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यह फिल्म अंग्रेज़ी किताब "बानो: भारत की बेटी" का नाटकीय और काल्पनिक रूपांतर है, जिसे जिग्ना वोरा ने लिखा है।
[एक महिला की आवाज़] नमस्कार!
हमारे सभी दर्शकों के लिए आज का दिन बहुत ही खास है।
हम सब के साथ रूबरू होंगी शाज़िया बानो।
कुछ समय से आपने काला पहनना शुरू किया है। जान सकते हैं क्यों?
[शाज़िया बानो] लोगों की आदत है अक्सर है हम पर कचरा, कालिख फेंकने की
काले पर दाग नहीं दिखते।
[पहली महिला] बानो जी आपने तो एक जंग छेड़ी है,
ट्रिपल तलाक के खिलाफ, औरतों के शोषण के खिलाफ,
अब्बास खान और उसके जैसे मर्दों के खिलाफ।
राजनीतिक खेल?
[वही महिला] आप कुछ कहना चाहेंगी आपकी कौम की औरतों से?
धीरे बोलो।
मुद्दतों सोचो।
मुक्तसर बोलो।
हो सके तो बोलो ही मत।
लेकिन आपने फिर भी बोला?
दस साल से बोल रही हैं...
जस्टिस के लिए लड़ रही हैं ना।
हम लड़ना चाहते नहीं थे,
मजबूरी बनी।
आपको शायद हमारा जवाब अच्छा ना लगे, पर...
हम अब्बास से बेहद प्यार करते थे।
उसी प्यार से इस लड़ाई की शुरुआत हुई।
दस साल में एक बंद कमरे की लड़ाई,
मोहल्ले की लड़ाई और फिर एक कौम की लड़ाई बन गई।
हमने सिर्फ़ खुद के लिए इंसाफ माँगा और इस मुल्क के दो हिस्से...
फिर से दो हिस्से हो गए।
हमें आज तक नहीं पता हमने क्या गलत किया है।
हम सिर्फ़ शाज़िया बानो हैं।
और हमारी लड़ाई सिर्फ़ एक ही चीज़ की रही है...
हमारा हक़।
[शाज़िया की आवाज़] शादी से पहले अब्बास से हमारी बातें बस ख़तों में होती थी।
हम एक ही बार मिले थे, वो भी चुपके से।
[पार्श्व में मधुर संगीत बजता है]
सांखनी की हवा पसंद आ गई हमें।
मौलवी की बेटी को ऐसे गैर मर्दों से नहीं मिलना चाहिए।
कुछ तो पर्दे का लिहाज़ करती।
कल निकाह है हमारा।
जो कहना है जल्दी कह दीजिए।
घर जाना है हमें।
अपने घरवालों को बोलना...
अब हमने मोहर लगा दी है।
♪ मिला आसमां से कोह-इ-नूर ♪
♪ कोह-इ-नूर ♪
♪ दस्तूर मेरा ♪
♪ लो आज से ♪
♪ हुआ, मैं सदियों को तेरा ♪
♪ देखो, ज़रा देखो ♪
♪ नाम तेरा लिखा है ♪
♪ मेरा है जो मेरा ♪
♪ सब तेरा हो चुका है ♪
♪ दिल पर अब ना ज़ोर कोई ♪
♪ हर कदम तेरी ओर है ♪
♪ साँस है ख़ुशबू भरी ♪
♪ हर रास्ता अब फूल है ♪
[एक आदमी] अब्बास, वल्द महरूम जुनैद ख़ान से आपका निकाह,
मेहर रकम 2000 हज़ार में तय हुआ है।
क्या आपको ये निकाह अपनी मर्ज़ी से कबूल है?
कबूल है।
[मौलवी] कबूल है?
कबूल है।
[मौलवी] कबूल है?
- कबूल है। - कबूल है।
♪ कबूल तेरी ज़िद है सारी ♪
♪ सारी बातें कबूल हैं ♪
♪ कबूल सारे दिन तुम्हारे ♪
♪ स्याह रातें कबूल हैं ♪
♪ देखो, ज़रा देखो ♪
♪ नाम तेरा लिखा है ♪
♪ मेरा है जो मेरा
♪ सब तेरा हो चुका है ♪
क्या बनाया जा रहा है?
टमाटर का हलवा।
- साहब को बहुत पसंंद है ना। - हाँ।
तीन-तीन कुकर?
एक की सीटी खराब है और दूसरे का रबड़ जल गया है।
और तीसरे का तो ढक्कन ही अटक गया था।
तो ठीक करवाना था ना?
अरे, हमारे साहब को सब्र कहाँ है।
एक खराब होता है, साहब नया ले आते हैं।
अब आप आ गई है ना, आप ही ठीक करवाइएगा इन्हें।
भाई, हमारी नई-नई बेगम हैं हमारा काम है इन्हें बिगाड़ना।
तो आज शाम को ऑफिस के बाद पहले हम नया कुकर लेंगे।
फिर बाहर खाना खाएँगे।
फिर फ़िल्म देखने चलेंगे।
- क्या ख़्याल है? - ख़्याल तो बहुत अच्छा है।
इतना खाना किसके लिए?
♪ दिल पर अब ना ज़ोर कोई ♪
♪ हर कदम तेरी ओर है ♪
♪ साँस है ख़ुशबू भरी ♪
♪ हर रास्ता अब फूल है ♪
♪ कोई शर्त हो या दर्द हो ♪
♪ ये राब्ता कबूल है ♪
♪ हर साँस है ख़ुशबू भरी ♪
♪ हर रास्ता कबूल है ♪
♪ कोई शर्त हो... ♪
♪ कबूल तेरी ज़िद है सारी ♪
♪ सारी बातें कबूल हैं ♪
♪ कबूल सारे दिन तुम्हारे ♪
♪ स्याह रातें कबूल हैं ♪
ये यहाँ से यहाँ तक, हमारे गुलाब का बगीचा।
नीले गुलाब मँगवाए हैं हमने।
और यहाँ से आएँगी लटियाँ। पतली-पतली, बहुत प्यारी लगेंगी।
और ऐसे दिवार को झालर की तरह ढँक लेंगी, है ना।
लटियाँ तो ठीक हैं, लेकिन इस छज्जे का मसला है।
इसकी वजह से गुलाबों में धूप नहीं आएगी।
हाँ।
ये तो सोचा नहीं हमने।
लियाकत साहब ने इलीगली बनवाया है ये।
हाँ।
ताकि बारिश का पानी रिस के अंदर ना उतरे।
तो इसको हटवा सकते हैं ना?
ए!
किसके कहने से ये तोड़ रहा है?
ए, चल नीचे उतर!
- फ़ौरन दफा हो यहाँ से! - अस्सलाम वालेकुम!
हमने सलीमा बी से बात की थी।
आपका छज्जा हमारे हिस्से है।
ये क्या बताएगी, इसे क्या मालूम?
ए, चल नीचे उतर!
नहीं। भाईजान, आप वहीं रहें।
लियाकत साहब...
ये ज़रूरी है, आपका जो छज्जा है, क्योंकि ये हमारे हिस्से में है।
हम वहाँ गुलाब लगाने वाले हैं।
ए, आप बगीचा बनाओ चाहे कुछ बनाओ!
चलो, तुम लोग नीचे उतरो, नहीं तो अभी पुलिस बुला रहा हूँ।
- चलो उतरो! - आप ज़रा तमीज़ से तो पहले बात करें?
सलीमा बी, कहे ना इनसे। किस तरह से बात कर रहे हैं?
हम आपसे आराम से बात कर रहे हैं,
- और आप ऐसे आवाज़ - ए तुम लोग नीचे उतरो,
- नहीं तो अभी मैं पुलिस बुला रहा हूँ। - ऊँची कर रहे हैं!
- हम पुलिस बुलाएँगे! - एक मिनट, एकदम चुप!
आपकी ज़मीन है जो आप पुलिस बुलाएँगी?
सालभर आए हुए हुआ नहीं,
ज़मीन को लेके झगड़ा शुरू कर दिया।
अब्बास का लिहाज़ करके बर्दाश्त कर रहा हूँ।
अंदर जाइए आप।
♪ कबूल तेरी ज़िद है सारी ♪
क्या बात कर रहे हैं, ऐसा कहा?
अब बताइए, पुलिस बुलाने की धमकी दे रही हैं मुझे।
पुलिस बुलाएगी?
और क्या! तमाशा है?
या अल्लाह! ठीक है मैं बात करता हूँ।
अस्सलाम वालेकुम!
- वालेकुम वालेकुम, अब्बास भाई! - सलाम!
अब देखिए, जो ज़मीन बानो की है ही नहीं, इस पर ये पुलिस कैसे बुलाए?
अब्बास भाई, अब जाने दीजिए। गलती हो जाती है।
ऐसे कैसे जाने दें?
ऐसी गलती फिर से ना हो,
इसलिए ये बगीचे वाली ज़मीन मैंने अपनी बेगम के नाम कर दी है।
बेगम, अगली बार इन्होंने हल्की सी भी आवाज़ ऊँची की ना,
तो सीधे पुलिस को बुला लेना।
[शाज़िया की आवाज़] हमारी ज़िंदगी एक आम शादीशुदा सी थी, मगर हमारे लिए,
किसी ख्वाब से कम नहीं।
शादी के डेढ़ साल बाद हमारी पहली औलाद हुई।
क़ामरान, एक बेटा।
फ़ोन पर शायरी के अलावा
अब्बास से अब बेबी फॉर्मूला और दलिया की बातें होने लगी।
फिर हमारी दूसरी औलाद हुई। कनीज़, एक बेटी।
शादी की रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों में,
बच्चे कब बड़े हो गए पता ही नहीं चला।
बेटा, ये वो जगह है जहाँ हमारे अज़ीज़ और बुजुर्ग दफ़न हैं।
आज हम उनकी रूह के लिए दुआ करते हैं।
चलिए हाथ उठाइए, ऐसे।
शाबाश।
[दुआ पढ़ता है]
[शाज़िया की आवाज़] हमारा परिवार और उन रिश्तों का बोझ बढ़ रहा था।
और अब्बास की मसरूफ़ियत भी।
[फ़ोन की घंटी बजती है]
घर में ही नहीं, अब फ़ोन पर भी बातें कम होने लगी।
पहले जो मोहल्ले वाले कहते थे,
कि अब्बास की बेगम ने उस पर काला जादू किया है,
- अब वो भी ये तिलिस्म टूटते देख रहे थे। - [फ़ोन की घंटी की आवाज़]
सर, वो अगले हफ्ते घर जाना है।
बड़े भाई का निकाह है।
तुम्हारा एक और भाई है?
नहीं। वो उनका दूसरा निकाह है।
पचास के तो होंगे भाईजान?
हमारी और बानो की तरफ़ से तोहफा।
शुक्रिया।
सर, घर से चार बार फ़ोन आ चुका है।
हाँ।
ज़रा वो श्रॉफ एंड श्रॉफ की फ़ाइल लेकर आना।
जी।
कनीज़, डर रही हैं आप?
शैतान की औलादों!
बड़ी नेक तरबियत दी है, तुम्हारी अम्मा ने तुम्हें?
गंदे कुत्ते के साथ खेल रहे हैं!
अरे कुत्ता नापाक है इस्लाम में!
बड़े नेक मुसलमान पल रहे हैं इस घर में!
लाहौल विला कुव्वत!
[फ़ोन की घंटी बजती है]
एक्सक्यूज़ मी।
- हैलो। - [शाज़िया] हैलो, अब्बास।
- [बच्चों के रोने की आवाज़] - ये लियाकत साहब फिर से चिल्ला रहे हैं!
देखिए बच्चे कितना रो रहे हैं!
संभालो उनको।
संभालो मतलब क्या?
मतलब, संभालो।
हर दो मिनट पर फ़ोन करना बंद करो।
देखिए आप उनका मिज़ाज जानते हैं।
हम बर्दाश्त कर सकते हैं,
- पर बच्चों को कोई इस तरह से बदसलूकी-- - बिज़ी हूँ मैंं।
बार-बार फ़ोन करना बंद करो।
और अगली बार कॉल किया ना, तो घर का फ़ोन कटवा दूँगा।
हम नाराज़ हैं।
अच्छा नहीं हैं।
आपने ऐसे क्यों कहा फ़ोन कटवा देंगे?
अब कोई मसला होगा तो आपसे ही बात करेंगे ना?
मुझे मरी जाना होगा, कल सुबह।
पाकिस्तान?
हमने झगड़ा किया इसलिए?
बेवकूफ़ हो?
पाकिस्तान इसलिए जाऊँगा क्योंकि हमारा झगड़ा हुआ?
वहाँ एक पुरानी प्रॉपर्टी को लेकर कुछ कॉम्प्लिकेशन है।
शायद बेचनी पड़ जाए।
सुनो...
मेरे कपड़े पैक कर दो प्लीज़।
कितना वक़्त लगेगा?
पता नहीं। शायद तीन हफ्ते।
♪ तू साहिबा तू ♪
♪ तेरी छाँव में खुद को भुलाकर झूम लूँ ♪
♪ यूँ तेरा हूँ ♪
♪ तू दर्द दे तो दर्द को भी चूम लूँ ♪
- उज़्मा! - जी बीबी?
देखना कहीं फ़ोन की तार तो नहीं निकल गई।
ये तो चालू है बीबी।
पता नहीं। पाँच दिन हो गए बात ही नहीं हुई।
- [एक आदमी] हैलो? - जी उनसे बात नहीं हो पा रही है।
बीबी, हर रोज़ दिन में दस मर्तबा तो आप कॉल करती हैं।
अरे जब वो फ़ोन उठाएँगे तो आपके पास भी कॉल आ जाएगा।
थोड़ा सब्र रखिए।
सब्र?
[फ़ोन की घंटी की आवाज़]
आपसे बात नहीं हो पाती है।
कैसे हैं आप? पहुँच गए?
हाँ।
और जो ज़मीन का मसला था? हो गया?
बात चल रही है।
देखते हैं क्या होता है।
अम्मी भी यहीं हैं।
ठंड कैसी है वहाँ?
आपको बहुत जल्दी सर्दी लग जाती है।
तुम मेरी फिक्र मत करो।
स्ट्रेस लेना अच्छा नहीं है।
बच्चा आने वाला है ना।
मैं जल्दी वापस आ जाऊँगा।
अपना ख़्याल रखना।
- ख़ुदा हाफिज। - वो काढ़ा...
पी लेते।
♪ मुस्कुराना है तुझी से ♪
♪ तुझसे ही आराम है ♪
♪ तू नहीं तो मैं नहीं हूँ ♪
♪ ज़िंदगी तेरे नाम है ♪
- ♪ तू ना तो मैं बे-मायने होना ही मेरा... ♪ - [अज़ान की आवाज़]
बानो, एक बात हमेशा याद रखना।
ख़ुदा का रहम है तुम पर।
[गाड़ी के हॉर्न की आवाज़]
आ गए!
आ गए।
क़ामरान! कनीज़!
कपड़े गंदे तो नहीं किए। अब्बू आ गए हैं।
उज़्मा?
उज़्मा?
नहीं, नहीं। पहले सामान नहीं।
गैस की आँच धीमी करिए, सालन चढ़ाया है।
आते ही उन्हें भूख लगी होगी। जाओ, जाओ!
♪ तेरा गलत, तेरा झूठ भी तो कबूल है ♪
♪ अच्छा-बुरा क्या तौलना? ♪
♪ क्या मशवरा, क्या सोचना? ♪
क्या आप भी!
तीन हफ्ते कह के गए थे, तीन महीने हो गए।
कैसे हैं?
इतना सामान?
सारा मरी उठा लाए हैं क्या?
ये बक्से भी हमारे नहीं हैं।
बेगम, तुमसे कुछ बात करनी है।
आपने दूसरी शादी कर ली?
सायरा।
सायरा की माँ का मुझ पर कर्ज़ था।
अब्बास ने उससे निकाह करके बड़े सबाब का काम किया है।
बानो...
बेटा उसे अपनी छोटी बहन की तरह ही रख लो घर में।
उसका शौहर उसे पीटता था।
इस छोटी सी ज़िंदगी में उसने इतने सारे गम देख लिए।
और अब्बास तो निकाह के लिए राज़ी भी नहीं था।
मैंने कहा, तुम्हारी फूफी की बेटी है।
ऐसे ही बेसहारा छोड़ दोगे क्या बेचारी को?
आपने सच में दूसरी शादी कर ली?
अब तुम कोई पहली औरत तो हो नहीं, जिसने अपना शौहर बाँटा है।
अब तुम्हारे खुद के मामू की दो-दो बीवियाँ हैं।
सब एक साथ रहते हैं, खुश हैं।
चालीस साल हो गए।
बेचारी! इतनी छोटी उम्र में बेवा हो गई।
हमारा फर्ज़ है,
दीन है, अपनी खुशनसीबी बाँटना।
बिरयानी या शिरख़ुरमा नहीं है, जिसे बाँटकर बहुत सबाब का, बहुत बरकत होगी !
अब्बास, शौहर हैं हमारे!
अरे मैंने उसे अपनी कसम दी थी।
ये सब कब तय किया आपने?
कब?
बानो, पहले सायरा को अंदर ले आते हैं।
कब से बाहर गाड़ी में बैठी है। मोहल्ले वाले सब देख रहे हैं।
बस बहुत हो गया, बहुत हो गया तमाशा!
पिछले एक घंटे से सायरा गाड़ी में बैठी है।
अब्बास, जाओ उसे घर के अंदर लेकर आओ।
[एक महिला] जो हो गया, वो गया।
अब आगे जो होगा, वो तुम्हारे हाथ में है बानो।
उसके बारे में सोचो, समझदारी दिखाओ।
तुम पहली बीवी हो, पहली बीवी शोर मचाती है, रोना-धोना करती है।
शौहर दूर भागता है उससे।
पहली बीवी मत बनो। बोझ मत बनो।
जब कोई प्रेशर कुकर खराब होता था ना,
अब्बास उसे बदल देते थे।
हम...
हमने इसे...
इसे अपना घर बनाया।
हमने बच्चों को सबकुछ दिया।
अपनी पूरी जान लगा दी।
समझ नहीं आया, अब्बास हमसे इतने दूर कब चले गए।
हमें पता ही नहीं चला।
[शाज़िया की आवाज़] हम ये सोचकर खामोश रहे,
कि अपने गमों को कहेंगे, तो सबकुछ खाक हो जाएगा।
अब्बास साहब...
भाई, बहुत खुशनसीब हैं आप
जो ऐसी नेक सूरत अहलिया पाई है।
सायरा बी, ये तज़बी आपके लिए
लीजिए।
सलाम वालेकुम।
शुक्रिया।
तुम्हें ख़ुदा ने इतनी हिम्मत से नवाजा है।
जो तुमने बाहर किया, मेरे लिए किया, मेरी इज़्ज़त रखी...
कोई और कभी नहीं कर पाता।
पता है, तुम्हें छोड़कर मैंने कभी किसी को नहीं चाहा।
बेगम हो तुम मेरी।
सायरा से मुझे जिस भी हाल में निकाह करना पड़ा...
अब वो यहाँ है।
प्रेग्नेंसी में तुम्हारी देखभाल करेगी।
इतना सबकुछ अकेले संभाल रही थी तुम।
और मैंने तय कर लिया है कि वो बाहर आउटहाउस में रहेगी।
तुम्हारा आउटहाउस, तुम्हारे बाग में।
वो बाहर रहेगी।
तुमसे दूर, एक किरायेदार की तरह।
ये तुम्हारा घर है,
और हमेशा तुम्हारा रहेगा।
तुम मेरी ज़िंदगी में हमेशा वाहिद रहोगी।
हमेशा।
नंबर एक।
जाओ, बात करो।
खाना एक बजे तक लगा देना तुम दोनों।
जी।
आपा...
हम कुछ मदद करें?
ये छील दो।
जी।
अम्मी को दो।
सायरा बैठो।
जी।
बानो, तुम यहाँ बैठो।
सायरा लो ना, रोटी लो, सब्जी लो।
जी।
बस, बस।
आपा।
वो...
कुछ पर्दे चाहिए थे।
और...
और चादर और तकिये के कवर भी।
ठीक है, हम तुम्हें मार्केट ले चलेंगे।
तैयार हो जाओ।
आप क्यों जाएँगी?
साहब को इतनी जल्दी माफ़ कर दिया?
बहुत बड़ा दिल है आपका।
कम उम्र में शादी हो गई, मियां पीटता था।
उसने भी बहुत सहा है।
अब जो हुआ अब्बास की मजबूरी थी।
कह रहे थे इस हालत में बच्चों को संभालने में मदद मिलेगी।
बहुत परवाह है उन्हें हमारी।
ये देखिए।
- ठीक है? - आपके पास...
- साटिन वाली है क्या? - जी, जी।
नहीं, साटिन नहीं।
- फूलदार दिखाएँ। वो वाली। - जी।
ये देखिए।
ठीक है।
- चंदन वाला है भाईजान? - हाँ, जी ये वाला।
- ये? - हाँ।
- क्या रुपये तोला? - आठ रुपया तोला।
- हाँ ये दे दे। - ये भी दिखाइए।
जी।
ये अच्छा है।
- ये दे दे, भाईजान। - जी।
महँगा...
वो दिखाइए पिंक वाली।
नहीं, ये रहने दें। ये दिखाएँ।
- हाँ, ये। - आपा, हमें यही चाहिए।
नहीं, ये ज़्यादा महँगी है ना। ये ठीक है, इसे बाँध दो।
सायरा!
क्या कर रही हो ये?
आप क्या कर रही हैं?
सब समझते हैं हम।
जो-जो चीज़ें आप हमें दिला रही हैं ना आपा,
अब्बास को बेहद नफ़रत है इनसे।
साटिन की बेडशीट पसंद करते हैं वो।
जो चंदन वाला इत्र आप हमें दिला रही थी,
अम्मा-खाला जैसी महक आती है उनसे।
कॉटन की ब्रा?
आपको नहीं पता कि अब्बास को कितनी चिढ़ है उनसे?
आप हमें कोई चैरिटी केस तो नहीं समझ रही हैं?
कोई ख़ैरात हैं क्या हम?
क्या लग रहा है, कोई बाई-बाजी ला दी है,
प्रेग्नेंसी में आपका ख़्याल रखेगी?
अब्बास ने ऐसा कहा?
अब्बास ने हमसे शादी की, क्योंकि वो हमसे मोहब्बत करते थे।
नहीं तो और भी लोग थे। किसी को भी चुन सकते थे हम।
एक बात कहे आपसे आपा।
आपसे मिलने के पहले ना,
उन्हें हम पसंद थे।
पर हमारा निकाह किसी और से तय हो चुका था।
फिर वो आपसे मिले।
बेशक आप उनकी पहली बीवी हैं,
पर हम उनकी पहली मोहब्बत हैं।
हमारे मियां की मौत की खबर सुनते ही ना,
दौड़े-दौड़े आ गए थे मरी।
मेहर में हम चाहते ना, तो आपका उनसे तलाक माँगते,
तो भी कबूल कर लेते पर हमने ऐसा नहीं किया।
हमने आपका घर नहीं तोड़ा आपा।
तो आपको तो हमारा शुक्रगुजार होना चाहिए।
चैरिटी केस तो आप हैं आपा।
[पार्श्व में दर्दभरा संगीत]
आप उसे पहले से जानते थे?
उससे क्या फर्क पड़ता है?
आप दोनों मरी में साथ में थे?
मुझसे पूछताछ कर रही हो तुम?
उसे सब पता है आपके बारे में।
आपको कौन सी चादर पसंद है, कौन सी ख़ुशबू,
- कौन से अंदर के कपड़े... - बानो!
चलो, किसी को तो मेरी पसंद का ख़्याल है।
बानो नहीं बेगम हैं हम!
शादी के बाद पहली बार आपने नाम से बुलाया है।
क्यों?
क्यों? कहाँ? कैसे?
क्या, हो क्या गया है तुम्हें?
चलो सो जाओ!
[अब्बास के हँसने की आवाज़]
♪ ओ रब्बा! ♪
♪ रब्बा दिल ♪
♪ तोड़ गया तू ♪
♪ मेरा दिल तुम बिन घबराए ♪
♪ मुझे याद तेरी तड़पाए ♪
♪ ओ मेरा दिल तुम बिन घबराए ♪
♪ मुझे याद तेरी तड़पाए ♪
♪ दिल तोड़ा जब से तूने ♪
♪ माहिया ए ♪
♪ ओ रब्बा दिल तोड़ गया तू ♪
♪ यूँ मुझको छोड़ गया तू ♪
♪ इश्क का रोग लगा के ♪
♪ मुझी से मुँह मोड़ गया तू ♪
♪ ओ रब्बा दिल तोड़ गया तू ♪
♪ यूँ मुझको छोड़ गया तू ♪
♪ इश्क का रोग लगा के ♪
♪ मुझी से मुँह मोड़ गया तू ♪
[शाज़िया की आवाज़] ज़िल्लत और खामोशी के दरमियान,
बस एक बात याद रखी थी हमने।
वो मेरे शौहर थे और हम उनकी बेगम।
पहली बेगम।
और ये रिश्ता ख़ुदा ने मेरी तकदीर में लिखा था।
[सायरा] आपा।
हैप्पी एनिवर्सरी!
शुक्रिया।
अब्बास से मिलने जा रही हैं?
वो आज शाम को डॉक्टर के पास जाना है।
उन्हें कह दें आप।
भूलिएगा नहीं।
मुश्ताक भाई, सलाम! कैसे हैं?
- ठीक हूँ। आप ठीक हैं? - बिल्कुल ठीक।
आज हमारी सालगिरह है।
मीठा बना है। सब में बाँट दें। गर्म है।
- ठीक है मैडम। हैप्पी एनिवर्सरी। - शुक्रिया।
[अब्बास] बात ऐसी है कि केस कोर्ट तक नहीं जाएगा।
वो बातें चल रही हैं।
- सेटलमेंट हो जाएगा। - ओके, सर।
- तो आप फिक्र ना करें। - हाँ, सर।
तुम?
- सलाम। - वालेकुम सलाम।
आज मैं थोड़ा बिज़ी हूँ।
जो बोलना है जल्दी बोलो?
हाँ कोई बात नहीं। आप काम खत्म करें। हम इंतज़ार कर रहे हैं।
इत्मिनान से।
आप दो मिनट के लिए बाहर वेट करेंगे?
मकबूल?
आज गर्मी बहुत ज़्यादा है।
चलिए आइए।
काका की फ़िल्म लगी है!
आज तुम इरम के साथ देख आओ ना।
अरे सालगिरह हमारी है। इरम के साथ क्यों देखेंगे?
इतना तो हक़ बनता है।
बार-बार हक़ की बात कहती रहती हो तुम, हैं?
एनिवर्सरी है हमारी।
खुशी का मौका है।
हमारी आपसे बात ही कहाँ हो पाती है।
इसलिए नहीं होती, क्योंकि हर बात पर ताना मारती हो तुम।
अब्बास, कभी तो ऐसा लगे कि आप हमारे भी हैं।
बच्चों से भी बात नहीं करते।
उठते हैं सायरा के साथ, सोते हैं सायरा के साथ।
प्लीज़, हर बात पर सायरा के साथ बराबरी करना बंद करो।
[अंग्रेज़ी में] अपनी उम्र का लिहाज़ करो।
कुछ समझदारी दिखाओ।
उम्र की ही बात है, तो आप हमसे भी बड़े हैं।
मेरे पास इस वक़्त तुम्हारे इस ड्रामे के लिए टाइम नहीं है।
तो कब होगा, बताएँ? कल, परसो, अगले हफ्ते?
कैलेंडर देख के बताएँ। हम इंतज़ार करेंगे आपका।
- कहाँ जा रहे हैं? - सर, वो डीएम साहब को देर हो रही है।
मकबूल भाई, पाँच मिनट दीजिए। ज़रूरी बात है।
सालगिरह है हमारी, मीठा खाएँ,
खत्म हो जाएगा, नहीं तो।
आप प्लीज़ मिठाई खाइए।
तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?
एक शाम ही तो माँग रहे हैं।
कितना सहूँ मैं?
हर चीज़ करता हूँ, फिर भी गलत मैं ही हूँ।
- आप सह रहे हैं? - और नहीं तो क्या!
घर चला रहा हूँ, सब लोगों की फरमाइशें पूरी करता हूँ।
तुम्हें कभी किसी चीज़ की कमी होने दी?
बताओ।
जो थोड़ा सा वक़्त माँगा आपसे।
इतनी बेरुख़ी से मना किया,
- फिर कह रहे हैं-- - अब बस करो।
बस।
तुम घर जाओ।
बाद में बात करते हैं। आइए।
आई एम वेरी सॉरी।
जाओ।
अस्सलाम वालेकुम।
हैप्पी एनिवर्सरी।
आइए।
♪ कैसी दुआ थी? ♪
♪ कैसी खुदाई? ♪
♪ किस्मत में मेरी क्यों लिख दी जुदाई? ♪
♪ बेघर हुए हैं ♪
♪ दिल से जो तेरे ♪
♪ लगने लगी है ये ♪
♪ दुनिया पराई ♪
♪ यही इश्क निभाया, मुझे करके पराया ♪
♪ बड़ा रज के रुलाया, तुझे तरस नहीं आया ♪
♪ मेरा भी सोचा होता, इक दफ़ा हाए ♪
♪ ओ, रब्बा दिल तोड़ गया तू ♪
♪ यूँ मुझको छोड़ गया तू ♪
♪ इश्क का रोग लगा के ♪
♪ मुझी से मुँह मोड़ गया तू ♪
बानो!
बानो कहाँ है?
वो तो बच्चों को लेके सांखनी निकल गईं।
आपको बताया नहीं?
♪ आँखों में, आँखों में, बहता है जो, ये चुभता है जो ये कैसे बोलें? ♪
♪ बातों में, बातों में, चुप सा है जो, ये गुम सा है जो, ये कैसे बोलें? ♪
♪ क्यों है पाई मैंने बेवफाई, बोलो कैसे बोलें? ♪
♪ आँखों में, आँखों में, बहता है जो, ये चुभता है जो ये कैसे बोलें ? ♪
♪ जीना कैसा, ये जीना? ♪
♪ जब संग में रहे तू ही ना ♪
♪ तन्हा मुझको है कितना कर दिया, हाए ♪
अब्बास का फ़ोन आया था।
बच्चों की परवरिश के लिए 400 रुपये हर महीने भेजेगा।
हमारे बारे में पूछा?
♪ ओ रब्बा दिल तोड़ गया तू ♪
♪ यूँ मुझको छोड़ गया तू ♪
♪ इश्क का रोग लगा के ♪
♪ मुझी से मुँह मोड़ गया तू ♪
♪ ओ रब्बा दिल तोड़ गया तू ♪
♪ यूँ मुझको छोड़ गया तू ♪
♪ इश्क दा रोग लगा के ♪
♪ मुझी से मुँह मोड़ गया तू ♪
♪ रब्बा, रब्बा होए! ♪
♪ ओ रब्बा ♪
♪ यूँ मुझको छोड़ ♪
- ♪ गया तू ♪ - [फ़ोन की घंटी बजती है]
[अब्बास की माँ] राई का पहाड़ क्यों बना रही हो बानो?
अब्बास ने जो हमारे साथ किया आपको सही लगता है, अम्मी?
इतनी बदसलूकी की हमारे साथ।
सही थी?
अरे मर्द का गुस्सा, अक्सर उन्हें ऐसी हरकतें करने पर मजबूर कर देता है।
जिसका उन्हें बाद में मलाल होता है।
अब्बास को मलाल है, तो माफ़ी क्यों नहीं माँगी?
माफ़ी? वो क्यों माँगेगा माफ़ी?
घर छोड़कर तुम गई हो बानो
ज़िद तुम्हारी है।
अब देख लो तुम्हें क्या करना है।
आ रहा है लेने?
बताओ तो। ठीक से बात किया कि नहीं उसने?
अरे साँस लेने दो ना।
हम बात करें क्या?
[शाज़िया की आवाज़] माँ ने कहा, हमने अपनी जिद में घर तोड़ा है।
लेकिन सच तो ये है,
अब्बास अगर एक बार आकर कहते, "घर चलो।"
मैं चुपचाप चल देती।
पर अब्बास ने ना माफ़ी माँगी, ना लेने आए।
और एक दिन,
पैसे भेजना भी बंद कर दिया।
पहुँचते ही खबर कर देना।
ये अब्बास को दे देना। उसे बहुत पसंद है ना।
मेरी तरफ़ से खूब प्यार देना।
चलो भैया। बिस्मिल्लाह!
सुनिए।
इस बार सुलह करा कर ही आइएगा।
अगली गाड़ी से हम सामान लेकर आ जाएँगे।
ठीक है।
दुआ करना।
ख़ुदा हाफिज।
शुक्रिया।
ये बहुत खूबसूरत है।
बानो आपा ने बनाया है।
माशा अल्लाह!
- सलाम वालेकुम। - वालेकुम अस्सलाम।
अरे देखो कौन आया है!
आ जाओ, आ जाओ।
आ जाओ, बेटा, आ जाओ।
अस्सलाम वालेकुम!
आ जाओ।
कैसी हैं आप?
- अब्बा को मिस किया? - हाँ।
ये देखो। कौन है ये?
सहर।
अब्बास?
अकेले में बात कर सकते हैं?
हमारी बच्ची, सहर।
नाम भी नहीं पता होगा ना तुम्हें?
कैसे हैं?
तुम बताओ।
कैसे आना हुआ?
बच्चों का हाल नहीं पूछेंगे?
कुछ महीनों से पैसे नहीं भेजे हैं आपने।
तो पैसों की बात करने आई हो तुम?
बच्चे आपके भी हैं अब्बास।
अकेले हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है।
तो बच्चों को मुझसे पूछकर ले गई थी तुम?
आप जानते हैं हम क्यों गए थे।
नहीं। नहीं जानता हूँ मैं।
प्लीज़ समझाओ मुझे।
मैं तुम्हें एक सालगिरह पर फ़िल्म दिखाने नहीं ले गया,
इसलिए तुम बैग पैक करके बच्चों को लेके निकल गई?
क्यों?
ब्लैकमेल कर रही थी मुझे?
धीरे बोलिए अब्बास।
क्योंकि मैंने तुमसे पूछे बिना दूसरी शादी कर ली?
गलत किया आपने।
मैंने सबाब का काम किया है।
सबाब की बात होती तो नमाज़ पढ़ते।
ज़कात का सोचते, हज करते।
पर नहीं, दूसरी शादी करके सबाब किया आपने!
पता है तुम्हें दूसरी शादी से प्रॉब्लम नहीं है...
सायरा से है।
जनाना प्रॉब्लम है तुम्हारी।
जलती हो तुम उससे।
हाँ ठीक है, जलते हैं हम।
वो पढ़ी-लिखी है। हमसे ज़्यादा खूबसूरत है।
हम...
अपना सच कबूल करते हैं।
मगर आज, आप भी सच बोलेंगे।
आपने पूरे होश-ओ-हवास में ये फैसला लिया।
जब आपको पता चला सायरा बेवा हो गई है,
आपने खुद होकर अपने बीवी-बच्चों से फ़ासला बढ़ाया।
ताकि अपने अरमान पूरे कर सके।
हमने कुछ गलत नहीं किया था।
आपने दूसरी शादी की, उसे सबाब का सेहरा पहना रहे हैं।
आपका ईमान जानता है, अब्बास, आपने जो किया गलत था
ईमान से भी और ख़ुदा की आँखों में भी।
अगर तुम एक सही मुसलमान होती ना,
एक नेक और वफ़ादार बीवी होती, तो ऐसी बात कभी नहीं करती।
शराब आप पीते हैं।
सूद आप रखते हैं।
पाँच वक़्त की नमाज़ तो छोड़िए
जुम्मे की नमाज़ के लिए भी हमें आपको कहना पड़ता था।
तो मज़हब की बात तो आप रहने दें।
कुरान रखने, पढ़ने, और समझने
बहुत फर्क होता है, अब्बास।
जो औरत निकाह के पाक रिश्ते को
गुड्डे-गुड़ियों का खेल समझ के घर छोड़कर निकल जाए...
उस औरत के बारे में क्या कहना है?
कुछ नहीं।
हम इसे खेल समझते हैं?
अगर निकाह के पाक रिश्ते को आप समझते ना,
तो हमें इस तरह बेइज़्ज़त ना करते।
तो फिर तुम यहाँ और बेइज़्ज़त होने के लिए क्यों आई हो?
माँ हैं हम।
अपने बच्चों के लिए आए हैं।
आपने कहा था 400 रुपये देंगे।
वही लेने आए हैं हम।
[बच्चों के पढ़ने की आवाज़ें]
अब आपसे क्या छिपा हुआ है।
जब तक इन दोनों का मसला सुलझ नहीं जाता,
आप अब्बास से बोलिए कि...
पैसे देते रहे।
बात कीजिए आप उनसे।
आप लड़की को समझा बुझाकर
- घर भेज दीजिए। - बानो!
बानो है मेरी लड़की का नाम।
देखिए बड़ा घर है।
ये तमाशा करना अच्छा लगता है?
क्यों बात बढ़ा रहे हैं आप?
काज़ी साहब, आपने अब्बास से बात की है, कि अब्बास ने आपसे बात की है।
दूसरा निकाह करके ले आया।
पहले हमसे कहा, किसी बेवा की मदद कर रहा है।
और अब पता चला--
अब गड़े मुर्दे उखाड़ने का क्या मकसद?
और कोई तरीका भी नहीं।
क्यों बात बढ़ा रहे हैं आप?
अल्लाह मेहरबानी करे।
ख़ुदा हाफिज।
[शाज़िया की आवाज़] जो मेरे साथ हुआ वो कुछ नया नहीं था।
लेकिन अब्बू हाफ़िज़ थे।
इंसाफ और इमान पर यकीन रखते थे।
उन्होंने मुझे रोकने के बजाय मेरा साथ दिया।
जहाँ हम जा रहे हैं बेटा
वहाँ से वापस आना बहुत मुश्किल है।
पर इतना ख़्याल रखना।
जो भी हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।
एक दरख्वास्त लिखवानी थी
शौहर के खिलाफ।
जी। बताइए आपका नाम, आपके शौहर का नाम।
सब लिखा है।
अब्बास खान?
वो आपके शौहर हैं?
वो तो वकील हैं ना वकील अब्बास खान?
हम अपने शौहर का पेशा जानते हैं।
आप उनके खिलाफ केस कर रही हैं?
अब्बास खान, जो हमारे शौहर हैं और पेशे से वकील,
उन्होंने वादा किया था, हमारे बच्चों का खर्चा भेजेंगे।
अब अचानक मुकर गए।
इसलिए हम अदालत आए हैं, मदद माँगने।
कोई मसला है क्या?
जी नहीं, पर...
आपको नहीं लगता कि आपको इस मामले के लिए किसी काज़ी के पास जाना चाहिए था?
- शुक्रिया। चले अब्बू, हम किसी और के पास चलते हैं। - रुकिए। सुनिए।
दीजिए मैं करता हूँ ना।
बस बाद में ये मत कहिएगा कि मैंने आपको आगाह नहीं किया था।
शुक्रिया।
सर आपकी बेगम आपके ऊपर केस कर रही हैं।
[जज] ये लाइन से अलग क्यों खड़ा है?
लाइन में खड़े रहो। हवलदार कहाँ है?
जाइए। फिर से दलील लेकर आइए।
[दूसरा आदमी] केस नंबर 13051।
मोहतरमा शाज़िया बानो बनाम अब्बास खान।
- हम हैं। हम हैं, एक मिनट। - [वही आदमी] कृपया बेंच के पास हाज़िर हो।
एक मिनट। पीछे जाइए।
- कौन हैं आपके साथ? - जी मैं।
हमारे वालिद हैं, सर।
- वकील कहाँ है? - वकील नहीं है।
हमारी जो शिकायत है हमने सब लिख दी है उसमें।
ये कोई स्कूल के हेडमास्टर का ऑफिस है कि आप सीधा शिकायत लेकर आ गईं?
ये अदालत है।
नाम क्या है?
शाज़िया बानो।
हमारे शौहर ने दूसरी शादी कर ली है।
हमारे तीन छोटे बच्चे हैं।
महीने के खर्च पर बात हुई थी, अब अचानक पैसे भेजना बंद कर दिया है।
- काज़ी के पास जाइए। - हम गए थे।
हमारा मसला यहीं सुलझेगा।
ऐसा नहीं होता ना कि काज़ी का फैसला पसंद नहीं आया तो आप यहाँ आ गईं।
ये अदालत है।
हमारे शौहर ने दूसरी शादी कर ली है।
हमारे तीन छोटे बच्चे हैं।
ये आप बता चुकी हैं।
आपका केस मुस्लिम लॉ बोर्ड के अंडर आएगा।
नेक्स्ट!
- आप चलिए। - नहीं! एक मिनट!
- अरे बात कर रहे हैं ना, दो मिनट रुको। - मैडम एक मिनट, नहीं, एक सेकंड, मैडम।
सर अगर हमारे हाथ किसी का खून हो जाए, तब भी आप यही कहेंगे,
कि अपने लोगों के पास जाए?
अब मैं बैठकर आपको कानून सिखाऊँ?
कत्ल के बाद हम कहते हैं, हमारे लोग ही फैसला करेंगे,
आप करने देते सर?
बातें बनाने से कुछ नहीं होगा।
अदालत का अपना तरीका होता है।
- नेक्स्ट! - एक मिनट!
सर ये देखिए, तस्वीरें देखिए सर।
- एक मिनट। - इतने छोटे बच्चे हैं, सर।
आपकी सारी बातें सुनी जाएगी, लेकिन पहले वकील तो लेकर आइए।
वकील कहाँ से लेकर आए?
सेक्शन 125 सीआरपीसी, जज साहब।
एक सेकंड, हटिए भाई साहब।
सेक्शन 125 सीआरपीसी के अंडर इनका केस फाइल होगा।
बानो बेगम, आपका शौहर आपको ऐसे बेसहारा नहीं छोड़ सकता।
जो पैसों की आपने माँग की है, आपको मिलने चाहिए।
[अंग्रेज़ी में] जज साहब, शाज़िया बानो का केस हम लड़ेंगे।
आप बोलो कि हम आपके वकील हैं। बोलो।
बोलो, बोलो।
ये हमारे वकील हैं।
क्या नाम है वकील का?
बेला जैन।
बेला जैन।
- बेला जैन। - और ये भी।
फ़राज़ अंसारी।
- आप भी हैं? - हाँ।
फ़राज़ अंसारी।
जी, ख़ुदा हाफिज।
एक बार तो केस के बारे में बताना चाहिए था ना।
इससे पहले तो कभी नहीं बोला।
आप जानती हैं मैं क्या बोल रहा हूँ।
जब मेरे नानाजी कॉन्स्टिट्यूशन की पहली कॉपी लिख रहे थे,
तो कभी सोचा होगा,
कि इस देश में धर्म देखकर अदालत में एंट्री डिसाइड करेंगे?
क्यों बेचारी औरत को अपनी मंजिल को हासिल करने के लिए सूली पर चढ़ा रही हैं?
चाय?
सीआरपीसी कम्प्लेन।
ये तो चालाकी वाला मूव था, जो हमने नहीं सोचा था।
मतलब?
मतलब, ये क्रीमनल केस बन जाता है।
पुलिस कार्रवाई कर सकती है।
तो, अगर पैसे नहीं दिए तो पुलिस घर आ सकती है?
अब्बास, आप हमारी बात सुनें।
चार सौ रुपये ही है ना।
देके खत्म करें।
अब्बास, आपको हमारी कसम।
- अब्बास। - उज़्मा!
क़ामरान, यहाँ आइए।
ये अनीसा आपा को देकर आओ।
और नीदा बी ने ब्लाउज का कपड़ा नहीं भेजा?
नहीं अम्मी। उन्होंने कहा कि अगले महीने आना।
अगले महीने?
अच्छा। ये देकर आओ।
वो अब्बास का फ़ोन आया था।
पहल की है उसने।
झुका है तुम्हारे सामने।
तो अब खत्म करो ये सब बानो।
आपा!
आप रहने दे।
हम उज़्मा से कह के करवा देंगे।
ये पिछली बार सहर के लिए लाए थे, देना भूल गए।
रंग देख लेना, पसंद आए।
बानो!
- कैसी हो? - ठीक हैं।
पता है, अम्मी ने अब्बास को बहुत डांटा।
लेकिन बानो, तुम तो सच में कोर्ट चली गई।
लेकिन बस अब बहुत हो गया।
- अब छोड़ भी दो ये-- - हम कौन सा ये करना चाहते थे।
फिर भी,
तुमने जो किया वो ठीक नहीं है।
मैंने अब्बास को मनाया है।
चलो आमने-सामने बैठकर बात कर लो दोनों।
आओ।
बच्चे कैसे हैं?
क़ामरान हमारे कंधों तक आता है।
कनीज़ अपने बाल
घुटनों तक करना चाहती है।
बिलाल तो टिकता ही नहीं एक जगह।
इसलिए, उसे घर छोड़कर आए हैं।
बात यहाँ तक नहीं पहुँचनी चाहिए थी, बानो।
जी।
तो फिर तुमने ऐसा क्यों किया?
तुम्हें क्या लगा मैं डर जाऊँगा?
बात सिर्फ़ आपकी ज़बान की थी।
नहीं। पिछली बार तुमने कहा था कि तुम्हारी इज़्ज़त की बात थी।
मैंने बहुत सोचा।
और तुम सही थी।
मैंने सबाब के लिए सायरा से शादी नहीं की थी।
मैं हमेशा सायरा से मोहब्बत करता था।
उसका इंतज़ार करना चाहिए था।
जल्दबाजी में तुमसे शादी कर ली।
मैं अब उस गलती को ठीक कर रहा हूँ।
तलाक।
बिलाल का जन्मदिन है आज।
- इसलिए घर बुलाया है? - अब्बास, ये क्या कर रहे हो बेटा? रुक जाओ!
- अब्बास! - तलाक।
अम्मीजान, समझाइए ना भाईजान को!
- भाईजान! - तलाक।
ये रही मेहर की रकम।
अब आज से हमारा कोई रिश्ता नहीं है।
अब्बास, ये क्या किया तुमने?
कमसकम एक बार मुझसे पूछ लेते।
क्या कहते लोग?
"कि अब्बास खान की बीवी उसके ही कोर्ट में उसका तमाशा बना रही है,
और वो उसे रोक नहीं पाया।"
भाईजान, 400 रुपये तो माँग रही थी।
तलाक उससे सस्ता लगा आपको?
सेक्शन 125 सिर्फ़ बीवी पर लागू होता है।
जब बानो मेरी बीवी है ही नहीं,
तो ये केस ऐसे ही खारिज हो जाता है।
बिलाल को अब्बास की गोद में रख देती,
और खुद चौखट पर बैठ जाती।
शौहर है, बाप है, दिल कभी तो पिघलता।
अब शौहर नहीं हो वो।
आपने ही कहा था, तलाक का तरीका गलत है?
तो शौहर हुए ना?
- वालेकुम अस्सलाम। - हम बाद में बात करते हैं।
अब्बास ने तुम्हारा सामान तक भिजवा दिया है।
अरे घर से कोई कबाड़ भी इतनी जल्दी साफ नहीं करता जितना...
जितना हमारे साहब...
- नमस्ते। - मैं बेला जैन। ये मेरे साथ हैं, फ़राज़ अंसारी।
- आदाब। - बानो बेगम यहीं हैं?
जी। अंदर आए।
कौन सोच सकता था ना, अब्बास ऐसा करेंगे...
- तलाक... - तलाक-ए-बिद्दत कहते हैं इसे।
जो इंसान ने बनाया हो।
कुरान से अलग।
कुरान से अलग?
तो क्या मतलब?
मतलब शरीयत के हिसाब से ये तलाक जायज नहीं है?
जानती हो तुम क्या कह रही हो बानो?
लिखा है।
तो फिर तो...
- तो फिर तो मतलब सेक्शन 125 इस केस पर अभी भी लागू है। - सेक्शन 125...
क्योंकि बानो बेगम
अभी भी अब्बास खान की बीवी हैं।
तुम सही हो बानो!
तुम सही हो।
आपकी बेटी सही है।
आपकी अम्मी सही हैं!
बानो, तुम सही हो!
इस यकीन को टूटने नहीं देना है, बानो।
हमें जीतना है।
[अंग्रेज़ी में] हम कोर्ट जाएँगे, बानो बेगम!
केस नंबर 76895।
शाज़िया बानो बनाम अब्बास खान।
बेला जी, बोलिए।
जज साहब!
अब्बास खान ने अपनी बीवी शाज़िया बानो को बेसहारा छोड़ दिया है।
इस अदालत में मेरी क्लाइंट ने,
अपने और अपने बच्चों की गुजारे के लिए
चार सौ रुपये महीने की गुजारिश की है।
जज साहब, ये बस परेशान करेना वाला केस है।
मुझे बदनाम करने के लिए।
शाज़िया बानो और मेरा आज से तीन महीने पहले तलाक हो गया है।
अब ये मेरी बीवी नहीं हैं।
जज साहब, शाज़िया बानो अभी भी अब्बास खान की बीवी हैं।
इसलिए, सेक्शन 125 सीआरपीसी के तहत
मेंटेनेंस की माँग अभी भी जायज है।
जिस तलाक की ये बात कर रहे हैं,
वो तलाक लागू नहीं होता है, जज साहब।
तो आप कह रही हैं कि शरीयत के तरीके से दिया गया तलाक लागू नहीं है?
जज साहब।
अब्बास साहब ने तीन बार तलाक बोलकर शाज़िया बानो तलाक दिया है।
इसे तलाक-ए-बिद्दत कहते हैं।
तलाक-ए-बिद्दत इस्लामिक परंपराओं के खिलाफ है।
मौलाना मौदूदी जैसे कई मुस्लिम उलेमाओं ने कहा है
कि तलाक-ए-बिद्दत इस्लाम का हिस्सा नहीं है।
ऑब्जेक्शन, जज साहब!
पहले मैंने कहा था कि ये बस परेशान करेना वाला केस है।
लेकिन अब मैं अपनी राय बदलता हूँ।
[अंग्रेज़ी में] ये बहुत ही खतरनाक और गलत इरादे वाला केस है!
शरीयत का मामला अब इस कोर्ट रूम में डिस्कस होगा?
[अंग्रेज़ी में] ये हमारे कम्युनिटी के लोगों के मूल अधिकारों के खिलाफ है।
[अंग्रेज़ी में] ऑब्जेक्शन स्वीकार किया जाता है!
ये नाजुक मामला है, बेला जी।
ये मुस्लिम पर्सनल लॉ का मामला है।
हम ये फैसला नहीं कर सकते कि तलाक का तरीका सही था या नहीं।
जज साहब।
मेरी क्लाइंट का दावा है कि तलाक-ए-बिद्दत दीन के खिलाफ है।
- इसलिए-- - ऑब्जेक्शन, जज साहब!
आपकी क्लाइंट कोई हाफ़िज़ हैं?
या कोई आलिमा हैं?
[अंग्रेज़ी में] इसे तुरंत रोकना होगा।
[अंग्रेज़ी में] ऑब्जेक्शन स्वीकार किया जाता है!
अगली बार आपने तलाक-ए-बिद्दत की बात की,
[अंग्रेज़ी में] कोर्ट की अवमानना के लिए आपके ऊपर कार्रवाई करूँगा।
एक साँस में तीन बार तलाक लेना कैसे सही हो सकता है सर?
आप बैठिए।
नहीं सही है।
और बहुत सारे इंटरप्रिटेशन में इसे सही माना गया है।
[अंग्रेज़ी में] लेकिन ये सब डिस्कस करने के लिए ये सही जगह नहीं है, बानो।
- शरीयत के तरीके से-- - कुरान पढ़ा ही नहीं है इन्होंने!
- सर, इन्होंने कुरान पढ़ा ही नहीं है... - आप वकील हैं क्या?
और शरीयत-शरीयत बोल रहे हैं!
हमें आपसे कुछ ज़रूरी बात बतानी है।
उसके बाद आप जो फैसला करें।
तीन बार तलाक बोलकर इन्होंने हमें तलाक दिया है।
लेकिन उसे कायम करने के लिए जिसने ऐसा किया है
उसे कोड़े पड़ने चाहिए।
अब्बास साहब, आप ऑब्जेक्शन बोलेंगे कि नहीं?
ऑब्जेक्शन, जज साहब!
आप चाहती हैं कि मुझे कोड़े पड़े?
नहीं हम नहीं कह रहे हैं। ऐसा कहा गया है।
तो फिर आपने ये बात कोर्ट रूम में क्यों उठाई?
- [अंग्रेज़ी में] अब्बास साहब, क्लाइंट से बात मत कीजिए। - अदालत में आप बोल रही हैं
- कि मुझे कोड़ पड़ने चाहिए? - कि तलाक-ए-बिद्दत की जहाँ इजाज़त दी गई है,
- अरे बानो बेगम, आप बैठिए, आप बैठिए! - वहीं उसकी कीमत कोड़े हैं।
- आप बैठ जाइए। - बैठ जाओ, बैठ जाओ।
इस कोर्ट में तलाक-ए-बिद्दत का जिक्र नहीं होगा। [अंग्रेज़ी में] बात समझ में आई?
नहीं तो आप जेल जाएँगी।
समझाइए अपनी क्लाइंट को मिसेज जेन।
मुस्लिम पर्सनल लॉ और सेक्युलर लॉ को आप एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रही हैं।
[अंग्रेज़ी में] और मैं अब्बास खान से सहमत हूँ
कि ये बहुत खतरनाक है।
अगर यही बातें करनी थी आपको
तो मैंने शुरू में ही कहा था
कि अपने लोगों के पास जाइए।
आप फिर यहाँ आ गई!
आप लोग अपना केस मुस्लिम लॉ बोर्ड में लेकर जाइए।
[एक आदमी] मौलवी साहब, ये कौम का मसला है।
इसे आपस में ही सुलझा लेना चाहिए था।
आप तो मौलाना हैं।
आपको मालूम होना चाहिए था
कि इस तरह तलाक के मामले को अदालत में ले जाना, हमारे लिए कितनी शर्म की बात है।
तलाक-ए-बिद्दत जैसे मसले उठाने से बदनामी होती है।
हम लोग आए थे आपके पास
एक साल पहले।
आप तो माशाल्लाह हाफ़िज़े कुरान हैं मौलवी साहब।
तमीज़ नहीं सिखाई आपने अपनी बेटी को?
केस हमने दर्ज किया है आप हमसे बात करें।
और पूछिए काज़ी साहब से कि हमारे अब्बू उनके पास आए थे कि नहीं।
काज़ी साहब के फैसले से आप नाखुश थीं,
तो कोर्ट चली गईं।
ख़ुदा-ए-पाक के फ़रमान के खिलाफ आप अदालत में लड़ेंगी?
अदालत में जाने का मतलब था शरीयत को नकारना।
आप शैतान का साथ दे रही हैं।
ख़ुदा-ए-पाक के फ़रमान को हम समझते हैं।
उसे नज़रअंदाज आप लोग कर रहे हैं!
तुम काज़ी को खुदा के फ़रमान समझा रही हो?
जब एक काज़ी अपने ओहदे का गलत इस्तेमाल करे,
तो करना पड़ता है।
मौलवी साहब!
इस औरत को चुप करवाएँ।
मेरी बच्ची का नाम बानो है काज़ी साहब।
हम ख़ुदा के नुमाइंदे हैं।
ये कुफ्र कर रही है।
खुदा के नुमाइंदे हैं, खुदा नहीं।
आप ख़ुदा बनने का दावा करते हैं, ये कुफ्र है।
बानो!
माफ़ कीजिए हम ऊँचा बोल गए।
लेकिन जब कोई आपकी आवाज़ ना सुने तो दर्द होता है।
तलाक के तरीके और शर्तें कुरान में लिखी हैं।
तलाक को तीन महीनों की मुद्दत में दिया जाए
जिससे सुलह का मौका मिले।
सूरह अल-बक़रा में लिखा है,
कि शौहर अपने गुस्से पर काबू पाए, वक़्त ले,
और अगर सुलह हो जाए तो रिश्ते को तोड़ने की ज़रूरत ही नहीं।
सूरह अन-निसा में साफ-साफ कहा गया है,
कि अगर मियां-बीवी में झगड़ा हो जाए,
तो दोनों के घरवाले मिलके मसलों को सुलझाने की कोशिश करें।
अब्बास ने तो एक ही पल में रिश्ता तोड़ दिया।
एक साँस में तलाक दे दिया।
ये तरीका तो कुरान में है ही नहीं।
कुरान में नहीं है, लेकिन शरीयत में तो हैं।
खलीफा उमर ने तलाक-ए-बिद्दत को सही माना।
तुम उनकी बात को गलत ठहरा रही हो?
खलीफा उमर ने तो ये भी कहा है...
कि तलाक-ए-बिद्दत तब तक कायम रहेगा,
जब तक ऐसा करने वालो को सरेआम कोड़े ना मारे जाए।
दूसरा निकाह करने से पहले,
हर मर्द को अपनी पहली बीवी से इजाज़त लेनी पड़ती है।
सूरह अन-निसा में कहा गया है,
कि अगर तुम डरते हो कि इंसाफ नहीं कर पाओगे, तो एक ही बीवी रखो।
शादी से पहले उनके,
सायरा के साथ जो ताल्लुकात थे, वो जीना नहीं?
जब एक औरत पर हर कानून, हर सज़ा लागू होती है,
तो मर्द क्यों बचता रहे?
दीन के हर कानून हमारे खिलाफ हैं,
अब्बास के साथ क्यों हैं।
कलम-ए-पाक की चार आयतें पढ़कर इतना गुरुर करना ठीक नहीं है, बीवी।
गलत है ये!
तुम्हें शर्म आनी चाहिए।
तुमने ना सिर्फ़ कौम के साथ गद्दारी की है बल्कि...
काफ़िरों का साथ दिया है।
हमने कुरान पढ़ा है।
बचपन से पढ़ते आए हैं।
किसी और मुद्दे पर आप हमें कुछ भी कह दीजिए...
हमारे और हमारे ख़ुदा के बीच जो है,
उस पर आप कुछ नहीं कह सकते।
ना हम कौम के गद्दार हैं,
और ना ही अपने किए पर शर्मशार हैं।
हम सही हैं।
बेहतरीन तरबियत है मेरी
जिसमें औलाद नेक, दीदार और खुदमुख्तार निकले।
और मेरी बच्ची में ये तीनों खूबियाँ हैं।
ख़ुदा हाफिज।
बानो।
[शाज़िया की आवाज़] हमारे लोगों ने हमें दो मिनट में गद्दार कहकर बाहर निकाल दिया।
और इस अदालत में जहाँ हमारी सुनवाई हो रही थी, वहाँ सालों लगने वाले थे।
लेकिन अब्बू हमारे साथ थे।
अब्बास खान बीए एलएलबी एलएलएम (वकील)
[एक आदमी] चाय, चाय, गर्म चाय, चाय!
चाय, चाय, गर्म चाय!
[शाज़िया की आवाज़] बच्चे और उनकी ज़रूरतें बढ़ रही थी और गुज़ारा नहीं हो पा रहा था।
बच्चे बड़े हो रहे थे, और घर का राशन कम।
भैया कल से आधा लीटर ही देना दूध।
क़ामरान! कनीज़!
दूध ले लीजिए।
[शाज़िया की आवाज़] हमने कोशिश की, हमारी मुश्किलें बच्चों पर बोझ ना बने।
इस सफर हम कभी कामयाब हुए, कभी नहीं।
अब्बास को कचहरी में काले कोट में देखते-देखते
शेरवानी में अब्बास की यादें धुंधली होती जा रही थी।
चार साल हो गए थे, चार सौ रुपये की लड़ाई शुरू हुए।
जज साहब, तलाक के बाद मैंने मेहर की रकम 2000 रुपये भी बानो बेगम को दे दी है।
इस केस का कोई मतलब नहीं बनता है।
बस कोर्ट का वक़्त जाया किया जा रहा है।
[अंग्रेज़ी में] जज साहब, मैं फिर से अनुरोध करता हूँ कि इस केस को खारिज कर दिया जाए।
जज साहब, मेरे क्लाइंट के तीन बच्चे हैं।
खान साहब, सलाना सत्तर हज़ार रुपये कमाते हैं।
मेरी क्लाइंट ने बस 400 रुपये महीने की माँग की है।
ये बच्चे इनके भी हैं।
दूसरी शादी इन्होंने की है।
गलत तरीके से तलाक इन्होंने दिया है।
शाज़िया बानो आज भी इनकी बीवी हैं।
ऑब्जेक्शन, जज साहब!
इस्लाम में निकाह एक कानूनी मुआयदा है।
कॉन्ट्रैक्ट, इकरारनामा।
सात जन्मों का मुकद्दस बंधन नहीं कि हिंदुओं के कानून इसमें लागू किए जाए।
कॉन्ट्रैक्ट के टर्म्स तैयार होते हैं,
और दोनों पार्टीज उन्हीं टर्म्स को कबूल करती हैं।
इसलिए काज़ी पूछता है और तीन बार पूछता है
कबूल है, कबूल है, कबूल है।
और अगर कॉन्ट्रैक्ट बनता है तो वही कॉन्ट्रैक्ट तोड़ा भी जा सकता है।
और जब कॉन्ट्रैक्ट तोड़ा जाता है,
तो उसे तोड़े जाने की शर्तें भी उन्हीं टर्म्स में तय की जा चुकी होती हैं।
मैंने 2000 रुपये बानो बेगम को दे दिए हैं।
अब ये मुझसे पैसों की माँग करके,
हमारे तय किए हुए कॉन्ट्रैक्ट के टर्म्स के खिलाफ जा रही हैं।
जज साहब!
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने
बाई ताहिरा बनाम अली हुसैन फ़िसल्ली और अन्य के केस में,
ये फैसला सुनाया है कि सेक्शन 125 सीआरपीसी के तहत,
तलाकशुदा मुस्लिम औरतों को भी मेंटेनेंस का हक़ मिलना चाहिए,
चाहे मेहर और दूसरी रस्मों के पैसे मिले हो या नहीं।
तो जैसा कि खान साहब ने कहा कि उन्होंने बानो बेगम को तलाक दे दिया है
तो उस मापदंड के हिसाब से भी
ये मेरी क्लाइंट का संवैधानिक हक़ है।
आरएन त्रिपाठी
धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत,
और इस मामले की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए,
अदालत अब्बास खान को निर्देश देती है
कि वो बानो बेगम को महीने का गुजारा भत्ता दें।
पहले किए गए भुगतानों को ध्यान में रखते हुए,
दिए जाने वाले मेंटेनेंस का
बाईस रुपये महीना तय किया जाता है।
बाईस रुपये?
[अंग्रेज़ी में] ये नैतिक जीत है, बानो।
जीत हमारी है।
बाईस रुपये?
मौलवी साहब।
कल से मैं नहीं आऊँगा।
कोई बात नहीं बेटा।
[घंटी बजने की आवाज़]
सब हमारी वजह से हो रहा है अब्बू।
अरे नहीं बेटा।
दुनिया में सबसे आसान काम होता है डर जाना,
सबसे मुश्किल
हक़ का साथ देना।
ये सब तुम्हारी वजह से नहीं हो रहा।
इनके खौफ़ की वजह से हो रहा है।
तुम्हारी वजह से तो इनका सच सामने आ रहा है।
[शाज़िया की आवाज़] जब एक छोटी लड़ाई जंग में तब्दील होने वाली होती है,
आसपास के माहौल में उसका असर दिखाई देता है।
लेकिन मैं अब्बू की बेटी थी।
मैंने हार नहीं मानी।
हमारा मोहल्ला, पड़ोस, सब कट गया।
हर नज़र में शक और गुस्सा
जैसे हम कोई मुज़रिम थे।
[लोग भला-बुरा बोलते हैं]
[शाज़िया की आवाज़] यहाँ हिंदू-मुसलमान का मसला शुरू हो गया था।
अपने और दूसरों की गिनती हो रही थी।
और मौलवी साहब की बेटी बानो से बड़ा कौम का गद्दार और कोई नहीं था।
पीछे से देख!
[शाज़िया की आवाज़] इससे पहले हमारे अम्मी-अब्बू और कुछ खोए
उनकी और अपने बच्चों की हिफाजत के लिए हमें एक सख्त फैसला लेना पड़ा।
चलो बच्चों।
कहाँ जाओगी?
यहाँ क्या कर रही हो?
सांखनी में माहौल अच्छा नहीं है।
और तुम्हें ऐसा क्यों लगता कि तुम यहाँ इस घर में रह सकती हो?
आपने ही ये ज़मीन बानो बेगम के नाम की थी।
अगर आपको इनके यहाँ रहने से एतराज है तो
साथ-साथ एक और केस लड़ सकते हैं।
ये बगीचा तुम्हारी अम्मी ने बनाया था।
सुंदर है?
ये है आज से हमारा नया घर।
ठीक है?
बाईस रुपये। इसे आप जीत मान रहे हैं?
आप खुद वकील हैं, अब्बास साहब इमेज की अहमियत तो आप समझते ही हो?
बात अब सिर्फ़ एक बीवी के गुजारे की नहीं रही है।
जो बात अंदरूनी तौर पर रफा-दफा हो जानी चाहिए थी
अब ज़माना उसे देखेगा।
इस बार तलाक-ए-बिद्दत की बात उठाई है कोर्ट में।
आगे कुछ और आ जाएगा!
वैसे, बाई ताहिरा तो सुप्रीम कोर्ट से जीत कर आ चुकी हैं।
एक और मुस्लिमा फुज़लुनबी का मामला भी कोर्ट में चल रहा है।
मैरिज लॉ, गोद लेना, विरासत, पर्सनल कानून।
अब ये आपका ज़्यादती मामला नहीं रहा है।
पूरा मुल्क इसमें घुसने वाला है।
सब अपनी राय देंगे।
अगर पूरा मुल्क इसमें घुसने ही वाला है,
तो ठीक है।
मैं भी दरवाज़ा खोल के तैयार बैठा हूँ।
चार पुश्तों से वकालत कर रहे हैं हम।
इस मुल्क का कानून लिखा है हमने।
इमेज की बात कर रहे हैं आप कुरैशी जी।
[अंग्रेज़ी में] हम इस मुल्क को तमाशा दिखाएँगे।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय
जज साहब, ताहिरा बी के केस में
सुप्रीम कोर्ट ने जजमेंट दिया है कि एक्स-वाइफ
अगर अपना खुद का खर्चा ना निकाल सके
या जब तक कि उनकी दूसरी शादी ना हो,
उनके पति को उनके गुजारे की पूरी रिस्पांसिबिलिटी लेनी होगी।
उनका मज़हब चाहे जो भी हो।
जज साहब, एक्स-वाइफ सेकुलर लॉ का लफ्ज़ है।
शरीयत में इसका कोई वजूद नहीं है।
जज साहब, इस अदालत में
शरीयत और सेकुलर लॉ की दलीलें नहीं होनी चाहिए।
बेला जी, तलाक एक लीगल कॉन्ट्रैक्ट का टर्मिनेशन है।
एक बार खत्म हो जाए, तो उसकी कंडीशन भी खत्म हो जाती है।
कॉन्ट्रैक्ट तो समझ में आता है खान साहब,
लेकिन रिश्ता कैसे खत्म हो जाएगा?
पहली, दूसरी, नई, पुरानी, तलाकशुदा, एक्स।
बीवी के नाम के आगे आप कुछ भी लगा लें,
उनकी पहचान में बीवी लफ्ज़ तो रहेगा ना?
जिस दिन तलाक कायम होता है,
उस दिन से शौहर और बीवी दोनों एक दूसरे के लिए गैर हो जाते हैं।
इन फोटोज में,
ये आपके साथ, आपके बच्चों के साथ कौन खड़ी हैं?
इन्हें आप क्या बुलाइएगा? कौन हैं ये?
गैर-औरत?
उसे मैं अपने बच्चों की माँ बुलाऊँगा। बस।
इसके अलावा हमारा कोई रिश्ता नहीं है।
जब वो आपके बच्चों की माँ बनी,
तब वो आपके बीवी थी या नहीं?
ऑब्जेक्शन, जज साहब!
- शरीयत के मुताबिक-- - ऑब्जेक्शन, माई लॉर्ड!
ये एक सेकुलर अदालत है।
यहाँ पर शरीयत का जिक्र नहीं हो सकता।
ये बात खान साहब ने ही मुझे सेशंस कोर्ट में बताई थी।
अगर शरीयत लफ्ज़ शब्द का इस्तेमाल हो,
तो इनके सारे आर्ग्यूमेंट्स खारिज कर देने चाहिए, जज साहब।
[अंग्रेज़ी में] ऑब्जेक्शन स्वीकार किया जाता है!
बेला जी, आगे बढ़िए।
[शाज़िया की आवाज़] जो सवाल घर के छोटे दायरे में उठ रहे थे
वही सवाल अब अदालत में उठाए जा रहे थे।
"बीवी है, बीवी नहीं?"
"एक बीवी की शिनाख्त क्या होती है?"
"उसका वजूद किस चीज़ से तय होता है?"
"बीवी का असली मतलब क्या है?"
"घंटों दलीलें चलती।"
"लेकिन इस बार, अब्बास चुप थे।"
देर हो गई हमें।
[शाज़िया की आवाज़] बाकी माओं की ज़िंदगी बच्चों के जन्मदिन, त्योहारों,
स्कूल में पहली, दूसरी, तीसरी क्लास से नापी जाती थी।
क़ामरान।
हमारे बच्चे अपनी ज़िंदगी हाईकोर्ट के तारीखों से नापते थे।
और आपके लिए ये।
पढ़ाई करो।
अँधेरा हो जाता,
पर हमारी लड़ाई सुकून की नींद से सौदा कर चुकी थी।
अब्बास...
वो कुरान आपसे बेहतर समझती हैं और शरीयत भी।
क्या कहा था आपने...
सिर्फ़ एक हियरिंग की बात है?
हो गई एक हियरिंग?
ऐसी क्लाइंट और उसके...
अब्बास साहब, एक मिनट आपको बुला रहे हैं।
आ रहे हैं।
- फ़राज़ मियां। - अब्बास साहब।
- कैसे हैं आप? - ठीक हैं।
पता है, हमारे और आपके वालिद एक दूसरे को जानते थे।
हमें तो साथ में काम करना चाहिए।
तीन सौ रुपये महीने।
और बाकी फॉर्मेलिटीज़ मकबूल आपको समझा देगा।
मंडे से ऑफिस आ जाइएगा।
आप मुझे खरीदने की कोशिश कर रहे हैं?
फ़राज़ मियां आपको एक बहुत बड़ी गलती करने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
ये जो आगज़नी का शौक पाल रखा है ना
इसमें हमारे लोग जलेंगे।
और बेला जैन अपने हाथ सेकेगी।
बेला जैन आपका इस्तेमाल कर रही हैं।
कुछ समझिए।
और सोचिएगा, हमारे ऑफर के बारे में।
ख़ुदा हाफिज।
[अब्बास] आपकी क्लाइंट वक्फ बोर्ड के पास जाना नहीं चाहती।
मेहर की रकम काफी नहीं है।
मेहर को एलिमनी से तुलना नहीं कर सकते, माई लॉर्ड।
मेहर की रकम निकाह के वक़्त तय की जाती है,
और वो उसी वक़्त बीवी को दी जानी चाहिए।
औरतें वो माँगती नहीं है, ये अलग बात है।
ये हिंदुओं के स्त्रीधन के बराबर हुआ।
स्त्रीधन?
यानी दहेज?
ये आप स्टेटमेंट दे रहे हैं, या आप कोर्ट से सवाल पूछ रहे हैं?
- भाईजान... - नहीं ये सवाल नहीं, स्टेटमेंट था।
कोर्ट से तारीख माँग लीजिए।
स्त्रीधन की आड़ में दहेज लिया जाता है।
[अंग्रेज़ी में] ये एक बुरी प्रथा है।
- भाई जान... - एक्सक्यूज़ मी।
मेरी बात मानिए। कोर्ट से तारीख माँग लीजिए।
एक्सक्यूज़ मी।
कितनी औरतों की ज़िंदगी बर्बाद हो गई है इसकी वजह से!
जबकि मेहर उन औरतों को एक हक़ देता है।
ऑब्जेक्शन, जज साहब!
मेरे सम्मानित अधिवक्ता, कोर्ट को गुमराह कर रहे हैं।
ये अच्छी तरह जानते हैं कि स्त्रीधन और दहेज का कोई लेना-देना नहीं है।
जब तक मामला अदालत तक नहीं पहुँचता,
तब तक हर दहेज स्त्रीधन ही कहलाता है।
मिस्टर खान।
भाई, मुद्दे की बात कीजिए।
आगे बढ़िए।
जज साहब, हम कोर्ट से अगली तारीख देने की दरख़्वास्त करते हैं।
- आप बैठ जाइए। मैं-- - अरे आप समझिए ना।
बैठ जाओ। मैं संभाल लूँगा।
- क्या कर रहे हैं? - जज साहब, आई एम सॉरी।
[अंग्रेज़ी में] मैं आपसे कृपया करके सुनवाई आगे बढ़ाने का अनुरोध करता हूँ।
इसको क्या हुआ है?
यहाँ पर भी आप ही जीतोगी।
इसलिए, केस वापस मत लेना।
क्या कह रहा था?
कि यहाँ पर भी हम ही जीतेंगे।
केस वापस मत लेना।
ऐसा क्यों बोले?
कुछ और हो रहा है, जो हम समझ नहीं पा रहे हैं।
[जज साहब] ये कोर्ट ये मानता है कि पर्सनल लॉ और क्रिमिनल प्रोसीजर कोर्ट के बीच एक
पेचीदा ताल्लुक है।
खासकर, सेक्शन 125 के तहत औरतों के मेंटेनेंस के हक़ के मामले में।
लेकिन ये भी देखा गया है कि मेहर सिर्फ़ शादी का हिस्सा है,
तलाक के बाद मेंटनेंस का नहीं।
इन सब पहलुओं के मद्देनजर
ये कोर्ट पिटीशनर के हक़ में फैसला सुनाता है।
सेक्शन 125 सीआरपीसी के तहत,
बीवी को अपने शौहर से मेंटनेंस का दावा करने का हक़ है।
मेंटेनेंस की अमाउंट
एक सौ अस्सी रुपये और बीस पैसे तय की जाती है।
[अंग्रेज़ी में] कोर्ट की कार्यवाही स्थगित की जाती है।
नमक छिड़क रही हैं हमारे ज़ख्म पर?
ज़ख्म पर नमक छिड़के का मज़ा तो तब आता
जब मुझे यकीन होता कि ज़ख्म असली हैं।
आप केस हारे नहीं हैं अब्बास साहब।
आपने हारने का फैसला किया है।
बाई ताहिरा और फुज़लुनबी का सुप्रीम कोर्ट जजमेंट आपके खिलाफ जाएगा,
आप जानते थे।
अगर ये केस आप हाई कोर्ट में जीत जाते,
तो फिर ये केस आप सुप्रीम कोर्ट कैसे ले जाते?
आपको सुप्रीम कोर्ट जाना है।
सुप्रीम कोर्ट ही सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट को पलट सकता है।
[अंग्रेज़ी में] अच्छा है!
मुझे लगा था कि आप समझने में थोड़ा और वक़्त लगाएँगी, बेला जी।
[अंग्रेज़ी में] मैं प्रभावित हुआ।
अब ये मेरी ज़्यादती लड़ाई नहीं है।
[अंग्रेज़ी में] ये उससे भी बहुत बड़ा है।
[अंग्रेज़ी में] हम इस केस के साथ इतिहास रचने वाले हैं।
सेकुलर लॉ की आड़ में,
शरीयत का मज़ाक बनाया जा रहा है,
और हम देखते रह जाएँगे?
इसे बचाना हमारा फर्ज़ है।
फर्ज़ तो आपका बानो और अपने बच्चों का ख़्याल रखना भी था, अब्बास साहब।
ओह, आपको शुगर की प्रॉब्लम है।
बानो ने बताया था।
[बेला] अब्बास ने पूरी तैयारी कर ली है सुप्रीम कोर्ट के लिए।
वो पीछे नहीं हटने वाला।
चलो, किसी का तो भला हुआ इस केस से।
[अंग्रेज़ी में] बहुत बढ़िया, मिस्टर फ़राज़।
मुझे मालूम है, अब्बास को जॉइन कर रहे हो ना।
इमान की लड़ाई है, बेला मैम। इसलिए साथ में हूँ।
नहीं तो आपने मुझ पर भरोसा कब किया है, बताइए?
अब्बास, अगर आप पैसे नहीं दे सकते तो हम दे देंगे।
एक सौ अस्सी रुपये के लिए आगे की ज़िंदगी नहीं खराब कर सकते।
तुम्हें क्या लगता है कि मैं सुप्रीम कोर्ट 180 रुपये बचाने के लिए जा रहा हूँ?
बेवकूफ़।
हाँ, हैं बेवकूफ़ हम! क्योंकि हम नहीं समझ पा रहे।
समझाए आप।
मुझे पता है मैं क्या कर रहा हूँ।
तुम चाहती क्या हो बानो?
अब्बास से पूछो।
हम तो 180 रुपये 20 पैसे लेकर जाने को भी तैयार थे।
अच्छा?
तुम तो केस जीत गई ना, अपील तो करनी ही पड़ेगी उन्हें।
नहीं ऐसा ज़रूरी नहीं है।
कहो मत करें।
क्यों कर रही हो तुम ये सब?
मोहब्बत की थी ना उन्होंने तुमसे।
तुम ही थी जिसने मसले पैदा किए।
कभी उनको समझा नहीं। अब ये सब कर रही हो।
सायरा...
जब तुम पहली बार हमारे पास आई...
हम तुम्हें अपना लेते।
तुम ये बात जानती हो।
तुम्हें हमें सच बताने की ज़रूरत नहीं थी।
कि अब्बास तुमसे मोहब्बत करते हैं।
और तुम कोई...
चैरिटी केस नहीं हो।
पर तुम्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा।
कि उनका झूठ पकड़ा जाएगा। उन्हें बुरा लगेगा।
और तुमने इस बात की परवाह नहीं की।
क्योंकि तुम्हें अपनी
बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं हुई।
हैं?
कभी-कभी मोहब्बत काफी नहीं होती।
हमें अपनी इज़्ज़त भी चाहिए।
[फ़ोन की घंटी बजती है]
कौन?
जी हम फरीदा बोल रहे हैं।
आपने ये होने कैसे दिया?
ज़रा बानो को बुला दीजिए?
बहुत ज़रूरी बात करनी है।
इस घर के अंदर वो कभी नहीं आएगी फरीदा।
यहाँ दोबारा फ़ोन मत कीजिएगा।
भाईजान!
आधा किलो प्याज और आलू देना।
कैसी गमज़दा ज़िंदगी जी है तुम्हारे बाप ने!
मौलवी साहब को मौत भी मिली तो ऐसी।
ऐसी औलाद ख़ुदा किसी को ना दे, [उर्दू में] ऊपर वाला ही बचाए!
सलीमा बी!
ये आदमी दिन रात आप पर चिल्लाता रहता है।
रात को हाथ उठाता है।
और अगले दिन कहता है कुरान में ये सब जायज है।
ऐसे ही करता है?
सूरह-अन-निसा में कुरान में लिखा है,
मर्द औरतों के मुहाफ़िज़ और उनकी देखभाल करने वाले हैं।
पजामे को ऊपर चढ़ाकर, दाढ़ी बढ़ाकर,
आप लोगों को सिर्फ़ जहालत बेचते हैं!
हमें हमारा मज़हब ना सिखाएँ!
"इकरा।"
कुरान का पहला लफ्ज़ जो नसील हुआ इकरा।
"पढ़।"
खुद कुरान पढ़।
पढ़ने का हुकुम दिया है ख़ुदा ने।
ताकि उनका पैगाम हम खुद समझ सकें।
कोई और इसका गलत मतलब हम पर ना थोपे।
आप लोग जब सब्जी-तरकारी खरीदते हैं,
दस रेहड़ी वालों से पूछताछ करते हैं कि नहीं?
और अपना मौलाना बस बगल वाली मस्जिद से ढूँढ लेते हैं।
वो क्या पढ़ा रहा है, क्या सिखा रहा है, कभी देखते हैं?
आज से इसका हुक्का पानी बंद!
कोई इससे बातचीत नहीं करेगा।
इसकी शक्ल देखते ही पीछे मुड़ जाएगा।
बड़ी आई मुझे कुरान का मतलब बताने वाली।
कोई इसे सब्जी तरकारी नहीं बेचेगा।
इसको, इसके बच्चों को अपने घर की चौखट पार करने नहीं देगा।
[दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़]
चलो।
सूरह अल-फातिहा और कुल पढ़ते हैं।
[अंसारी] क़ामरान! बिलाल!
बिलाल और क़ामरान मुझे देखते ही दूर चले गए।
एक बाप के लिए इससे ज़्यादा दर्दनाक बात क्या हो सकती है।
आज रात वो रात है,
जहाँ ख़ुदा पुराने अमाल का हिसाब लेता है।
और नई तकदीरें लिखता है।
मुझे नहीं लगता है कि मेरे अमाल मुझे बचाएँगे।
ना ही मेरी तकदीर में माफ़ी होगी।
लेकिन तुम्हारा बानो?
तुम्हारा क्या हिसाब होगा?
मैंने तो सिर्फ़ माचिस जलाई थी।
लेकिन तुम थी जिसने हमारी पूरी दुनिया को आग लगा दी।
आज की रात...
ख़ुदा अपने बंदों के गुनाह माफ़ करने के लिए
रहमत के दरवाज़े खोलता है।
आजतक जो हमने एक दूसरे के साथ किया,
ख़ुदा हमें माफ़ करे।
और जो करने जा रहे हैं, उसकी भी माफ़ी दे।
अस्सलाम वालेकुम!
वालेकुम सलाम!
बानो बनाम खान
द कैपिटल हेराल्ड बानो न्याय की तलाश में
♪ जिस दिन के हैं सपने देखे ♪
♪ जिसके लिए सौ दर्द सहे ♪
♪ जिसके लिए रातों में जागे ♪
♪ आँखों में हम अश्क लिए ♪
♪ दर्द की रातें ढल जाएँगी ♪
♪ पल वो सुनहरा आएगा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
[एक आदमी अंग्रेज़ी में] शाज़िया बानो बनाम अब्बास खान। बचाव पक्ष अपनी बात रखे।
मिस्टर. एच. एन वशिष्ठ माननीय चीफ जस्टिस
माई लॉर्ड्स।
ये हिंदुस्तानी मुसलमान शरीयत की रट क्यों लगाते रहते हैं?
ले लिया ना उन्होंने पाकिस्तान?
अगर शरीयत ही चाहिए थी,
तो फिर बँटवारे में पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए?
वहाँ जो करना चाहे करते।
पूरे देश में हर हिंदुस्तानी मुसलमान...
जो ना अब्बास खान है, ना शाज़िया बानो,
उन्हें इन सवालों का जवाब देना पड़ रहा है।
ये केस एलिमनी का नहीं,
मियां-बीवी के बीच रंजिश का मामला भी नहीं।
ये केस अब है मुसलमानों की पहचान का।
ये केस अब हिंदुस्तानी मुसलमान की कल्चरल आइडेंटिटी का सवाल बन गया है।
और उस सवाल का...
कि क्यों चाहिए उन्हें शरीयत?
माई लॉर्ड्स! तीस साल से ऊपर हो गए हैं...
लेकिन फिर भी हम आज सुप्रीम कोर्ट में,
पर्सनल लॉ बनाम सेकुलर लॉ की लड़ाई लड़ रहे हैं।
क्यों?
क्योंकि भारत के संविधान ने हमसे एक वादा किया था,
[अंग्रेज़ी में] कि मुस्लिम पर्सनल लॉ, भारतीय मुसलमानों और भारत के बीच एक समझौता है।
जब संविधान लिखा जा रहा था,
तो कांस्टीट्यूएंट असेंबली में हर इंटरेस्ट ग्रुप
अपनी माँगे रख रहा था।
हर माइनॉरिटी अपने हक़ के लिए लड़ रही थी।
हमने अपनी माँगे रखी।
हमने कहा, हमारा बस अलग चुनाव क्षेत्र हों,
सरकारी दफ्तरों में रिप्रेजेंटेशन मिले, रिजर्वेशन मिले, वगैरह।
माई लॉर्ड्स! 40 साल बाद आज,
जब शेड्यूल कास्ट के पास रिजर्वेशन हैं, शेड्यूल ट्राइब्स के साथ रिजर्वेशन हैं
औरतों के पास रिजर्वेशन हैं रिप्रेजेंटेशन हैं।
सैकड़ों प्रोटेक्टेड ग्रुप हैं, प्रोटेक्टेड कम्युनिटीज हैं।
हमारे पास क्या है?
और... हमारे पास ऐसा कुछ क्यों नहीं है?
क्योंकि हमें चुनना पड़ा।
जी हाँ!
सियासत और शरीयत के बीच।
वो मुसलमान, हिंदुस्तानी मुसलमान जिसने इस देश की ज़मीन को अपनाया है।
देखिए पार्टीशन के लिए तो हम सब ज़िम्मेदार हैं।
लेकिन उसका दाग सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान अपने दामन पर लेकर घूम रहा है,
चालीस साल बाद आज भी।
मेरे दादा, मेरे वालिद, मैंने...
और हमारे जैसे सैकड़ों मुसलमानों ने
हमेशा इस देश की बुनियादी उसूलों पर अपना यकीन रखा है।
[अंग्रेज़ी में] लेकिन हर कुछ सालों में
हमें अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए कहा जाता है।
हमें पूछा जाता है, शरीयत क्यों?
मुसलमानों को स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों मिलनी चाहिए?
आप थोड़ा एडजस्ट क्यों नहीं कर लेते?
एक-एक करके...
हमने अपनी सारी मांगों पर एडजस्ट किया था तब।
सबकुछ नेशनल यूनिटी के नाम कुर्बान कर दिया हमने।
बस बदले में शरीयत के संबंध में अधिकार माँगा।
वो शरीयत, [अंग्रेज़ी में] जो हमें मुसलमान के रूप में पहचान देता है।
माई लॉर्ड्स!
एक पंजाबी मुसलमान
और एक केरल की मुसलमान में क्या कॉमन है?
उनकी कल्चरल आइडेंटिटी।
शरीयत।
शरीयत उन्हें जोड़ती है।
हिंदुस्तानी मुसलमान ने बड़ी कीमत चुकाई है शरीयत के लिए।
[अंग्रेज़ी में] आखिर में हमारे पास बस यही एक अधिकार बचा था।
वो भी हमसे छीनकर हमें सरेआम नंगा किया जाएगा?
[अंग्रेज़ी में] हमें और अपमानित करने के लिए? हमें हमारी औकात दिखाने के लिए?
फुज़लुनबी, बाई ताहिरा,
और अब साज़िया बानो।
सेक्शन 125 को घुमा-फिराकर, शरीयत को ताक पर रखकर
सेकुलरिज्म के नाम पर हमसे वादाखिलाफी की जा रही है।
हमारी नाक ज़मीन में रगड़ी जा रही है, हमें हमारी औकात दिखाई जा रही है।
माई लॉर्ड्स!
ये केस इस कौम की पहचान का है।
उनके वजूद का है।
[अंग्रेज़ी में] ये हमारे आत्म-सम्मान का मामला है।
शाज़िया बानो सेक्शन 125 डेस्टीट्यूशन केस में आई है।
इन्हें बहकाया गया है, साफ बात है।
क्योंकि शाज़िया बानो जो पाँच नमाजी मुसलमान औरत है, खूब जानती है,
कि शरीयत में कोई बेसहारा नहीं रहता।
वक्फ बोर्ड उसी के लिए बनाया गया है, उनके पास जाएँ।
ऐसी हज़ारों, बेसहारा, ज़रूरतमंद औरतों की वक्फ बोर्ड देखभाल करता है।
माई लॉर्ड्स! इस केस में ऐसा क्या खास है
कि उन्होंने इस अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा?
सिवाय इसके कि...
शाज़िया बानो निकाह को गुड्डे-गुड़ियों का खेल समझती है?
घर छोड़ा, बच्चों को लेकर निकल गई।
और एक दिन बस अदालत में पहुँच गई।
लोअर कोर्ट्स को ये केस एक्सेप्ट करना ही नहीं चाहिए था।
ये केस इस अदालत तक पहुँचना ही नहीं चाहिए था, माई लॉर्ड्स!
[अंग्रेज़ी में] ये हमारे लिए बेहद संवेदनशील मामला है।
सेशंस कोर्ट और हाई कोर्ट में इस केस में जीत
हमसे वादाखिलाफी थी।
वहाँ जो वादाखिलाफी हुई,
[अंग्रेज़ी में] हम यहाँ उम्मीद और न्याय पाने
की चाह लेकर देश के सबसे हाइएस्ट कोर्ट में आए हैं।
थैंक यू, माई लॉर्ड्स!
फ़राज़, ये क्या कर रहे हो, कहाँ भाग रहे हो तुम?
आपा, आपको क्या लगता है, क्या हुआ आज अंदर?
विक्टिम हुड का आलीशान खेल खेला है, अब्बास ने! और क्या हुआ है!
[अंग्रेज़ी में] उसने बहुत अच्छा खेला है, आपा।
पिछले सात साल से ये केस मैं लड़ रहा हूँ।
लेकिन उनकी बात सनुकर आज मुझे लगा कि हाँ हमारे साथ नाइंसाफी हुई है।
हमारे साथ?
तुम कब से उनके साथ हो गए, हैं?
यहाँ का हर सेकुलर मुसलमान अब्बास की इस चाल को समझेगा।
जब हमारा कॉन्स्टिट्यूशन लिखा गया था ना फ़राज़
तब मेरे नानाजी ने कहा था,
आपके नानाजी ने कॉन्स्टिट्यूशन नहीं लिखा, बेला मैम!
कैलिग्राफी से लिखने वालों के पेन की निब बदला करते थे।
सेकुलर मुसलमान थे मेरे अब्बा।
ना उन्हें सेकुलर सियासत में जगह मिली, ना अपने कौम में।
अब्बास की जो वो स्पीच थी, उसके सामने आपके नाना जी की निब और संविधान की कहानी
वाहियात और ड्रामा लगती है।
खैर, छोड़िए इन बातों को।
अगर अब्बास को कोर्ट में सुनकर, मुझे वो सही लग सकता है,
तो सोचिए बेंच का रिएक्शन?
अब प्लान क्या है हमारा, ये बताइए?
एक बात कहे?
कोई आज हमसे पूछे ना,
तो हम यही कहेंगे
कि वो सही है।
बानो सही है।
अपने ख़्याल पर्सनल डायरी में लिख लिया करो।
बोलकर मेरी शाम खराब मत करो।
[अब्बास की आवाज़] तलाक।
[अब्बास की अम्मी की आवाज़] अब्बास ने इससे निकाह करके बड़े सबाब का काम किया है।
- [सायरा की आवाज़] हम उनकी पहली मोहब्बत हैं। - [अब्बास की आवाज़] तलाक।
[काज़ी की आवाज़] हम ख़ुदा के नुमाइंदे हैं।
- [अब्बास की आवाज़] तलाक। - [शाज़िया की आवाज़] अब्बास शौहर हैं हमारे!
[काज़ी की आवाज़] ये कुफ्र है कर रही है!
माई लॉर्ड्स!
मेरी क्लाइंट अपनी दलीलें खुद पेश करना चाहेंगी।
जज साहब! सर!
माई लॉर्ड्स।
माई लॉर्ड्स!
माफ़ कीजिए, हम थोड़ा घबराए हुए हैं।
पानी पी लो।
माई लॉर्ड्स!
हमारा नाम शाज़िया बानो है।
अब्बू ने बहुत प्यार से हमारा नाम रखा था।
शाज़िया का मतलब...
नायाब, अलग।
एक साल पहले अब्बू गुजर गए।
उनका जनाजा उठाना था,
कंधे कम पड़ गए।
जिस गाँव के हर घर ने अपना नाम अब्बू से लिखना सीखा था
अब वही लोग हमारा नाम दीवार पर लिखते हैं,
पर साथ में गद्दार, कमज़र्फ या कोई और गाली लिखी होती है।
अब्बू का सिर्फ़ एक ही गुनाह था...
कि हम उनकी बेटी हैं।
और वही गुनाह
विरासत में हमारे बच्चों को मिला।
हमारे बच्चों के साथ कोई नहीं खेलता।
क्योंकि...
बाकी बच्चों को उनका खेल समझ नहीं आता।
कभी वो जज,
काज़ी, वकील बनते हैं।
कभी-कभी दंगे-दंगाइयों वाला खेल खेलते हैं।
कनीज़ डर के दरवाज़ा बंद करती है।
बिलाल बाहर से दरवाज़ा तोड़ने का नाटक।
रात को सोने से पहले क़ामरान
कम से कम चार दफ़ा दरवाज़े की सांकले देखता है।
बच्चों की हिफाजत होती है, माँ-बाप की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी।
ना तो उनके अब्बू उनके साथ हैं,
और माँ एक मुद्दा बनकर रह गई है।
हमने बहुत बार सोचा कि पीछे हट जाए।
फिर ख़्याल आया...
अगर बिलाल और क़ामरान ने किसी और की बच्ची के साथ वही किया जो उनके
अब्बू ने हमारे साथ किया तो?
कनीज़ ने क्या सोचेगी?
उसका वजूद उसके लिए एक सवाल होगा।
फिर हमें लगा...
हमारी लड़ाई हमसे बड़ी है।
ये सिर्फ़ हमारे बच्चों के लिए
उस दीन के लिए भी है, जिसका गलत इस्तेमाल हो रहा है।
आज, मुस्लिम लॉ बोर्ड अब्बास साहब के साथ खड़ा है,
क्योंकि शरीयत की हिफ़ाजत की ज़िम्मेदारी उनकी है।
अब्बास साहब कहते हैं, बड़ी लड़ाई लड़ी तब जाकर
संविधान में हमें ये हक़ मिला है।
जिस कौम की ये बात कर रहे हैं, उसमें औरतें भी शामिल हैं या नहीं?
क्योंकि बड़े लोग तो आए दिन
शरीयत के खिलाफ जाते रहे हैं।
एक निज़ाम साहब ने
अपने बेटे की बजाय अपने पोते को वारिस बनाया
जो शरीयत के खिलाफ है।
तब भी हिंदुस्तान में शरिया कामय रहा और कोई मुसलमान सरेआम बाज़ार में नंगा नहीं हुआ।
1947 में,
हैदराबाद के निज़ाम हिंदुस्तान में नहीं शामिल होना चाहते थे।
जंग छिड़ी, समझौता हुआ।
निज़ाम साहब ही नहीं, उनके कुत्तों को भी अलग से भत्ता मिला।
और आप चाहते हैं कि हम और हमारे बच्चे
वक्फ बोर्ड के ख़ैरात में ज़िंदा रहे?
आप ऊँचे तबके के लोग हैं, अब्बास साहब।
ज़रा नीचे झुककर देखिए असल में हिफ़ाजत की ज़रूरत किसे है!
हमारे कौम के पिछड़ों को है।
और पिछड़ों में जो सबसे पीछे होती हैं, औरतें!
उन्हें है।
हाई कोर्ट में,
जानबूझकर हार गए ताकि
सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले पलट सके।
ताकि तीन तलाक बोलकर,
हाथ में मेहर की रकम थमाकर,
बीवी-बच्चों को छोड़कर कोई मर्द अगर
आगे बढ़ना चाहे तो बढ़ सके, उसे खुली छूट हो, सहूलियत हो।
सत्रह साल पहले,
अब्बास ने हमसे शादी की।
हमने उनका घर बसाया।
बच्चे हुए।
हमारी शादी के नौ साल बाद...
अब्बास ने फिर निकाह पढ़ा।
और हम बेगम से पहली बेगम बन गए।
पहली बेगम का किरदार कुछ इस तरह होता है, अगर वो
बड़े सुकून से अपनी घर की चाबी, अपना वजूद
नई बेगम के हवाले कर देती है।
हम नहीं कर पाए।
और फिर।
जो हमारी बेगम, हमारी बेगम कहते नहीं थकते थे,
उनके तीन लफ्ज़ों ने
हमारी पूरी ज़िंदगी बदल दी।
शरीयत कहती है, जो मर्द तीन तलाक दे
उसे कोड़े पड़ने चाहिए।
कितनी मर्दों के पीठ पर आपने ऐसे छाले देखे होंगे?
जबकि आए दिन बेसहारा औरतें आपको सड़क किनारे दिखेंगी।
निकाह इस्लाम में एक,
इकरारनामा होता है।
लेकिन ये सिर्फ़ एक कॉन्ट्रैक्ट नहीं।
मोहब्बत और रिश्तों की ज़िम्मेदारी भी है।
और जब
इस इकरारनामे का इस्तेमाल रिश्तों की दगाबाजी के लिए किया जाए,
तब होती है शरीयत की असल बेइज़्ज़ती।
हम ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं।
वकालत तो बहुत दूर की बात है।
लेकिन इतने साल कोर्ट-कचहरी करते-करते,
ये ज़रूर समझ चुके हैं।
कि जो कुरान-ए-पाक में है
वही संविधान और कानून कहता है।
[उर्दू में आयतें बोलती है]
"तलाकशुदा औरतों को मुनासिब गुजर-बसर का इंतज़ाम करना ज़रूरी है।
ये नेक लोगों पर एक फर्ज़ है।
इस तरह ख़ुदा तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाते हैं, ताकि तुम समझ सको।"
हमसे बार-बार पूछा जाता है, हम हिंदुस्तानी हैं, या मुसलमान।
बेटी है? माँ है? बीवी रह चुके हैं? तलाकशुदा बनने जा रहे हैं?
इतनी सारी पहचाने तो संभाल रहे हैं एक साथ।
तो इस मामले में, हमें एक पहचान चुनने पर क्यों मजबूर किया जा रहा है?
हम सिर्फ़ मुसलमान औरत नहीं।
हम हिंदुस्तान की मुसलमान औरत हैं, इसी मिट्टी में पले-बढ़े हैं।
इसलिए आज यहाँ अपने हक़ के लिए सिर उठाकर इंसाफ की गुहार लगा रहे हैं।
कि कानून हमें भी उसी नज़र से देखे, जैसे बाकि हिंदुस्तानियों को देखता है।
[सन्नाटा छा जाता है]
हमारे अब्बू ने बहुत प्यार से हमारा नाम रखा था।
जो आज हमारे कौम में एक
गाली बन चुका है।
हम उस धब्बे को मिटाने आए हैं।
अगर आज यहाँ हमें अपना हक़ नहीं मिला,
तो हमें यकीन है...
कोई अपनी बच्ची का नाम
शाज़िया बानो नहीं रखेगा!
♪ मैं भी खेलूँ-हँसू, मुस्काऊँ ♪
♪ इनकी ही तो तरह मैं ♪
♪ कोई जीना है ये? जी पाऊँ ♪
♪ इनकी ही तो तरह मैं ♪
♪ फर्क कोई ना हो हम सब में ♪
♪ हाँ फिर ये जिया मुस्काएगा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
[चीफ जस्टिस एच. एन वशिष्ठ] शाज़िया बानो और अब्बास खान के मामले में,
ये अदालत ने सेक्शन 125
और मुस्लिम पर्सनल लॉ के सब पहलुओं को गौर से समझा है,
और साथ-साथ अपने पिछले फैसले,
बाई ताहिरा बनाम अली हुसैन फिस्सल्ली चोथिया,
और फुज़लुनबी बनाम खादर वली को भी ध्यान में रखा है।
हमारे संविधान का आर्टिकल 44,
यूनिफॉर्म सिविल कोड में
जो यूनिफॉर्म सिविल कोड का वादा करता है,
एक डेड लेटर बन चुका है।
अगर इस देश के हर नागरिक को एक बराबर इंसाफ
और इज़्ज़त देनी है,
तो हमें वो वादा निभाना पड़ेगा।
सेक्शन 125 कहता है कि किसी भी तलाकशुदा औरत को
मेंटनेंस मिलना चाहिए।
और ये हक़ मुस्लिम औरतों पर भी उतना ही लागू होता है।
ये अदालत कुरान को इस्लामिक लॉ की सबसे बड़ी अथॉरिटी मानती है,
और ये पाती है कि कुरान कहता है,
कि इंसाफ और मुहाफ़िज़त
हर तलाकशुदा औरत का हक़ है।
ये अदालत इस नतीजे पर पहुँची है,
कि मुस्लिम पर्सनल लॉ और सेक्शन 125 में कोई कॉन्फ्लिक्ट नहीं है।
इसलिए हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए,
शाज़िया बानो का मेंटनेंस का दावा कबूल किया जाता है।
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ ऐसी है ये दुनिया तुम्हारी ♪
♪ तो इसमें तुम ही जी लो ♪
♪ मुझको है अब जाना यहाँ से ♪
♪ घूंट जहर के तुम पी लो ♪
♪ होंगे नहीं हम, होगा ख़ुदा पर ♪
♪ बन के दुआ वो लाएगा जो ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
♪ हक़ है मेरा ♪
[एक महिला] और अब आगे क्या सोचा है?
बच्चियों को कुरान पढ़ाते हैं।
जो हदिया मिलता है
उसी से खर्चा चलता है।
"इकरा।"
"पढ़।"
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