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हजारों साल पहले प्राचीन भारत के दक्षिन में स्थित लंका द्वीप में एक दुष्ट
राजा रावन राज करता था। उसकी सारी दुनिया को जीतने और प्रशासन करने की
महत्वक अंख्षा ने पूरे संसार को संकट में डाल रखा था। वहीं दूसरी तरफ उत्तर
भ
हाला के कोशल राज की राजधाने अयोध्या की सबसे बड़ी चिंता ये थी कि उनका कोई
उत्राधिकारी नहीं था। ब्रह्म रिशी वशिष्ट के कहने पर महाराज
दशरत ने पुत्र प्राप्ती के लिए एक यग्य करवाया। जिसके परिणाम सरूप उने अपनी तीन
रा
जो दश्रत की पहली पत्नी कौशल्या से जन्मे थे।
जब जब धर्ती पर संकट आया है, तब तब उसके उद्धार
के लिए भगवान विश्णू ने अवतार लिया है। भगवान विश्णू के दस अवतारों में से
राम उनके साथमें अवतार माने जाते हैं।
जब राम प उस समय रावन की शक्तियों ने
संसार में हाहाकार मचा रखा था। रावन के मामा मारीज और राक्षसी ताड़का ने अयोध्या
की सीमा के पार जंगल में रह रहे ब्रह्मरिशे विश्वमित्र और अन्य साथों को
किया हुआ था। वो हर दिन उनके यग्यों में
वि
ओम अग्नि मीले पुरोहितं यद्न्यत्य देवं रुत्विजं होतारं
रत्नधातमं ओम अग्नले त्वाहा इदं नमः अग्नि
पूर्वे भिरुशि भिरीड्यो नूतनै रुत सदेवां एह वक्षती
ओम अग्नले त्वाहा इदं नमः अग्नि नारै मश्णवत्
ओषमेव दिवे दिवे यशतं वीरवत्तमं ओषमेव दिवे
यशतं वीरवत्तमं ओषमेव दिवे दिवे यशतं
वीरवत्तमं
ए पालन हार भगवान विश्वनू, क्या यहाँ ऐसा कोई नहीं जो हम रिशियों को इस विपत्ती से
बचाएं?
उसका नाम है राम, अयोध्या नरेश का जेष्ट पुत्र वही तुम्हारी रक्षा करेगा.
मैं धन्य हुआ महराज. आपके चरण पड़ते ही आयोध्या राजभवन धन्य हो गया. आग्या करें
प्रभू, मेरे लिए क्या आदेश है? हे सूर्य पुत्र कुल भूषण महराज दश्रत, राक्षसों ने
हमारी तपो भूमी को तहस नहस कर दिया है. रिशी जन संकट में है
मैं स्वयं चल कर उन राक्षसों को धर्ती से मिटा दूँगा। ये ईश्वर का आदेश है राजन। इस
आदेश को तुम ठुकरा नहीं सकते हैं। महराज, राम और लक्षमन को दम्मर्शि विश्वमित्र के
साथ जाने का आदेश दीजिये। ये स्वयं दिव्यास्त्रों के
प्रम्मरिशे, हम आपको अपनी आँखों के तारे सौप रहे हैं। आपके मार्गदर्शन में ये और
सक्षम बनेंगे। कल्याण हो महाराश दश्रत। आपका ये निर्णे पूरे संतार की रक्षा
हम अपने पिता के समान ही आपकी आग्या का भी पालन करेंगे
राम नक्ष्मन, एक समय ये बड़ा ही सुन्दर उपूवन था, परन्तु अब ये नष्ट हो गया है,
क्योंकि बहुती क्रूर, भयानक, नरभक्षी, राक्षती ताड़का, उसके पुत्र मारीच और उनकी
दुष्ट राक्षतों की टोली के उत्पाद से यहां सब कुछ
उज
हमारे बाद तुहरा हमारे
बाद
तुहरा
पेजी दिना कानम शब्द में पोज़े रदनाते हैं
राम लक्ष्मन, बहुत वर्ष पूर्व यही इसी स्थान पर हमारी कड़ी तपस्या से प्रसन्न
होकर देवताओं ने हमें भिन्न -भिन्न प्रकार के तिव्यास्त्र दिये। अब समय आके
आये कि हम इन दैवी अस्त्रों को योग्य उत्राधिकारी को सौपे।
इन्हें
त्व
अब ये तुम्हारे हैं। योग्यत समय पर इनका उपयोग करो।
ये
वही है। इसी ने मेरी मा को मारा है। मैं इसकी हत्या...
अपनी मां की मृत्यु का प्रतिशोत लूँगा।
इतनी जल्दी दिव्यास्त्रों का प्रयोग आपने कैसे सीखा भाईया? ये दिव्यास्त्र समय आने
पर अपने आप संचालित होते हैं.
इनके उप्योग के लिए शिक्षा की कोई आवश्यक्ता नहीं.
गुरुदेव मुझे बताईए की इस चक्र का प्रयोग कैसे करते हैं? �
पत्रत्यंचा कड़ाएगा महराज
और अब अयोध्या के राजकुमार राम
कर दो
समय बीतने के साथ साथ अयोध्या नगरी और विक्सित और सम्रिध हो गई। राम प्रजा के
प्रिय राजकुमार और होने वाले राजा थे। चारो भाईयों में बड़ा प्रेम था और सबका
भविश्य उज्जवल दिख रहा था। मेरे प्रिय जनों,
आज हमने नीन में सु�
गुरु वशिष्ट ने उसे किसी संकट के आगमन का संकेत माना है। साथ ही हमारा
स्वास्थ गिर रहा है। शरीर बुढ़ा हो रहा है। अब हम दुष्टों के आक्रमण का सामना
कर सकते हैं। हमने निर्णय लिया है कि हम राम को अपना सिंघासन सौंप दें। राम
अय
लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करना हमें तुम पर विश्वास है आपने जो
आदर्श थापित किये हैं मैं उन पर खरा उतरने का प्रयास करूँगा आयोध्धा की जैहो राजा
दर्शरत की जैहो राजकुमार राम की जैहो
चोर
मत मचाओ उड़ो यहां ते अरे मंथरा, चिड़ियों को क्यों आप शब्द बोल
रही हो?
महरानी कह कही, राज में अन्होनी होने वाली है, और आप है कि यहाँ शुंगार
करवा रही है? मंथरा, ऐसा क्यों बोल रही हो तुम?
क्या तुम्हें पता नहीं मंथरा, कल हमारे प्रियाराम का राज्यविशेक ह
इतनी भोली है, थोड़ा सोचिये, महाराज ने चलाकी से आपके साथ
विश्वागात किया है। अपनी जीव पर नियंतरन रखो, हम महाराज के लिए अनुचित शब्द नहीं
सुन सकते। परन्तु, राजकुमार भरत को महाराज ने अभी दूर क्यों भेजा, और
राज्या
भ
कहीं महराज को ये सुझाओ कोशलिया ने दिया होगा। आप जानती हैं कि आप महराज की प्रिय
राणी हैं। इसलिए कोशलिया आप से इश्चा करती है। क्यूंकि आप सबसे सुन्दर हैं। वस्त
हैं और जवान हैं। तो मुझे क्या करना चाहिए। आप इस
मंतरा की चतु
क्या हुआ महरानी?
ऐसे शुब समय में आपका ये क्रोध से भरा अशुब रूप क्या समस्या है? हम से तो कहिए.
महराज क्या आपको याद है?
सालों पहले जब आप युद्ध में घायल हो गए थे,
तब
मैंने ही आपको वहाँ से सुरक्षित निकाला था.
और आपने मुझे दो वर्दान देने का वचन दिया था।
आज मुझे मेरे वो दो वर्दान
चाहिए। वो भी अभी। केवल दो वर्दान। यदि आप चाहें तो और भी ले
सकती हैं। नहीं। मुझे मेरे वो दो वर्दान ही चाहिए। मेरा पहला वर्दान है।
नहीं। य
इसके बदले चाहो तो तुम पूरी संपत्ती ले लो। नहीं। फिर संसार कहेगा कि सूरे वंश का
एक राजा वचन देकर मुकर गया। इसलिए या तो मुझे मेरे दो वरदान दीजिये या अपना यश
कलंकित कीजिये। पहला वरदान था
कि कैकई के पुत्र भरत को राजा
वो भी 14 वर्ष के लिए भाईया, आप लोगों की पुकार सुन रहे हैं ना
लक्ष्मन, मेरे भाग्य में यही लिखा है किन्तु भाईया, क्या हमें भाग्य का लिखा
चुप बैठ जाना चाहिए और ये तलवार, क्या केवल एक अभिनेता के अभिने का सामान है
भा
पति पत्नी के कर्तवे अलग नहीं हो सकते हम सुख दुख में समान भागिदार हैं सत्य वचन
अगर आत्मा एक है तो भाग्य भी एक ही होगा इसलिए भाईया मैं भी आप दोनों
के साथ चलूंगा ठीक है
मा, ये चौदे साल यूँ ही देखते देखते ही भीच जाएंगे. मैं फिर लोट कर इसी तरहें
आशिर्वाद लूँगा.
अवश्य मेरे लाल. राम,
तुम
वन जाने को क्यों मान गए? तुमने मेरा विरोध क्यों नहीं किया? शायद इससे मेरा
कम हो जाता.
मुझे ना राज्य चाहिए और ना ही सिंघासन. मेरे लिए आपका वचन इन सब से बड़ा है,
पिताजी. आशिर्वात दीजे.
मेरे लान, संसार में कौन पिता तुम्हारे समान संतान पाकर अभिमान न करेगा?
तुम सूरे वंश के गौरव हो, सुरक्षित लोटना.
मंत्री �
राम के वन जाने के लिए हाथी, घोड़े, साज, सामान सहित संपूर्ण सेना तैयार करो। जैसी
आपकी आग्या। पिताश्री आपके आशिर्वाद से प्रकृति हमारा ध्यान सुएम रखेगी। सेना की
कोई आवश्यकता नहीं है। वन में राज्य की सेना का क्या काम?
यही
माता, अपने इस बेटे को आशिर्वात
दीजिये।
प्रिये
अयोध्यावातियों,
मुझे आपसे अपार्थ नहीं है, और जानता हूँ आपके हिर्दे में भी मेरे लिए प्रेम है।
आपसे निवेदन है कि यही प्रेम आप मेरे भाई भरत को भी दें। वो आपकी प्रेम का सही
उत्तराधिकारी है और आपसे अयोध्या का राजा भी मेरे प्यारे अयोध्यावातियों मेरी आप
सभी से विनती है कि ताथ ही आप मेरे दुखी पिता का भी ध्यान रखना
राजकुमार राम, जल्द लोटियेगा।
राम, मेरे
बच्चे। अपना ध्यान
रखना, राम, लक्ष्मन, इता। आप भी अपना ध्यान रखना, और हमारे
पिताजी की देखभाल करना। अवश्य राम।
कई महीनों तक महराज तश्रत का महल दुख के अंधकार में डूबा रहा।
अब महाराज दशरत संसार की कष्टों से मुक्त हो चुके हैं।
कैकैई के पुत्र भरत, जो अपने नाना
के हाँ कैकैई गहवे थे, उन्हें तुरंद अयोध्या वापत बुलाया गया।
मा, मा, ये सब क्या है?
कैसे हुआ ये?
उत्र भारत,
मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ. मुझे बताईए, क्या ये सत्य है? क्या पिताजी का
निधन हो गया है?
ए, भगवान, अर्थात ये सत्य है?
हाँ, परन्तु वो तुम्हें आयोध्या का राज सौप कर गए हैं. �
पापी नहीं, दुष्ट कुल खोती नहीं। कितने तुम्हारे मन में यह विश भरा है,
बताओ। वो यही है भाईया। इतनी दुष्टा ने हमारी माँ को भ्रमित कर, उनके मन में विश
विनाश के बीच भूए। मुझे ख्षमा कर दीजिये, ख्षमा। मैं केवल
आप द
वरना तुम्हारी लीप के टुकडे टुकडे कर दूँगा। रुख जाओ ब्राता, इसकी हत्या करके
वंश की तलवार अपवित्र मत करो। आज से तुम मेरी मा नहीं हो और ये बात पूरे संसार को
पता चलेगी। शमा कर दो पुत्र, मुझे से भूल हो गई, अपनी म
क्या?
ये तुम क्या कह रहे हो भरत?
हमारे पिताजी स्वर्ग से धार गए?
भाईया, ये हम सब के लिए कठिन समय है.
पिताजी, पिताजी, मुझे एकशमा कर दीजिये पिताजी. आपके अंतिम समय मैं आपके
साथ नहीं था.
भाईया, मैं एकशमा चाहता हूँ.
मेरी महा के सारे शडियंत्रों के लिए आप वापस अयोध्या चलिए। उस सिंहासन पर केवल
ही अधिकार है। भरत, अब प्रश्न ये नहीं है कि माता कही ने क्या किया। याद रखो, ये
हमारे महा अन्स्वर्गिय पिता का आधेश था कि मैं चौदर वर्षवन में �
मैं केवल आपका प्रतिनिधी बनकर राज करूँगा.
अपनी पादुका दीजिये.
अपने भाई को आशिर्वाद दीजिये भाईया, ताकि मैं आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतर सको.
मैं अगले चौदा
सालों तक राजकात संभालूंगा, जब तक आप वापत नहीं आते.
मेरे प्यारे भाई भाईया
महामंत्री प्रहस्तु तुम्हारी इस तरह अजानक यहां आने का कारण। महाराज, सभी रिशी मुनी
दंडक वन और अपने अपने आश्रमों में वापत लोट रहे हैं। उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा
हमारी गुप्तचरुं का कहना है कि इसका कारण है
आयोध्या
सत्य है महाराज, परन्तु इससे पहले कि देर हो जाए हमें कुछ करना होगा। ओ
राम, मैं तुमसे मिलने के लिए उताब...
राजगृहं वा उटजम दीनं सघनत तरीके
रावन की छोटी बेहन शूर्प नखा एक सुन्दर महिला का भेश बना कर राम को लुबाने के लिए
पंचवटी में आती है। राम, मैं हूँ शूर्प
नखा। ओ राम,
तुम कितने सुन्दर हो और कितने शक्ति शाली हो। मैं तुम से विवा करना चाती हूँ।
मैं तुम्हारी इच्छा का सम्मान करता हूँ, किन्तु सीता के रहते तुमसे विवा नहीं कर
सकता। तुम मेरे भाई लक्ष्मन से पूछ लो, वो भी बहुती सुन्दर और शक्तिशाली है।
ये भी कम सुन्दर नहीं है। जब तुम्हें भाईया राम पसंद है, और
तुम
� आओ पहले मैं आपका परिचे करा दूँ ये है मेरी पतनी सीता बहुत हो गया लगता है मुझे
आब अपने अजली रूप में आना ही बड़ेगा अगर मैं सीता को मार दूँ
क्या हुआ तुम्हें?
अरे शुर्पनखा, ये क्या? ये किसने किया?
राम, क्या हयोध्या के उस तुछ और वनवासी राजकुमार राम ने तुम्हारी ये तुरदशा की?
चिंता मत करो मेरी बेहन उसे तो मैं टुकड़े टुकड़े करके चील कववों को खिला दूँगा
प्रहरस्त मेरे भाई कुम कर्ण को जगाओ
महाराज वही हुआ जिसका मुझे डर था। कुम्भ करण अगले छै महिने तक नहीं जागने वाली।
काश, काश मैं उस सीता की सुन्दर्ता नश कर पाती। क्या सच में, वो इतनी सुन्दर
है। उसके जैसी सुन्दर त्री पूरे संसार में नहीं है भाईया।
वो स्वर्ट क
अगर उसके कोई योग्य है तो वो तुम हो भाईया और कोई नहीं
रावन अपने मामा मारीज के साथ सीता का अभरन करने निकलता
है।
इतना प्यारा है, क्या ये सत्य है, या मेरी आँखों का दोखा, ऐसा मनमोहक हिरन तो मैंने
पहले कभी नहीं देखा, स्वामी, आप इसे मेरे लिए पकड़ सकते हैं, क्यों नहीं, अवश्य,
लक्ष्मन, तुम सीटा का ध्यान रखना,
भाईया,
इस नर्जन बन में भेज
बद
हो सकता है ये दिव्य हिरन भी कोई राक्षत ही हो।
मुझे
ये तो ज्याद था कि तुम मुझे मार दोगे, लेकिन अब तुम्हारी प्रिय सीता का क्या
वो अवश्य किसी संकट में है। तुरंत उनकी सहायता करो। आप चिंता ना करें माते। कोई
संकट उन्हें छूँ भी नहीं सकता। ये क्या कह रहे हो लक्ष्मर। तुम चाहते हो उनकी
मृत्यू हो जाए। मैं आपकी ब्याकुलता समझता हूँ। जैसी आपकी आग्या।
म
मेरी अनुपस्थिति में इस रेखा को पार ना करें इसके भीतर आप सुरक्षित हैं आज्या
सब
कुछ मेरी योजना अनुसार ही हो रहा है
ये लीजिये रुशिवार
ये कैसी रिखा है किसी ने
तुम्हारी सुरक्षा के लिए बनाई है। मैं ऐसे पार नहीं कर सकता, पर तुम कर सकती हूँ।
आगे आओ। नहीं, कदापी नहीं। देवी भूख है, साधु का निरादर मत करो,
उसे भोजन दो। अन्यता तुम्हारे पिता और ससुर के वंशों का सर्वनाश हो ज
बिना संकोच हमें भिक्षा दो और हमारा आशिर्वाद राप करो।
तुम यहाँ क्या कर रहे हो? सीता को अकेले क्यों छोड़ाए? आपकी छीक सुनकर उन्होंने
के लिए विवश किया. ये क्या किया? उस राक्षत ने जान भूचकर तुम्हें मेरी आवाज
पुकारा था.
मुझे अनुनी की आशंका हो रही है. चलो जल्दी से सीता के �
हमारे साथ छल हुआ है। सीता को अकेली पाकर कोई दुष्ट उसे हर ले गया है।
लक्षमन मैं उस दुष्ट को पाताल से भी खोज निकालूँगा। वो चाहे ब्रह्मान्ड
के किसी भी कोने में छपा हो। मैं उसे पकड़ कर लाऊंगा। और उसे नष्ट कर
दूँगा। �
और आज आप स्वयं क्रोध में अपना धैर्य खो रही हैं। शांत मन से सोचिये कि हमें क्या
करना चाहिए। ठीक कहा। तुम धैर्यवान हो लक्ष्मन। अब
तुम्हें मुझे कोई रास्ता दिखाओ। अब से जैसा तुम कहोगे मैं वैसा ही करूँगा।
लक्ष्मन,
मुझ
चमा करे राम, मेरे फ्रिंद पंखुस दुष्ट का सामना नहीं कर सके और वो सीता
को ले गया। नहीं जटायू, तुम अपने आपको दोश मत दो,
तुमने तो मेरी पतनी की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की भी परवा नहीं की। हिम्मत
ना हारे राम, आपको सीता �
ध्यान से सुनो। किसी ने भी सीता को हानी पहुंचाई तो हम उसे मृत्यु दंड देंगे। ये
लंका की होने वाली महाराणी है। इनका ध्यान रखा जाए। स्रीजटा। मेरे लिए क्या आग्या
है महाराज। हम सीता की सुरक्षा का दायित्व तुम्हें सौंपते हैं। �
इन दिनों की चुबन से बड़ा है मेरी भूख का दर्द। तुम्हें खाने के लिए मती है तो...
सुगरीव, वो कौन है?
यहाँ तो जील है। लक्ष्मन, अब हम क्या करें?
भाईया, वहाँ कोई दिख रहा है। चलिए उससे सुगरीप के बारे में पूछते हैं। हाँ, ठीक
रुकिये।
कपड़े तो आपने मुनियों के पहने हैं, लेकिन आप दुनों के चेहरे से राज कुमारों का
अभास होता है। प्रकृति भी हमारे साथ अद्भुत खेल खेलती है। और हम सबको उस खेल
अलग -अलग पात्र निभाने का अवसर मिलता है। जैसे किसी रंग मंच की
कटप
मेरी पत्नी सीता को खोज रहे हैं। किसी दुष्ट राक्षत ने उसका हरण कर लिया है। हम
नहीं जानते कि वो उसे कहां ले गया। मैंने अवश्य कुछ पुन्ने किये होंगे जो मुझे
साक्षात अयोध्या के राजकुमार राम के दर्शन हुए। आपको अपना
परिचे
क
मार्ग दर्शक बन कर हमारे सामने आ गए हैं। राम, लक्ष्मन, जिन महराज दर्शरत
का नाम पूरे संसार में आदर से लिया जाता है। उनके पुत्र राम, लक्ष्मन से मिलना
लिए सम्मान की बात है। ये भी एक संयोग ही है कि कुछी दिन पहले मैंने एक पुकार स�
जब वो चीख रही थी, एक छोटी सी पोटली भी उसने नीचे फेकी थी, जिसे हमने संभाल कर
है. कहाँ है वो? कहाँ है वो?
ओ, ये देखो लक्ष्मन, ये सीता का ही वस्तर है, ये
कंगन और ये मनी भी. ओ, सीता, पेरी सीता.
धीरज रखे भाईया. राम, अभी ये शो
शीगर ही कोई निर्णय लेना होगा मैं सीता को बचाने का हर संभाव प्रयास करूँगा
मैं आपकी पीड़ा समझ सकता हूँ क्योंकि मैं भी उसी पीड़ा से जूज रहा हूँ मेरा भाई
बाली उसने मुझसे मेरा राज्य छीन लिया और साथ ही मेरी पत्नी को भी आज
यदि अपने समस्त संसाधनों का उपयोग करके सीता मैया की
खोज में लग जाता। आईए, आज से हम दोनों मित्रता के बंधन में बंध कर ये प्रण लेते
हैं। ये अपने अपने बल के अनुसार एक दूसरे की सहायता कर सभी कश्टों को दूर करेंगे।
अवश्य, ऐसा ही होगा
आज से यही मेरा प्रथन धर्म है, जिसका पालन करते हुए मैं आपकी सहायता की शपत लेता
हूँ। मैं भी शपत लेता हूँ। राम ने सुगरीव को दिया वचन निभाया, और
शक्तिशाली बाली से युद्ध किया। बाली युद्ध में पराजित हुआ, और सुगरीव
को
और बारिश बंध होने के बाद जब मौसम साफ हुआ तो रिश्य मुख बार के पानी से घिरा हुआ एक
द्वीप जैसा लग रहा था और तभी सुगरीव ने अपनी विशाल वानर सिना
बुलाई जब तुम्हें सीता मिल जाए तो उसे ये अभूशन दे देना ताकि वो
तुम
ये हमारा राज सी आभूशन है, इसे जाकर सिता को दिखा दिना।
वानर
राज तुब्रीव ने भी राम को दिया वशन निभाटे गए, सभी दिशाओं में अपने खोजी दल भेजे।
देखो, वहाँ, उस दिशा में, कुछ पक्षी वहाँ से निकल रहे हैं, हो सकता है कि वहाँ जल
हो. हाँ, वहाँ जल हो सकता है, चलो सब वहीं चलते हैं.
उनको मुझे थोड़ी रोटने दिखना ही है शेद वहाँ रात्ता हो सकता है जल्दी चलो
दक्षिन की ओर के दल का नित्रित्व करने वाले हनमान की धेंद, रावण के हाथों मारे
पक्षीराज जटायू के भाई संपाती से हुई। ये हम कहां आ गए?
क्या आप जटायू के बड़े भाई संपाती हैं?
मैं संपाती ही हूँ. क्या आप लोग मेरे भाई को जानते हैं?
कैसा है मेरा भाई जटायू?
वो ठीक तो है न?
वीर जटायू का स्वर्गवास हो चुका है.
क्या इससे बड़ा कोई दुख हो सकता है कि बड़े
भाई के...
जीते जी, छोटे भाई की बृत्यो हो जाए। वीर
जटायू बहुत ही पराक्रमी और साहसी थे। उस कप्ती दुष्ट रावन थे मा थीता
को बचाने के प्रयास में लड़ते लड़ते उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
तुमने रावन कहा, यही कहा
अगर मुझे पता होता कि रावन ने मेरे भाई को मारा, तो मैं कभी भी उस दुष्ट को यहां से
उड़कर नहीं जाने देता.
क्या यहीं से उड़कर गया था वो? हाँ, तुम सब को समुद्र पार
वो द्वीद दिख रहा है, वही है लंका.
मा सीता को बंदी बना कर उस
दु�
अगर हम सबको समद्रे पार करना है तो उसके लिए हजारों नाव चाहिए होंगी ये कारे मैं
सकता था परंतु अब मैं बुढ़ा हो गया हूँ यूवा अवस्था में मैंने 21 बार पृत्वी की
परिक्रमा की थी पर अब जेवल एक है जो इस कठिन कारे
को कर सकता है और वो ह
फिर उड़ कर उसके पास गए और उसे निगलने का प्रियास किया था तुम्हारी शक्तियां आपार
हैं परन्तु तुम्हें ग्यात नहीं कि इसका प्रियोग कैसे करें संसार तुम्हारी
से भैभीत हो गया था परन्तु एक शाप के कारण तुम अपनी शक्तियों को
समुद्र पार लंका पहुँचकर माता सीता का पता लगा सकते हो।
ओम। ओम।
जल्द मिलेंगे साथियों
हनुमान सीगर
ही लंका की ओर निकलते हैं रास्ते में समुद्री राक्षती सिमहिका उन्हें ललकारती
ये क्या है?
यह मैं कहां आ गया यहां से बाहर निकलना होगा
भयंकर युद्ध में सिमहिका का वद करने के पश्चार हनुमान बिनाव लंब की लंका की ओर
बढ़ते हैं
हुआ है
किन्तु इतनी बड़ी लंगा में माता सिता को डून्डू कहते है।
आ, तुम जाग रही हो। सुबह, दुबहर, शाम, हर समय केवल तुम्हें ही
देखना चाहते हैं। लेकिन तुम हो, जो हमें देखती भी नहीं। अब हमें लगता है, ये तभी
संभव होगा। जब हम राम का फिर काट कर लाएंगे। आप बार -बार इसके पास क्यों आते
याद रहे एक वर्ष समाप्त होने में थोड़े ही दिन बचे है
ऐसा
क्या है तुम्हें जो लंकेश तुम पर इतरे मोहित है मुझे कुछ विशेश नहीं लगता मैंने
लंकापती से अधिक सुनर किसी को नहीं देखा पर तेरे पती को देखना चाहूँगी जिस पर तुझे
इ
जननिहं रामदूत हनुमान
चरणवान
मम प्रभु कान
किन्तु करोती सदात अवचिंतन।
मेरे साथ चलिये मा, मैं आपको श्रीराम के पास ले जाओंगा। मैं तुमारे साथ नहीं जा
सकती। इस राक्षस ने बहुत से लोगों को बलपूर्वक अपहरण करके लंका में बंदी बना
है। मेरे साथ साथ उन सब का भी यहां से मुक्त होना आवश्यक है। समझ सक
जाके स्वामी से कहो कि वो जल्दी से मुझे बचा ले तब तक मैं उनकी राह देखूंगी जो
आग्या माता परन्तु जाने से पहले मैं रावन और उसके लोगों को सबक सिखा कर
जाओंगा
योधा लग रहा है मेरे लायक।
अगर
मैं योधा का बंदी बन जाओं, तो ये मुझे सिधा रावन के पार ले जाएगा, और तब रावन
सामने होगा। बचाओ, बचाओ, आगते मेरी रक्षा करो।
वानर कौन हो तुम, अपना परिचे दो। बताओ
तुम्हें यहाँ किस ने भेजा है।
ए लंकेश रावन, मेरा नाम हनुमान है।
मैं वानर राज सुग्रीम और उनके मित्र योध्या के राजकुमार प्रभू श्री राम का दूद
यहाँ आपके सामने उपस्थित हुआ हूँ। आपने माता सीता का फरण करके ए
गृणित और धर्म विरुद्ध कार्य किया है। जिसके कारण आपका और आपकी समस्त राक्षस
का विनाश निश्चित है। इसलिए एकशमा मांग कर माता सीता को सम्मान के साथ प्रभू
श्रीराम को लोटा दो। मार दो इसे। भाईया, राजनीती के अनुसार हम
किसी
तो हम अपने शत्रु को यहां तक कैसे लेकर आएंगे। ठीक है, इसकी पूंच
में आग लगा दो और छोड़ दो इसे।
अरे क्या किया, मेरी पूंच जवादी, मेरी पूंच, मेरी
पूंच, अरे कहा जाओ।
लंकेश, आपसे मेरी प्रार्थना है कि सीता को वापस राम के पास भेज दीजिये। अन्यथा लंका
का सर्वनाश कोई नहीं रोग सकता। विभीचन, अगर तुम्हारे सिवा किसी
और ने ये कहा होता, तो उसका सर कटकर हमारे पैरों में पढ़ा होता। मैं लंकापती
राव
निकल जाओ विश्वास खाती।
शान्त
हो जाओ, शान्त हो जाओ, ये सोचो कि हम समुद्र पार कैसे जा सकते हैं। इसके लिए
हजारों नाओ की आवश्चक्ता होगी। हमें समुत्र पर फूल बनाना चाहिए। तुम्हें पता
इतना लंबा फूल बनाने में हमें कितने वर्ष लग जाएंगे। बात केवल माता सीता को ही
बचाने की होती। तो पलक जपकते ही मैं लंका जाता और माता को ले कर आ जाता। हमें केवल
सीता को ही नहीं
बचाना
ये बहुत अच्छे व्यक्ति हैं। लंका में इन्होंने मेरे प्राणों की रक्षा की थी।
निश्कपट सौभाव स्वैम मैंने अपनी आखों से देखा है। इनके हमारे साथाने में मुझे कोई
दोश नहीं दिखता। मैं हनुमान से पूर्णत है सहमत हूँ। हमारे �
राम ने दिन रात जार्थना करते हुए साथ दिनों तक समुद्र देवता का आभान
किया। तब आठवे दिन
समुद्र देव स्वेम प्रकट हुए।
धर्म रक्षक राम, अपनी सेना से कहिए कि वो पत्थरों पर आपका नाम लिख कर
समुद्र में फैक दे जाएं। आपके नाम के पत्थरों को मैं दूबने नहीं दूँगा। उनहीं
को एक दूसरे से चोड़ते हुए आप एक सेतु का निर्मान कीजिए। इस कारे में ना
के
सफलता प्राप्त होगी
मेरे
वीरों आओ मिलकर तमुद्र पर तेतु बनाएं
महाराज, ये युद्ध हमारे सैनिकों के लिए युद्ध नहीं, मात्र एक खेल होगा।
इस छोटे से संकट के लिए आपको चिंतित होने की आवश्यक्ता नहीं
है।
धूल चटा देंगे, रावन, हमने तुमसे पहले ही कहा था, और आज फिर
से कह रहे हैं कि, राजा को इस तरह की चापलूसियों से, हमेशा बच के रहना चाहिए,
जिनोंने समुदर पर पुल बनाया हो, वो साधारन सेना नहीं हो सकती, रावन, हम तुमारे ही
बलाई के
लिए
क आप जानते भी हैं आप क्या कह रहे हैं अगर हमने सीता को सौप दिया तो शत्रू समझेगा
कि हम कायर हैं डरते हैं ऐसा नहीं है पुत्र केवल एक स्त्री के लिए हजारों
को युद्ध की आग में जोंग देना उन्हें बली चड़ा देना उचित नहीं है उचित नह
आप कायर हो गए हैं इंद्र जीत अपनी जीवा पर नियंत्र रखो मैं कायर नहीं हूँ
परन्तो अनावशक युदल लड़ना भी कोई बुद्धिमानी नहीं है आपने मुझे याद किया
हाँ बल्वान युवराज अंगद सुनो मैं जो कहने जा रहा हूँ उसे ध्
वो समय हमारे स्तामने आ गया है। लेकिन फिर भी मैं गहमातान युद्ध को रोकने और
रावन को बचने का एक अस्तर देना चाहता हूँ। इसलिए अगर रावन सीता सहित
सभी बंधकों को हमेशा के लिए मुक्त कर दे और ख्षमा मांग ले तो ये युद्ध रुख सकता है
लेकिन युद्ध को हमें हर हाल में रोकना चाहिए जिससे तीनों ही लोकों में सुख शामती
बनी रहे और इसके लिए मैं रावन के सभी अपराधों को क्षमा करने के लिए तैयार हूँ
अंगद, क्या तुम ये संदेश रावन तक पहुचातकते हो?
मैं निश्चित रूप से
तो तुम ये कहने के लिए यहां सकाय हो क्या नाम बताया था तुमने
अंगल यही नाम बताया था ना तो ये रहा हमारा जवा मूर है
एक चांती दूद के साथ इस तरह का व्यवहार आप जैसे राजा को शोभा नहीं देता
तो आखर कार रावन युद्ध ही चाहता है ठीक है मैं तुम्हारे साहत की सराहना करता हूँ
मैंने बहुत कोशिश की पर उस घमंडी रावन ने आपका शांती प्रतार ठुकरा दिया वो युद्ध ही
चाहता है
सुनों वानर वीरो भोर की पहली किरण के परवत शिकर को चूते ही हम युद्ध आरंब कर देंगे
तो क्या आप अन्याय के विरुद लड़ाई लड़ने के लिए राम का साथ देंगे
जय जय जय जय जय जय
हे प्रभु मेरी पुकार सुनो रक्षा करो मेरे स्वामी की रक्षा
करो प्रभु मेरे स्वामी की रक्षा करो
इससे मुझे परिशानी हो रही है इससे निकाल ही देता हूँ
युद्ध का आरंभ अति उत्तम था महाराज। हमारी और शत्रु सेना दोनों ने बराबरी की टक्कर
दी। परन्तु अब हमारे सैनिक ठकने लगे हैं। उन सैनिकों को वहाँ से वापस बला लो। और
थोड़ा आराम करने को कहो। आदर्णिय महाराज। ये तो पराजए
स्व
धूल चटा देंगे। ठीक है। सूर्यास्त के बाद जब युद्ध रुक जाएगा तब राम अपने घायल
सैनिकों का उपचार करेगा और मृत्य सैनिकों का आंतिम सस्कार। उचित है। मैं कुंभा और
निकुंभ को भेजता हूँ।
कहीं भी बाग जाओ पर मेरे हाथों से
कुम्ब के बल और पराक्रम ने त्राही त्राही मचा दी है महाराज। क्यों नहीं आखिर वो
महामली कुम्ब करन के बेटे हैं। कई वीरों के प्रान
चले गए और बहुत खायल भी हो गए।
मुझे तुम पर गर्व है। आज तुम बहुत ही बहधुरी से लड़े। अब आराम करो। नहीं
प्रभु, ये तो छोटा सा खाव है। कल सुबह मैं युद्ध के लिए तयार हो जाओंगा।
और कश्ट मत करो। विश्राम करो। जी, जैसा आप
कहें।
भाईया, आप शत्रू के सेनिकों का अंतिम संस्कार हमारे अपने सेनिकों के साथ क्यों
रहे हैं?
नहीं, लक्ष्मन. ये हमारे या रावन के सेनिक तब तक थे जब तक जीवित थे.
मृत्यू के बाद कोई किसी का शत्रू नहीं. इसलिए ये सभी मृत सेनिक सम्मान के
प
तो मैं भी क्रोध और कड़वाहट से भरा हुआ था। लेकिन लंका की यात्रा के दरान मैंने
देखा कि हम सभी को ईश्वर की कृपा से जीवन रूपी ये अन्मोल रत्न मिला
है। और ये अती आवश्यक है कि हम एक अच्छे क्षत्रिय होने से पहले एक अच्छे मानव हूँ
वानर, मनुष्य, जानवर, पक्षी और मचलिया एक ही स्रोच से नहीं आये हैं। फिर
भी हम मेंसे कुछ लोग अज्ञानता में अपने ही साथियों के विरुद अस्त्र शस्त्रों का
उप्योग करते हैं। आज युद्ध भूमी में बहुत से लोगों ने अपने प्राण
गव
तो मैं उस समय एक ऐसी दुनिया के लिए प्रार्थना करूँगा, जहां फिर कभी कोई
मनुष्य अपने भाई बंदूं पर ग्रोध में आकर शस्त्र ना उठाए।
भाईया, मैं आपकी भावना समझ गया।
हमसे युद करो अवश्चि नील आगे चलो
मुझे छोड़ कर क्यों चले गए। या तुम
ही हो वो जिसने मेरे भाई का वद किया है, बताओ। हाँ, मैं हूँ, मैं हूँ सुग्रीव,
वानरों का राजा सुग्रीव। तुम्हारा भाई बहुत ही बलवान और सहसी योद्धा था।
आज से पहले मेरा कभी ऐसे
योद्धा
ये क्या कह रहे हो इंद्रजीत, प्रहस्त और कुंब दोनों मारे गए हाँ पिताश्वी,
से ये सच है हम सोच भी नहीं सकते कि कोई इन्हें मार सकता है
ये जुद्ध आसान नहीं है हमें अपनी रणनिती बदलनी होगी इंद्रजीत, कुंब कर्ण को जगाओ
प
तत्कान उसे जगाओ ये मिरा आदेश है जी पिताश्वी जैसी आपकी आग्या
बावन का भाई कुपकन है।
विदीशा, धर्ती आकाश को एक करता ये विशाल योद्धा कौन है? हे राम, ये रावण का सक्त
शक्तिशाली और पराक्रमी योद्धा और भाई कुम्भ करन है.
अगर ये छे महिने की निद्रा पूरी कर लेता तो ये अमर हो जाता. लेकिन रावण ने समय से
पहले ही इसे
ज
कुम्बकर्ण इतना शक्तिशाली है कि ये अकेला ही हमारी पूरी वानर सिना को समाप्त कर
देगा अब केवल आप ही हैं जो इस विनाश को होने से रोक सकते हैं
फिर तो मेरा जाना ही उचित है
क्या नाम है तुम्हारा?
मैं अंगद हूँ, महाराज सुग्रीव का भतीजा और वानर राज बाली का पुत्र.
योवराज अंगद, निसंदे तुम वीर हो, लेकिन मुझसे युद्ध नहीं कर सकते, इसलिए
मृत्यू को ललकारने की भूल मत करो. बैरो!
मेरे बारे में क्या
र मैं जानता हूँ तुम
बहुत ही बल्चाली हो तो इस हनुमान के साथ अपना बाहु बला अजमाना चाहोगे
बहुत अच्छी लेकिन हमारे युद्ध के पहले
ये लो
इसकी आवशक्ता
नहीं।
हमारा युद्ध निहत्य नहीं हो सकता। तुम गदा चिराने में कुछल हो। इसलिए ये युद्ध
अस्त्रों के साथ होगा।
पागिशाली हो कि मेरे हाथ में कोई अस्तर नहीं था. अब उठो और मुझसे युद्ध करो.
जहां हो वहीं खड़े रहो.
मैं हूँ राम, अयोध्या का राजकुमार, दश्रतनंदन राम.
दूर रहो मुर्खों तो तुम हो रा सुना है तुम्हें
अस्त्रविद्या का बहुत जान है दूर रहो मुझसे जाओ यहाँ से
और जाकर वानरों से युद्ध करो
कुम्बकरण
जैसे महाबली के युद्ध मैदान में होते हुए भी दिन की समाप्ती तक युद्ध चला कैसे?
पिताश्री, अब मुझे ही ये युद्ध समाप्त करने के लिए जाना होगा विजय भव इंद्र जीत,
जाओ
शमा करना कुम्बकरन, मैं बस अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ।
भाईया, ये गर्व का ख्षण है, लेकिन आप ठीक तो है न, कहीं चोट तो नहीं लगी?
हाँ, हलकिसी लगी है, लेकिन मैं ठीक हूँ, मुझे एक शमा करना भी भी शण, ये युद्ध ना
होता, तो आज कुम्ब करण की मृत्यू मेरे हाथों ना हुई होती.
शिरी राम के सै
उसकी मृत्यू ने लंका की नीव हिला दी ऐसे बलशाली युद्धा का जाना
अतेंद दुखदार बहुत बड़ी शती है पिताश्री मेरे रहते लंका का
गौरो धूमिल नहीं होगा मैंने एक योजना बनाई है उसके अनुसार मैं रात में ही शत्रू
सेना पर आक्रमण करके �
जितनी जल्दी हो सके सभी घायलों को शिविर पोचाओ चलो जल्दी
इतनी भी क्या जल्दी है अभी
तो बहुत सारे शव मिलेंगे तुम्हे एक दुताहत का दंड उसे मिलना ही चाहिए अभी बताता हूँ
पहरो उसके साथ कोई है
ये क्या माता सीता
आप ठीक तो है न?
जल्दी आओ, सहायता करो, घेरा बनाओ। जाब
बन। तुम्हें यमलोक पहुचाने से पहले राम, तुम्हारी पत्नी और भाई
की मृत्यू का शोक मनाने का एक अवसर दे रहा हूँ।
महराज, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। कहो। हमने घायलों के ऊपर जंगल में उपलब्द सभी
जड़ी बुटियों का प्रयोग करके देख लिया। लेकिन इंद्रजीत द्वारा दिये घाव किसी भी
जड़ी बुटी से भर ही नहीं रहे हैं। क्या कहा?
लेकिन ये कैस
स्वेम को संभालिये राम, अन्यता आपका ये गिरता हुआ मनोबल हमारी सेना पर शत्रु
से भी बड़ी ख्षती पहुँचाएगा. प्रभू, आप चिंता मत कीजिये, माता सीता अवश्य जीवित
होंगी. जीवित? लेकिन सीता की हत्या तो हमारी आखों के सामने ही क
ताकि आप दुखी हो और आपका ध्यान भंग हो। इंद्रजीत की मायावी शक्तियों को मिटाने का
केवल एक ही उपाय है। उस पर उस समय हमला किया जाए। जब वो युद्ध से पहले देवी
निकुम्भिला की गुफा में तंत्र साधना करने में मगन हो। युद्ध में
आ
युद्ध में आने से एक दिन पहले ये विधी प्रारंभ होती है और देर रात तक चलती है
अच्छा?
नहीं, नहीं, नहीं हमारे बहुत से वीर और साथ ही मेरा भाई लक्ष्मन भी गायल पड़ा है
ऐसी स्थिती में निकुंभला देवी की गुफा तक जाकर इंडर जीत पर ह
आप विश्राम करते करते ही, बोलो जामबंद। कुछ ऐसी जड़ी बूटिया हैं जो
हमारे घावों को ठीक कर सकती हैं, जो हिमाले पर हैं। अच्छा, हिमाले में,
वो तो बहुत दूर है, इतनी जल्दी वहाँ से जड़ी बूटिया कौन लाएगा।
ये तो अयोध्या है प्रभू श्रीराम का राज्य
पहच
गए हिमाले ओ कितना सुन्दर
है पवित्र और अद्वत इसके भी दर्शन हो गए
द्रोन गिरी शिकर भी मिल गया।
और
अब मुझे खोजनी होगी हमारी गायल सेना के लिए चमतकारी संजीवनी बूटी।
यही है वो संजीवनी बूठी
यह
तो बहुत पीड़ा दाई है
अरे
वा मेरी चोड़ ठीक हो गई और साथी पीड़ा भी चली गई ये संजीवनी बूटी तो
उम्मीद से भी ज्यादा चमतकारी है
लेकिन मुठी भर
जड़ी बूटियों से हमारी पूरी सेना आखिर कैसे ठीक हो पाएगी समझ में नहीं आ रहा
कोई तो उपाए सोचना होगा
ये उपाय काम करेगा इस पेड़ को खाड़ लेता हूँ
बन गया निशान।
और
अब मैं उठा कर ले जाओंगा इस पूरे परवत को।
हे प्रभो, जब तक मैं ये संजीवनी बूटी लेकर ना पहुँच जाओं, तब तक आप मेरे लक्ष्मन
भाईया की रक्षा करना.
लक्ष्मन भाईया, बस थोड़ी देर और आप अपना धिरज बनाए रखना.
मेरे प्यारे लक्ष्मन धैर्य मत खोना, बस थोड़ी देर और
मैं बस पहुची गया लक्ष्मन भाईया भाईया भाईया राम लक्ष्मन
मैं यही हूँ वहाँ देखो हनुमान जी आ गए हैं हनुमान जी चैलो
चैलो चैलो हनुमान जी आ गए हैं वो अपने गंधों पर कुछ ले कर आ रहे हैं लेकिन
वो है क्या यह तो पूरा परवत ही उ�
हनुमान जी, परवत पर जड़ी बूटियां कहा है? बताता हूँ, ठीक उसी जगा जहां मैंने पेड़
का तना गाड़ कर निशान बना दिया है जल्दी करो, लक्ष्मन भाईया के घाओ पर संजीवनी
लगाओ जी हनुमान जी, हम अभी जाते हैं
लक्ष्मन, मेरे भाई, तुम्हें होश आ गया, तुम ठीक हो गये।
हनुमान, भाईयों की तरह तुम भी मुझे अत्यंत प्रिय हो।
ये कौन है?
ये क्या हुआ?
कौन है वहाँ? मेरे सामने आओ!
अस्चरियती बात है! तुम अभी तक जीवित हो?
हाँ! और आज तुम्हारी तनरक्षिका देवी भी तुम्हें तुम्हारे काल से नहीं बचा पाएगी।
आजशर्य की बात है कि तुम जैसे दुष्ट के लिए तुम्हारे दास फ्रान
देने के लिए आतुर है। सैनिकों, मार दो इसे!
कुछ और तोड़ना पड़ेगा
तुम
मुझे बाहर लेकर चलो
इंद्रजीत। मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ, जो तुम जैसे वानर के जाल में फ़स जाओ।
वो
हमारे हाथ से निकल गया।
अगर मेरी आग्या का पालन किया तो तुम्हारे प्राण नहीं लूँगा। मुझे आकाश में ले चलो
और याद रहे। जब मैं दाएं कहूँ तो दाएं ही जाना। और बाएं कहूँ तो केबल बाएं। अगर
चालाकी की तो तुम्हारा फिर धर्ते अलग कर दूँगा।
इस बार नहीं, इम्रजी, मैं तुम्हें जिन्दा हूँ.
तुम मुझे फिर नहीं...
करते हैं
तुम मुझे कभी नहीं मार पाओगे!
ओ, इंद्रजीत!
मेरे बेटे!
वीर इंद्रजीत ने तो!
मायावी सीता का वद्ध किया था। लेकिन मैं असली सीता को ही मार डालूँगा। जो भी राम
बील है, उसकी मृत्यू निश्चित है। एक स्त्री की हत्या करके अपनी तलवार को क्यों
कलंकित करते हो। बात समझो लंकेश। तुमने देखा ना। कुंब और निकुंब,
प
पिता हो और एक राजा भी हो, क्या तुम उनकी कीर्ती को कलंकित करोगी? समय आ गया है कि
अब हम तुम धलवार उठाएं और अपना प्रतिशोध लिने युद्ध भूमी में उत्रें.
यही होगा, लेकिन तब तक आप लंका की स्त्रियों और बच्चों की रक्षा कीजिए. को
तो ऐसे लग रहे हैं जैसे गरूर पे साथ शाद भगवान विश्टु हो
तुम्हारे और मेरे बीच का ये युद्ध आज अधर्म का विनाश कर देगा। लंका वासियों, आओ
सुनो। तुम्हारा राजा रावन, जिसे तुम अमर शक्ती का प्रतीक मानते हो। उसे
अब एक साधारन मानव के हाथों मरते देखो। राम, रावन के
सामने तो फै भ
संसार में दुशानन रावन एक ही है दूसरा ना कभी था और ना कभी होगा आओ राम
मुझसे युद्ध करो आजाओ जैती तुम्हारी इच्छा आजाओ
अब इसका अंत हो गया
मुझे
अपनी आँखों पर विश्वात नहीं हो रहा
तुम्हें क्या लगा रावण कमात होगा या?
रावण अजय के!
कोई रास्ता नहीं मचा।
असंभव
ये कैसी शक्ति है जितने रावन के केले को दो दिया।
आपको तो वाली गृप्यों लिखी तैराओ
ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे, ब्राधा रावन। युद्ध का अंत
हुआ।
लंका के सैनिकों, रावन
के साथ -साथ शत्रुता का भी अंत हुआ। मेरा आपसे कोई बैर नहीं। इसलिए अपने अस्तर
-शत्र त्याग दो। और आज से अपने नए राजा विभीषण
जो आग्या
दीते
द्वामी
मैं आप सबका किस तरह से आभार प्रकट करूँ। विशेश रूप से उनका जिन्होंने मेरे लिए
अपने प्रांट दे दिये। मैं उनके लिए दुखी हूँ और आप सबसे एक शमा चाहती हूँ। इसकी
आवशक्ता नहीं है। युद्ध में मिली
मृत्यु
गौरवश पुष्पक विमान भेज किया।
अयोध्या
लोटते समय राम को देखते हुए, सीता जी अत्यंत प्रसन्न हो रही थी, लेकिन उन्हें
भे था उनके लिए, जिन्होंने अपने प्राण गवाए उस युद्ध में जिसे ताला
जा सकता था.
अयोध्या अपने प्रिय राजा के सुरक्षित लोटने का उठ्सव मनाती है, और वे सभी आनन्द
रहते है बहुत साल बाद राम स्वर्ग प्रख्ठान कर जाते हैं और सीता अपनी मा धर्ती के
पास। जैहे श्रीराम।
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