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00:05:04,720 मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो जाती 25 00:05:04,720 --> 00:05:07,280 है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता चलता 26 00:05:07,280 --> 00:05:10,000 है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता है। 27 00:05:10,000 --> 00:05:13,600 इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को मालूम 28 00:05:13,600 --> 00:05:15,680 होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर की 29 00:05:15,680 --> 00:05:18,800 सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी नुकसान 30 00:05:18,800 --> 00:05:21,520 में है। आलिया दोनों के दरमियान पल बनने 31 00:05:21,520 --> 00:05:23,840 की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर कहती 32 00:05:23,840 --> 00:05:26,639 है कि बाज गलतियां सजा नहीं से अब समझ 33 00:05:26,639 --> 00:05:29,600 मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर अंदर 34 00:05:29,600 --> 00:05:32,000 से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 35 00:05:32,000 --> 00:05:34,960 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 36 00:05:34,960 --> 00:05:37,360 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 37 00:05:37,360 --> 00:05:41,520 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 38 00:05:41,520 --> 00:05:43,919 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 39 00:05:43,919 --> 00:05:46,240 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 40 00:05:46,240 --> 00:05:49,039 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 41 00:05:49,039 --> 00:05:51,199 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 42 00:05:51,199 --> 00:05:54,560 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 43 00:05:54,560 --> 00:05:56,960 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 44 00:05:56,960 --> 00:05:59,680 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 45 00:05:59,680 --> 00:06:03,199 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 46 00:06:03,199 --> 00:06:06,240 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 47 00:06:06,240 --> 00:06:08,479 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 48 00:06:08,479 --> 00:06:10,639 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 49 00:06:10,639 --> 00:06:13,360 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 50 00:06:13,360 --> 00:06:15,840 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 51 00:06:15,840 --> 00:06:18,319 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 52 00:06:18,319 --> 00:06:20,720 ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है 53 00:06:20,720 --> 00:06:23,280 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 54 00:06:23,280 --> 00:06:25,600 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 55 00:06:25,600 --> 00:06:28,479 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 56 00:06:28,479 --> 00:06:32,080 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 57 00:06:32,080 --> 00:06:34,400 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 58 00:06:34,400 --> 00:06:37,120 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 59 00:06:37,120 --> 00:06:39,680 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 60 00:06:39,680 --> 00:06:42,240 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 61 00:06:42,240 --> 00:06:44,560 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 62 00:06:44,560 --> 00:06:47,280 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 63 00:06:47,280 --> 00:06:50,240 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 64 00:06:50,240 --> 00:06:52,800 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 65 00:06:52,800 --> 00:06:55,440 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 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00:07:32,960 --> 00:07:35,440 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 81 00:07:35,440 --> 00:07:37,919 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 82 00:07:37,919 --> 00:07:40,319 ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है 83 00:07:40,319 --> 00:07:42,880 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 84 00:07:42,880 --> 00:07:45,199 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 85 00:07:45,199 --> 00:07:48,080 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 86 00:07:48,080 --> 00:07:51,680 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 87 00:07:51,680 --> 00:07:54,000 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 88 00:07:54,000 --> 00:07:56,720 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 89 00:07:56,720 --> 00:07:59,280 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 90 00:07:59,280 --> 00:08:01,840 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 91 00:08:01,840 --> 00:08:04,160 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 92 00:08:04,160 --> 00:08:06,879 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 93 00:08:06,879 --> 00:08:09,840 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 94 00:08:09,840 --> 00:08:12,400 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 95 00:08:12,400 --> 00:08:15,039 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 96 00:08:15,039 --> 00:08:18,319 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 97 00:08:18,319 --> 00:08:20,720 नाम नहीं बनाता। 98 00:08:20,720 --> 00:08:23,120 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 99 00:08:23,120 --> 00:08:25,440 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 100 00:08:25,440 --> 00:08:28,240 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 101 00:08:28,240 --> 00:08:30,400 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 102 00:08:30,400 --> 00:08:33,760 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 103 00:08:33,760 --> 00:08:36,159 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 104 00:08:36,159 --> 00:08:38,880 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 105 00:08:38,880 --> 00:08:42,399 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 106 00:08:42,399 --> 00:08:45,440 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 107 00:08:45,440 --> 00:08:47,680 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 108 00:08:47,680 --> 00:08:49,839 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 109 00:08:49,839 --> 00:08:52,560 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 110 00:08:52,560 --> 00:08:55,040 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 111 00:08:55,040 --> 00:08:57,519 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 112 00:08:57,519 --> 00:08:59,920 ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है 113 00:08:59,920 --> 00:09:02,480 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 114 00:09:02,480 --> 00:09:04,800 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 115 00:09:04,800 --> 00:09:07,680 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 116 00:09:07,680 --> 00:09:11,279 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 117 00:09:11,279 --> 00:09:13,600 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 118 00:09:13,600 --> 00:09:16,320 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 119 00:09:16,320 --> 00:09:18,880 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 120 00:09:18,880 --> 00:09:21,440 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 121 00:09:21,440 --> 00:09:23,760 मंसूर से मिलकर कहती है 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दूसरे को गले 136 00:10:02,000 --> 00:10:05,040 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 137 00:10:05,040 --> 00:10:07,279 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 138 00:10:07,279 --> 00:10:09,440 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 139 00:10:09,440 --> 00:10:12,160 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 140 00:10:12,160 --> 00:10:15,200 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 141 00:10:15,200 --> 00:10:17,440 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 142 00:10:17,440 --> 00:10:20,320 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 143 00:10:20,320 --> 00:10:22,720 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 144 00:10:22,720 --> 00:10:25,120 हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का 145 00:10:25,120 --> 00:10:27,839 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 146 00:10:27,839 --> 00:10:31,680 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 147 00:10:31,680 --> 00:10:33,440 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 148 00:10:33,440 --> 00:10:36,480 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 149 00:10:36,480 --> 00:10:39,200 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 150 00:10:39,200 --> 00:10:41,600 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 151 00:10:41,600 --> 00:10:44,480 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 152 00:10:44,480 --> 00:10:47,279 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। 153 00:10:47,279 --> 00:10:50,240 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 154 00:10:50,240 --> 00:10:52,959 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 155 00:10:52,959 --> 00:10:55,440 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 156 00:10:55,440 --> 00:10:59,920 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 157 00:10:59,920 --> 00:11:02,320 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 158 00:11:02,320 --> 00:11:04,640 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 159 00:11:04,640 --> 00:11:07,440 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 160 00:11:07,440 --> 00:11:09,600 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 161 00:11:09,600 --> 00:11:12,880 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 162 00:11:12,880 --> 00:11:15,360 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 163 00:11:15,360 --> 00:11:18,079 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 164 00:11:18,079 --> 00:11:21,600 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 165 00:11:21,600 --> 00:11:24,640 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 166 00:11:24,640 --> 00:11:26,880 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 167 00:11:26,880 --> 00:11:29,040 हंठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के 168 00:11:29,040 --> 00:11:31,760 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 169 00:11:31,760 --> 00:11:34,800 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 170 00:11:34,800 --> 00:11:37,040 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 171 00:11:37,040 --> 00:11:39,920 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 172 00:11:39,920 --> 00:11:42,320 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 173 00:11:42,320 --> 00:11:44,720 हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का 174 00:11:44,720 --> 00:11:47,440 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 175 00:11:47,440 --> 00:11:51,279 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 176 00:11:51,279 --> 00:11:53,040 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 177 00:11:53,040 --> 00:11:56,079 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 178 00:11:56,079 --> 00:11:58,800 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 179 00:11:58,800 --> 00:12:01,200 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 180 00:12:01,200 --> 00:12:04,079 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 181 00:12:04,079 --> 00:12:06,880 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। 182 00:12:06,880 --> 00:12:09,839 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 183 00:12:09,839 --> 00:12:12,560 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 184 00:12:12,560 --> 00:12:15,040 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 185 00:12:15,040 --> 00:12:19,519 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 186 00:12:19,519 --> 00:12:21,920 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 187 00:12:21,920 --> 00:12:24,240 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 188 00:12:24,240 --> 00:12:27,040 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 189 00:12:27,040 --> 00:12:29,200 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 190 00:12:29,200 --> 00:12:32,480 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 191 00:12:32,480 --> 00:12:34,959 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 192 00:12:34,959 --> 00:12:37,680 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 193 00:12:37,680 --> 00:12:41,120 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 194 00:12:41,120 --> 00:12:44,160 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 195 00:12:44,160 --> 00:12:46,480 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 196 00:12:46,480 --> 00:12:48,639 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 197 00:12:48,639 --> 00:12:51,279 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 198 00:12:51,279 --> 00:12:54,720 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 199 00:12:54,720 --> 00:12:56,880 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 200 00:12:56,880 --> 00:12:59,920 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 201 00:12:59,920 --> 00:13:02,079 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 202 00:13:02,079 --> 00:13:04,560 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 203 00:13:04,560 --> 00:13:07,279 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 204 00:13:07,279 --> 00:13:10,959 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 205 00:13:10,959 --> 00:13:13,120 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 206 00:13:13,120 --> 00:13:15,920 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 207 00:13:15,920 --> 00:13:18,720 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 208 00:13:18,720 --> 00:13:21,120 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 209 00:13:21,120 --> 00:13:23,839 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 210 00:13:23,839 --> 00:13:26,800 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 211 00:13:26,800 --> 00:13:29,600 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 212 00:13:29,600 --> 00:13:32,480 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 213 00:13:32,480 --> 00:13:34,959 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 214 00:13:34,959 --> 00:13:39,120 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 215 00:13:39,120 --> 00:13:41,440 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 216 00:13:41,440 --> 00:13:43,839 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 217 00:13:43,839 --> 00:13:46,560 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 218 00:13:46,560 --> 00:13:48,800 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 219 00:13:48,800 --> 00:13:52,079 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 220 00:13:52,079 --> 00:13:54,560 रोते हुए कहता है, मैंने तुम्हें निकालकर 221 00:13:54,560 --> 00:13:57,279 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 222 00:13:57,279 --> 00:14:00,720 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 223 00:14:00,720 --> 00:14:03,760 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 224 00:14:03,760 --> 00:14:06,079 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 225 00:14:06,079 --> 00:14:08,240 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 226 00:14:08,240 --> 00:14:10,880 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 227 00:14:10,880 --> 00:14:14,320 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 228 00:14:14,320 --> 00:14:16,480 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 229 00:14:16,480 --> 00:14:19,519 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 230 00:14:19,519 --> 00:14:21,680 यूसफु मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 231 00:14:21,680 --> 00:14:24,160 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 232 00:14:24,160 --> 00:14:26,880 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 233 00:14:26,880 --> 00:14:30,560 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 234 00:14:30,560 --> 00:14:32,720 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 235 00:14:32,720 --> 00:14:35,519 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 236 00:14:35,519 --> 00:14:38,320 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 237 00:14:38,320 --> 00:14:40,720 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 238 00:14:40,720 --> 00:14:43,440 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 239 00:14:43,440 --> 00:14:46,399 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 240 00:14:46,399 --> 00:14:49,199 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 241 00:14:49,199 --> 00:14:52,079 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 242 00:14:52,079 --> 00:14:54,560 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 243 00:14:54,560 --> 00:14:58,720 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 244 00:14:58,720 --> 00:15:01,040 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 245 00:15:01,040 --> 00:15:03,440 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 246 00:15:03,440 --> 00:15:06,160 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 247 00:15:06,160 --> 00:15:08,399 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 248 00:15:08,399 --> 00:15:11,680 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 249 00:15:11,680 --> 00:15:14,160 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 250 00:15:14,160 --> 00:15:16,880 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 251 00:15:16,880 --> 00:15:20,320 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 252 00:15:20,320 --> 00:15:23,360 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 253 00:15:23,360 --> 00:15:25,680 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 254 00:15:25,680 --> 00:15:27,839 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 255 00:15:27,839 --> 00:15:30,480 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 256 00:15:30,480 --> 00:15:33,920 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 257 00:15:33,920 --> 00:15:36,079 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 258 00:15:36,079 --> 00:15:39,120 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 259 00:15:39,120 --> 00:15:41,279 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 260 00:15:41,279 --> 00:15:43,760 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 261 00:15:43,760 --> 00:15:46,480 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 262 00:15:46,480 --> 00:15:50,160 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 263 00:15:50,160 --> 00:15:52,320 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 264 00:15:52,320 --> 00:15:55,120 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 265 00:15:55,120 --> 00:15:57,920 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 266 00:15:57,920 --> 00:16:00,320 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 267 00:16:00,320 --> 00:16:03,040 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 268 00:16:03,040 --> 00:16:06,000 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 269 00:16:06,000 --> 00:16:08,800 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 270 00:16:08,800 --> 00:16:11,680 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 271 00:16:11,680 --> 00:16:14,160 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 272 00:16:14,160 --> 00:16:18,320 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 273 00:16:18,320 --> 00:16:20,639 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 274 00:16:20,639 --> 00:16:23,040 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 275 00:16:23,040 --> 00:16:25,759 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 276 00:16:25,759 --> 00:16:28,000 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 277 00:16:28,000 --> 00:16:31,279 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 278 00:16:31,279 --> 00:16:33,680 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 279 00:16:33,680 --> 00:16:36,480 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 280 00:16:36,480 --> 00:16:39,920 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 281 00:16:39,920 --> 00:16:42,959 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 282 00:16:42,959 --> 00:16:45,279 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 283 00:16:45,279 --> 00:16:47,440 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 284 00:16:47,440 --> 00:16:50,079 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 285 00:16:50,079 --> 00:16:53,519 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 286 00:16:53,519 --> 00:16:55,680 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 287 00:16:55,680 --> 00:16:58,720 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 288 00:16:58,720 --> 00:17:00,880 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 289 00:17:00,880 --> 00:17:03,360 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 290 00:17:03,360 --> 00:17:06,079 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 291 00:17:06,079 --> 00:17:09,760 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 292 00:17:09,760 --> 00:17:11,919 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 293 00:17:11,919 --> 00:17:14,720 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 294 00:17:14,720 --> 00:17:17,520 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 295 00:17:17,520 --> 00:17:19,919 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 296 00:17:19,919 --> 00:17:22,640 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 297 00:17:22,640 --> 00:17:25,600 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 298 00:17:25,600 --> 00:17:28,400 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 299 00:17:28,400 --> 00:17:31,280 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 300 00:17:31,280 --> 00:17:33,760 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 301 00:17:33,760 --> 00:17:37,919 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 302 00:17:37,919 --> 00:17:40,240 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 303 00:17:40,240 --> 00:17:42,640 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 304 00:17:42,640 --> 00:17:45,360 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 305 00:17:45,360 --> 00:17:47,600 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 306 00:17:47,600 --> 00:17:50,880 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 307 00:17:50,880 --> 00:17:53,280 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 308 00:17:53,280 --> 00:17:56,080 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 309 00:17:56,080 --> 00:17:59,520 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 310 00:17:59,520 --> 00:18:02,559 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 311 00:18:02,559 --> 00:18:04,880 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 312 00:18:04,880 --> 00:18:07,039 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 313 00:18:07,039 --> 00:18:09,679 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 314 00:18:09,679 --> 00:18:13,120 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 315 00:18:13,120 --> 00:18:15,280 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 316 00:18:15,280 --> 00:18:18,320 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 317 00:18:18,320 --> 00:18:20,480 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 318 00:18:20,480 --> 00:18:22,960 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 319 00:18:22,960 --> 00:18:25,679 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 320 00:18:25,679 --> 00:18:29,360 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 321 00:18:29,360 --> 00:18:31,520 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 322 00:18:31,520 --> 00:18:34,320 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 323 00:18:34,320 --> 00:18:37,120 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 324 00:18:37,120 --> 00:18:39,520 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 325 00:18:39,520 --> 00:18:42,240 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 326 00:18:42,240 --> 00:18:45,200 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 327 00:18:45,200 --> 00:18:48,000 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 328 00:18:48,000 --> 00:18:50,880 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 329 00:18:50,880 --> 00:18:53,360 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 330 00:18:53,360 --> 00:18:57,520 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 331 00:18:57,520 --> 00:18:59,840 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 332 00:18:59,840 --> 00:19:02,240 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 333 00:19:02,240 --> 00:19:04,960 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 334 00:19:04,960 --> 00:19:07,200 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 335 00:19:07,200 --> 00:19:10,480 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 336 00:19:10,480 --> 00:19:12,880 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 337 00:19:12,880 --> 00:19:15,679 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 338 00:19:15,679 --> 00:19:19,120 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 339 00:19:19,120 --> 00:19:22,160 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 340 00:19:22,160 --> 00:19:24,480 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 341 00:19:24,480 --> 00:19:26,640 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 342 00:19:26,640 --> 00:19:29,280 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 343 00:19:29,280 --> 00:19:32,720 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 344 00:19:32,720 --> 00:19:34,880 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 345 00:19:34,880 --> 00:19:37,919 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 346 00:19:37,919 --> 00:19:40,080 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 347 00:19:40,080 --> 00:19:42,559 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 348 00:19:42,559 --> 00:19:45,280 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 349 00:19:45,280 --> 00:19:48,960 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 350 00:19:48,960 --> 00:19:51,120 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 351 00:19:51,120 --> 00:19:53,919 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 352 00:19:53,919 --> 00:19:56,720 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 353 00:19:56,720 --> 00:19:59,120 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 354 00:19:59,120 --> 00:20:01,840 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 355 00:20:01,840 --> 00:20:04,799 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 356 00:20:04,799 --> 00:20:07,600 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 357 00:20:07,600 --> 00:20:10,480 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 358 00:20:10,480 --> 00:20:12,960 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 359 00:20:12,960 --> 00:20:17,120 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 360 00:20:17,120 --> 00:20:19,440 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 361 00:20:19,440 --> 00:20:21,840 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 362 00:20:21,840 --> 00:20:24,559 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 363 00:20:24,559 --> 00:20:26,799 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 364 00:20:26,799 --> 00:20:30,080 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 365 00:20:30,080 --> 00:20:32,480 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 366 00:20:32,480 --> 00:20:35,280 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 367 00:20:35,280 --> 00:20:38,720 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 368 00:20:38,720 --> 00:20:41,760 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 369 00:20:41,760 --> 00:20:44,080 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 370 00:20:44,080 --> 00:20:46,240 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 371 00:20:46,240 --> 00:20:48,880 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 372 00:20:48,880 --> 00:20:52,240 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 373 00:20:52,240 --> 00:20:54,480 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 374 00:20:54,480 --> 00:20:57,520 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 375 00:20:57,520 --> 00:20:59,679 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 376 00:20:59,679 --> 00:21:02,159 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 377 00:21:02,159 --> 00:21:04,880 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 378 00:21:04,880 --> 00:21:08,559 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 379 00:21:08,559 --> 00:21:10,720 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 380 00:21:10,720 --> 00:21:13,520 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 381 00:21:13,520 --> 00:21:16,320 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 382 00:21:16,320 --> 00:21:18,720 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 383 00:21:18,720 --> 00:21:21,440 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 384 00:21:21,440 --> 00:21:24,400 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 385 00:21:24,400 --> 00:21:27,200 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 386 00:21:27,200 --> 00:21:30,080 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 387 00:21:30,080 --> 00:21:32,559 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 388 00:21:32,559 --> 00:21:36,640 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 389 00:21:36,640 --> 00:21:39,039 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 390 00:21:39,039 --> 00:21:41,360 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 391 00:21:41,360 --> 00:21:44,159 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 392 00:21:44,159 --> 00:21:46,400 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 393 00:21:46,400 --> 00:21:49,679 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 394 00:21:49,679 --> 00:21:52,080 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 395 00:21:52,080 --> 00:21:54,799 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 396 00:21:54,799 --> 00:21:58,320 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 397 00:21:58,320 --> 00:22:01,360 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 398 00:22:01,360 --> 00:22:03,679 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 399 00:22:03,679 --> 00:22:05,840 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 400 00:22:05,840 --> 00:22:08,640 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 401 00:22:08,640 --> 00:22:11,520 वो वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 402 00:22:11,520 --> 00:22:13,760 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 403 00:22:13,760 --> 00:22:16,640 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 404 00:22:16,640 --> 00:22:19,039 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 405 00:22:19,039 --> 00:22:21,440 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 406 00:22:21,440 --> 00:22:24,240 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 407 00:22:24,240 --> 00:22:28,000 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 408 00:22:28,000 --> 00:22:29,760 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 409 00:22:29,760 --> 00:22:32,880 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 410 00:22:32,880 --> 00:22:35,520 भी नुकसान में है। अलिया दोनों के दरमियान 411 00:22:35,520 --> 00:22:37,919 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 412 00:22:37,919 --> 00:22:40,799 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 413 00:22:40,799 --> 00:22:43,600 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 414 00:22:43,600 --> 00:22:46,640 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 415 00:22:46,640 --> 00:22:49,280 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 416 00:22:49,280 --> 00:22:51,760 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 417 00:22:51,760 --> 00:22:56,240 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 418 00:22:56,240 --> 00:22:58,640 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 419 00:22:58,640 --> 00:23:00,960 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 420 00:23:00,960 --> 00:23:03,760 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 421 00:23:03,760 --> 00:23:06,000 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 422 00:23:06,000 --> 00:23:09,280 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 423 00:23:09,280 --> 00:23:11,679 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 424 00:23:11,679 --> 00:23:14,400 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 425 00:23:14,400 --> 00:23:17,919 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 426 00:23:17,919 --> 00:23:20,960 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 427 00:23:20,960 --> 00:23:23,280 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 428 00:23:23,280 --> 00:23:25,440 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 429 00:23:25,440 --> 00:23:28,240 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 430 00:23:28,240 --> 00:23:31,120 वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी 431 00:23:31,120 --> 00:23:33,360 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 432 00:23:33,360 --> 00:23:36,240 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 433 00:23:36,240 --> 00:23:38,640 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 434 00:23:38,640 --> 00:23:41,039 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 435 00:23:41,039 --> 00:23:43,840 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 436 00:23:43,840 --> 00:23:47,600 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 437 00:23:47,600 --> 00:23:49,360 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 438 00:23:49,360 --> 00:23:52,480 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 439 00:23:52,480 --> 00:23:55,120 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 440 00:23:55,120 --> 00:23:57,520 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 441 00:23:57,520 --> 00:24:00,400 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 442 00:24:00,400 --> 00:24:03,200 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 443 00:24:03,200 --> 00:24:06,240 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 444 00:24:06,240 --> 00:24:08,880 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 445 00:24:08,880 --> 00:24:11,360 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 446 00:24:11,360 --> 00:24:15,840 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 447 00:24:15,840 --> 00:24:18,240 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 448 00:24:18,240 --> 00:24:20,559 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 449 00:24:20,559 --> 00:24:23,360 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 450 00:24:23,360 --> 00:24:25,600 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 451 00:24:25,600 --> 00:24:28,880 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 452 00:24:28,880 --> 00:24:31,279 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 453 00:24:31,279 --> 00:24:34,000 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 454 00:24:34,000 --> 00:24:37,520 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 455 00:24:37,520 --> 00:24:40,559 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 456 00:24:40,559 --> 00:24:42,880 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 457 00:24:42,880 --> 00:24:44,960 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 458 00:24:44,960 --> 00:24:47,840 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 459 00:24:47,840 --> 00:24:50,720 वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी 460 00:24:50,720 --> 00:24:52,960 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 461 00:24:52,960 --> 00:24:55,840 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 462 00:24:55,840 --> 00:24:58,240 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 463 00:24:58,240 --> 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477 00:25:37,840 --> 00:25:40,159 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 478 00:25:40,159 --> 00:25:42,960 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 479 00:25:42,960 --> 00:25:45,200 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 480 00:25:45,200 --> 00:25:48,480 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 481 00:25:48,480 --> 00:25:50,880 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 482 00:25:50,880 --> 00:25:53,600 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 483 00:25:53,600 --> 00:25:57,120 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 484 00:25:57,120 --> 00:26:00,159 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 485 00:26:00,159 --> 00:26:02,480 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 486 00:26:02,480 --> 00:26:04,559 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 487 00:26:04,559 --> 00:26:07,279 इख्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 488 00:26:07,279 --> 00:26:09,760 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 489 00:26:09,760 --> 00:26:12,240 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 490 00:26:12,240 --> 00:26:14,640 ड्रामा सेल के 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546 00:28:41,600 --> 00:28:43,760 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 547 00:28:43,760 --> 00:28:46,480 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 548 00:28:46,480 --> 00:28:48,960 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 549 00:28:48,960 --> 00:28:51,440 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 550 00:28:51,440 --> 00:28:53,840 ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है 551 00:28:53,840 --> 00:28:56,399 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 552 00:28:56,399 --> 00:28:58,720 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 553 00:28:58,720 --> 00:29:01,600 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 554 00:29:01,600 --> 00:29:05,200 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 555 00:29:05,200 --> 00:29:07,520 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 556 00:29:07,520 --> 00:29:10,240 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 557 00:29:10,240 --> 00:29:12,799 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 558 00:29:12,799 --> 00:29:15,360 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 559 00:29:15,360 --> 00:29:17,679 मंसूर से मिलकर 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दोनों एक दूसरे को गले 574 00:29:55,919 --> 00:29:58,960 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 575 00:29:58,960 --> 00:30:01,200 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 576 00:30:01,200 --> 00:30:03,360 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 577 00:30:03,360 --> 00:30:06,080 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 578 00:30:06,080 --> 00:30:08,559 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 579 00:30:08,559 --> 00:30:11,039 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 580 00:30:11,039 --> 00:30:13,440 ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है 581 00:30:13,440 --> 00:30:16,000 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 582 00:30:16,000 --> 00:30:18,320 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 583 00:30:18,320 --> 00:30:21,200 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 584 00:30:21,200 --> 00:30:24,799 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 585 00:30:24,799 --> 00:30:27,120 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 586 00:30:27,120 --> 00:30:29,840 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 587 00:30:29,840 --> 00:30:32,399 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 588 00:30:32,399 --> 00:30:34,960 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 589 00:30:34,960 --> 00:30:37,279 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 590 00:30:37,279 --> 00:30:40,000 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 591 00:30:40,000 --> 00:30:42,960 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 592 00:30:42,960 --> 00:30:45,520 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 593 00:30:45,520 --> 00:30:48,159 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 594 00:30:48,159 --> 00:30:51,440 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 595 00:30:51,440 --> 00:30:53,840 नाम नहीं बनाता। 596 00:30:53,840 --> 00:30:56,240 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 597 00:30:56,240 --> 00:30:58,559 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 598 00:30:58,559 --> 00:31:01,360 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 599 00:31:01,360 --> 00:31:03,520 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 600 00:31:03,520 --> 00:31:06,799 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 601 00:31:06,799 --> 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थी। 615 00:31:44,399 --> 00:31:46,720 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 616 00:31:46,720 --> 00:31:49,440 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 617 00:31:49,440 --> 00:31:52,000 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 618 00:31:52,000 --> 00:31:54,559 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 619 00:31:54,559 --> 00:31:56,880 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 620 00:31:56,880 --> 00:31:59,600 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 621 00:31:59,600 --> 00:32:02,559 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 622 00:32:02,559 --> 00:32:05,120 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 623 00:32:05,120 --> 00:32:07,679 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 624 00:32:07,679 --> 00:32:11,039 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 625 00:32:11,039 --> 00:32:13,440 नाम नहीं बनाता। 626 00:32:13,440 --> 00:32:15,840 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 627 00:32:15,840 --> 00:32:18,159 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 628 00:32:18,159 --> 00:32:20,960 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 629 00:32:20,960 --> 00:32:23,120 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 630 00:32:23,120 --> 00:32:26,399 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 631 00:32:26,399 --> 00:32:28,880 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 632 00:32:28,880 --> 00:32:31,600 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 633 00:32:31,600 --> 00:32:35,120 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 634 00:32:35,120 --> 00:32:38,159 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 635 00:32:38,159 --> 00:32:40,399 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 636 00:32:40,399 --> 00:32:42,559 हंठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 637 00:32:42,559 --> 00:32:45,279 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 638 00:32:45,279 --> 00:32:48,320 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 639 00:32:48,320 --> 00:32:50,559 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 640 00:32:50,559 --> 00:32:52,960 सेल के हवाले से वहीं रह जाती है जहां 641 00:32:52,960 --> 00:32:55,200 टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 642 00:32:55,200 --> 00:32:57,519 आंखें नम हो जाती है। 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होती। कभी-कभी इंसान 698 00:35:27,839 --> 00:35:30,079 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 699 00:35:30,079 --> 00:35:33,040 हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी। 700 00:35:33,040 --> 00:35:35,200 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 701 00:35:35,200 --> 00:35:37,680 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 702 00:35:37,680 --> 00:35:40,480 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 703 00:35:40,480 --> 00:35:44,079 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 704 00:35:44,079 --> 00:35:46,320 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 705 00:35:46,320 --> 00:35:49,040 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 706 00:35:49,040 --> 00:35:51,839 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 707 00:35:51,839 --> 00:35:54,240 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 708 00:35:54,240 --> 00:35:56,960 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से अब 709 00:35:56,960 --> 00:35:59,920 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर 710 00:35:59,920 --> 00:36:02,720 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 711 00:36:02,720 --> 00:36:05,680 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 712 00:36:05,680 --> 00:36:08,079 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 713 00:36:08,079 --> 00:36:12,240 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 714 00:36:12,240 --> 00:36:14,640 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 715 00:36:14,640 --> 00:36:16,960 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 716 00:36:16,960 --> 00:36:19,760 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 717 00:36:19,760 --> 00:36:21,920 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 718 00:36:21,920 --> 00:36:25,200 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 719 00:36:25,200 --> 00:36:27,680 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 720 00:36:27,680 --> 00:36:30,320 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 721 00:36:30,320 --> 00:36:33,839 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 722 00:36:33,839 --> 00:36:36,880 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 723 00:36:36,880 --> 00:36:39,119 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 724 00:36:39,119 --> 00:36:41,280 होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के 725 00:36:41,280 --> 00:36:44,000 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 726 00:36:44,000 --> 00:36:47,040 है। वो वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी 727 00:36:47,040 --> 00:36:49,280 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 728 00:36:49,280 --> 00:36:51,680 सेल के हवाले से वहीं रह जाती है जहां 729 00:36:51,680 --> 00:36:53,920 टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 730 00:36:53,920 --> 00:36:56,240 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 731 00:36:56,240 --> 00:36:59,119 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 732 00:36:59,119 --> 00:37:02,800 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 733 00:37:02,800 --> 00:37:05,040 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 734 00:37:05,040 --> 00:37:07,839 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 735 00:37:07,839 --> 00:37:10,400 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 736 00:37:10,400 --> 00:37:12,960 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 737 00:37:12,960 --> 00:37:15,280 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 738 00:37:15,280 --> 00:37:18,000 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 739 00:37:18,000 --> 00:37:20,960 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 740 00:37:20,960 --> 00:37:23,520 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 741 00:37:23,520 --> 00:37:26,079 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 742 00:37:26,079 --> 00:37:29,440 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 743 00:37:29,440 --> 00:37:31,760 नाम नहीं बनाता। 744 00:37:31,760 --> 00:37:34,160 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 745 00:37:34,160 --> 00:37:36,480 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 746 00:37:36,480 --> 00:37:39,280 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 747 00:37:39,280 --> 00:37:41,440 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 748 00:37:41,440 --> 00:37:44,720 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 749 00:37:44,720 --> 00:37:47,200 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 750 00:37:47,200 --> 00:37:50,000 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 751 00:37:50,000 --> 00:37:53,520 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 752 00:37:53,520 --> 00:37:56,560 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 753 00:37:56,560 --> 00:37:58,800 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 754 00:37:58,800 --> 00:38:00,960 होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के 755 00:38:00,960 --> 00:38:03,839 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 756 00:38:03,839 --> 00:38:06,720 वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी 757 00:38:06,720 --> 00:38:08,960 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 758 00:38:08,960 --> 00:38:11,359 सेल के हवाले से वहीं रह जाती है जहां 759 00:38:11,359 --> 00:38:13,599 टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 760 00:38:13,599 --> 00:38:15,920 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 761 00:38:15,920 --> 00:38:18,800 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 762 00:38:18,800 --> 00:38:22,400 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 763 00:38:22,400 --> 00:38:24,640 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 764 00:38:24,640 --> 00:38:27,440 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 765 00:38:27,440 --> 00:38:30,000 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 766 00:38:30,000 --> 00:38:32,560 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 767 00:38:32,560 --> 00:38:34,880 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 768 00:38:34,880 --> 00:38:37,599 सजा नहीं सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर 769 00:38:37,599 --> 00:38:40,560 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 770 00:38:40,560 --> 00:38:43,119 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 771 00:38:43,119 --> 00:38:45,680 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 772 00:38:45,680 --> 00:38:49,040 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 773 00:38:49,040 --> 00:38:51,440 नाम नहीं बनाता। 774 00:38:51,440 --> 00:38:53,760 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 775 00:38:53,760 --> 00:38:56,160 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 776 00:38:56,160 --> 00:38:58,960 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 777 00:38:58,960 --> 00:39:01,119 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 778 00:39:01,119 --> 00:39:04,400 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 779 00:39:04,400 --> 00:39:06,880 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 780 00:39:06,880 --> 00:39:09,599 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 781 00:39:09,599 --> 00:39:13,119 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 782 00:39:13,119 --> 00:39:16,160 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 783 00:39:16,160 --> 00:39:18,400 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 784 00:39:18,400 --> 00:39:20,560 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 785 00:39:20,560 --> 00:39:23,599 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 786 00:39:23,599 --> 00:39:26,640 वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 787 00:39:26,640 --> 00:39:28,880 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 788 00:39:28,880 --> 00:39:31,920 हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी। 789 00:39:31,920 --> 00:39:34,000 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 790 00:39:34,000 --> 00:39:36,480 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 791 00:39:36,480 --> 00:39:39,280 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 792 00:39:39,280 --> 00:39:42,880 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 793 00:39:42,880 --> 00:39:45,119 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 794 00:39:45,119 --> 00:39:47,839 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 795 00:39:47,839 --> 00:39:50,640 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 796 00:39:50,640 --> 00:39:53,040 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 797 00:39:53,040 --> 00:39:55,760 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब 798 00:39:55,760 --> 00:39:58,720 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर 799 00:39:58,720 --> 00:40:01,520 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 800 00:40:01,520 --> 00:40:04,480 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 801 00:40:04,480 --> 00:40:06,880 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 802 00:40:06,880 --> 00:40:11,040 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 803 00:40:11,040 --> 00:40:13,359 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 804 00:40:13,359 --> 00:40:15,760 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 805 00:40:15,760 --> 00:40:18,560 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 806 00:40:18,560 --> 00:40:20,720 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 807 00:40:20,720 --> 00:40:24,000 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 808 00:40:24,000 --> 00:40:26,480 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 809 00:40:26,480 --> 00:40:29,200 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 810 00:40:29,200 --> 00:40:32,720 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 811 00:40:32,720 --> 00:40:35,760 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 812 00:40:35,760 --> 00:40:38,000 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 813 00:40:38,000 --> 00:40:40,160 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 814 00:40:40,160 --> 00:40:43,200 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 815 00:40:43,200 --> 00:40:46,480 वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद 816 00:40:46,480 --> 00:40:48,480 की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 817 00:40:48,480 --> 00:40:51,440 हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी। 818 00:40:51,440 --> 00:40:53,599 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 819 00:40:53,599 --> 00:40:56,079 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 820 00:40:56,079 --> 00:40:58,880 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 821 00:40:58,880 --> 00:41:02,400 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 822 00:41:02,400 --> 00:41:04,640 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 823 00:41:04,640 --> 00:41:07,359 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 824 00:41:07,359 --> 00:41:10,160 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 825 00:41:10,160 --> 00:41:12,560 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 826 00:41:12,560 --> 00:41:15,280 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब 827 00:41:15,280 --> 00:41:18,240 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर 828 00:41:18,240 --> 00:41:21,040 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 829 00:41:21,040 --> 00:41:24,000 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 830 00:41:24,000 --> 00:41:26,400 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 831 00:41:26,400 --> 00:41:30,640 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 832 00:41:30,640 --> 00:41:32,960 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 833 00:41:32,960 --> 00:41:35,359 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 834 00:41:35,359 --> 00:41:38,160 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 835 00:41:38,160 --> 00:41:40,319 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 836 00:41:40,319 --> 00:41:43,599 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 837 00:41:43,599 --> 00:41:46,079 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 838 00:41:46,079 --> 00:41:48,720 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 839 00:41:48,720 --> 00:41:52,240 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 840 00:41:52,240 --> 00:41:55,280 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 841 00:41:55,280 --> 00:41:57,520 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 842 00:41:57,520 --> 00:41:59,680 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 843 00:41:59,680 --> 00:42:02,720 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 844 00:42:02,720 --> 00:42:05,440 वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 845 00:42:05,440 --> 00:42:07,680 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 846 00:42:07,680 --> 00:42:10,560 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 847 00:42:10,560 --> 00:42:13,040 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 848 00:42:13,040 --> 00:42:15,440 हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का 849 00:42:15,440 --> 00:42:18,160 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 850 00:42:18,160 --> 00:42:22,000 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 851 00:42:22,000 --> 00:42:23,760 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 852 00:42:23,760 --> 00:42:26,800 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 853 00:42:26,800 --> 00:42:29,520 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 854 00:42:29,520 --> 00:42:31,920 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 855 00:42:31,920 --> 00:42:34,480 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 856 00:42:34,480 --> 00:42:37,280 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 857 00:42:37,280 --> 00:42:40,319 है। मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने 858 00:42:40,319 --> 00:42:43,119 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 859 00:42:43,119 --> 00:42:45,359 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 860 00:42:45,359 --> 00:42:50,160 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 861 00:42:50,160 --> 00:42:52,480 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 862 00:42:52,480 --> 00:42:54,880 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 863 00:42:54,880 --> 00:42:57,680 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 864 00:42:57,680 --> 00:42:59,839 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 865 00:42:59,839 --> 00:43:03,119 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 866 00:43:03,119 --> 00:43:05,599 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 867 00:43:05,599 --> 00:43:08,400 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 868 00:43:08,400 --> 00:43:11,920 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 869 00:43:11,920 --> 00:43:14,960 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 870 00:43:14,960 --> 00:43:17,200 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 871 00:43:17,200 --> 00:43:19,359 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 872 00:43:19,359 --> 00:43:22,400 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 873 00:43:22,400 --> 00:43:25,119 वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 874 00:43:25,119 --> 00:43:27,359 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 875 00:43:27,359 --> 00:43:30,240 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 876 00:43:30,240 --> 00:43:32,560 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 877 00:43:32,560 --> 00:43:34,960 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 878 00:43:34,960 --> 00:43:37,680 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 879 00:43:37,680 --> 00:43:41,599 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 880 00:43:41,599 --> 00:43:43,359 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 881 00:43:43,359 --> 00:43:46,400 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 882 00:43:46,400 --> 00:43:49,119 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 883 00:43:49,119 --> 00:43:51,520 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 884 00:43:51,520 --> 00:43:54,079 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 885 00:43:54,079 --> 00:43:56,880 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 886 00:43:56,880 --> 00:43:59,920 है। मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने 887 00:43:59,920 --> 00:44:02,720 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 888 00:44:02,720 --> 00:44:04,960 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 889 00:44:04,960 --> 00:44:09,839 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 890 00:44:09,839 --> 00:44:12,160 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 891 00:44:12,160 --> 00:44:14,560 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 892 00:44:14,560 --> 00:44:17,359 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 893 00:44:17,359 --> 00:44:19,520 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 894 00:44:19,520 --> 00:44:22,800 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 895 00:44:22,800 --> 00:44:25,280 रोते हुए कहता है, मैंने तुम्हें निकालकर 896 00:44:25,280 --> 00:44:28,000 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 897 00:44:28,000 --> 00:44:31,520 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 898 00:44:31,520 --> 00:44:34,560 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 899 00:44:34,560 --> 00:44:36,800 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 900 00:44:36,800 --> 00:44:38,960 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 901 00:44:38,960 --> 00:44:42,000 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 902 00:44:42,000 --> 00:44:45,280 वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद 903 00:44:45,280 --> 00:44:47,280 की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 904 00:44:47,280 --> 00:44:50,240 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 905 00:44:50,240 --> 00:44:52,400 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 906 00:44:52,400 --> 00:44:54,880 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 907 00:44:54,880 --> 00:44:57,680 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 908 00:44:57,680 --> 00:45:01,280 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 909 00:45:01,280 --> 00:45:03,440 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 910 00:45:03,440 --> 00:45:06,240 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 911 00:45:06,240 --> 00:45:09,040 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 912 00:45:09,040 --> 00:45:11,440 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 913 00:45:11,440 --> 00:45:14,160 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब 914 00:45:14,160 --> 00:45:17,119 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 915 00:45:17,119 --> 00:45:19,920 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 916 00:45:19,920 --> 00:45:22,800 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 917 00:45:22,800 --> 00:45:25,280 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 918 00:45:25,280 --> 00:45:29,440 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 919 00:45:29,440 --> 00:45:31,760 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 920 00:45:31,760 --> 00:45:34,160 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 921 00:45:34,160 --> 00:45:36,880 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 922 00:45:36,880 --> 00:45:39,119 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 923 00:45:39,119 --> 00:45:42,400 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 924 00:45:42,400 --> 00:45:44,880 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 925 00:45:44,880 --> 00:45:47,599 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 926 00:45:47,599 --> 00:45:51,119 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 927 00:45:51,119 --> 00:45:54,160 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 928 00:45:54,160 --> 00:45:56,400 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 929 00:45:56,400 --> 00:45:58,560 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 930 00:45:58,560 --> 00:46:01,599 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 931 00:46:01,599 --> 00:46:04,640 वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 932 00:46:04,640 --> 00:46:06,800 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 933 00:46:06,800 --> 00:46:09,839 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 934 00:46:09,839 --> 00:46:12,000 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 935 00:46:12,000 --> 00:46:14,480 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 936 00:46:14,480 --> 00:46:17,280 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 937 00:46:17,280 --> 00:46:20,880 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 938 00:46:20,880 --> 00:46:23,040 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 939 00:46:23,040 --> 00:46:25,839 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 940 00:46:25,839 --> 00:46:28,640 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 941 00:46:28,640 --> 00:46:31,040 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 942 00:46:31,040 --> 00:46:33,760 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 943 00:46:33,760 --> 00:46:36,720 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 944 00:46:36,720 --> 00:46:39,520 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 945 00:46:39,520 --> 00:46:42,400 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 946 00:46:42,400 --> 00:46:44,880 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 947 00:46:44,880 --> 00:46:49,040 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 948 00:46:49,040 --> 00:46:51,359 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 949 00:46:51,359 --> 00:46:53,760 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 950 00:46:53,760 --> 00:46:56,480 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 951 00:46:56,480 --> 00:46:58,720 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 952 00:46:58,720 --> 00:47:02,000 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 953 00:47:02,000 --> 00:47:04,480 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 954 00:47:04,480 --> 00:47:07,200 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 955 00:47:07,200 --> 00:47:10,720 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 956 00:47:10,720 --> 00:47:13,680 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 957 00:47:13,680 --> 00:47:16,000 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 958 00:47:16,000 --> 00:47:18,160 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 959 00:47:18,160 --> 00:47:21,200 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 960 00:47:21,200 --> 00:47:24,480 वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद 961 00:47:24,480 --> 00:47:26,400 की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 962 00:47:26,400 --> 00:47:29,440 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 963 00:47:29,440 --> 00:47:31,599 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 964 00:47:31,599 --> 00:47:34,079 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 965 00:47:34,079 --> 00:47:36,880 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 966 00:47:36,880 --> 00:47:40,480 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 967 00:47:40,480 --> 00:47:42,640 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 968 00:47:42,640 --> 00:47:45,440 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 969 00:47:45,440 --> 00:47:48,240 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 970 00:47:48,240 --> 00:47:50,640 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 971 00:47:50,640 --> 00:47:53,359 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 972 00:47:53,359 --> 00:47:56,319 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 973 00:47:56,319 --> 00:47:59,119 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 974 00:47:59,119 --> 00:48:02,000 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 975 00:48:02,000 --> 00:48:04,480 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 976 00:48:04,480 --> 00:48:08,640 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 977 00:48:08,640 --> 00:48:10,960 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 978 00:48:10,960 --> 00:48:13,359 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 979 00:48:13,359 --> 00:48:16,079 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 980 00:48:16,079 --> 00:48:18,319 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 981 00:48:18,319 --> 00:48:21,599 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 982 00:48:21,599 --> 00:48:24,079 रोते हुए कहता है, मैंने तुम्हें निकालकर 983 00:48:24,079 --> 00:48:26,800 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 984 00:48:26,800 --> 00:48:30,319 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 985 00:48:30,319 --> 00:48:33,280 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 986 00:48:33,280 --> 00:48:35,599 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 987 00:48:35,599 --> 00:48:37,760 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 988 00:48:37,760 --> 00:48:40,800 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 989 00:48:40,800 --> 00:48:44,079 वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद 990 00:48:44,079 --> 00:48:46,000 की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 991 00:48:46,000 --> 00:48:49,040 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 992 00:48:49,040 --> 00:48:51,200 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 993 00:48:51,200 --> 00:48:53,680 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 994 00:48:53,680 --> 00:48:56,480 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 995 00:48:56,480 --> 00:49:00,079 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 996 00:49:00,079 --> 00:49:02,240 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 997 00:49:02,240 --> 00:49:05,040 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 998 00:49:05,040 --> 00:49:07,839 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 999 00:49:07,839 --> 00:49:10,240 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1000 00:49:10,240 --> 00:49:12,960 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 1001 00:49:12,960 --> 00:49:15,920 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 1002 00:49:15,920 --> 00:49:18,720 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1003 00:49:18,720 --> 00:49:21,599 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1004 00:49:21,599 --> 00:49:24,079 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1005 00:49:24,079 --> 00:49:28,240 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1006 00:49:28,240 --> 00:49:30,559 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1007 00:49:30,559 --> 00:49:32,960 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1008 00:49:32,960 --> 00:49:35,680 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1009 00:49:35,680 --> 00:49:37,920 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1010 00:49:37,920 --> 00:49:41,200 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1011 00:49:41,200 --> 00:49:43,680 रोते हुए कहता है, मैंने तुम्हें निकालकर 1012 00:49:43,680 --> 00:49:46,400 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1013 00:49:46,400 --> 00:49:49,839 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1014 00:49:49,839 --> 00:49:52,880 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1015 00:49:52,880 --> 00:49:55,200 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1016 00:49:55,200 --> 00:49:57,359 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1017 00:49:57,359 --> 00:50:00,400 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1018 00:50:00,400 --> 00:50:03,680 वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद 1019 00:50:03,680 --> 00:50:05,599 की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1020 00:50:05,599 --> 00:50:08,640 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 1021 00:50:08,640 --> 00:50:10,800 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1022 00:50:10,800 --> 00:50:13,280 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 1023 00:50:13,280 --> 00:50:16,000 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1024 00:50:16,000 --> 00:50:19,680 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1025 00:50:19,680 --> 00:50:21,839 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1026 00:50:21,839 --> 00:50:24,640 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1027 00:50:24,640 --> 00:50:27,440 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1028 00:50:27,440 --> 00:50:29,839 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1029 00:50:29,839 --> 00:50:32,559 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब 1030 00:50:32,559 --> 00:50:35,520 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 1031 00:50:35,520 --> 00:50:38,319 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1032 00:50:38,319 --> 00:50:41,200 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1033 00:50:41,200 --> 00:50:43,680 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1034 00:50:43,680 --> 00:50:47,839 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1035 00:50:47,839 --> 00:50:50,160 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1036 00:50:50,160 --> 00:50:52,559 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1037 00:50:52,559 --> 00:50:55,280 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1038 00:50:55,280 --> 00:50:57,520 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1039 00:50:57,520 --> 00:51:00,800 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1040 00:51:00,800 --> 00:51:03,280 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1041 00:51:03,280 --> 00:51:06,000 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1042 00:51:06,000 --> 00:51:09,440 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1043 00:51:09,440 --> 00:51:12,480 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 1044 00:51:12,480 --> 00:51:14,800 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1045 00:51:14,800 --> 00:51:16,960 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1046 00:51:16,960 --> 00:51:20,000 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1047 00:51:20,000 --> 00:51:23,280 वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद 1048 00:51:23,280 --> 00:51:25,200 की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1049 00:51:25,200 --> 00:51:28,240 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 1050 00:51:28,240 --> 00:51:30,400 यूसफु मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1051 00:51:30,400 --> 00:51:32,880 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 1052 00:51:32,880 --> 00:51:35,599 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1053 00:51:35,599 --> 00:51:39,280 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1054 00:51:39,280 --> 00:51:41,440 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1055 00:51:41,440 --> 00:51:44,240 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1056 00:51:44,240 --> 00:51:47,040 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1057 00:51:47,040 --> 00:51:49,440 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1058 00:51:49,440 --> 00:51:52,160 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 1059 00:51:52,160 --> 00:51:55,119 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 1060 00:51:55,119 --> 00:51:57,920 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1061 00:51:57,920 --> 00:52:00,800 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1062 00:52:00,800 --> 00:52:03,280 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1063 00:52:03,280 --> 00:52:07,440 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1064 00:52:07,440 --> 00:52:09,760 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1065 00:52:09,760 --> 00:52:12,160 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1066 00:52:12,160 --> 00:52:14,880 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1067 00:52:14,880 --> 00:52:17,119 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1068 00:52:17,119 --> 00:52:20,400 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1069 00:52:20,400 --> 00:52:22,880 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1070 00:52:22,880 --> 00:52:25,599 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1071 00:52:25,599 --> 00:52:29,040 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1072 00:52:29,040 --> 00:52:32,079 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 1073 00:52:32,079 --> 00:52:34,400 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1074 00:52:34,400 --> 00:52:36,559 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1075 00:52:36,559 --> 00:52:39,200 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1076 00:52:39,200 --> 00:52:42,640 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 1077 00:52:42,640 --> 00:52:44,800 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1078 00:52:44,800 --> 00:52:47,839 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 1079 00:52:47,839 --> 00:52:50,000 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1080 00:52:50,000 --> 00:52:52,480 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 1081 00:52:52,480 --> 00:52:55,200 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1082 00:52:55,200 --> 00:52:58,880 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1083 00:52:58,880 --> 00:53:01,040 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1084 00:53:01,040 --> 00:53:03,839 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1085 00:53:03,839 --> 00:53:06,640 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1086 00:53:06,640 --> 00:53:09,040 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1087 00:53:09,040 --> 00:53:11,760 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 1088 00:53:11,760 --> 00:53:14,720 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 1089 00:53:14,720 --> 00:53:17,520 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1090 00:53:17,520 --> 00:53:20,400 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1091 00:53:20,400 --> 00:53:22,880 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1092 00:53:22,880 --> 00:53:27,040 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1093 00:53:27,040 --> 00:53:29,359 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1094 00:53:29,359 --> 00:53:31,760 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1095 00:53:31,760 --> 00:53:34,480 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1096 00:53:34,480 --> 00:53:36,720 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1097 00:53:36,720 --> 00:53:40,000 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1098 00:53:40,000 --> 00:53:42,480 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1099 00:53:42,480 --> 00:53:45,200 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1100 00:53:45,200 --> 00:53:48,640 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1101 00:53:48,640 --> 00:53:51,680 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1102 00:53:51,680 --> 00:53:54,000 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1103 00:53:54,000 --> 00:53:56,160 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1104 00:53:56,160 --> 00:53:59,200 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1105 00:53:59,200 --> 00:54:02,480 वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद 1106 00:54:02,480 --> 00:54:04,400 की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1107 00:54:04,400 --> 00:54:07,440 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 1108 00:54:07,440 --> 00:54:09,599 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1109 00:54:09,599 --> 00:54:12,079 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 1110 00:54:12,079 --> 00:54:14,800 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1111 00:54:14,800 --> 00:54:18,480 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1112 00:54:18,480 --> 00:54:20,640 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1113 00:54:20,640 --> 00:54:23,440 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1114 00:54:23,440 --> 00:54:26,240 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1115 00:54:26,240 --> 00:54:28,640 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1116 00:54:28,640 --> 00:54:31,359 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 1117 00:54:31,359 --> 00:54:34,319 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 1118 00:54:34,319 --> 00:54:37,119 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 1119 00:54:37,119 --> 00:54:40,000 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1120 00:54:40,000 --> 00:54:42,480 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1121 00:54:42,480 --> 00:54:46,640 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1122 00:54:46,640 --> 00:54:48,960 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1123 00:54:48,960 --> 00:54:51,359 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1124 00:54:51,359 --> 00:54:54,079 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1125 00:54:54,079 --> 00:54:56,319 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1126 00:54:56,319 --> 00:54:59,599 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1127 00:54:59,599 --> 00:55:02,000 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1128 00:55:02,000 --> 00:55:04,800 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1129 00:55:04,800 --> 00:55:08,240 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1130 00:55:08,240 --> 00:55:11,280 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1131 00:55:11,280 --> 00:55:13,599 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1132 00:55:13,599 --> 00:55:15,760 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1133 00:55:15,760 --> 00:55:18,400 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1134 00:55:18,400 --> 00:55:21,839 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 1135 00:55:21,839 --> 00:55:24,000 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1136 00:55:24,000 --> 00:55:27,040 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 1137 00:55:27,040 --> 00:55:29,200 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1138 00:55:29,200 --> 00:55:31,680 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 1139 00:55:31,680 --> 00:55:34,400 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1140 00:55:34,400 --> 00:55:38,079 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1141 00:55:38,079 --> 00:55:40,240 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1142 00:55:40,240 --> 00:55:43,040 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1143 00:55:43,040 --> 00:55:45,839 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1144 00:55:45,839 --> 00:55:48,240 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1145 00:55:48,240 --> 00:55:50,960 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 1146 00:55:50,960 --> 00:55:53,920 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 1147 00:55:53,920 --> 00:55:56,720 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 1148 00:55:56,720 --> 00:55:59,599 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1149 00:55:59,599 --> 00:56:02,079 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1150 00:56:02,079 --> 00:56:06,240 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1151 00:56:06,240 --> 00:56:08,559 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1152 00:56:08,559 --> 00:56:10,960 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1153 00:56:10,960 --> 00:56:13,680 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1154 00:56:13,680 --> 00:56:15,920 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1155 00:56:15,920 --> 00:56:19,200 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1156 00:56:19,200 --> 00:56:21,599 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1157 00:56:21,599 --> 00:56:24,400 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1158 00:56:24,400 --> 00:56:27,839 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1159 00:56:27,839 --> 00:56:30,880 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1160 00:56:30,880 --> 00:56:33,200 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1161 00:56:33,200 --> 00:56:35,359 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1162 00:56:35,359 --> 00:56:38,000 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1163 00:56:38,000 --> 00:56:41,119 है। वापसी से घर की नहीं होती। कभी-कभी 1164 00:56:41,119 --> 00:56:43,359 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1165 00:56:43,359 --> 00:56:46,160 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1166 00:56:46,160 --> 00:56:48,640 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1167 00:56:48,640 --> 00:56:51,040 हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का 1168 00:56:51,040 --> 00:56:53,760 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1169 00:56:53,760 --> 00:56:57,520 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1170 00:56:57,520 --> 00:56:59,359 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1171 00:56:59,359 --> 00:57:02,400 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1172 00:57:02,400 --> 00:57:05,040 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1173 00:57:05,040 --> 00:57:07,520 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1174 00:57:07,520 --> 00:57:10,079 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 1175 00:57:10,079 --> 00:57:13,200 सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 1176 00:57:13,200 --> 00:57:15,920 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 1177 00:57:15,920 --> 00:57:18,720 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 1178 00:57:18,720 --> 00:57:20,960 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 1179 00:57:20,960 --> 00:57:25,839 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1180 00:57:25,839 --> 00:57:28,160 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1181 00:57:28,160 --> 00:57:30,559 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1182 00:57:30,559 --> 00:57:33,280 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1183 00:57:33,280 --> 00:57:35,520 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1184 00:57:35,520 --> 00:57:38,799 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1185 00:57:38,799 --> 00:57:41,200 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1186 00:57:41,200 --> 00:57:44,000 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1187 00:57:44,000 --> 00:57:47,440 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1188 00:57:47,440 --> 00:57:50,480 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 1189 00:57:50,480 --> 00:57:52,799 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1190 00:57:52,799 --> 00:57:54,960 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1191 00:57:54,960 --> 00:57:57,599 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1192 00:57:57,599 --> 00:58:01,040 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 1193 00:58:01,040 --> 00:58:03,200 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1194 00:58:03,200 --> 00:58:06,240 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 1195 00:58:06,240 --> 00:58:08,400 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1196 00:58:08,400 --> 00:58:10,880 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 1197 00:58:10,880 --> 00:58:13,599 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1198 00:58:13,599 --> 00:58:17,280 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1199 00:58:17,280 --> 00:58:19,440 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1200 00:58:19,440 --> 00:58:22,240 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1201 00:58:22,240 --> 00:58:25,040 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1202 00:58:25,040 --> 00:58:27,440 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1203 00:58:27,440 --> 00:58:30,160 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 1204 00:58:30,160 --> 00:58:33,119 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 1205 00:58:33,119 --> 00:58:35,920 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 1206 00:58:35,920 --> 00:58:38,799 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1207 00:58:38,799 --> 00:58:41,280 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1208 00:58:41,280 --> 00:58:45,440 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1209 00:58:45,440 --> 00:58:47,760 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1210 00:58:47,760 --> 00:58:50,160 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1211 00:58:50,160 --> 00:58:52,880 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1212 00:58:52,880 --> 00:58:55,119 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1213 00:58:55,119 --> 00:58:58,400 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1214 00:58:58,400 --> 00:59:00,799 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1215 00:59:00,799 --> 00:59:03,599 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1216 00:59:03,599 --> 00:59:07,040 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1217 00:59:07,040 --> 00:59:10,079 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1218 00:59:10,079 --> 00:59:12,319 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1219 00:59:12,319 --> 00:59:14,559 हंठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1220 00:59:14,559 --> 00:59:17,200 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1221 00:59:17,200 --> 00:59:20,240 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 1222 00:59:20,240 --> 00:59:22,559 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1223 00:59:22,559 --> 00:59:25,359 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1224 00:59:25,359 --> 00:59:27,839 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1225 00:59:27,839 --> 00:59:30,240 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1226 00:59:30,240 --> 00:59:32,960 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1227 00:59:32,960 --> 00:59:36,720 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1228 00:59:36,720 --> 00:59:38,559 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1229 00:59:38,559 --> 00:59:41,599 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1230 00:59:41,599 --> 00:59:44,240 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1231 00:59:44,240 --> 00:59:46,720 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1232 00:59:46,720 --> 00:59:49,280 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 1233 00:59:49,280 --> 00:59:52,400 सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 1234 00:59:52,400 --> 00:59:55,119 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 1235 00:59:55,119 --> 00:59:57,920 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 1236 00:59:57,920 --> 01:00:00,160 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 1237 01:00:00,160 --> 01:00:05,040 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1238 01:00:05,040 --> 01:00:07,359 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1239 01:00:07,359 --> 01:00:09,760 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1240 01:00:09,760 --> 01:00:12,480 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1241 01:00:12,480 --> 01:00:14,720 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1242 01:00:14,720 --> 01:00:18,000 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1243 01:00:18,000 --> 01:00:20,400 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1244 01:00:20,400 --> 01:00:23,200 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1245 01:00:23,200 --> 01:00:26,640 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1246 01:00:26,640 --> 01:00:29,680 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1247 01:00:29,680 --> 01:00:32,000 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1248 01:00:32,000 --> 01:00:34,160 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1249 01:00:34,160 --> 01:00:36,799 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1250 01:00:36,799 --> 01:00:40,160 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 1251 01:00:40,160 --> 01:00:42,400 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1252 01:00:42,400 --> 01:00:45,440 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 1253 01:00:45,440 --> 01:00:47,520 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1254 01:00:47,520 --> 01:00:50,079 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 1255 01:00:50,079 --> 01:00:52,799 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1256 01:00:52,799 --> 01:00:56,480 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1257 01:00:56,480 --> 01:00:58,640 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1258 01:00:58,640 --> 01:01:01,440 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1259 01:01:01,440 --> 01:01:04,240 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1260 01:01:04,240 --> 01:01:06,640 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1261 01:01:06,640 --> 01:01:09,359 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 1262 01:01:09,359 --> 01:01:12,319 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 1263 01:01:12,319 --> 01:01:15,119 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 1264 01:01:15,119 --> 01:01:18,000 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1265 01:01:18,000 --> 01:01:20,480 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1266 01:01:20,480 --> 01:01:24,640 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1267 01:01:24,640 --> 01:01:26,960 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1268 01:01:26,960 --> 01:01:29,359 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1269 01:01:29,359 --> 01:01:32,079 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1270 01:01:32,079 --> 01:01:34,319 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1271 01:01:34,319 --> 01:01:37,599 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1272 01:01:37,599 --> 01:01:40,000 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1273 01:01:40,000 --> 01:01:42,799 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1274 01:01:42,799 --> 01:01:46,240 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1275 01:01:46,240 --> 01:01:49,280 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1276 01:01:49,280 --> 01:01:51,599 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1277 01:01:51,599 --> 01:01:53,760 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1278 01:01:53,760 --> 01:01:56,400 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1279 01:01:56,400 --> 01:01:59,440 है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 1280 01:01:59,440 --> 01:02:01,760 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1281 01:02:01,760 --> 01:02:04,559 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1282 01:02:04,559 --> 01:02:06,960 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1283 01:02:06,960 --> 01:02:09,440 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1284 01:02:09,440 --> 01:02:12,160 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1285 01:02:12,160 --> 01:02:15,920 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1286 01:02:15,920 --> 01:02:17,760 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1287 01:02:17,760 --> 01:02:20,799 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1288 01:02:20,799 --> 01:02:23,440 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1289 01:02:23,440 --> 01:02:25,920 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1290 01:02:25,920 --> 01:02:28,480 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 1291 01:02:28,480 --> 01:02:31,599 सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 1292 01:02:31,599 --> 01:02:34,319 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 1293 01:02:34,319 --> 01:02:37,119 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 1294 01:02:37,119 --> 01:02:39,359 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 1295 01:02:39,359 --> 01:02:44,240 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1296 01:02:44,240 --> 01:02:46,559 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1297 01:02:46,559 --> 01:02:48,880 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1298 01:02:48,880 --> 01:02:51,680 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1299 01:02:51,680 --> 01:02:53,920 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1300 01:02:53,920 --> 01:02:57,200 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1301 01:02:57,200 --> 01:02:59,599 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1302 01:02:59,599 --> 01:03:02,319 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1303 01:03:02,319 --> 01:03:05,839 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1304 01:03:05,839 --> 01:03:08,880 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1305 01:03:08,880 --> 01:03:11,200 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1306 01:03:11,200 --> 01:03:13,359 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1307 01:03:13,359 --> 01:03:16,000 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1308 01:03:16,000 --> 01:03:19,039 है। वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी 1309 01:03:19,039 --> 01:03:21,359 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1310 01:03:21,359 --> 01:03:24,160 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1311 01:03:24,160 --> 01:03:26,559 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1312 01:03:26,559 --> 01:03:28,960 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1313 01:03:28,960 --> 01:03:31,760 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1314 01:03:31,760 --> 01:03:35,520 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1315 01:03:35,520 --> 01:03:37,359 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1316 01:03:37,359 --> 01:03:40,400 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1317 01:03:40,400 --> 01:03:43,039 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1318 01:03:43,039 --> 01:03:45,520 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1319 01:03:45,520 --> 01:03:48,079 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 1320 01:03:48,079 --> 01:03:51,200 सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 1321 01:03:51,200 --> 01:03:53,920 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 1322 01:03:53,920 --> 01:03:56,640 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 1323 01:03:56,640 --> 01:03:58,960 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 1324 01:03:58,960 --> 01:04:03,839 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1325 01:04:03,839 --> 01:04:06,160 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1326 01:04:06,160 --> 01:04:08,480 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1327 01:04:08,480 --> 01:04:11,280 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1328 01:04:11,280 --> 01:04:13,520 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1329 01:04:13,520 --> 01:04:16,799 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1330 01:04:16,799 --> 01:04:19,200 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1331 01:04:19,200 --> 01:04:21,920 खुद को सजा दी थी। युसुफ जवाब देता है और 1332 01:04:21,920 --> 01:04:25,440 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1333 01:04:25,440 --> 01:04:28,480 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1334 01:04:28,480 --> 01:04:30,799 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1335 01:04:30,799 --> 01:04:32,960 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1336 01:04:32,960 --> 01:04:35,599 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1337 01:04:35,599 --> 01:04:38,640 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 1338 01:04:38,640 --> 01:04:40,880 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1339 01:04:40,880 --> 01:04:43,760 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1340 01:04:43,760 --> 01:04:46,160 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1341 01:04:46,160 --> 01:04:48,559 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1342 01:04:48,559 --> 01:04:51,359 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1343 01:04:51,359 --> 01:04:55,119 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1344 01:04:55,119 --> 01:04:56,960 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1345 01:04:56,960 --> 01:05:00,000 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1346 01:05:00,000 --> 01:05:02,640 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1347 01:05:02,640 --> 01:05:05,119 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1348 01:05:05,119 --> 01:05:07,680 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 1349 01:05:07,680 --> 01:05:10,400 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 1350 01:05:10,400 --> 01:05:13,520 है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 1351 01:05:13,520 --> 01:05:16,240 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 1352 01:05:16,240 --> 01:05:18,559 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 1353 01:05:18,559 --> 01:05:23,440 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1354 01:05:23,440 --> 01:05:25,760 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1355 01:05:25,760 --> 01:05:28,079 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1356 01:05:28,079 --> 01:05:30,880 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1357 01:05:30,880 --> 01:05:33,119 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1358 01:05:33,119 --> 01:05:36,400 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1359 01:05:36,400 --> 01:05:38,799 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1360 01:05:38,799 --> 01:05:41,520 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1361 01:05:41,520 --> 01:05:45,039 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1362 01:05:45,039 --> 01:05:48,079 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1363 01:05:48,079 --> 01:05:50,400 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1364 01:05:50,400 --> 01:05:52,559 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1365 01:05:52,559 --> 01:05:55,200 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1366 01:05:55,200 --> 01:05:58,240 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 1367 01:05:58,240 --> 01:06:00,480 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1368 01:06:00,480 --> 01:06:03,359 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1369 01:06:03,359 --> 01:06:05,760 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1370 01:06:05,760 --> 01:06:08,160 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1371 01:06:08,160 --> 01:06:10,960 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1372 01:06:10,960 --> 01:06:14,720 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1373 01:06:14,720 --> 01:06:16,559 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1374 01:06:16,559 --> 01:06:19,599 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1375 01:06:19,599 --> 01:06:22,240 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1376 01:06:22,240 --> 01:06:24,720 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1377 01:06:24,720 --> 01:06:27,280 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 1378 01:06:27,280 --> 01:06:30,000 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 1379 01:06:30,000 --> 01:06:33,119 है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 1380 01:06:33,119 --> 01:06:35,839 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 1381 01:06:35,839 --> 01:06:38,160 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 1382 01:06:38,160 --> 01:06:43,039 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1383 01:06:43,039 --> 01:06:45,359 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1384 01:06:45,359 --> 01:06:47,680 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1385 01:06:47,680 --> 01:06:50,480 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1386 01:06:50,480 --> 01:06:52,720 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1387 01:06:52,720 --> 01:06:56,000 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1388 01:06:56,000 --> 01:06:58,400 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1389 01:06:58,400 --> 01:07:01,119 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1390 01:07:01,119 --> 01:07:04,640 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1391 01:07:04,640 --> 01:07:07,680 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1392 01:07:07,680 --> 01:07:10,000 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1393 01:07:10,000 --> 01:07:12,160 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1394 01:07:12,160 --> 01:07:14,799 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1395 01:07:14,799 --> 01:07:17,839 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 1396 01:07:17,839 --> 01:07:20,079 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1397 01:07:20,079 --> 01:07:22,960 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1398 01:07:22,960 --> 01:07:25,359 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1399 01:07:25,359 --> 01:07:27,760 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1400 01:07:27,760 --> 01:07:30,559 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1401 01:07:30,559 --> 01:07:34,319 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1402 01:07:34,319 --> 01:07:36,160 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1403 01:07:36,160 --> 01:07:39,200 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1404 01:07:39,200 --> 01:07:41,839 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1405 01:07:41,839 --> 01:07:44,319 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1406 01:07:44,319 --> 01:07:46,880 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 1407 01:07:46,880 --> 01:07:49,599 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 1408 01:07:49,599 --> 01:07:52,720 है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 1409 01:07:52,720 --> 01:07:55,440 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 1410 01:07:55,440 --> 01:07:57,760 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 1411 01:07:57,760 --> 01:08:02,640 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1412 01:08:02,640 --> 01:08:04,960 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1413 01:08:04,960 --> 01:08:07,280 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1414 01:08:07,280 --> 01:08:10,079 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1415 01:08:10,079 --> 01:08:12,319 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1416 01:08:12,319 --> 01:08:15,599 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1417 01:08:15,599 --> 01:08:18,000 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1418 01:08:18,000 --> 01:08:20,719 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1419 01:08:20,719 --> 01:08:24,239 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1420 01:08:24,239 --> 01:08:27,279 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1421 01:08:27,279 --> 01:08:29,600 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1422 01:08:29,600 --> 01:08:31,759 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1423 01:08:31,759 --> 01:08:34,400 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1424 01:08:34,400 --> 01:08:37,440 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 1425 01:08:37,440 --> 01:08:39,759 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1426 01:08:39,759 --> 01:08:42,560 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1427 01:08:42,560 --> 01:08:44,960 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1428 01:08:44,960 --> 01:08:47,359 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1429 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एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1443 01:09:26,880 --> 01:09:29,679 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1444 01:09:29,679 --> 01:09:31,920 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1445 01:09:31,920 --> 01:09:35,199 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1446 01:09:35,199 --> 01:09:37,600 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1447 01:09:37,600 --> 01:09:40,319 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1448 01:09:40,319 --> 01:09:43,839 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1449 01:09:43,839 --> 01:09:46,880 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1450 01:09:46,880 --> 01:09:49,199 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1451 01:09:49,199 --> 01:09:51,359 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1452 01:09:51,359 --> 01:09:54,000 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1453 01:09:54,000 --> 01:09:57,040 है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 1454 01:09:57,040 --> 01:09:59,280 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1455 01:09:59,280 --> 01:10:02,159 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1456 01:10:02,159 --> 01:10:04,560 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1457 01:10:04,560 --> 01:10:06,960 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1458 01:10:06,960 --> 01:10:09,760 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1459 01:10:09,760 --> 01:10:13,520 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1460 01:10:13,520 --> 01:10:15,360 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1461 01:10:15,360 --> 01:10:18,400 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1462 01:10:18,400 --> 01:10:21,040 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1463 01:10:21,040 --> 01:10:23,440 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1464 01:10:23,440 --> 01:10:26,320 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 1465 01:10:26,320 --> 01:10:29,120 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 1466 01:10:29,120 --> 01:10:31,920 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 1467 01:10:31,920 --> 01:10:34,640 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 1468 01:10:34,640 --> 01:10:36,960 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 1469 01:10:36,960 --> 01:10:41,760 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1470 01:10:41,760 --> 01:10:44,159 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1471 01:10:44,159 --> 01:10:46,480 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1472 01:10:46,480 --> 01:10:49,280 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1473 01:10:49,280 --> 01:10:51,520 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1474 01:10:51,520 --> 01:10:54,800 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1475 01:10:54,800 --> 01:10:57,199 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1476 01:10:57,199 --> 01:10:59,920 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1477 01:10:59,920 --> 01:11:03,440 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1478 01:11:03,440 --> 01:11:06,480 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1479 01:11:06,480 --> 01:11:08,800 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1480 01:11:08,800 --> 01:11:10,960 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1481 01:11:10,960 --> 01:11:14,000 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1482 01:11:14,000 --> 01:11:16,640 वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 1483 01:11:16,640 --> 01:11:18,880 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1484 01:11:18,880 --> 01:11:21,760 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1485 01:11:21,760 --> 01:11:24,159 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1486 01:11:24,159 --> 01:11:26,560 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1487 01:11:26,560 --> 01:11:29,360 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1488 01:11:29,360 --> 01:11:33,120 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1489 01:11:33,120 --> 01:11:34,960 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1490 01:11:34,960 --> 01:11:38,000 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1491 01:11:38,000 --> 01:11:40,640 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1492 01:11:40,640 --> 01:11:43,040 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1493 01:11:43,040 --> 01:11:45,920 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 1494 01:11:45,920 --> 01:11:48,719 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 1495 01:11:48,719 --> 01:11:51,760 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 1496 01:11:51,760 --> 01:11:54,400 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 1497 01:11:54,400 --> 01:11:56,880 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 1498 01:11:56,880 --> 01:12:01,280 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1499 01:12:01,280 --> 01:12:03,679 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1500 01:12:03,679 --> 01:12:06,000 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1501 01:12:06,000 --> 01:12:08,800 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1502 01:12:08,800 --> 01:12:11,040 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1503 01:12:11,040 --> 01:12:14,320 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1504 01:12:14,320 --> 01:12:16,719 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1505 01:12:16,719 --> 01:12:19,520 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1506 01:12:19,520 --> 01:12:23,040 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1507 01:12:23,040 --> 01:12:26,080 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1508 01:12:26,080 --> 01:12:28,400 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1509 01:12:28,400 --> 01:12:30,560 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1510 01:12:30,560 --> 01:12:33,600 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1511 01:12:33,600 --> 01:12:36,239 वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 1512 01:12:36,239 --> 01:12:38,480 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1513 01:12:38,480 --> 01:12:41,360 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1514 01:12:41,360 --> 01:12:43,760 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1515 01:12:43,760 --> 01:12:46,159 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1516 01:12:46,159 --> 01:12:48,960 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1517 01:12:48,960 --> 01:12:52,719 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1518 01:12:52,719 --> 01:12:54,560 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1519 01:12:54,560 --> 01:12:57,600 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1520 01:12:57,600 --> 01:13:00,239 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1521 01:13:00,239 --> 01:13:02,640 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1522 01:13:02,640 --> 01:13:05,520 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 1523 01:13:05,520 --> 01:13:08,320 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 1524 01:13:08,320 --> 01:13:11,360 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 1525 01:13:11,360 --> 01:13:14,000 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 1526 01:13:14,000 --> 01:13:16,480 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 1527 01:13:16,480 --> 01:13:20,960 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1528 01:13:20,960 --> 01:13:23,360 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1529 01:13:23,360 --> 01:13:25,679 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1530 01:13:25,679 --> 01:13:28,480 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1531 01:13:28,480 --> 01:13:30,719 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1532 01:13:30,719 --> 01:13:34,000 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1533 01:13:34,000 --> 01:13:36,400 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1534 01:13:36,400 --> 01:13:39,120 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1535 01:13:39,120 --> 01:13:42,640 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1536 01:13:42,640 --> 01:13:45,679 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1537 01:13:45,679 --> 01:13:47,920 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1538 01:13:47,920 --> 01:13:50,159 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1539 01:13:50,159 --> 01:13:53,199 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1540 01:13:53,199 --> 01:13:56,159 वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 1541 01:13:56,159 --> 01:13:58,400 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1542 01:13:58,400 --> 01:14:01,360 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 1543 01:14:01,360 --> 01:14:03,440 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1544 01:14:03,440 --> 01:14:05,920 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 1545 01:14:05,920 --> 01:14:08,719 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1546 01:14:08,719 --> 01:14:12,400 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1547 01:14:12,400 --> 01:14:14,640 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1548 01:14:14,640 --> 01:14:17,360 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1549 01:14:17,360 --> 01:14:20,239 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान फल 1550 01:14:20,239 --> 01:14:22,640 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1551 01:14:22,640 --> 01:14:25,679 कहती है कि बाज गलत सजा नहीं से अब समझ 1552 01:14:25,679 --> 01:14:28,640 मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर अंदर 1553 01:14:28,640 --> 01:14:31,120 से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1554 01:14:31,120 --> 01:14:34,000 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1555 01:14:34,000 --> 01:14:36,480 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1556 01:14:36,480 --> 01:14:40,560 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1557 01:14:40,560 --> 01:14:42,960 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1558 01:14:42,960 --> 01:14:45,280 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1559 01:14:45,280 --> 01:14:48,080 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1560 01:14:48,080 --> 01:14:50,320 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1561 01:14:50,320 --> 01:14:53,600 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1562 01:14:53,600 --> 01:14:56,000 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1563 01:14:56,000 --> 01:14:58,719 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1564 01:14:58,719 --> 01:15:02,239 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1565 01:15:02,239 --> 01:15:05,280 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1566 01:15:05,280 --> 01:15:07,600 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1567 01:15:07,600 --> 01:15:09,760 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1568 01:15:09,760 --> 01:15:12,560 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1569 01:15:12,560 --> 01:15:15,440 वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी 1570 01:15:15,440 --> 01:15:17,679 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1571 01:15:17,679 --> 01:15:20,560 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1572 01:15:20,560 --> 01:15:22,960 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1573 01:15:22,960 --> 01:15:25,360 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 1574 01:15:25,360 --> 01:15:28,159 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1575 01:15:28,159 --> 01:15:31,920 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1576 01:15:31,920 --> 01:15:33,760 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1577 01:15:33,760 --> 01:15:36,800 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1578 01:15:36,800 --> 01:15:39,440 भी नुकसान में है। अलिया दोनों के दरमियान 1579 01:15:39,440 --> 01:15:41,840 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1580 01:15:41,840 --> 01:15:44,719 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 1581 01:15:44,719 --> 01:15:47,520 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 1582 01:15:47,520 --> 01:15:50,560 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 1583 01:15:50,560 --> 01:15:53,199 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 1584 01:15:53,199 --> 01:15:55,679 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 1585 01:15:55,679 --> 01:16:00,159 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1586 01:16:00,159 --> 01:16:02,560 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1587 01:16:02,560 --> 01:16:04,880 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1588 01:16:04,880 --> 01:16:07,679 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1589 01:16:07,679 --> 01:16:09,920 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1590 01:16:09,920 --> 01:16:13,199 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1591 01:16:13,199 --> 01:16:15,600 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1592 01:16:15,600 --> 01:16:18,239 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1593 01:16:18,239 --> 01:16:21,760 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1594 01:16:21,760 --> 01:16:24,800 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1595 01:16:24,800 --> 01:16:27,120 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1596 01:16:27,120 --> 01:16:29,280 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1597 01:16:29,280 --> 01:16:32,080 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1598 01:16:32,080 --> 01:16:34,960 वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी 1599 01:16:34,960 --> 01:16:37,199 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1600 01:16:37,199 --> 01:16:40,080 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1601 01:16:40,080 --> 01:16:42,719 थी। यू मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1602 01:16:42,719 --> 01:16:45,199 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 1603 01:16:45,199 --> 01:16:48,000 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1604 01:16:48,000 --> 01:16:51,600 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1605 01:16:51,600 --> 01:16:53,840 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1606 01:16:53,840 --> 01:16:56,560 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1607 01:16:56,560 --> 01:16:59,440 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1608 01:16:59,440 --> 01:17:01,760 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1609 01:17:01,760 --> 01:17:04,480 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से अब 1610 01:17:04,480 --> 01:17:07,520 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 1611 01:17:07,520 --> 01:17:10,239 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1612 01:17:10,239 --> 01:17:13,199 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1613 01:17:13,199 --> 01:17:15,600 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1614 01:17:15,600 --> 01:17:19,760 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1615 01:17:19,760 --> 01:17:22,159 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1616 01:17:22,159 --> 01:17:24,480 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1617 01:17:24,480 --> 01:17:27,280 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1618 01:17:27,280 --> 01:17:29,520 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1619 01:17:29,520 --> 01:17:32,800 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1620 01:17:32,800 --> 01:17:35,199 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1621 01:17:35,199 --> 01:17:37,920 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1622 01:17:37,920 --> 01:17:41,440 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1623 01:17:41,440 --> 01:17:44,480 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1624 01:17:44,480 --> 01:17:46,800 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 1625 01:17:46,800 --> 01:17:48,880 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1626 01:17:48,880 --> 01:17:51,760 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1627 01:17:51,760 --> 01:17:54,640 वो वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 1628 01:17:54,640 --> 01:17:56,880 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1629 01:17:56,880 --> 01:17:59,760 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1630 01:17:59,760 --> 01:18:02,159 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें 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मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 1645 01:18:41,760 --> 01:18:44,080 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1646 01:18:44,080 --> 01:18:46,880 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1647 01:18:46,880 --> 01:18:49,120 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1648 01:18:49,120 --> 01:18:52,400 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1649 01:18:52,400 --> 01:18:54,800 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1650 01:18:54,800 --> 01:18:57,520 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1651 01:18:57,520 --> 01:19:01,040 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1652 01:19:01,040 --> 01:19:04,080 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1653 01:19:04,080 --> 01:19:06,320 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1654 01:19:06,320 --> 01:19:08,480 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1655 01:19:08,480 --> 01:19:11,199 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1656 01:19:11,199 --> 01:19:13,679 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 1657 01:19:13,679 --> 01:19:16,159 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 1658 01:19:16,159 --> 01:19:18,560 ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है 1659 01:19:18,560 --> 01:19:21,120 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 1660 01:19:21,120 --> 01:19:23,440 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की 1661 01:19:23,440 --> 01:19:26,320 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 1662 01:19:26,320 --> 01:19:29,920 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 1663 01:19:29,920 --> 01:19:32,239 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 1664 01:19:32,239 --> 01:19:35,040 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 1665 01:19:35,040 --> 01:19:37,520 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 1666 01:19:37,520 --> 01:19:40,080 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 1667 01:19:40,080 --> 01:19:42,719 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलत सजा 1668 01:19:42,719 --> 01:19:45,679 नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश 1669 01:19:45,679 --> 01:19:48,880 रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ 1670 01:19:48,880 --> 01:19:51,520 अपने बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया 1671 01:19:51,520 --> 01:19:53,840 तौर पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के 1672 01:19:53,840 --> 01:19:57,280 जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं 1673 01:19:57,280 --> 01:19:58,960 बनाता। 1674 01:19:58,960 --> 01:20:01,360 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 1675 01:20:01,360 --> 01:20:03,679 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1676 01:20:03,679 --> 01:20:06,480 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1677 01:20:06,480 --> 01:20:08,719 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1678 01:20:08,719 --> 01:20:12,000 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1679 01:20:12,000 --> 01:20:14,400 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1680 01:20:14,400 --> 01:20:17,120 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1681 01:20:17,120 --> 01:20:20,640 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1682 01:20:20,640 --> 01:20:23,679 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1683 01:20:23,679 --> 01:20:25,920 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1684 01:20:25,920 --> 01:20:28,080 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1685 01:20:28,080 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मंसूर खामोश रहता है। मगर 1699 01:21:06,239 --> 01:21:08,960 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1700 01:21:08,960 --> 01:21:11,920 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1701 01:21:11,920 --> 01:21:14,320 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1702 01:21:14,320 --> 01:21:18,560 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1703 01:21:18,560 --> 01:21:20,960 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 1704 01:21:20,960 --> 01:21:23,280 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1705 01:21:23,280 --> 01:21:26,080 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1706 01:21:26,080 --> 01:21:28,239 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1707 01:21:28,239 --> 01:21:31,600 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1708 01:21:31,600 --> 01:21:34,000 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1709 01:21:34,000 --> 01:21:36,719 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1710 01:21:36,719 --> 01:21:40,239 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1711 01:21:40,239 --> 01:21:43,280 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1712 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और 1739 01:22:56,320 --> 01:22:59,840 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1740 01:22:59,840 --> 01:23:02,880 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1741 01:23:02,880 --> 01:23:05,120 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1742 01:23:05,120 --> 01:23:07,280 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1743 01:23:07,280 --> 01:23:10,000 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1744 01:23:10,000 --> 01:23:12,480 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 1745 01:23:12,480 --> 01:23:14,960 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 1746 01:23:14,960 --> 01:23:17,360 ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है 1747 01:23:17,360 --> 01:23:19,920 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 1748 01:23:19,920 --> 01:23:22,239 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 1749 01:23:22,239 --> 01:23:25,120 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 1750 01:23:25,120 --> 01:23:28,719 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 1751 01:23:28,719 --> 01:23:31,040 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 1752 01:23:31,040 --> 01:23:33,760 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 1753 01:23:33,760 --> 01:23:36,320 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 1754 01:23:36,320 --> 01:23:38,880 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 1755 01:23:38,880 --> 01:23:41,199 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 1756 01:23:41,199 --> 01:23:43,920 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 1757 01:23:43,920 --> 01:23:46,880 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 1758 01:23:46,880 --> 01:23:49,440 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 1759 01:23:49,440 --> 01:23:52,000 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 1760 01:23:52,000 --> 01:23:55,360 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 1761 01:23:55,360 --> 01:23:57,760 नाम नहीं बनाता। 1762 01:23:57,760 --> 01:24:00,159 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 1763 01:24:00,159 --> 01:24:02,480 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1764 01:24:02,480 --> 01:24:05,280 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1765 01:24:05,280 --> 01:24:07,440 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1766 01:24:07,440 --> 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मंसूर को सच पता चल जाता 1794 01:25:22,080 --> 01:25:24,880 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1795 01:25:24,880 --> 01:25:27,040 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1796 01:25:27,040 --> 01:25:30,320 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1797 01:25:30,320 --> 01:25:32,800 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1798 01:25:32,800 --> 01:25:35,520 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1799 01:25:35,520 --> 01:25:39,040 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1800 01:25:39,040 --> 01:25:42,080 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1801 01:25:42,080 --> 01:25:44,320 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1802 01:25:44,320 --> 01:25:46,480 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1803 01:25:46,480 --> 01:25:49,199 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1804 01:25:49,199 --> 01:25:51,679 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 1805 01:25:51,679 --> 01:25:54,159 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 1806 01:25:54,159 --> 01:25:56,560 ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है 1807 01:25:56,560 --> 01:25:59,120 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 1808 01:25:59,120 --> 01:26:01,440 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 1809 01:26:01,440 --> 01:26:04,320 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 1810 01:26:04,320 --> 01:26:07,920 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 1811 01:26:07,920 --> 01:26:10,239 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 1812 01:26:10,239 --> 01:26:12,960 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 1813 01:26:12,960 --> 01:26:15,520 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 1814 01:26:15,520 --> 01:26:18,080 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 1815 01:26:18,080 --> 01:26:20,400 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 1816 01:26:20,400 --> 01:26:23,120 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मनसूर 1817 01:26:23,120 --> 01:26:26,080 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 1818 01:26:26,080 --> 01:26:28,639 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 1819 01:26:28,639 --> 01:26:31,199 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 1820 01:26:31,199 --> 01:26:34,560 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 1821 01:26:34,560 --> 01:26:36,960 नाम नहीं बनाता। 1822 01:26:36,960 --> 01:26:39,360 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 1823 01:26:39,360 --> 01:26:41,679 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1824 01:26:41,679 --> 01:26:44,480 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1825 01:26:44,480 --> 01:26:46,639 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1826 01:26:46,639 --> 01:26:49,920 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1827 01:26:49,920 --> 01:26:52,400 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1828 01:26:52,400 --> 01:26:55,040 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1829 01:26:55,040 --> 01:26:58,560 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1830 01:26:58,560 --> 01:27:01,600 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1831 01:27:01,600 --> 01:27:03,840 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1832 01:27:03,840 --> 01:27:06,000 हंठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के 1833 01:27:06,000 --> 01:27:08,719 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1834 01:27:08,719 --> 01:27:12,080 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 1835 01:27:12,080 --> 01:27:14,320 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1836 01:27:14,320 --> 01:27:17,360 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 1837 01:27:17,360 --> 01:27:19,520 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1838 01:27:19,520 --> 01:27:22,000 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 1839 01:27:22,000 --> 01:27:24,800 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1840 01:27:24,800 --> 01:27:28,400 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1841 01:27:28,400 --> 01:27:30,639 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1842 01:27:30,639 --> 01:27:33,360 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1843 01:27:33,360 --> 01:27:36,239 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1844 01:27:36,239 --> 01:27:38,560 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1845 01:27:38,560 --> 01:27:41,280 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से अब 1846 01:27:41,280 --> 01:27:44,239 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर 1847 01:27:44,239 --> 01:27:47,040 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1848 01:27:47,040 --> 01:27:50,000 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1849 01:27:50,000 --> 01:27:52,400 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1850 01:27:52,400 --> 01:27:56,560 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1851 01:27:56,560 --> 01:27:58,960 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 1852 01:27:58,960 --> 01:28:01,280 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1853 01:28:01,280 --> 01:28:04,080 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1854 01:28:04,080 --> 01:28:06,239 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1855 01:28:06,239 --> 01:28:09,520 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1856 01:28:09,520 --> 01:28:12,000 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1857 01:28:12,000 --> 01:28:14,719 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1858 01:28:14,719 --> 01:28:18,239 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1859 01:28:18,239 --> 01:28:21,280 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1860 01:28:21,280 --> 01:28:23,520 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1861 01:28:23,520 --> 01:28:25,679 होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के 1862 01:28:25,679 --> 01:28:28,400 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1863 01:28:28,400 --> 01:28:31,760 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 1864 01:28:31,760 --> 01:28:34,000 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1865 01:28:34,000 --> 01:28:36,960 हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी। 1866 01:28:36,960 --> 01:28:39,120 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1867 01:28:39,120 --> 01:28:41,600 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 1868 01:28:41,600 --> 01:28:44,400 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1869 01:28:44,400 --> 01:28:48,000 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1870 01:28:48,000 --> 01:28:50,239 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1871 01:28:50,239 --> 01:28:52,960 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1872 01:28:52,960 --> 01:28:55,760 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1873 01:28:55,760 --> 01:28:58,159 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1874 01:28:58,159 --> 01:29:00,880 कहती है कि बात 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नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1902 01:30:15,040 --> 01:30:17,440 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1903 01:30:17,440 --> 01:30:20,320 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 1904 01:30:20,320 --> 01:30:23,120 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। 1905 01:30:23,120 --> 01:30:26,080 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 1906 01:30:26,080 --> 01:30:28,800 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 1907 01:30:28,800 --> 01:30:31,280 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 1908 01:30:31,280 --> 01:30:35,760 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1909 01:30:35,760 --> 01:30:38,159 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 1910 01:30:38,159 --> 01:30:40,480 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1911 01:30:40,480 --> 01:30:43,280 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1912 01:30:43,280 --> 01:30:45,440 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1913 01:30:45,440 --> 01:30:48,719 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1914 01:30:48,719 --> 01:30:51,199 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 1915 01:30:51,199 --> 01:30:53,920 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1916 01:30:53,920 --> 01:30:57,440 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1917 01:30:57,440 --> 01:31:00,480 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1918 01:31:00,480 --> 01:31:02,719 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1919 01:31:02,719 --> 01:31:04,880 होठों पे मुस्कुराहटी होती है। ड्रामा के 1920 01:31:04,880 --> 01:31:07,520 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 1921 01:31:07,520 --> 01:31:10,639 है। वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी 1922 01:31:10,639 --> 01:31:12,880 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 1923 01:31:12,880 --> 01:31:15,760 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 1924 01:31:15,760 --> 01:31:18,159 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 1925 01:31:18,159 --> 01:31:20,560 हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का 1926 01:31:20,560 --> 01:31:23,280 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 1927 01:31:23,280 --> 01:31:27,120 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 1928 01:31:27,120 --> 01:31:28,880 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 1929 01:31:28,880 --> 01:31:31,920 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 1930 01:31:31,920 --> 01:31:34,639 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 1931 01:31:34,639 --> 01:31:37,040 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 1932 01:31:37,040 --> 01:31:39,600 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 1933 01:31:39,600 --> 01:31:42,400 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 1934 01:31:42,400 --> 01:31:45,440 है। मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने 1935 01:31:45,440 --> 01:31:48,239 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 1936 01:31:48,239 --> 01:31:50,480 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 1937 01:31:50,480 --> 01:31:55,360 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1938 01:31:55,360 --> 01:31:57,679 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 1939 01:31:57,679 --> 01:32:00,080 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1940 01:32:00,080 --> 01:32:02,880 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1941 01:32:02,880 --> 01:32:05,040 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1942 01:32:05,040 --> 01:32:08,320 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1943 01:32:08,320 --> 01:32:10,800 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1944 01:32:10,800 --> 01:32:13,520 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1945 01:32:13,520 --> 01:32:17,040 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1946 01:32:17,040 --> 01:32:20,080 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1947 01:32:20,080 --> 01:32:22,320 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 1948 01:32:22,320 --> 01:32:24,480 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1949 01:32:24,480 --> 01:32:27,520 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1950 01:32:27,520 --> 01:32:30,560 वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 1951 01:32:30,560 --> 01:32:32,800 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1952 01:32:32,800 --> 01:32:35,760 हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी। 1953 01:32:35,760 --> 01:32:37,920 यूसफु मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1954 01:32:37,920 --> 01:32:40,400 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 1955 01:32:40,400 --> 01:32:43,199 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1956 01:32:43,199 --> 01:32:46,800 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1957 01:32:46,800 --> 01:32:49,040 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1958 01:32:49,040 --> 01:32:51,760 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1959 01:32:51,760 --> 01:32:54,560 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1960 01:32:54,560 --> 01:32:56,960 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1961 01:32:56,960 --> 01:32:59,679 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब 1962 01:32:59,679 --> 01:33:02,639 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर 1963 01:33:02,639 --> 01:33:05,440 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1964 01:33:05,440 --> 01:33:08,400 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1965 01:33:08,400 --> 01:33:10,800 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1966 01:33:10,800 --> 01:33:14,960 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1967 01:33:14,960 --> 01:33:17,280 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 1968 01:33:17,280 --> 01:33:19,679 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1969 01:33:19,679 --> 01:33:22,480 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1970 01:33:22,480 --> 01:33:24,639 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 1971 01:33:24,639 --> 01:33:27,920 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 1972 01:33:27,920 --> 01:33:30,400 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 1973 01:33:30,400 --> 01:33:33,120 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 1974 01:33:33,120 --> 01:33:36,639 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 1975 01:33:36,639 --> 01:33:39,679 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 1976 01:33:39,679 --> 01:33:41,920 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 1977 01:33:41,920 --> 01:33:44,080 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 1978 01:33:44,080 --> 01:33:47,120 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 1979 01:33:47,120 --> 01:33:50,400 वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान खुद 1980 01:33:50,400 --> 01:33:52,400 की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 1981 01:33:52,400 --> 01:33:55,360 हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी। 1982 01:33:55,360 --> 01:33:57,520 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 1983 01:33:57,520 --> 01:34:00,000 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 1984 01:34:00,000 --> 01:34:02,800 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 1985 01:34:02,800 --> 01:34:06,400 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 1986 01:34:06,400 --> 01:34:08,639 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 1987 01:34:08,639 --> 01:34:11,360 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 1988 01:34:11,360 --> 01:34:14,159 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 1989 01:34:14,159 --> 01:34:16,560 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 1990 01:34:16,560 --> 01:34:19,280 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ अब 1991 01:34:19,280 --> 01:34:22,239 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर 1992 01:34:22,239 --> 01:34:25,040 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 1993 01:34:25,040 --> 01:34:28,000 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 1994 01:34:28,000 --> 01:34:30,400 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 1995 01:34:30,400 --> 01:34:34,560 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 1996 01:34:34,560 --> 01:34:36,880 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 1997 01:34:36,880 --> 01:34:39,280 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 1998 01:34:39,280 --> 01:34:42,000 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 1999 01:34:42,000 --> 01:34:44,239 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2000 01:34:44,239 --> 01:34:47,520 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2001 01:34:47,520 --> 01:34:49,920 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2002 01:34:49,920 --> 01:34:52,719 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2003 01:34:52,719 --> 01:34:56,159 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2004 01:34:56,159 --> 01:34:59,199 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 2005 01:34:59,199 --> 01:35:01,520 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2006 01:35:01,520 --> 01:35:03,679 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2007 01:35:03,679 --> 01:35:06,320 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2008 01:35:06,320 --> 01:35:09,760 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 2009 01:35:09,760 --> 01:35:11,920 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 2010 01:35:11,920 --> 01:35:14,960 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 2011 01:35:14,960 --> 01:35:17,120 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 2012 01:35:17,120 --> 01:35:19,600 जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का पता 2013 01:35:19,600 --> 01:35:22,320 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 2014 01:35:22,320 --> 01:35:26,000 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 2015 01:35:26,000 --> 01:35:28,159 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 2016 01:35:28,159 --> 01:35:30,960 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 2017 01:35:30,960 --> 01:35:33,760 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान पल 2018 01:35:33,760 --> 01:35:36,159 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 2019 01:35:36,159 --> 01:35:38,880 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 2020 01:35:38,880 --> 01:35:41,840 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 2021 01:35:41,840 --> 01:35:44,639 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 2022 01:35:44,639 --> 01:35:47,520 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 2023 01:35:47,520 --> 01:35:50,000 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 2024 01:35:50,000 --> 01:35:54,159 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2025 01:35:54,159 --> 01:35:56,480 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2026 01:35:56,480 --> 01:35:58,880 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2027 01:35:58,880 --> 01:36:01,600 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2028 01:36:01,600 --> 01:36:03,840 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2029 01:36:03,840 --> 01:36:07,120 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2030 01:36:07,120 --> 01:36:09,520 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2031 01:36:09,520 --> 01:36:12,320 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2032 01:36:12,320 --> 01:36:15,760 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2033 01:36:15,760 --> 01:36:18,800 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 2034 01:36:18,800 --> 01:36:21,120 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2035 01:36:21,120 --> 01:36:23,280 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2036 01:36:23,280 --> 01:36:25,920 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2037 01:36:25,920 --> 01:36:29,280 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 2038 01:36:29,280 --> 01:36:31,520 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 2039 01:36:31,520 --> 01:36:34,560 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 2040 01:36:34,560 --> 01:36:36,719 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 2041 01:36:36,719 --> 01:36:39,199 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 2042 01:36:39,199 --> 01:36:41,920 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 2043 01:36:41,920 --> 01:36:45,600 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 2044 01:36:45,600 --> 01:36:47,760 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 2045 01:36:47,760 --> 01:36:50,560 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 2046 01:36:50,560 --> 01:36:53,360 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान फल 2047 01:36:53,360 --> 01:36:55,760 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 2048 01:36:55,760 --> 01:36:58,480 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 2049 01:36:58,480 --> 01:37:01,440 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 2050 01:37:01,440 --> 01:37:04,239 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 2051 01:37:04,239 --> 01:37:07,119 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 2052 01:37:07,119 --> 01:37:09,600 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 2053 01:37:09,600 --> 01:37:13,760 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2054 01:37:13,760 --> 01:37:16,080 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2055 01:37:16,080 --> 01:37:18,480 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2056 01:37:18,480 --> 01:37:21,199 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2057 01:37:21,199 --> 01:37:23,440 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2058 01:37:23,440 --> 01:37:26,719 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2059 01:37:26,719 --> 01:37:29,119 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2060 01:37:29,119 --> 01:37:31,920 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2061 01:37:31,920 --> 01:37:35,360 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2062 01:37:35,360 --> 01:37:38,400 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2063 01:37:38,400 --> 01:37:40,719 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2064 01:37:40,719 --> 01:37:42,880 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2065 01:37:42,880 --> 01:37:45,520 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2066 01:37:45,520 --> 01:37:48,560 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 2067 01:37:48,560 --> 01:37:50,880 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2068 01:37:50,880 --> 01:37:53,679 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2069 01:37:53,679 --> 01:37:56,159 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2070 01:37:56,159 --> 01:37:58,560 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2071 01:37:58,560 --> 01:38:01,280 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2072 01:38:01,280 --> 01:38:05,040 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2073 01:38:05,040 --> 01:38:06,880 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2074 01:38:06,880 --> 01:38:09,920 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2075 01:38:09,920 --> 01:38:12,560 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2076 01:38:12,560 --> 01:38:15,040 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2077 01:38:15,040 --> 01:38:17,600 मिलकर कहती है कि बाज गलतिया सजा नहीं 2078 01:38:17,600 --> 01:38:20,719 सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 2079 01:38:20,719 --> 01:38:23,440 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 2080 01:38:23,440 --> 01:38:26,239 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 2081 01:38:26,239 --> 01:38:28,480 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 2082 01:38:28,480 --> 01:38:33,360 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2083 01:38:33,360 --> 01:38:35,679 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2084 01:38:35,679 --> 01:38:38,080 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2085 01:38:38,080 --> 01:38:40,800 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2086 01:38:40,800 --> 01:38:43,040 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2087 01:38:43,040 --> 01:38:46,320 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2088 01:38:46,320 --> 01:38:48,719 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2089 01:38:48,719 --> 01:38:51,520 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2090 01:38:51,520 --> 01:38:54,960 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2091 01:38:54,960 --> 01:38:58,000 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2092 01:38:58,000 --> 01:39:00,320 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2093 01:39:00,320 --> 01:39:02,480 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2094 01:39:02,480 --> 01:39:05,119 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2095 01:39:05,119 --> 01:39:08,159 है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 2096 01:39:08,159 --> 01:39:10,480 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2097 01:39:10,480 --> 01:39:13,280 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2098 01:39:13,280 --> 01:39:15,679 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2099 01:39:15,679 --> 01:39:18,159 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2100 01:39:18,159 --> 01:39:20,880 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2101 01:39:20,880 --> 01:39:24,639 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2102 01:39:24,639 --> 01:39:26,480 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2103 01:39:26,480 --> 01:39:29,520 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2104 01:39:29,520 --> 01:39:32,159 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2105 01:39:32,159 --> 01:39:34,639 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2106 01:39:34,639 --> 01:39:37,199 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 2107 01:39:37,199 --> 01:39:40,320 सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 2108 01:39:40,320 --> 01:39:43,040 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 2109 01:39:43,040 --> 01:39:45,840 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 2110 01:39:45,840 --> 01:39:48,080 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 2111 01:39:48,080 --> 01:39:52,960 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2112 01:39:52,960 --> 01:39:55,280 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2113 01:39:55,280 --> 01:39:57,600 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2114 01:39:57,600 --> 01:40:00,400 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2115 01:40:00,400 --> 01:40:02,639 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2116 01:40:02,639 --> 01:40:05,920 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2117 01:40:05,920 --> 01:40:08,320 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2118 01:40:08,320 --> 01:40:11,119 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2119 01:40:11,119 --> 01:40:14,560 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2120 01:40:14,560 --> 01:40:17,600 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2121 01:40:17,600 --> 01:40:19,920 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2122 01:40:19,920 --> 01:40:22,080 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2123 01:40:22,080 --> 01:40:24,719 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2124 01:40:24,719 --> 01:40:27,760 है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 2125 01:40:27,760 --> 01:40:30,000 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2126 01:40:30,000 --> 01:40:32,880 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2127 01:40:32,880 --> 01:40:35,280 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2128 01:40:35,280 --> 01:40:37,760 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2129 01:40:37,760 --> 01:40:40,480 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2130 01:40:40,480 --> 01:40:44,239 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2131 01:40:44,239 --> 01:40:46,080 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2132 01:40:46,080 --> 01:40:49,119 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2133 01:40:49,119 --> 01:40:51,760 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2134 01:40:51,760 --> 01:40:54,239 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2135 01:40:54,239 --> 01:40:56,800 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 2136 01:40:56,800 --> 01:40:59,520 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 2137 01:40:59,520 --> 01:41:02,639 है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 2138 01:41:02,639 --> 01:41:05,440 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 2139 01:41:05,440 --> 01:41:07,679 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 2140 01:41:07,679 --> 01:41:12,560 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2141 01:41:12,560 --> 01:41:14,880 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2142 01:41:14,880 --> 01:41:17,199 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2143 01:41:17,199 --> 01:41:20,000 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2144 01:41:20,000 --> 01:41:22,239 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2145 01:41:22,239 --> 01:41:25,520 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2146 01:41:25,520 --> 01:41:27,920 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2147 01:41:27,920 --> 01:41:30,639 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2148 01:41:30,639 --> 01:41:34,159 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2149 01:41:34,159 --> 01:41:37,199 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2150 01:41:37,199 --> 01:41:39,440 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 2151 01:41:39,440 --> 01:41:41,600 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2152 01:41:41,600 --> 01:41:44,320 इख्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2153 01:41:44,320 --> 01:41:47,360 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 2154 01:41:47,360 --> 01:41:49,600 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2155 01:41:49,600 --> 01:41:52,480 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2156 01:41:52,480 --> 01:41:54,880 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2157 01:41:54,880 --> 01:41:57,280 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2158 01:41:57,280 --> 01:42:00,000 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2159 01:42:00,000 --> 01:42:03,840 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2160 01:42:03,840 --> 01:42:05,600 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2161 01:42:05,600 --> 01:42:08,719 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2162 01:42:08,719 --> 01:42:11,360 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2163 01:42:11,360 --> 01:42:13,760 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2164 01:42:13,760 --> 01:42:16,639 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 2165 01:42:16,639 --> 01:42:19,440 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। 2166 01:42:19,440 --> 01:42:22,400 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 2167 01:42:22,400 --> 01:42:25,119 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 2168 01:42:25,119 --> 01:42:27,600 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 2169 01:42:27,600 --> 01:42:32,080 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2170 01:42:32,080 --> 01:42:34,480 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 2171 01:42:34,480 --> 01:42:36,800 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2172 01:42:36,800 --> 01:42:39,600 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2173 01:42:39,600 --> 01:42:41,760 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2174 01:42:41,760 --> 01:42:45,040 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2175 01:42:45,040 --> 01:42:47,440 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2176 01:42:47,440 --> 01:42:50,239 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2177 01:42:50,239 --> 01:42:53,679 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2178 01:42:53,679 --> 01:42:56,719 लगा देते हैं। आर्या यह मंजर दे दूर से 2179 01:42:56,719 --> 01:42:59,040 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2180 01:42:59,040 --> 01:43:01,199 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2181 01:43:01,199 --> 01:43:03,840 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2182 01:43:03,840 --> 01:43:07,199 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 2183 01:43:07,199 --> 01:43:09,440 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 2184 01:43:09,440 --> 01:43:12,480 हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी थी। 2185 01:43:12,480 --> 01:43:14,639 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 2186 01:43:14,639 --> 01:43:17,119 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 2187 01:43:17,119 --> 01:43:19,840 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 2188 01:43:19,840 --> 01:43:23,520 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 2189 01:43:23,520 --> 01:43:25,679 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 2190 01:43:25,679 --> 01:43:28,480 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 2191 01:43:28,480 --> 01:43:31,280 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान फल 2192 01:43:31,280 --> 01:43:33,679 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 2193 01:43:33,679 --> 01:43:36,400 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 2194 01:43:36,400 --> 01:43:39,360 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 2195 01:43:39,360 --> 01:43:42,159 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 2196 01:43:42,159 --> 01:43:45,040 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 2197 01:43:45,040 --> 01:43:47,520 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 2198 01:43:47,520 --> 01:43:51,679 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2199 01:43:51,679 --> 01:43:54,000 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2200 01:43:54,000 --> 01:43:56,400 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2201 01:43:56,400 --> 01:43:59,119 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2202 01:43:59,119 --> 01:44:01,360 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2203 01:44:01,360 --> 01:44:04,639 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2204 01:44:04,639 --> 01:44:07,040 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2205 01:44:07,040 --> 01:44:09,840 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2206 01:44:09,840 --> 01:44:13,280 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2207 01:44:13,280 --> 01:44:16,320 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2208 01:44:16,320 --> 01:44:18,639 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2209 01:44:18,639 --> 01:44:20,800 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2210 01:44:20,800 --> 01:44:23,440 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2211 01:44:23,440 --> 01:44:26,800 है। वापसी घर की नहीं होती। कभी-कभी इंसान 2212 01:44:26,800 --> 01:44:29,040 खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा सेल के 2213 01:44:29,040 --> 01:44:32,080 हवाले से वहीं रह जाती है जहां टूटी थी। 2214 01:44:32,080 --> 01:44:34,239 यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम हो 2215 01:44:34,239 --> 01:44:36,719 जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का पता 2216 01:44:36,719 --> 01:44:39,440 चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर देता 2217 01:44:39,440 --> 01:44:43,119 है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ को 2218 01:44:43,119 --> 01:44:45,280 मालूम होता है कि इसके जाने के बाद मंसूर 2219 01:44:45,280 --> 01:44:48,080 की सेहत खराब हो गई है और कारोबार भी 2220 01:44:48,080 --> 01:44:50,880 नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान फल 2221 01:44:50,880 --> 01:44:53,280 बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से मिलकर 2222 01:44:53,280 --> 01:44:56,000 कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं सिर्फ 2223 01:44:56,000 --> 01:44:58,960 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है मगर 2224 01:44:58,960 --> 01:45:01,760 अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने बाप के 2225 01:45:01,760 --> 01:45:04,639 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 2226 01:45:04,639 --> 01:45:07,119 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 2227 01:45:07,119 --> 01:45:11,280 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2228 01:45:11,280 --> 01:45:13,600 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2229 01:45:13,600 --> 01:45:16,000 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2230 01:45:16,000 --> 01:45:18,719 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2231 01:45:18,719 --> 01:45:20,960 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2232 01:45:20,960 --> 01:45:24,239 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2233 01:45:24,239 --> 01:45:26,639 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2234 01:45:26,639 --> 01:45:29,440 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2235 01:45:29,440 --> 01:45:32,880 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2236 01:45:32,880 --> 01:45:35,920 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2237 01:45:35,920 --> 01:45:38,239 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2238 01:45:38,239 --> 01:45:40,400 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2239 01:45:40,400 --> 01:45:43,040 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2240 01:45:43,040 --> 01:45:46,080 है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 2241 01:45:46,080 --> 01:45:48,400 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2242 01:45:48,400 --> 01:45:51,199 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2243 01:45:51,199 --> 01:45:53,600 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2244 01:45:53,600 --> 01:45:56,080 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2245 01:45:56,080 --> 01:45:58,800 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2246 01:45:58,800 --> 01:46:02,560 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2247 01:46:02,560 --> 01:46:04,400 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2248 01:46:04,400 --> 01:46:07,440 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2249 01:46:07,440 --> 01:46:10,080 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2250 01:46:10,080 --> 01:46:12,560 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2251 01:46:12,560 --> 01:46:15,119 मिलकर कहती है कि बाज गलतिया सजा नहीं 2252 01:46:15,119 --> 01:46:18,239 सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 2253 01:46:18,239 --> 01:46:20,960 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 2254 01:46:20,960 --> 01:46:23,760 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 2255 01:46:23,760 --> 01:46:26,000 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 2256 01:46:26,000 --> 01:46:30,880 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2257 01:46:30,880 --> 01:46:33,199 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2258 01:46:33,199 --> 01:46:35,520 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2259 01:46:35,520 --> 01:46:38,320 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2260 01:46:38,320 --> 01:46:40,560 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2261 01:46:40,560 --> 01:46:43,840 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2262 01:46:43,840 --> 01:46:46,239 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2263 01:46:46,239 --> 01:46:49,040 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2264 01:46:49,040 --> 01:46:52,480 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2265 01:46:52,480 --> 01:46:55,520 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2266 01:46:55,520 --> 01:46:57,840 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2267 01:46:57,840 --> 01:47:00,000 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2268 01:47:00,000 --> 01:47:02,639 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2269 01:47:02,639 --> 01:47:05,679 है। वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 2270 01:47:05,679 --> 01:47:08,000 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2271 01:47:08,000 --> 01:47:10,800 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2272 01:47:10,800 --> 01:47:13,199 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2273 01:47:13,199 --> 01:47:15,679 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2274 01:47:15,679 --> 01:47:18,400 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2275 01:47:18,400 --> 01:47:22,159 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2276 01:47:22,159 --> 01:47:24,000 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2277 01:47:24,000 --> 01:47:27,040 मंसूर की सेहत खराब हो 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देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2305 01:48:41,760 --> 01:48:43,600 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2306 01:48:43,600 --> 01:48:46,639 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2307 01:48:46,639 --> 01:48:49,280 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2308 01:48:49,280 --> 01:48:51,760 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2309 01:48:51,760 --> 01:48:54,320 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 2310 01:48:54,320 --> 01:48:57,440 सिर्फ समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 2311 01:48:57,440 --> 01:49:00,159 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 2312 01:49:00,159 --> 01:49:02,880 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 2313 01:49:02,880 --> 01:49:05,199 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 2314 01:49:05,199 --> 01:49:10,080 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2315 01:49:10,080 --> 01:49:12,400 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2316 01:49:12,400 --> 01:49:14,719 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2317 01:49:14,719 --> 01:49:17,520 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2318 01:49:17,520 --> 01:49:19,760 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2319 01:49:19,760 --> 01:49:23,040 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2320 01:49:23,040 --> 01:49:25,440 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2321 01:49:25,440 --> 01:49:28,159 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2322 01:49:28,159 --> 01:49:31,679 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2323 01:49:31,679 --> 01:49:34,719 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2324 01:49:34,719 --> 01:49:37,040 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2325 01:49:37,040 --> 01:49:39,199 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2326 01:49:39,199 --> 01:49:41,840 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2327 01:49:41,840 --> 01:49:44,880 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 2328 01:49:44,880 --> 01:49:47,119 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2329 01:49:47,119 --> 01:49:50,000 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2330 01:49:50,000 --> 01:49:52,400 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2331 01:49:52,400 --> 01:49:54,800 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2332 01:49:54,800 --> 01:49:57,600 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2333 01:49:57,600 --> 01:50:01,360 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2334 01:50:01,360 --> 01:50:03,199 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2335 01:50:03,199 --> 01:50:06,239 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2336 01:50:06,239 --> 01:50:08,880 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2337 01:50:08,880 --> 01:50:11,360 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2338 01:50:11,360 --> 01:50:13,920 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 2339 01:50:13,920 --> 01:50:16,639 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 2340 01:50:16,639 --> 01:50:19,760 है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 2341 01:50:19,760 --> 01:50:22,480 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 2342 01:50:22,480 --> 01:50:24,800 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 2343 01:50:24,800 --> 01:50:29,679 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2344 01:50:29,679 --> 01:50:32,000 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2345 01:50:32,000 --> 01:50:34,320 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2346 01:50:34,320 --> 01:50:37,119 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2347 01:50:37,119 --> 01:50:39,360 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2348 01:50:39,360 --> 01:50:42,639 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2349 01:50:42,639 --> 01:50:45,040 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2350 01:50:45,040 --> 01:50:47,760 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2351 01:50:47,760 --> 01:50:51,280 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2352 01:50:51,280 --> 01:50:54,320 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2353 01:50:54,320 --> 01:50:56,639 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2354 01:50:56,639 --> 01:50:58,800 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2355 01:50:58,800 --> 01:51:01,440 इ्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2356 01:51:01,440 --> 01:51:04,480 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 2357 01:51:04,480 --> 01:51:06,719 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2358 01:51:06,719 --> 01:51:09,600 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2359 01:51:09,600 --> 01:51:12,000 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2360 01:51:12,000 --> 01:51:14,400 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2361 01:51:14,400 --> 01:51:17,199 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2362 01:51:17,199 --> 01:51:20,960 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2363 01:51:20,960 --> 01:51:22,800 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2364 01:51:22,800 --> 01:51:25,840 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2365 01:51:25,840 --> 01:51:28,480 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2366 01:51:28,480 --> 01:51:30,960 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2367 01:51:30,960 --> 01:51:33,520 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 2368 01:51:33,520 --> 01:51:36,239 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 2369 01:51:36,239 --> 01:51:39,360 है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 2370 01:51:39,360 --> 01:51:42,080 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 2371 01:51:42,080 --> 01:51:44,400 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 2372 01:51:44,400 --> 01:51:49,280 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2373 01:51:49,280 --> 01:51:51,599 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2374 01:51:51,599 --> 01:51:53,920 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2375 01:51:53,920 --> 01:51:56,719 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2376 01:51:56,719 --> 01:51:58,960 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2377 01:51:58,960 --> 01:52:02,239 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2378 01:52:02,239 --> 01:52:04,639 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2379 01:52:04,639 --> 01:52:07,360 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2380 01:52:07,360 --> 01:52:10,880 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2381 01:52:10,880 --> 01:52:13,920 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2382 01:52:13,920 --> 01:52:16,239 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2383 01:52:16,239 --> 01:52:18,400 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2384 01:52:18,400 --> 01:52:21,040 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2385 01:52:21,040 --> 01:52:24,080 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 2386 01:52:24,080 --> 01:52:26,320 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2387 01:52:26,320 --> 01:52:29,199 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2388 01:52:29,199 --> 01:52:31,599 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2389 01:52:31,599 --> 01:52:34,000 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2390 01:52:34,000 --> 01:52:36,800 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2391 01:52:36,800 --> 01:52:40,560 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2392 01:52:40,560 --> 01:52:42,400 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2393 01:52:42,400 --> 01:52:45,440 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2394 01:52:45,440 --> 01:52:48,080 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2395 01:52:48,080 --> 01:52:50,560 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2396 01:52:50,560 --> 01:52:53,119 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं 2397 01:52:53,119 --> 01:52:55,840 सिर्फ अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता 2398 01:52:55,840 --> 01:52:58,960 है मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 2399 01:52:58,960 --> 01:53:01,679 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 2400 01:53:01,679 --> 01:53:04,000 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 2401 01:53:04,000 --> 01:53:08,880 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2402 01:53:08,880 --> 01:53:11,199 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2403 01:53:11,199 --> 01:53:13,520 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2404 01:53:13,520 --> 01:53:16,320 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2405 01:53:16,320 --> 01:53:18,560 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2406 01:53:18,560 --> 01:53:21,840 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2407 01:53:21,840 --> 01:53:24,239 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2408 01:53:24,239 --> 01:53:26,960 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2409 01:53:26,960 --> 01:53:30,480 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2410 01:53:30,480 --> 01:53:33,520 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2411 01:53:33,520 --> 01:53:35,840 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2412 01:53:35,840 --> 01:53:38,000 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2413 01:53:38,000 --> 01:53:40,639 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2414 01:53:40,639 --> 01:53:43,679 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 2415 01:53:43,679 --> 01:53:45,920 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2416 01:53:45,920 --> 01:53:48,800 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2417 01:53:48,800 --> 01:53:51,199 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2418 01:53:51,199 --> 01:53:53,599 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2419 01:53:53,599 --> 01:53:56,400 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2420 01:53:56,400 --> 01:54:00,159 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2421 01:54:00,159 --> 01:54:02,000 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2422 01:54:02,000 --> 01:54:05,040 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2423 01:54:05,040 --> 01:54:07,679 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2424 01:54:07,679 --> 01:54:10,159 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2425 01:54:10,159 --> 01:54:12,960 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 2426 01:54:12,960 --> 01:54:15,840 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 2427 01:54:15,840 --> 01:54:18,560 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसुफ अपने 2428 01:54:18,560 --> 01:54:21,280 बाप के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर 2429 01:54:21,280 --> 01:54:23,599 पर मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए 2430 01:54:23,599 --> 01:54:28,480 कर्ज अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2431 01:54:28,480 --> 01:54:30,800 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2432 01:54:30,800 --> 01:54:33,119 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2433 01:54:33,119 --> 01:54:35,920 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2434 01:54:35,920 --> 01:54:38,159 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2435 01:54:38,159 --> 01:54:41,440 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2436 01:54:41,440 --> 01:54:43,840 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकालकर 2437 01:54:43,840 --> 01:54:46,560 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2438 01:54:46,560 --> 01:54:50,080 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2439 01:54:50,080 --> 01:54:53,119 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2440 01:54:53,119 --> 01:54:55,440 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2441 01:54:55,440 --> 01:54:57,599 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2442 01:54:57,599 --> 01:55:00,639 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 2443 01:55:00,639 --> 01:55:03,280 वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 2444 01:55:03,280 --> 01:55:05,520 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2445 01:55:05,520 --> 01:55:08,400 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2446 01:55:08,400 --> 01:55:10,800 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2447 01:55:10,800 --> 01:55:13,199 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2448 01:55:13,199 --> 01:55:16,000 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2449 01:55:16,000 --> 01:55:19,760 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2450 01:55:19,760 --> 01:55:21,599 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2451 01:55:21,599 --> 01:55:24,639 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2452 01:55:24,639 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मैंने तुम्हें निकाल कर 2466 01:56:03,440 --> 01:56:06,159 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2467 01:56:06,159 --> 01:56:09,679 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2468 01:56:09,679 --> 01:56:12,719 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2469 01:56:12,719 --> 01:56:15,040 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2470 01:56:15,040 --> 01:56:17,199 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2471 01:56:17,199 --> 01:56:20,239 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 2472 01:56:20,239 --> 01:56:22,880 वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 2473 01:56:22,880 --> 01:56:25,119 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2474 01:56:25,119 --> 01:56:28,000 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2475 01:56:28,000 --> 01:56:30,400 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2476 01:56:30,400 --> 01:56:32,800 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2477 01:56:32,800 --> 01:56:35,599 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2478 01:56:35,599 --> 01:56:39,360 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2479 01:56:39,360 --> 01:56:41,199 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2480 01:56:41,199 --> 01:56:44,239 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2481 01:56:44,239 --> 01:56:46,880 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2482 01:56:46,880 --> 01:56:49,280 फल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2483 01:56:49,280 --> 01:56:52,159 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 2484 01:56:52,159 --> 01:56:54,960 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है 2485 01:56:54,960 --> 01:56:58,000 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 2486 01:56:58,000 --> 01:57:00,639 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 2487 01:57:00,639 --> 01:57:03,119 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 2488 01:57:03,119 --> 01:57:07,599 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2489 01:57:07,599 --> 01:57:10,000 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2490 01:57:10,000 --> 01:57:12,320 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2491 01:57:12,320 --> 01:57:15,119 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2492 01:57:15,119 --> 01:57:17,360 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2493 01:57:17,360 --> 01:57:20,639 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2494 01:57:20,639 --> 01:57:23,040 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2495 01:57:23,040 --> 01:57:25,760 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2496 01:57:25,760 --> 01:57:29,280 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2497 01:57:29,280 --> 01:57:32,320 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2498 01:57:32,320 --> 01:57:34,639 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2499 01:57:34,639 --> 01:57:36,800 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2500 01:57:36,800 --> 01:57:39,840 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 2501 01:57:39,840 --> 01:57:42,480 वापस सिर्फ घर की नहीं होती। कभी-कभी 2502 01:57:42,480 --> 01:57:44,719 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2503 01:57:44,719 --> 01:57:47,599 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2504 01:57:47,599 --> 01:57:50,000 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2505 01:57:50,000 --> 01:57:52,400 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 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02:00:59,440 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 2574 02:00:59,440 --> 02:01:01,920 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 2575 02:01:01,920 --> 02:01:06,400 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2576 02:01:06,400 --> 02:01:08,800 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2577 02:01:08,800 --> 02:01:11,119 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2578 02:01:11,119 --> 02:01:13,920 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2579 02:01:13,920 --> 02:01:16,159 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2580 02:01:16,159 --> 02:01:19,440 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2581 02:01:19,440 --> 02:01:21,840 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2582 02:01:21,840 --> 02:01:24,560 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2583 02:01:24,560 --> 02:01:28,080 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2584 02:01:28,080 --> 02:01:31,119 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2585 02:01:31,119 --> 02:01:33,440 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2586 02:01:33,440 --> 02:01:35,599 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2587 02:01:35,599 --> 02:01:38,400 इताम में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता है। 2588 02:01:38,400 --> 02:01:41,280 वो वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 2589 02:01:41,280 --> 02:01:43,520 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2590 02:01:43,520 --> 02:01:46,400 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2591 02:01:46,400 --> 02:01:48,800 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2592 02:01:48,800 --> 02:01:51,199 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2593 02:01:51,199 --> 02:01:54,000 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2594 02:01:54,000 --> 02:01:57,760 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2595 02:01:57,760 --> 02:01:59,520 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2596 02:01:59,520 --> 02:02:02,639 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2597 02:02:02,639 --> 02:02:05,280 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2598 02:02:05,280 --> 02:02:07,679 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2599 02:02:07,679 --> 02:02:10,560 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 2600 02:02:10,560 --> 02:02:13,360 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। 2601 02:02:13,360 --> 02:02:16,320 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 2602 02:02:16,320 --> 02:02:19,040 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 2603 02:02:19,040 --> 02:02:21,520 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 2604 02:02:21,520 --> 02:02:26,000 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2605 02:02:26,000 --> 02:02:28,400 मंसूर को शक होता है कि कोई इसकी मदद कर 2606 02:02:28,400 --> 02:02:30,719 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2607 02:02:30,719 --> 02:02:33,520 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2608 02:02:33,520 --> 02:02:35,760 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2609 02:02:35,760 --> 02:02:39,040 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2610 02:02:39,040 --> 02:02:41,440 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2611 02:02:41,440 --> 02:02:44,159 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2612 02:02:44,159 --> 02:02:47,679 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2613 02:02:47,679 --> 02:02:50,719 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2614 02:02:50,719 --> 02:02:52,960 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 2615 02:02:52,960 --> 02:02:55,119 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2616 02:02:55,119 --> 02:02:57,840 इख्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2617 02:02:57,840 --> 02:03:00,320 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 2618 02:03:00,320 --> 02:03:02,800 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 2619 02:03:02,800 --> 02:03:05,199 ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है 2620 02:03:05,199 --> 02:03:07,760 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 2621 02:03:07,760 --> 02:03:10,080 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की 2622 02:03:10,080 --> 02:03:12,960 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 2623 02:03:12,960 --> 02:03:16,560 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 2624 02:03:16,560 --> 02:03:18,880 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 2625 02:03:18,880 --> 02:03:21,679 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 2626 02:03:21,679 --> 02:03:24,159 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 2627 02:03:24,159 --> 02:03:26,719 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 2628 02:03:26,719 --> 02:03:29,040 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 2629 02:03:29,040 --> 02:03:31,840 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 2630 02:03:31,840 --> 02:03:34,719 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 2631 02:03:34,719 --> 02:03:37,280 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 2632 02:03:37,280 --> 02:03:39,920 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 2633 02:03:39,920 --> 02:03:43,199 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 2634 02:03:43,199 --> 02:03:45,599 नाम नहीं बनाता। 2635 02:03:45,599 --> 02:03:48,000 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 2636 02:03:48,000 --> 02:03:50,320 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2637 02:03:50,320 --> 02:03:53,119 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2638 02:03:53,119 --> 02:03:55,360 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2639 02:03:55,360 --> 02:03:58,639 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2640 02:03:58,639 --> 02:04:01,040 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2641 02:04:01,040 --> 02:04:03,760 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2642 02:04:03,760 --> 02:04:07,280 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2643 02:04:07,280 --> 02:04:10,320 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2644 02:04:10,320 --> 02:04:12,560 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 2645 02:04:12,560 --> 02:04:14,719 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2646 02:04:14,719 --> 02:04:17,440 इख्तता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2647 02:04:17,440 --> 02:04:20,480 है। वो वापस से घर की नहीं होती। कभी-कभी 2648 02:04:20,480 --> 02:04:22,719 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2649 02:04:22,719 --> 02:04:25,599 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2650 02:04:25,599 --> 02:04:28,000 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2651 02:04:28,000 --> 02:04:30,400 हो जाती है। मंसूर को यूसुफ की वापसी का 2652 02:04:30,400 --> 02:04:33,119 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2653 02:04:33,119 --> 02:04:36,960 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2654 02:04:36,960 --> 02:04:38,719 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2655 02:04:38,719 --> 02:04:41,840 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2656 02:04:41,840 --> 02:04:44,480 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2657 02:04:44,480 --> 02:04:46,880 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2658 02:04:46,880 --> 02:04:49,760 मिलकर कहती है कि बाज गलतियां सजा नहीं से 2659 02:04:49,760 --> 02:04:52,560 अब समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। 2660 02:04:52,560 --> 02:04:55,520 मगर अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप 2661 02:04:55,520 --> 02:04:58,239 के कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर 2662 02:04:58,239 --> 02:05:00,719 मदद करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज 2663 02:05:00,719 --> 02:05:05,199 अदा कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2664 02:05:05,199 --> 02:05:07,599 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 2665 02:05:07,599 --> 02:05:09,920 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2666 02:05:09,920 --> 02:05:12,719 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2667 02:05:12,719 --> 02:05:14,960 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2668 02:05:14,960 --> 02:05:18,239 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2669 02:05:18,239 --> 02:05:20,639 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2670 02:05:20,639 --> 02:05:23,360 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2671 02:05:23,360 --> 02:05:26,880 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2672 02:05:26,880 --> 02:05:29,920 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2673 02:05:29,920 --> 02:05:32,159 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 2674 02:05:32,159 --> 02:05:34,320 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2675 02:05:34,320 --> 02:05:37,040 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2676 02:05:37,040 --> 02:05:40,080 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 2677 02:05:40,080 --> 02:05:42,320 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2678 02:05:42,320 --> 02:05:45,199 सेल के हवाले से वही रह जाती है जहां टूटी 2679 02:05:45,199 --> 02:05:47,599 थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर आंखें नम 2680 02:05:47,599 --> 02:05:50,000 हो जाती है। मंसूर को युसुफ की वापसी का 2681 02:05:50,000 --> 02:05:52,719 पता चलता है। मगर वह मिलने से इंकार कर 2682 02:05:52,719 --> 02:05:56,560 देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। इधर युसुफ 2683 02:05:56,560 --> 02:05:58,320 को मालूम होता है कि इसके जाने के बाद 2684 02:05:58,320 --> 02:06:01,440 मंसूर की सेहत खराब हो गई है और कारोबार 2685 02:06:01,440 --> 02:06:04,080 भी नुकसान में है। आलिया दोनों के दरमियान 2686 02:06:04,080 --> 02:06:06,480 पल बनने की कोशिश करती है। वो मंसूर से 2687 02:06:06,480 --> 02:06:09,520 मिलकर कहती है कि बाज गलत सजा नहीं से अब 2688 02:06:09,520 --> 02:06:12,560 समझ मांगती है। मंसूर खामोश रहता है। मगर 2689 02:06:12,560 --> 02:06:15,280 अंदर से टूटने लगता है। युसफ अपने बाप के 2690 02:06:15,280 --> 02:06:18,239 कारोबार बचाने के लिए खुफिया तौर पर मदद 2691 02:06:18,239 --> 02:06:20,639 करता है। वह अपनी कंपनी के जरिए कर्ज अदा 2692 02:06:20,639 --> 02:06:24,800 कर देता है। मगर नाम नहीं बनाता। 2693 02:06:24,800 --> 02:06:27,199 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 2694 02:06:27,199 --> 02:06:29,520 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2695 02:06:29,520 --> 02:06:32,320 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2696 02:06:32,320 --> 02:06:34,480 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2697 02:06:34,480 --> 02:06:37,840 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2698 02:06:37,840 --> 02:06:40,239 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2699 02:06:40,239 --> 02:06:42,960 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2700 02:06:42,960 --> 02:06:46,480 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2701 02:06:46,480 --> 02:06:49,520 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2702 02:06:49,520 --> 02:06:51,760 देख रही होती है। इसकी आंखों में आंसू और 2703 02:06:51,760 --> 02:06:53,920 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2704 02:06:53,920 --> 02:06:56,639 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2705 02:06:56,639 --> 02:06:59,119 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 2706 02:06:59,119 --> 02:07:01,599 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 2707 02:07:01,599 --> 02:07:04,000 ड्रामा सेल के हवाले से वही रह जाती है 2708 02:07:04,000 --> 02:07:06,560 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 2709 02:07:06,560 --> 02:07:08,880 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 2710 02:07:08,880 --> 02:07:11,760 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 2711 02:07:11,760 --> 02:07:15,360 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 2712 02:07:15,360 --> 02:07:17,679 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 2713 02:07:17,679 --> 02:07:20,400 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 2714 02:07:20,400 --> 02:07:22,960 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 2715 02:07:22,960 --> 02:07:25,520 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 2716 02:07:25,520 --> 02:07:27,840 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 2717 02:07:27,840 --> 02:07:30,560 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 2718 02:07:30,560 --> 02:07:33,520 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 2719 02:07:33,520 --> 02:07:36,079 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 2720 02:07:36,079 --> 02:07:38,719 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 2721 02:07:38,719 --> 02:07:42,000 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 2722 02:07:42,000 --> 02:07:44,400 नाम नहीं बनाता। 2723 02:07:44,400 --> 02:07:46,800 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 2724 02:07:46,800 --> 02:07:49,119 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2725 02:07:49,119 --> 02:07:51,920 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2726 02:07:51,920 --> 02:07:54,079 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2727 02:07:54,079 --> 02:07:57,440 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2728 02:07:57,440 --> 02:07:59,840 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2729 02:07:59,840 --> 02:08:02,560 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2730 02:08:02,560 --> 02:08:06,079 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2731 02:08:06,079 --> 02:08:09,119 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2732 02:08:09,119 --> 02:08:11,360 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2733 02:08:11,360 --> 02:08:13,520 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2734 02:08:13,520 --> 02:08:16,239 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2735 02:08:16,239 --> 02:08:18,719 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 2736 02:08:18,719 --> 02:08:21,199 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 2737 02:08:21,199 --> 02:08:23,599 ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है 2738 02:08:23,599 --> 02:08:26,159 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 2739 02:08:26,159 --> 02:08:28,480 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 2740 02:08:28,480 --> 02:08:31,360 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 2741 02:08:31,360 --> 02:08:34,960 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 2742 02:08:34,960 --> 02:08:37,280 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 2743 02:08:37,280 --> 02:08:40,000 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 2744 02:08:40,000 --> 02:08:42,560 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 2745 02:08:42,560 --> 02:08:45,119 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 2746 02:08:45,119 --> 02:08:47,440 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 2747 02:08:47,440 --> 02:08:50,159 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 2748 02:08:50,159 --> 02:08:53,119 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 2749 02:08:53,119 --> 02:08:55,679 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 2750 02:08:55,679 --> 02:08:58,239 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 2751 02:08:58,239 --> 02:09:01,599 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 2752 02:09:01,599 --> 02:09:04,000 नाम नहीं बनाता। 2753 02:09:04,000 --> 02:09:06,400 मंसूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 2754 02:09:06,400 --> 02:09:08,719 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2755 02:09:08,719 --> 02:09:11,520 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2756 02:09:11,520 --> 02:09:13,679 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2757 02:09:13,679 --> 02:09:16,960 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2758 02:09:16,960 --> 02:09:19,440 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2759 02:09:19,440 --> 02:09:22,159 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2760 02:09:22,159 --> 02:09:25,679 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2761 02:09:25,679 --> 02:09:28,719 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2762 02:09:28,719 --> 02:09:30,960 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2763 02:09:30,960 --> 02:09:33,119 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2764 02:09:33,119 --> 02:09:35,840 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2765 02:09:35,840 --> 02:09:38,320 है। वो वापस इससे घर की नहीं होती। 2766 02:09:38,320 --> 02:09:40,800 कभी-कभी इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। 2767 02:09:40,800 --> 02:09:43,199 ड्रामा सेल के हवाले से वहीं रह जाती है 2768 02:09:43,199 --> 02:09:45,760 जहां टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 2769 02:09:45,760 --> 02:09:48,079 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 2770 02:09:48,079 --> 02:09:50,960 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 2771 02:09:50,960 --> 02:09:54,560 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 2772 02:09:54,560 --> 02:09:56,880 इधर युसुफ को मालूम होता है कि इसके जाने 2773 02:09:56,880 --> 02:09:59,599 के बाद मंसूर की सेहत खराब हो गई है और 2774 02:09:59,599 --> 02:10:02,159 कारोबार भी नुकसान में है। आलिया दोनों के 2775 02:10:02,159 --> 02:10:04,719 दरमियान पल बनने की कोशिश करती है। वो 2776 02:10:04,719 --> 02:10:07,040 मंसूर से मिलकर कहती है कि बाज गलतियां 2777 02:10:07,040 --> 02:10:09,760 सजा नहीं से अब समझ मांगती है। मंसूर 2778 02:10:09,760 --> 02:10:12,719 खामोश रहता है। मगर अंदर से टूटने लगता 2779 02:10:12,719 --> 02:10:15,280 है। युसफ अपने बाप के कारोबार बचाने के 2780 02:10:15,280 --> 02:10:17,840 लिए खुफिया तौर पर मदद करता है। वह अपनी 2781 02:10:17,840 --> 02:10:21,199 कंपनी के जरिए कर्ज अदा कर देता है। मगर 2782 02:10:21,199 --> 02:10:23,599 नाम नहीं बनाता। 2783 02:10:23,599 --> 02:10:26,000 मंजूर को शक होता है कि क्विज की मदद कर 2784 02:10:26,000 --> 02:10:28,320 रहा है। एक दिन मंसूर को सच पता चल जाता 2785 02:10:28,320 --> 02:10:31,119 है। वो पहली बार यूसुफ के दफ्तर आता है। 2786 02:10:31,119 --> 02:10:33,280 दोनों आमनेसामने बैठे होते हैं। बरसू की 2787 02:10:33,280 --> 02:10:36,560 खामोशी दरमियान में खड़ी होती है। मंसूर 2788 02:10:36,560 --> 02:10:39,040 रोते हुए कहता है मैंने तुम्हें निकाल कर 2789 02:10:39,040 --> 02:10:41,760 खुद को सजा दी थी। यूसुफ जवाब देता है और 2790 02:10:41,760 --> 02:10:45,280 मैंने वापस ना आकर दोनों एक दूसरे को गले 2791 02:10:45,280 --> 02:10:48,320 लगा देते हैं। आलिया यह मंजर दे दूर से 2792 02:10:48,320 --> 02:10:50,560 देख रही होती है। इसके आंखों में आंसू और 2793 02:10:50,560 --> 02:10:52,719 होठों पे मुस्कुराहट होती है। ड्रामा के 2794 02:10:52,719 --> 02:10:55,440 इख्तिता में एक सादा मगर गहरा पैगाम देता 2795 02:10:55,440 --> 02:10:58,480 है। वापस इससे घर की नहीं होती। कभी-कभी 2796 02:10:58,480 --> 02:11:00,719 इंसान खुद की तरफ भी वापस आता है। ड्रामा 2797 02:11:00,719 --> 02:11:03,119 सेल के हवाले से वहीं रह जाती है जहां 2798 02:11:03,119 --> 02:11:05,360 टूटी थी। यूसुफ मुस्कुरा देता है मगर 2799 02:11:05,360 --> 02:11:07,679 आंखें नम हो जाती है। मंसूर को युसुफ की 2800 02:11:07,679 --> 02:11:10,560 वापसी का पता चलता है। मगर वह मिलने से 2801 02:11:10,560 --> 02:11:14,159 इंकार कर देता है। इसकी आना भी जिंदा थी। 2802 02:11:14,159 --> 02:11:17,360 इधर यू सबको मालूम होता377118

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