लगता है साफ़ होने के लिए दो अलग-अलग तरह के साबुन चाहिए।
फिर कहूँगी, मुझे नहीं पता क्यों, पर मेरा दिमाग़ मुझसे यह कहता है।
यहाँ पर जूता मुझसे छुआ था।
मेरी कलाई पर छुआ तो मैं इसे अपनी कलाई पर
ऐसे डालने की कोशिश कर रही हूँ... जहाँ... जैसे उसने मुझे छुआ था।
तो...
ओसीडी के साथ चक्कर यह है, कि यह एक जाल की तरह है।
"बस करो," मैं ख़ुद से कहती हूँ। पर नहीं कर पाती।
ऐसा लगता है जैसे मैं इस सफ़ाई के चक्र में कैद हूँ।
हालाँकि मैं बाहर निकलना चाहती हूँ, इसे रोकना चाहती हूँ...
बस, लगभग हो गया।
...मेरा मन कहता है, "नहीं, बस एक बार और। एक बार और।"
मेरे साथ क्या होता है, कि अगर मैं अपने हाथ ठीक तरीके से नहीं धोती,
तो मुझे अपने शरीर में कुछ बहुत अजीब सा महसूस होता है जिसमें
तुम्हारा दिमाग़ धुँधला जाता है, तुम्हारी माँसपेशियाँ तन जाती हैं।
तुम बस... तुम्हारा दिमाग़ ठीक तरह काम नहीं करता।
और यह बंद नहीं होता।
मैंने अपनी ज़्यादातर ज़िंदगी यह छिपा कर रखा।
और उससे मैं ज़्यादा असुरक्षित महसूस करती थी।
मैं ख़ुद को पसंद नहीं करती थी।
मैंने इसे इतनी देर तक छिपाया क्योंकि मैंने सोचा लोग राय बना लेंगे
और वे सोचेंगे कि मैं कोई पागल हूँ।
इसके बारे में बता कर मैं इसे ज़्यादा अच्छी तरह समझ पाई हूँ।
जब मैं लोगों को बताती हूँ, वे पूछते हैं, "तुम ऐसा करती क्यों हो?"
और उससे मैं सोचती हूँ, "हँ। मैं ऐसा क्यों करती हूँ?"
तो फिर मुझे सोचना पड़ता है मैं यह क्यों करती हूँ, फिर जब समझ पाती हूँ क्यों,
तो कहती हूँ, "अच्छा।"
-ज़रूर। -तुमने ये देखा?
तुमने देखा तुम क्या कर रही हो?
मुझे पसंद नहीं कि मेरे रैप ज़मीन से छू जाएँ।
मेरी टीम के सब सदस्य, वे परवाह नहीं करते। वे बस करते हैं...
अपने हाथों पर लपेट रहे हैं। सब ज़मीन छू रहा है।
जबकि मेरा हाल होता है, "नहीं!"
या जब डर्विन मेरे रैप निकालता है, हम ध्यान रखते हैं यह ज़मीन को ना छुएँ।
वह आख़िरकार, सीख गया है। और उन्हें अपने कंधे पर रख लेता है।
कुछ समय लगा उसे सीखने में पर अब उसे पता है।
ज़मीन लावे की तरह है। संदूषण का लावा।
मैं तो यही कहती हूँ।
और मेरे ओसीडी का चक्कर यह है, बहुत से लोग जो संदूषण से डरते हैं,
असल में उनका डर बीमार होकर मरने के बारे में भी हो सकता है।
ज़रूरी नहीं कि मेरा डर भी यही हो।
मुझे यह चिंता नहीं थी, "हे भगवान, उसका खून मेरे मुँह में चला गया।
मुझे कुछ हो जाएगा, बीमार पड़कर मर जाऊँगी।"
मुझे इसकी चिंता नहीं थी।
मेरा डर ज़्यादा यह है
कि उस गंदे, घृणित एहसास से मुझे लगता है मैं गंदी, घृणित इन्सान हूँ।
ओसीडी होता है बार-बार आपके दिमाग़ में एक जैसे विचार आना
जो कारण बनते हैं आपकी परेशानी, घबराहट या डर...
डॉ. एंजला स्मिथ, क्लिनिकल साइकॉलोजिस्ट की आवाज़
...और बार-बार दोहराए जाने वाले बरताव का जो उस परेशानी को कम करने के लिए किए जाते हैं।
ओसीडी कई प्रकार की होती है।
लोगों को सबसे अधिक आदत होती है तरतीब और संतुलन की,
या चीज़ें बिल्कुल सही तरीके से होने की।
संदूषण ओसीडी के साथ, डर होता है घृणा का।
यह घृणा की भावना इतनी बुरी होती है,
कि यह बरदाश्त से बाहर है, ख़त्म ही नहीं होती,
और यह सारी क्रियाएँ इस अप्रिय भावना से पीछा छुड़ाने के लिए की जाती हैं।
अपने ओसीडी को अपनी बॉक्सिंग में
ना घुसने देने में मैं हमेशा सफ़ल रही हूँ।
पर पिछली फरवरी बिलकुल अलग थी।
तीन दिन तक, मैं दो घंटे से ज़्यादा नहीं सोई।
मैं जिम में होती थी और कुछ मेरी त्वचा को छू जाता था,
और मैं जाकर उसे धोती थी, पर...
मैं उस छोटी सी जगह को भी धो रही थी
जिससे ज़मीन दो सेकंड के लिए छू गई थी।
मैं एक छोटी सी जगह को शायद 30 मिनट के लिए धोती थी
और फिर जाकर कपड़े धोने लगती थी।
पर कपड़े ठीक नहीं धुलते थे
तो दो-तीन बार मुझे कपड़े धोने पड़ते थे।
और ऐसे यह बढ़ता गया।
नहाने की सारी प्रक्रिया बद से बदतर होती चली गई।
अब मुझे पूरा घंटा लगता था।
पहले मैं एक बार नहाने के लिए केवल एक स्पंज इस्तेमाल करती थी,
पर अब मैं एक बार नहाने के लिए दस-दस स्पंज इस्तेमाल करने लगी।
एक बार नहाने के लिए साबुन की पाँच टिक्कियाँ।
शावर जेल की बड़ी-बड़ी बोतलें ख़त्म करने लगी।
एक बार नहाने में दो बोतलें ख़त्म कर देती थी।
मैं खा भी नहीं रही थी क्योंकि मेरे पास कैफ़े में जाकर खाने का समय नहीं था।
मुझे अगले अभ्यास से पहले नहाना होता था।
मैं उस एहसास को इतने ज़ोर से ढूँढ रही थी कि वह सब करने के दौरान,
मेरी माँस-पेशियाँ कस जातीं, और मैं...
इतनी तेज़ साँस ले रही थी कि जैसे मैं कसरत कर रही हूँ।
वह ऐसे था जैसे मैं चौबीसों घंटे कसरत कर रही हूँ, बिना रुके केवल एक घंटा सोकर।
तुम तीन दिन तक सोए नहीं हो,
तुम्हें मतिभ्रम होने लगता है, कुछ सोच नहीं पाते।
और उस तीसरी रात, मैं बस उसी में फँस गई।
मैं लगातार वही करती जा रही हूँ और वह बदल नहीं रहा।
ख़ुद को साफ़ करने का वह एहसास बदल नहीं रहा,
और मैं ख़ुद से ही बहुत परेशान हो गई।
मैं कह रही थी, "बस बंद करो!" ख़ुद पर चिल्ला रही थी।
रो रही थी। सोच रही थी, "हे भगवान, मैं रुक क्यों नहीं पा रही?"
और मैं आगे-पीछे चक्कर काट रही थी।
बस ऐसे ही इधर-उधर।
मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ। मैं बस इस जाल में फँस गई थी।
अब तुम बॉक्सिंग नहीं कर पाओगी। किसी से मिल-जुल नहीं पाओगी।
मुझे लगा, "अब तुम जीवित नहीं रह पाओगी।"
क्योंकि अगर तुमने उठ कर जीने की कोशिश की,
तो तुम उस जाल में फँस जाओगी और बाहर नहीं निकल पाओगी।
इस समय तक मैं इतना थक गई कि मैं ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी।
मैं ज़मीन पर जैसे गिर सी गई।
और उस समय मैंने सोचा, "मुझे किसी की मदद लेनी ही होगी,
और बेहतर होगा वह मैं अभी करूँ इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।"
मानसिक स्वास्थ्य के कलंक से संबंधित
आपने और कौन से शब्द सुने हैं?
-पागल। -पागल।
-दिमाग़ खराब हो गया है। -दिमाग़ खराब हो गया।
-ख़ुद को संभाल नहीं सकता। -दिमाग़ ठीक नहीं है।
हाँ। नर्वस ब्रेकडाउन।
-हाँ। -यह "अलग" है...
का ठप्पा लगने का कलंक
शायद सबसे भयंकर है, जब मानसिक स्वास्थ्य की बात आती है।
देखो ज़रा कितने सालों से
लोगों ने इसे अपने परिवार वालों से भी छुपाने की कोशिश की है
और चाहा है यह किसी को पता ना चले।
और अगर तुम्हारे माँ-बाप इसकी बात नहीं करते
और तुम्हारे दोस्त तुम्हें इसकी याद नहीं दिला सकते,
तो तुम्हारे पास कोई कारण नहीं यह कहने का, "रुको ज़रा।
हो सकता है, यह मेरे पालन-पोषण का नतीजा हो।"
हाँ। और वह हर व्यक्ति जिसने इसे राज़ रखा,
शर्मिंदगी में जीया, उस
उस चुप्पी को तुम्हारा कलंक बनने दिया
और अपने लिए उस चुप्पी की सीमा तोड़ ली।
तुम समझते हो कि जब तुम इस कहानी को दूसरे लोगों को सुनाते हो,
उससे ना केवल दूसरे लोग तुम्हें अलग तरीके से देख पाते हैं
बल्कि तुम भी ख़ुद को अलग तरीके से देखते हो
और बहुत सारे अन्य लोगों की मदद कर पाते हो।
तो मुझे वह "आहा" वाले क्षण बहुत पसंद हैं,
और ऐसी कहानियाँ दूसरों के साथ सांझा कर पाना
जिससे लोग ख़ुद को किसी और में देख पाते हैं।
और जब भी मैं लेडी गागा जैसे किसी व्यक्ति को देखती हूँ,
उठ कर इसके बारे में बात करते हुए,
मुझे पता है यह बहुत अच्छी बात है, क्योंकि इससे लोग कहते हैं,
"अरे, तुम? तुम भी, जबकि कितना कुछ तुम्हारे पास है और देखने को मिलता है?"
तो यहाँ हमारा ध्येय है, कि हम लोगों से इसके बारे में बात करवाएँ।
कृपया स्वागत कीजिए बेमिसाल लेडी गागा का!
जब मैं ओपरा से मिली और हमने वो बातें कीं...
हैशओपराज़2020विज़नटूर
मानसिक स्वास्थ्य संकट में है।
तो इलाज से आपको मदद मिली?
इलाज से मुझे बहुत मदद मिली। मेरा मतलब...
और उसके बाद, वह मेरे साथ कमरे में वापस आई।
तुम इतनी संवेदनशील थीं, इतनी सच्ची थीं, इतनी स्वाभाविक थीं...
और हम दोनों रो रहे थे, एक-दूसरे को गले लगा रहे थे।
मुझे लगा मैं किसी ऐसे व्यक्ति के साथ हूँ जो सुरक्षित है।
मैंने ऐसा समय बिताया है जब मेरे दिमाग़ का बहुत बुरा हाल था
और मुझे अब भी उस पर काम करना पड़ता है।
और...
मैं कोशिश कर रही हूँ कि अपने अनुभव से दूसरों को कुछ सिखा सकूँ,
बजाय इसके कि,
पता नहीं, उसे छिपा कर मैं नाटक करती फिरूँ।
नहीं पढ़ सकता, नहीं पढ़ सकता
नहीं, वह मेरा भावहीन चेहरा नहीं पढ़ सकता
मुझे उसके जितना कोई पसंद नहीं
स्टेफ़नी
मेरा मानसिक स्वास्थ्य, मैंने सोचा,
एक समस्या थी जब मैं बहुत छोटी थी।
जब मैं बहुत छोटी थी, ख़ुद को काट लेती थी।
दुर्व्यवहार के साथ मेरे अपने अनुभव रहे...
और मेरे लिए ऐसे तरीके से इसे बता पाना बहुत मुश्किल है
जिससे मुझे लगे कि युवा लोगों के लिए सुनना सुरक्षित है
या बड़े लोगों के लिए भी सुनना ठीक है कि कोई ख़ुद को क्यों काटेगा।
मेरा मानना है कि मेरी वह तीव्र इच्छाएँ इसलिए पैदा होती थीं
क्योंकि मैं अपने अंदर की तक़लीफ़ दिखाना चाहती थी।
सुनो
द बिटर एंड 20 जनवरी 2006
मेरी बहुत घटिया अभिलाषा है
मैं 19 वर्ष की थी...
स्टेफ़नी लाइव
...और मैं इस क्षेत्र में काम कर रही थी,
और एक निर्माता ने मुझसे कहा...
"अपने कपड़े उतारो।"
और मैंने मना कर दिया।
और मैं वहाँ से चली आई।
और...
उन्होंने मुझे कहा वे मेरा सारा संगीत जला देंगे।
और वे रुके नहीं...
उन्होंने मुझसे यह कहना बंद नहीं किया और फिर मैं बस जड़ हो गई और मैं बस...
मुझे नहीं... मुझे याद भी नहीं है।
और मैं उसका नाम नहीं बताऊँगी।
मैं यह मी टू आंदोलन समझती हूँ।
मैं समझती हूँ कि कुछ लोग इसे बहुत सहजता से कर पाए
पर मैं नहीं कर सकती।
मैं उस आदमी का चेहरा फिर कभी देखना नहीं चाहती।
लेडी गागा ने किशोरावस्था के दौरान यौन आक्रमण सहने के बाद
पीटीएसडी से ग्रसित होने के बारे में बताया
यह व्यवस्था इतनी अत्याचारपूर्ण और ख़तरनाक है।
"मुझे कई तरीके के आघात सहने पड़े हैं...
पर मैं जीवित रही और मैं आगे बढ़ती रही।"
कई साल बाद मैं हस्पताल गई। वे एक मनोरोग चिकित्सक को ले आए।
मैंने कहा, "मेरे लिए एक असली डॉक्टर को लेकर आओ।"
मैंने कहा, "मनश्चिकित्सक क्यों आया है? मुझे अपना शरीर महसूस नहीं हो रहा।"
पहले मुझे तेज़ दर्द हुआ।
फिर मैं सुन्न हो गई।
और फिर उसके बाद मैं कई हफ़्तों तक बीमार रही,
और मैंने महसूस किया कि यह दर्द वैसा ही था जैसा तब था जब
गर्भवती होने पर मुझे वह व्यक्ति एक कोने पर छोड़ गया था जिसने मेरा बलात्कार किया था,
मेरे माता-पिता के घर के पास।
क्योंकि मुझे उल्टियाँ हो रही थीं।
और मैं बीमार थी।
क्योंकि मेरा शोषण किया गया था।
मुझे महीनों तक एक स्टूडियो में कैद रखा गया था।
लेडी गागा बताती हैं कि उनके पीटीएसडी के लक्षण कैसे महसूस होते हैं:
'मेरा सारा शरीर ऐंठ जाता है'
मैं चाहती हूँ...
कि यह देखने वाले सब लोगों को मैं बता सकूँ कि अब मैं अपने आँसू सुखा लेती हूँ।
और आगे बढ़ जाती हूँ। ऐसे... देखा आपने?
ऐसे...
अपनी आँखें खोलती हूँ। ऐसा करना मुझे सिखाया गया था।
अपने कंधे पीछे की ओर घुमाओ। अपनी आँखें खोलो।
तुम्हें नियंत्रण करने में मदद करता है।
पता है, मुझे पता है मैं कहाँ हूँ। मैं अपने ऑफ़िस के बेसमेंट में हूँ।
और...
तुम ऐसी चीज़ों के बाद भी वापस आ सकते हो।
पर जब यह...
जब यह तुम्हें बहुत बड़ा झटका देता है...
यह तुम्हें बदल सकता है।
मैं अपना दिमाग़ी संतुलन खो बैठी थी।
और कुछ सालों तक,
मैं वही लड़की नहीं थी।
लेडी गागा ने बाकी बचा जोएन विश्व टूर रद्द किया
'तेज़ दर्द' के कारण
दर्द होने पर मुझे जैसा महसूस होता है...
लेडी गागा ने फाइब्रोमायल्जिया दर्द के कारण टूर की डेट्स रद्द कीं
...वैसा मुझे मेरा बलात्कार होने के बाद महसूस हुआ था।
मेरे ढेरों एमआरआई और स्कैन हो चुके हैं।
उन्हें नहीं... उन्हें कुछ नहीं मिलता।
पर...
तुम्हारा शरीर याद रखता है।
मुझे कुछ महसूस नहीं हो रहा था।
सौजन्य वाहन
मैंने ख़ुद को सबसे अलग कर लिया।
ऐसे था जैसे मेरे दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया।
और तुम्हें समझ नहीं आता कि और कोई घबरा क्यों नहीं रहा,
पर तुम अत्यं... जैसे संविभ्रम की अत्यंत बुरी दशा में हो।
वह सच में, बहुत वास्तविक चीज़ है,
ऐसा महसूस करना कि एक काला बादल
तुम्हारे पीछे-पीछे हर जगह आ रहा है,
और कह रहा है कि तुम बिल्कुल बेकार हो और तुम्हें मर जाना चाहिए।
और मैं चीखती-चिल्लाती थी और दीवारों से टकराती फिरती थी।
और पता है ख़ुद को काटना क्यों अच्छा नहीं है?
दीवारों से ख़ुद को टकराना क्यों अच्छा नहीं है?
ख़ुद को नुकसान पहुँचाना क्यों अच्छा नहीं है?
क्योंकि इससे तुम्हें बदतर महसूस होता है।
तुम्हें लगता है तुम्हें बेहतर महसूस होगा
क्योंकि तुम किसी को दिखा रहे हो कि, "अरे, देखो, मैं तक़लीफ़ में हूँ।"
उससे कोई फ़ायदा नहीं होता।
मैं हमेशा लोगों से कहती हूँ, "किसी को बताओ। किसी को दिखाओ नहीं।"
और मैंने जो हाल ही में काटा है, मेरे विचार में उसका कारण है
कि मेरे मानसिक स्वास्थ्य की हालत में सुधार की प्रक्रिया
बहुत धीरे...
बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ी है।
और...
चाहे छः महीने बहुत बढ़िया गुज़र जाएँ...
केवल एक बार कोई कारण होने की ज़रूरत है और तुम्हारी हालत...
फिर खराब हो जाती है।
और जब मैं कहती हूँ "खराब हो जाती है," उससे मेरा मतलब है
काटने की इच्छा होना, मरने का सोचना, यह सोचना कि क्या मैं कभी ना कभी यह करूँगी।
मैंने ख़ुद को उससे बाहर निकालने के लिए
तमाम तरीके सीखे।
वह सब धीरे-धीरे बदलने लगा। उसमें ढाई साल लगे।
उस दौरान आप क्या कर रही थीं?
मैंने एक ऑस्कर जीता।
-बढ़िया। -किसी को नहीं पता था।
लेडी गागा, मार्क रॉन्सन
एन्थनी रॉसोमांडो और एन्ड्रयू वायट।
बहुत बहुत धन्यवाद।
इस शानदार सम्मान के लिए अकादमी का बहुत बहुत धन्यवाद।
वे सब जो इस समय घर पर हैं और कष्ट सह रहे हैं,
सबसे पहले तो मैं कहना चाहूँगी कि यह बहुत ज़रूरी है
कि तुम्हारे आसपास कम से कम एक व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो तुम्हारा समर्थन करता है।
"समर्थन करता है" से मेरा मतलब है ऐसा व्यक्ति जो तुम पर भरोसा करता है,
तुम्हारी परवाह करता है और तुमसे कहता है कि तुम्हारा कष्ट महत्वपूर्ण है
और वह सच्चा है।
फिर मैं कहूँगी
कि ख़ुद को नियंत्रित करने का कोई ना कोई तरीका ज़रूर होता है।
-हैलो! -हैलो।
कैसे हो तुम?
-हैलो। तुम कैसी हो? -कैसा लग रहा है तुम्हें?
अगर मैं ध्यान केंद्रित करूँ,
और मैं सोचूँ, "अच्छा, मैं जागूँगी।
मैं थोड़ी थेरेपी करूँगी या ग्राउंडिंग करूँगी या आभार व्यक्त करूँगी
और मैं अपना शरीर हिलाऊँगी और कुछ खाऊँगी
और वह सब चीज़ें करूँगी जो मुझे पता है मेरे लिए गुणकारी हैं।"
मैं पियानो बजाऊँगी। थोड़ा-बहुत गाऊँगी।
अपने दाँतों पर ब्रश करूँगी। याद से नहाऊँगी।
ध्यान देकर, हर काम करूँगी।
अगर मैंने यह पर्याप्त काम लगातार कर लिए,
अगर मैं बस आगे बढ़ती रही और ख़ुद से कहती रही, "स्टेफ़नी, बहादुर बनो।"
तुम्हें बहादुर बनना होगा। साँस लेना बहादुरी है।
आगे बढ़ते रहना बहादुरी है।
और फिर मैं आगे बढ़ती जाती हूँ और कुछ ही समय में, मैं अपने आंगन में खड़ी होती हूँ
और मैं कहती हूँ, "अच्छा। ठीक है। मैं स्वस्थ हो गई हूँ।"
मेरा मानना है कि हमें...
पूरा दिन खाते रहना चाहिए।
मेरे विचार में यह तुम्हारे दिमाग़ के लिए बहुत ज़रूरी है।
तो मैं इसे एक,
कौशल समझूँगी।
पोषण।
पोषण, जबकि मैं अपनी ब्रॉक्ली पर और तीखा सॉस डाल रही हूँ।
क्या यह अभी भी पोषक है अगर तुम्हारी ब्रॉक्ली...
ऐसी दिखे?
मैं हर चीज़ पर तीखा सॉस डालती हूँ।
यह सामान्य नहीं है।
दिलचस्प चीज़ है वह धार जिस पर मैं चलती हूँ।
यह सच में ऐसा महसूस होना कि मैं ख़ुद को काटना चाहती हूँ
और महसूस होना कि मैं यह नहीं चाहती, दोनों दरअसल बहुत क़रीब हैं।
सभी सोचते हैं यह एक सीधी दिशा में चलेगा
और यह वैसा ही है
जैसे किसी को वायरस ने पकड़ा, तुम बीमार पड़े और फिर ठीक हो गए।
पर पता है, इसमें ऐसा नहीं होता।
इसमें ऐसा बिल्कुल नहीं होता,
और दरअसल, मुझे लगता है इसी से लोग फँस जाते हैं।
लोग फँस जाते हैं क्योंकि वे बेहद निराश हो जाते हैं।
मैं हो गई थी। तुम स्वयं से निराश हो जाते हो।
"मैं ठीक क्यों नहीं हो रही? मेरे साथ क्या गड़बड़ है?"
और पता है क्या? तुम्हारे साथ कोई गड़बड़ नहीं है।
पर कुछ है जो ठीक से काम नहीं कर रहा।
और उस पर तुम्हें ध्यान देना होगा
और, साथ ही, यह आसान नहीं है।
रशाद
यह साल काफ़ी दिलचस्प रहा है।
मेरा तलाक हुआ। मेरा व्यवसाय चौपट हो गया।
कोविड से गुज़रना पड़ा।
मेरी आँटी के सोफ़े पर सोने से लेकर...
गॉड्स हैशआइ ऐम किंग - स्थापित 1987
"आइ ऐम द डार्कर ब्रदर"
...बिल्कुल बेघर होना, कंगाल होना, कोई पैसा ना होना,
और फिर वापस मेहनत करके...
अब मेरे पास अपना घर है और मैं फिर से अपना ख़्याल रख सकता हूँ।
इससे मैं बहुत, बहुत आभारी महसूस करता हूँ।
मुझे यहाँ वापस ओकलैंड आना पड़ा क्योंकि मुझे फिर से काम करना था।
साराह रॉल्स "डाउन टू अर्थ कुक बुक"
हम हर सप्ताह क़रीब 750 लोगों के लिए खाना बना रहे हैं।
थेरेपी थोड़ी मुश्किल रही है क्योंकि एक समय ऐसा था, मेरे पास उसके लिए पैसे नहीं थे।
तो मुझे ठीक होना जारी रखने के लिए अलग तरीके ढूँढने पड़े।
और ब्लैक फ़ूड कलेक्टिव में मदद करना, इन व्यवसायों में मदद करना,
मेरे ठीक होने की प्रक्रिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा था।
और इन सारे बक्सों को खोलना,
मेरी भावनाओं को ऊपर-नीचे करने के लिए काफ़ी था।
मुझे बहुत सा ऐसा सामान खोलना पड़ा जिसका मैं सामना नहीं करना चाहता था।
मैं क्वारंटाइन के पहले हिस्से के दौरान घर वापस गया।
मुझे समझ नहीं आ रहा था अपने परिवार को यह कैसे बताऊँ
कि मुझे कितना ज़्यादा डिप्रेशन और चिंता है।
क्योंकि कभी-कभी मुझे यह कहने के लिए शब्द नहीं मिलते।
मतलब मैं बताना चाहता हूँ पर मुझे सही शब्द नहीं मिलते
जिससे वह समझ सकें जो मैं कहना चाह रहा हूँ।
पर वे एक तरह से ज़बरदस्ती मेरे बुलबुले में घुस ही आए।
जिसकी मुझे ख़ुशी है कि उन्होंने ऐसा किया क्योंकि कई बार
मैं अपनी ही छोटी सी दुनिया में इतना खो जाता हूँ कि बाहर का कुछ नहीं देख पाता।
आप तेल अभी गरम करना चाहती हैं?
-काश हमारे पास भुने चिकन का तेल होता। -मुझे यह करना आता है।
-इसे ऐसे ही बनाया जाता है। -नहीं।
आपने यह पहले कभी नहीं खाया? देखा?
-ढीले पड़ रहे हो। -मुझे ऐसा नहीं लगता।
सच में?
-क्या कहा इसने? -तुम्हें मुझे सिखाना पड़ेगा
कि अपने ऊपर धुआँ आने दिए बिना बार्बेक्यू कैसे करते हैं।
बड़े होते समय, मेरी माँ और मेरे पिता ही मेरे जीवन में एकमात्र अच्छी चीज़ थे।
अपनी सारी बहनों में केवल मेरी माँ हैं जो अब तक विवाहित हैं।
उन्होंने कुछ ऐसी चीज़ें सही हैं जो ज़्यादातर लोगों को तोड़ देतीं।
यह देखो। हाँ।
रशाद संवेदनशील और मिलनसार था।
यह हमेशा से लीडर बनकर रहता था।
जब यह छोटा था,
तब भी सबका नेता बनकर घूमता था।
कभी-कभी यह थोड़ा चुप सा हो जाता है...
ज़्यादा बात नहीं करता।
जब यह छोटा था, बड़ा हो रहा था, मैंने किशोरावस्था में यह थोड़ा देखा था
पर इसकी शादी के बाद यह पूरी तरह बाहर आ गया।
तब मैंने देखा कि सब कुछ असर डालने लगा है।
और इसकी हालत बहुत खराब थी। वह बुरा समय था।
वह बहुत बुरा समय था।
चाहे यह कुछ भी जताने या दिखाने की कोशिश करता, क्योंकि मैं अपने बेटे को जानती हूँ।
यह कष्ट में था। यह बहुत ज़्यादा कष्ट में था।
ऐसा लगा जैसे ज़िंदगी पूरी घूम गई है,
और वह इतनी बुरी तरह घूमी कि मैं जैसे,
मैं जैसे उसमें कैद होकर रह गया।
मुझे दस गुना ज़्यादा चिंता होती थी।
हर रोज़, पर मैं बस...
मैं बस बैठकर अटैक के ख़त्म होने का इंतज़ार भी नहीं कर सकता था।
मुझे अटैक होने के दौरान ही अपना काम करते रहना होता था।
डिप्रेशन होने के दौरान अपना काम करते रहना होता था।
और कई बार आपके पास शब्द नहीं होते
या आपको सही शब्द नहीं मिलते कि इसके बारे में ठीक तरह बता सकें।
हाँ।
जब मैं उन बहुत, बहुत बुरे क्षणों से गुज़र रहा होता था
तो ऐसा लगता था मानो मैं जेल में हूँ।
और मैं उससे बाहर नहीं निकल पाता था।
-हाँ। -मैं जानती हूँ।
-हाँ। -मुझे वह महसूस हुआ था।
-हाँ, हमें वह महसूस हुआ था। हमें पता था। -मुझे वह महसूस हुआ था।
और मुझे दिख रहा था कि हालत खराब हो रही है।
जब शुरुआत में इसके साथ यह सब होना शुरू हुआ, मैं इसके साथ ज़्यादा नहीं होती थी।
मैं इससे बात करती थी...
पर बहुत ज़्यादा बात नहीं करती थी
क्योंकि मैं इसे ख़ुद उससे निपटने का समय देकर इसे बता रही थी कि हमें
फ़र्क नहीं पड़ता और तुम्हें,
तुम मर्द हो, तुम्हें जो करना है वह तो करना ही है।
तो हम थोड़ा पीछे हट गए।
पर मैं नहीं चाहता कि आप लोगों को ऐसा लगे कि आपके कारण...
आप लोगों ने कुछ ऐसा किया...
जो ग़लत था या आप लोग इस सबके लिए ख़ुद को कसूरवार समझें क्योंकि ऐसा...
ऐसा कुछ भी नहीं था। यह आपके कारण नहीं हुआ।
यह बाकी सब चीज़ों के कारण था, और आसपास के बाकी सब लोग
जो मुझ पर असर डाल कर सब कुछ ख़राब कर रहे थे।
गुज़रे समय में कुछ ऐसे हालातों में फँसना
और तुम लोगों को ठीक तरह जान ना पाना।
यह समझ नहीं पाया कि वह बहुत कुछ,
उसने तुम लोगों पर बहुत ज़्यादा असर डाला।
-बहुत ज़्यादा। -मुझे पता है उसने डाला।
पर तुम्हें पता है कि अब तुम्हारे लिए हम हैं यहाँ।
तो, तुम्हें पता है, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।
जो भी तुम्हारे साथ हो, मैं तुम्हारे लिए यहाँ हूँ।
ज़्यादातर लोगों के ठीक होने में परिवारों का एक अहम हिस्सा होता है।
और एक प्यार करने वाला परिवार जो सीख सकता है...
केन डकवर्थ, चीफ़ मेडिकल ऑफ़ीसर की आवाज़
मानसिक बीमारी के लिए राष्ट्रीय गठबंधन
...और समस्याएँ सुलझा सकता है, एक अत्यावश्यक सहारा है।
पर अगर आपके पास ऐसा परिवार है जो खुले मन से सीखने के लिए तैयार है
और आपकी कमज़ोरी के लिए आपको शर्मिंदा नहीं करता
बल्कि आपके साथ काम करता है,
तो उसके आपको बहुत उत्कृष्ट नतीजे मिल सकते हैं।
"क्या गड़बड़ है?" सही नहीं है। यह सही सवाल नहीं है।
बल्कि उस व्यक्ति के साथ ऐसा क्या हुआ
कि उसका इस तरह का हठी या निरंतर एक जैसा व्यवहार है।
तो यह नारा, या जो भी तुम इसे कहना चाहो...
-हाँ। -...अब मेरे दिमाग़ में जम गया है।
-"तुम्हारे साथ क्या हुआ?" -जब भी कुछ होता है, जब भी...
चाहे मुझे नफ़रत और गालियों की बौछार ही क्यों ना मिल रही हो,
मैं यह याद रखता हूँ क्योंकि...
-"तुम्हारे साथ क्या हुआ?" -तुम्हारे साथ क्या हुआ?
उनके साथ क्या हुआ?
क्योंकि "तुम्हारे साथ क्या हुआ? यह सवाल दोष नहीं दे रहा।
यह कहता है, "बताओ मुझे, क्या हुआ?" बजाय इसके कि "तुममें क्या गड़बड़ है?"
और मैंने देखा है कि यह हर किसी पर लागू होता है।
एकमात्र चीज़ जो मुझे आज के दिन भी रुला देती है,
जीवन के छः दशक गुज़र जाने के बाद भी, वह है यह एहसास...
ओपरा
...जब मैं सबसे पहले अटाला काउंटी, मिसिसीपी से मिलवॉकी गई थी,
और उससे पहले कभी अपनी नानी से अलग नहीं रही थी।
और अचानक से मुझे एक कार में बिठा कर मिलवॉकी भेज दिया जाता है
और बताया जाता है कि तुम अब कभी अपनी नानी से नहीं मिलोगी।
और अब तुम अपनी माँ के साथ रहोगी,
ऐसी माँ जिसे मैं जानती तक नहीं थी।
और... क्योंकि मेरी माँ उस विशाल प्रवसन का हिस्सा थी
जो उत्तर की ओर गए थे और अपने बच्चों को नानियों के पास छोड़ गए थे।
मेरी माँ एक मध्यम-वर्गीय, बहुत हल्के रंग वाली,
जिसे श्वेत समझा जा सकता था, महिला के घर किराए पर रहती थी।
पहला क्षण जब मैं उसके घर पहुँची, मुझे तुरंत पता चल गया
कि मेरी त्वचा के रंग के कारण उसे मैं पसंद नहीं आई।
और उस पहली रात को ही
उसने मुझे घर में नहीं आने दिया।
और एक छोटा सा बरामदा था जो सड़क की ओर था।
और मुझे वहाँ बाहर सोफ़े पर सोना पड़ा।
और मेरी माँ...
जिनका एक और बच्चा था...
वह पहली बार था कि मैं अपनी सौतेली बहन से मिली...
मेरे लिए खड़ी नहीं हुईं,
उन्होंने नहीं कहा, "नहीं, मेरी बेटी घर में ज़रूर आएगी।"
और उस क्षण में
जब मेरी माँ ने कहा, "ठीक है, फिर, तुम यहीं सोओगी, यहाँ बाहर,"
मैं समझ गई कि मैं अकेली हूँ।
आज ओपरा विन्फ़्रे शो पर
हम लोगों को उनकी पसंदीदा टीचर से फिर से मिलवाएँगे,
कुछ ऐसे भी जिन्होंने एक-दूसरे को दस, बीस, यहाँ तक कि तीस सालों से नहीं देखा।
पर पहले, मैं आपको अपनी पसंदीदा टीचर के बारे में बताना चाहूँगी।
आप चाहते हैं मैं रोना शुरू कर दूँ? मुझे बचाने वाली मेरी टीचरें ही थीं।
मैरी डंकन?
श्रीमती डंकन!
अगर मेरी क्लास में सारे ओपरा जैसे विद्यार्थी होते,
तो मैं ख़ुशी के मारे हवा में तैर रही होती।
मेरे जीवन के कितने साल,
केवल वही एक जगह थी जहाँ मुझे लगा मुझे प्यार मिलता है।
और यही कारण है कि क्यों मैं इतने सालों तक टीचर बनना चाहती थी।
कि मैं बाकी बच्चों को वह दे सकूँ जो मेरी टीचरों ने मुझे दिया था।
श्रीमती डंकन से मैं इतना प्यार इसलिए करती हूँ कि यह मेरा सर्वश्रेष्ठ पहलू बाहर लाईं।
यह वह साल था जब मुझे जैसे पता चल गया था कि मैं कुछ बन सकती हूँ।
इन्होंने मुझे महत्वपूर्ण महसूस करवाया,
और मुझे लगता है सब बच्चों में स्वाभिमान की भावना होनी चाहिए।
और मैं हमेशा आपके कारण महसूस करती थी कि मैं सारी दुनिया का सामना कर सकती हूँ।
क्योंकि किसी भी ऐसे इन्सान के साथ संबंध जो आपकी परवाह करता है,
बहुत अंतर लाता है।
मेरे लिए, वह मेरी टीचरें थीं।
और इसीलिए मुझे पता है कि स्कूल कितना महत्वपूर्ण है।
शिक्षा आपको बचा नहीं सकती पर यह आपको राहत दे सकती है।
तो मेरे लिए यह बहुत बड़ी राहत थी
और इसने मेरे अंदर...
मान और महत्व पैदा किया जो मुझे अपने घर में बिल्कुल महसूस नहीं होता था।
बिल्कुल महसूस नहीं होता था।
ज़रा सा भी नहीं।
20 अगस्त, 2006
मैं आज यहाँ आप सब को लाई हूँ यह बताने के लिए
कि आप हिस्सा बनेंगी उसकी पहली क्लास का जिसका नाम है
ओपरा विन्फ़्रे...
ओपरा विन्फ़्रे लीडरशिप अकैडमी फ़ॉर गर्ल्स
मायरटन, दक्षिण अफ़्रीका
सन् 2007 में, मैंने दक्षिण अफ़्रीका में ओपरा विन्फ़्रे लीडरशिप अकैडमी
शुरू की, उन लड़कियों के लिए जिनके पास इच्छा तो थी पर साधन नहीं थे।
उस स्कूल की पहली दो कक्षाएँ, उन्हें मैंने ख़ुद चुना था।
मैं अलग-अलग गाँवों और शहरों में गई
और ऐसी लड़कियाँ चुनीं जिनके अंदर अपनी ज़िंदगी को बेहतर
बनाने के लिए कुछ भी कर गुज़रने की लालसा थी।
देवियों और सज्जनों,
ओपरा विन्फ़्रे लीडरशिप अकैडमी फ़ॉर गर्ल्स की लड़कियाँ।
पर स्कूल के पहले ही सप्ताह में
कुछ लड़कियाँ मुझे अजीब बरताव करती दिखीं।
ऐसा लग रहा था, "इन लड़कियों को हुआ क्या है?
"ये ध्यान नहीं दे रहीं, इनका चित्त नहीं लग रहा।"
तो मैंने डॉ. ब्रूस पैरी को बुलाया
और उन्होंने मुझे कहा, "तुम्हारे बच्चे सदमे में हैं।
उन्हें इतनी उथल-पुथल की आदत है कि एक शांत, प्रोत्साहित करने वाली,
सहारा देने वाली जगह को उनका दिमाग़ समझ ही नहीं पा रहा है।"
उस समय तक मुझे डिप्रेशन समझ नहीं आता था।
हम सदमे या मानसिक बीमारी, डिप्रेशन, चिंता को
संभाल पाने के लिए तैयार नहीं थे।
हर साल मैं वापस जाती हूँ और लाइफ 101 नामक एक कोर्स पढ़ाती हूँ।
मैं माइकल सिंगर की किताब, "द अनटेदर्ड सोल" इस्तेमाल कर रही थी।
उसमें वह उन काँटों की बात करते हैं जो हम सब उठाए घूमते हैं।
कुछ ऐसी चीज़ें जो आपके जीवन में हुईं जिन्हें ढाँप दिया गया, दबा दिया गया,
जिनके बारे में आपने सोचने की कोशिश नहीं की,
जिनके कारण आप ऐसी स्थितियों में फँस जाते हो जो समझ नहीं आता ऐसा क्यों हुआ।
बात बस इतनी सी होती है वह काँटा कहीं रगड़ खा जाता है।
तो तुम्हारे लिए वह कौन सा काँटा है जिसे निकाले जाने की ज़रूरत है?
पहली लड़की ने कहा, "मेरा काँटा है गुस्सा।
मेरे अंदर कितना गुस्सा भरा हुआ है।"
वह 72 लड़कियों की क्लास थी।
"मेरे अंदर कितना गुस्सा भरा हुआ है।"
उसने कहा, "क्योंकि जब मैं चार साल की थी...
मैंने अपनी नानी को बताने की कोशिश की कि मेरे अंकल मेरे साथ ग़लत हरकतें कर रहे हैं।
और उन्होंने मुझे कहा, 'लड़की, क्या बोल रही हो? वह तुम्हारे अंकल हैं।'
उन्होंने अनसुना कर दिया। सात साल की उम्र में, मेरे अंकल ने मेरा बलात्कार किया।"
और उसने कहा...
"हर बार जब मैं घर जाती हूँ...
मुझे अभी भी उन अंकल के साथ रहना पड़ता है।
और मेरी नानी को पता है।
और मैं उस बारे में कुछ नहीं कर पाई।
और मैं बहुत गुस्से में हूँ।"
वहाँ सन्नाटा था क्योंकि कोई यक़ीन नहीं कर पा रहा था कि उसने यह सच में बोल दिया था।
मैंने कहा, "तुम इकलौती लड़की नहीं हो जिसकी ऐसी कहानी है।
मैं शर्तिया कह सकती हूँ तुम इकलौती लड़की नहीं हो जिसकी ऐसी कहानी है।
और मैं चाहूँगी कि इस कमरे में कोई भी और लड़की...
जिसकी ऐसी कहानी हो, वह खड़ी हो जाए।
और मैं चाहती हूँ तुम इसका समर्थन करने के लिए खड़ी हो।
क्योंकि जब तुम इसका समर्थन करोगी, तो अपना समर्थन करोगी,
क्योंकि इसकी नानी ने इसका समर्थन नहीं किया।
कौन इसके लिए खड़ा होगा?
पर मैं चाहती हूँ तुम केवल तभी खड़े होना अगर तुम समझती हो यह क्या कह रही है
और तुम्हारे पास भी एक ऐसी ही कहानी है।
उस 20... 72 लड़कियों की क्लास में, चौबीस लड़कियाँ खड़ी हो गईं।
नौ और दस और 11 और 12 वर्ष की उम्र में...
मेरे 19 वर्षीय कज़िन ने मेरा बलात्कार किया था।
मुझे नहीं पता था बलात्कार क्या होता है।
इस शब्द तक की कोई जानकारी नहीं थी मुझे।
मुझे नहीं पता था सेक्स क्या होता है। मुझे बिल्कुल नहीं...
मुझे बिल्कुल नहीं पता था बच्चे कैसे पैदा होते हैं।
मुझे यह भी नहीं पता था मेरे साथ क्या हो रहा था।
और मैंने वह राज़ ही रखा।
और...
मैंने उसे बस स्वीकार कर लिया।
कि एक लड़की सुरक्षित नहीं है...
इस आदमियों से भरी दुनिया में।
विकासात्मक आघात होने पर आप उससे सकुशल बच कर नहीं निकल सकते।
आप उससे गुज़र कर अपने लिए रास्ता खोज सकते हो,
पर रास्ते में दर्द अवश्य मिलेगा...
डॉ. ब्रूस पैरी की आवाज़
सीनियर फ़ैलो चाइल्डट्रॉमा अकैडमी
...और उसके निशान भी रहेंगे और चुनौतियाँ भी आएँगी।
और मुझे लगता है लोगों के लिए
यह समझना बहुत ज़रूरी है
कि हर व्यक्ति कुछ उठाकर चल रहा है।
हर किसी पर कोई ना कोई बोझ है। बस, हमें पता नहीं है वह क्या है।
और इसीलिए जब आप किसी भी तरह का मानसिक स्वास्थ्य का काम करते हैं
तो बहुत ज़रूरी है आपको उस व्यक्ति की कहानी पता हो।
उस कहानी को बताना,
उसे ऊँची कह पाना कि, "मेरे साथ यह हुआ था,"
अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मैं यह कहानी अपने फ़ायदे को लिए नहीं सुनाती।
क्योंकि, सच कहूँ तो यह बताना बहुत मुश्किल है।
मुझे इसे लेकर बहुत शर्मिंदगी होती है।
यह चीज़ मैं लोगों को कैसे समझाऊँ कि मेरे पास सुविधाएँ हैं, पैसा है,
मेरे पास ताक़त है और फिर भी मैं दुखी हूँ?
मतलब, तुम यह कैसे कर पाओगे?
मुझे सरोकार वास्तव में इससे है कि मैं अपनी कहानी आपको इसलिए नहीं बता रही
कि मैं चाहती हूँ कोई मेरे लिए आँसू बहाए। मैं ठीक हूँ।
पर आप किसी और के लिए अपना दिल खोल सकते हैं।
क्योंकि मैं बता रही हूँ मैं इससे गुज़र चुकी हूँ और लोगों को मदद की ज़रूरत है।
तो यह मेरे ठीक होने का हिस्सा है, कि मैं आपसे बात कर पा रही हूँ।
मुझे अब डर नहीं लगता।
क्योंकि मुझे यह कहने में कोई डर नहीं कि हाँ, मुझे डिप्रेशन होता है।
हाँ, मुझे घबराहट होती है,
और ऐसे पल आते हैं जब मेरी कुछ करने की इच्छा नहीं होती।
ऐसे पल आते हैं जब मुझे बहुत गुस्सा आता है और मैं उदास हो जाता हूँ
और ज़्यादा भावुक हो जाता हूँ, यह सब होता है मेरे साथ।
यह पूरी तरह मैं हूँ। मैं यह सब शिद्दत से महसूस करता हूँ।
पर पता है क्या, मुझे ख़ुशी है मैंने यह महसूस किया।
मुझे लगता है जो लोग अपने मानसिक स्वास्थ्य के संघर्ष को स्वीकार करते हैं
वे सुपरहीरोज़ की तरह हैं।
अगर तुमने कुछ झेला है,
तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे बच्चों या बाकी सब को भी
वही सब झेलना पड़े जो तुमने झेला है।
मैं जानता हूँ कि उस चक्र को तोड़ना मेरी ज़िम्मेदारी और मेरा कर्त्तव्य है।
उपशीर्षक अनुवादक: मृणाल अग्रवाल
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