All language subtitles for Ramayana-The.Legend.of.Prince.Rama.2025.1080p.HEVC.Hindi.WEB-DL.5.1.x265-HDHub4u.Tv.
Afrikaans
Akan
Albanian
Amharic
Arabic
Armenian
Azerbaijani
Basque
Belarusian
Bemba
Bengali
Bihari
Bosnian
Breton
Bulgarian
Cambodian
Catalan
Cebuano
Cherokee
Chichewa
Chinese (Simplified)
Chinese (Traditional)
Corsican
Croatian
Czech
Danish
Dutch
English
Esperanto
Estonian
Ewe
Faroese
Filipino
Finnish
French
Frisian
Ga
Galician
Georgian
German
Greek
Guarani
Gujarati
Haitian Creole
Hausa
Hawaiian
Hebrew
Hindi
Hmong
Hungarian
Icelandic
Igbo
Indonesian
Interlingua
Irish
Italian
Japanese
Javanese
Kannada
Kazakh
Kinyarwanda
Kirundi
Kongo
Korean
Krio (Sierra Leone)
Kurdish
Kurdish (Soranî)
Kyrgyz
Laothian
Latin
Latvian
Lingala
Lithuanian
Lozi
Luganda
Luo
Luxembourgish
Macedonian
Malagasy
Malay
Malayalam
Maltese
Maori
Marathi
Mauritian Creole
Moldavian
Mongolian
Myanmar (Burmese)
Montenegrin
Nepali
Nigerian Pidgin
Northern Sotho
Norwegian
Norwegian (Nynorsk)
Occitan
Oriya
Oromo
Pashto
Persian
Polish
Portuguese (Brazil)
Portuguese (Portugal)
Punjabi
Quechua
Romanian
Romansh
Runyakitara
Russian
Samoan
Scots Gaelic
Serbian
Serbo-Croatian
Sesotho
Setswana
Seychellois Creole
Shona
Sindhi
Sinhalese
Slovak
Slovenian
Somali
Spanish
Spanish (Latin American)
Sundanese
Swahili
Swedish
Tajik
Tamil
Tatar
Telugu
Thai
Tigrinya
Tonga
Tshiluba
Tumbuka
Turkish
Turkmen
Twi
Uighur
Ukrainian
Urdu
Uzbek
Vietnamese
Welsh
Wolof
Xhosa
Yiddish
Yoruba
Zulu
Would you like to inspect the original subtitles? These are the user uploaded subtitles that are being translated:
1
00:00:08,340 --> 00:00:15,280
हजारों साल पहले प्राचीन भारत के दक्षिन
में स्थित लंका द्वीप में एक दुष्ट
2
00:00:15,280 --> 00:00:21,900
राजा रावन राज करता था। उसकी सारी दुनिया
को जीतने और प्रशासन करने की
3
00:00:21,900 --> 00:00:28,860
महत्वक अंख्षा ने पूरे संसार को संकट में
डाल रखा था। वहीं दूसरी तरफ उत्तर
4
00:00:28,860 --> 00:00:36,280
भ
5
00:00:37,320 --> 00:00:43,560
हाला के कोशल राज की राजधाने अयोध्या की
सबसे बड़ी चिंता ये थी कि उनका कोई
6
00:00:43,560 --> 00:00:50,300
उत्राधिकारी नहीं था। ब्रह्म रिशी वशिष्ट
के कहने पर महाराज
7
00:00:50,300 --> 00:00:57,100
दशरत ने पुत्र प्राप्ती के लिए एक यग्य
करवाया। जिसके परिणाम सरूप उने अपनी तीन
8
00:00:57,100 --> 00:01:05,680
रा
9
00:01:06,430 --> 00:01:10,850
जो दश्रत की पहली पत्नी कौशल्या से जन्मे
थे।
10
00:01:10,850 --> 00:01:17,830
जब जब धर्ती पर संकट आया है, तब तब उसके
उद्धार
11
00:01:17,830 --> 00:01:24,130
के लिए भगवान विश्णू ने अवतार लिया है।
भगवान विश्णू के दस अवतारों में से
12
00:01:24,130 --> 00:01:28,310
राम उनके साथमें अवतार माने जाते हैं।
13
00:01:28,310 --> 00:01:34,880
जब राम प उस समय रावन की शक्तियों ने
14
00:01:34,880 --> 00:01:41,840
संसार में हाहाकार मचा रखा था। रावन के
मामा मारीज और राक्षसी ताड़का ने अयोध्या
15
00:01:41,840 --> 00:01:48,080
की सीमा के पार जंगल में रह रहे
ब्रह्मरिशे विश्वमित्र और अन्य साथों को
16
00:01:48,080 --> 00:01:51,360
किया हुआ था। वो हर दिन उनके यग्यों में
17
00:01:51,360 --> 00:01:56,080
वि
18
00:02:04,970 --> 00:02:11,970
ओम अग्नि मीले पुरोहितं यद्न्यत्य देवं
रुत्विजं होतारं
19
00:02:11,970 --> 00:02:18,430
रत्नधातमं ओम अग्नले त्वाहा इदं नमः अग्नि
20
00:02:18,430 --> 00:02:24,730
पूर्वे भिरुशि भिरीड्यो नूतनै रुत सदेवां
एह वक्षती
21
00:02:24,730 --> 00:02:31,030
ओम अग्नले त्वाहा इदं नमः अग्नि नारै
मश्णवत्
22
00:02:31,180 --> 00:02:38,040
ओषमेव दिवे दिवे यशतं वीरवत्तमं ओषमेव
दिवे
23
00:02:38,040 --> 00:02:42,740
यशतं वीरवत्तमं ओषमेव दिवे दिवे यशतं
24
00:02:42,740 --> 00:02:48,820
वीरवत्तमं
25
00:03:04,330 --> 00:03:10,110
ए पालन हार भगवान विश्वनू, क्या यहाँ ऐसा
कोई नहीं जो हम रिशियों को इस विपत्ती से
26
00:03:10,110 --> 00:03:11,110
बचाएं?
27
00:03:12,850 --> 00:03:19,510
उसका नाम है राम, अयोध्या नरेश का जेष्ट
पुत्र वही तुम्हारी रक्षा करेगा.
28
00:04:16,490 --> 00:04:23,050
मैं धन्य हुआ महराज. आपके चरण पड़ते ही
आयोध्या राजभवन धन्य हो गया. आग्या करें
29
00:04:23,050 --> 00:04:29,910
प्रभू, मेरे लिए क्या आदेश है? हे सूर्य
पुत्र कुल भूषण महराज दश्रत, राक्षसों ने
30
00:04:29,910 --> 00:04:33,810
हमारी तपो भूमी को तहस नहस कर दिया है.
रिशी जन संकट में है
31
00:04:44,270 --> 00:04:50,250
मैं स्वयं चल कर उन राक्षसों को धर्ती से
मिटा दूँगा। ये ईश्वर का आदेश है राजन। इस
32
00:04:50,250 --> 00:04:56,910
आदेश को तुम ठुकरा नहीं सकते हैं। महराज,
राम और लक्षमन को दम्मर्शि विश्वमित्र के
33
00:04:56,910 --> 00:05:00,230
साथ जाने का आदेश दीजिये। ये स्वयं
दिव्यास्त्रों के
34
00:05:15,180 --> 00:05:21,180
प्रम्मरिशे, हम आपको अपनी आँखों के तारे
सौप रहे हैं। आपके मार्गदर्शन में ये और
35
00:05:21,180 --> 00:05:27,800
सक्षम बनेंगे। कल्याण हो महाराश दश्रत।
आपका ये निर्णे पूरे संतार की रक्षा
36
00:05:27,800 --> 00:05:31,480
हम अपने पिता के समान ही आपकी आग्या का भी
पालन करेंगे
37
00:06:01,230 --> 00:06:06,770
राम नक्ष्मन, एक समय ये बड़ा ही सुन्दर
उपूवन था, परन्तु अब ये नष्ट हो गया है,
38
00:06:06,770 --> 00:06:12,490
क्योंकि बहुती क्रूर, भयानक, नरभक्षी,
राक्षती ताड़का, उसके पुत्र मारीच और उनकी
39
00:06:12,490 --> 00:06:15,450
दुष्ट राक्षतों की टोली के उत्पाद से यहां
सब कुछ
40
00:06:15,450 --> 00:06:30,210
उज
41
00:06:29,720 --> 00:06:35,580
हमारे बाद तुहरा हमारे
42
00:06:35,580 --> 00:06:41,200
बाद
43
00:06:41,200 --> 00:06:42,700
तुहरा
44
00:07:33,740 --> 00:07:36,200
पेजी दिना कानम शब्द में पोज़े रदनाते हैं
45
00:08:14,960 --> 00:08:21,620
राम लक्ष्मन, बहुत वर्ष पूर्व यही इसी
स्थान पर हमारी कड़ी तपस्या से प्रसन्न
46
00:08:21,620 --> 00:08:28,460
होकर देवताओं ने हमें भिन्न -भिन्न प्रकार
के तिव्यास्त्र दिये। अब समय आके
47
00:08:28,460 --> 00:08:33,220
आये कि हम इन दैवी अस्त्रों को योग्य
उत्राधिकारी को सौपे।
48
00:08:33,220 --> 00:08:39,380
इन्हें
49
00:08:39,380 --> 00:08:42,416
त्व
50
00:08:50,890 --> 00:08:55,930
अब ये तुम्हारे हैं। योग्यत समय पर इनका
उपयोग करो।
51
00:08:55,930 --> 00:09:14,690
ये
52
00:09:14,690 --> 00:09:19,610
वही है। इसी ने मेरी मा को मारा है। मैं
इसकी हत्या...
53
00:09:20,650 --> 00:09:23,350
अपनी मां की मृत्यु का प्रतिशोत लूँगा।
54
00:10:01,450 --> 00:10:06,390
इतनी जल्दी दिव्यास्त्रों का प्रयोग आपने
कैसे सीखा भाईया? ये दिव्यास्त्र समय आने
55
00:10:06,390 --> 00:10:08,210
पर अपने आप संचालित होते हैं.
56
00:10:08,770 --> 00:10:12,050
इनके उप्योग के लिए शिक्षा की कोई
आवश्यक्ता नहीं.
57
00:10:13,870 --> 00:10:17,550
गुरुदेव मुझे बताईए की इस चक्र का प्रयोग
कैसे करते हैं? �
58
00:10:44,970 --> 00:10:47,770
पत्रत्यंचा कड़ाएगा महराज
59
00:11:45,770 --> 00:11:49,510
और अब अयोध्या के राजकुमार राम
60
00:12:18,380 --> 00:12:19,380
कर दो
61
00:13:08,180 --> 00:13:15,120
समय बीतने के साथ साथ अयोध्या नगरी और
विक्सित और सम्रिध हो गई। राम प्रजा के
62
00:13:15,120 --> 00:13:21,500
प्रिय राजकुमार और होने वाले राजा थे।
चारो भाईयों में बड़ा प्रेम था और सबका
63
00:13:21,500 --> 00:13:28,460
भविश्य उज्जवल दिख रहा था। मेरे प्रिय
जनों,
64
00:13:28,460 --> 00:13:30,040
आज हमने नीन में सु�
65
00:13:32,510 --> 00:13:39,050
गुरु वशिष्ट ने उसे किसी संकट के आगमन का
संकेत माना है। साथ ही हमारा
66
00:13:39,050 --> 00:13:44,370
स्वास्थ गिर रहा है। शरीर बुढ़ा हो रहा
है। अब हम दुष्टों के आक्रमण का सामना
67
00:13:44,370 --> 00:13:51,330
कर सकते हैं। हमने निर्णय लिया है कि हम
राम को अपना सिंघासन सौंप दें। राम
68
00:13:51,330 --> 00:13:55,952
अय
69
00:14:01,740 --> 00:14:06,880
लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास
करना हमें तुम पर विश्वास है आपने जो
70
00:14:06,880 --> 00:14:12,700
आदर्श थापित किये हैं मैं उन पर खरा उतरने
का प्रयास करूँगा आयोध्धा की जैहो राजा
71
00:14:12,700 --> 00:14:16,920
दर्शरत की जैहो राजकुमार राम की जैहो
72
00:14:16,920 --> 00:14:27,360
चोर
73
00:14:27,360 --> 00:14:34,240
मत मचाओ उड़ो यहां ते अरे मंथरा, चिड़ियों
को क्यों आप शब्द बोल
74
00:14:34,240 --> 00:14:35,240
रही हो?
75
00:14:35,280 --> 00:14:42,080
महरानी कह कही, राज में अन्होनी होने वाली
है, और आप है कि यहाँ शुंगार
76
00:14:42,080 --> 00:14:45,360
करवा रही है? मंथरा, ऐसा क्यों बोल रही हो
तुम?
77
00:14:49,200 --> 00:14:53,400
क्या तुम्हें पता नहीं मंथरा, कल हमारे
प्रियाराम का राज्यविशेक ह
78
00:15:00,560 --> 00:15:07,040
इतनी भोली है, थोड़ा सोचिये, महाराज ने
चलाकी से आपके साथ
79
00:15:07,040 --> 00:15:12,500
विश्वागात किया है। अपनी जीव पर नियंतरन
रखो, हम महाराज के लिए अनुचित शब्द नहीं
80
00:15:12,500 --> 00:15:18,880
सुन सकते। परन्तु, राजकुमार भरत को महाराज
ने अभी दूर क्यों भेजा, और
81
00:15:18,880 --> 00:15:19,620
राज्या
82
00:15:19,620 --> 00:15:30,540
भ
83
00:15:30,490 --> 00:15:37,370
कहीं महराज को ये सुझाओ कोशलिया ने दिया
होगा। आप जानती हैं कि आप महराज की प्रिय
84
00:15:37,370 --> 00:15:43,910
राणी हैं। इसलिए कोशलिया आप से इश्चा करती
है। क्यूंकि आप सबसे सुन्दर हैं। वस्त
85
00:15:43,910 --> 00:15:50,550
हैं और जवान हैं। तो मुझे क्या करना
चाहिए। आप इस
86
00:15:50,550 --> 00:15:52,430
मंतरा की चतु
87
00:16:18,540 --> 00:16:19,740
क्या हुआ महरानी?
88
00:16:21,960 --> 00:16:27,480
ऐसे शुब समय में आपका ये क्रोध से भरा
अशुब रूप क्या समस्या है? हम से तो कहिए.
89
00:16:27,980 --> 00:16:29,500
महराज क्या आपको याद है?
90
00:16:29,940 --> 00:16:33,020
सालों पहले जब आप युद्ध में घायल हो गए
थे,
91
00:16:33,040 --> 00:16:41,920
तब
92
00:16:41,920 --> 00:16:44,520
मैंने ही आपको वहाँ से सुरक्षित निकाला
था.
93
00:16:44,840 --> 00:16:48,680
और आपने मुझे दो वर्दान देने का वचन दिया
था।
94
00:16:48,680 --> 00:16:55,500
आज मुझे मेरे वो दो वर्दान
95
00:16:55,500 --> 00:17:02,280
चाहिए। वो भी अभी। केवल दो वर्दान। यदि आप
चाहें तो और भी ले
96
00:17:02,280 --> 00:17:08,500
सकती हैं। नहीं। मुझे मेरे वो दो वर्दान
ही चाहिए। मेरा पहला वर्दान है।
97
00:17:08,500 --> 00:17:11,440
नहीं। य
98
00:17:14,960 --> 00:17:21,859
इसके बदले चाहो तो तुम पूरी संपत्ती ले
लो। नहीं। फिर संसार कहेगा कि सूरे वंश का
99
00:17:21,859 --> 00:17:28,820
एक राजा वचन देकर मुकर गया। इसलिए या तो
मुझे मेरे दो वरदान दीजिये या अपना यश
100
00:17:28,820 --> 00:17:35,380
कलंकित कीजिये। पहला वरदान था
101
00:17:35,380 --> 00:17:38,560
कि कैकई के पुत्र भरत को राजा
102
00:17:43,790 --> 00:17:50,390
वो भी 14 वर्ष के लिए भाईया, आप लोगों की
पुकार सुन रहे हैं ना
103
00:17:50,390 --> 00:17:55,990
लक्ष्मन, मेरे भाग्य में यही लिखा है
किन्तु भाईया, क्या हमें भाग्य का लिखा
104
00:17:55,990 --> 00:18:00,790
चुप बैठ जाना चाहिए और ये तलवार, क्या
केवल एक अभिनेता के अभिने का सामान है
105
00:18:00,790 --> 00:18:05,470
भा
106
00:18:16,220 --> 00:18:21,520
पति पत्नी के कर्तवे अलग नहीं हो सकते हम
सुख दुख में समान भागिदार हैं सत्य वचन
107
00:18:21,520 --> 00:18:28,400
अगर आत्मा एक है तो भाग्य भी एक ही होगा
इसलिए भाईया मैं भी आप दोनों
108
00:18:28,400 --> 00:18:32,840
के साथ चलूंगा ठीक है
109
00:18:46,710 --> 00:18:53,270
मा, ये चौदे साल यूँ ही देखते देखते ही
भीच जाएंगे. मैं फिर लोट कर इसी तरहें
110
00:18:53,270 --> 00:18:54,270
आशिर्वाद लूँगा.
111
00:18:55,070 --> 00:18:56,970
अवश्य मेरे लाल. राम,
112
00:18:57,830 --> 00:19:08,830
तुम
113
00:19:08,830 --> 00:19:13,890
वन जाने को क्यों मान गए? तुमने मेरा
विरोध क्यों नहीं किया? शायद इससे मेरा
114
00:19:13,890 --> 00:19:14,890
कम हो जाता.
115
00:19:15,110 --> 00:19:20,850
मुझे ना राज्य चाहिए और ना ही सिंघासन.
मेरे लिए आपका वचन इन सब से बड़ा है,
116
00:19:20,850 --> 00:19:22,570
पिताजी. आशिर्वात दीजे.
117
00:19:22,790 --> 00:19:29,370
मेरे लान, संसार में कौन पिता तुम्हारे
समान संतान पाकर अभिमान न करेगा?
118
00:19:32,170 --> 00:19:35,590
तुम सूरे वंश के गौरव हो, सुरक्षित लोटना.
119
00:19:39,070 --> 00:19:40,070
मंत्री �
120
00:19:43,400 --> 00:19:49,720
राम के वन जाने के लिए हाथी, घोड़े, साज,
सामान सहित संपूर्ण सेना तैयार करो। जैसी
121
00:19:49,720 --> 00:19:54,580
आपकी आग्या। पिताश्री आपके आशिर्वाद से
प्रकृति हमारा ध्यान सुएम रखेगी। सेना की
122
00:19:54,580 --> 00:19:57,640
कोई आवश्यकता नहीं है। वन में राज्य की
सेना का क्या काम?
123
00:20:03,780 --> 00:20:04,780
यही
124
00:20:23,620 --> 00:20:25,900
माता, अपने इस बेटे को आशिर्वात
125
00:20:25,900 --> 00:20:33,900
दीजिये।
126
00:20:33,900 --> 00:20:41,000
प्रिये
127
00:20:41,000 --> 00:20:42,080
अयोध्यावातियों,
128
00:20:42,840 --> 00:20:47,520
मुझे आपसे अपार्थ नहीं है, और जानता हूँ
आपके हिर्दे में भी मेरे लिए प्रेम है।
129
00:20:47,520 --> 00:20:52,430
आपसे निवेदन है कि यही प्रेम आप मेरे भाई
भरत को भी दें। वो आपकी प्रेम का सही
130
00:20:52,430 --> 00:20:58,130
उत्तराधिकारी है और आपसे अयोध्या का राजा
भी मेरे प्यारे अयोध्यावातियों मेरी आप
131
00:20:58,130 --> 00:21:03,310
सभी से विनती है कि ताथ ही आप मेरे दुखी
पिता का भी ध्यान रखना
132
00:21:24,520 --> 00:21:28,300
राजकुमार राम, जल्द लोटियेगा।
133
00:21:28,300 --> 00:21:35,200
राम, मेरे
134
00:21:35,200 --> 00:21:42,040
बच्चे। अपना ध्यान
135
00:21:42,040 --> 00:21:48,120
रखना, राम, लक्ष्मन, इता। आप भी अपना
ध्यान रखना, और हमारे
136
00:21:48,120 --> 00:21:51,600
पिताजी की देखभाल करना। अवश्य राम।
137
00:23:02,689 --> 00:23:09,410
कई महीनों तक महराज तश्रत का महल दुख के
अंधकार में डूबा रहा।
138
00:23:22,010 --> 00:23:27,250
अब महाराज दशरत संसार की कष्टों से मुक्त
हो चुके हैं।
139
00:23:27,250 --> 00:23:34,250
कैकैई के पुत्र भरत, जो अपने नाना
140
00:23:34,250 --> 00:23:39,290
के हाँ कैकैई गहवे थे, उन्हें तुरंद
अयोध्या वापत बुलाया गया।
141
00:24:07,799 --> 00:24:09,180
मा, मा, ये सब क्या है?
142
00:24:09,500 --> 00:24:10,500
कैसे हुआ ये?
143
00:24:10,580 --> 00:24:11,580
उत्र भारत,
144
00:24:12,140 --> 00:24:16,720
मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ. मुझे
बताईए, क्या ये सत्य है? क्या पिताजी का
145
00:24:16,720 --> 00:24:17,720
निधन हो गया है?
146
00:24:19,740 --> 00:24:23,400
ए, भगवान, अर्थात ये सत्य है?
147
00:24:23,680 --> 00:24:27,460
हाँ, परन्तु वो तुम्हें आयोध्या का राज
सौप कर गए हैं. �
148
00:24:35,340 --> 00:24:41,820
पापी नहीं, दुष्ट कुल खोती नहीं। कितने
तुम्हारे मन में यह विश भरा है,
149
00:24:41,860 --> 00:24:48,660
बताओ। वो यही है भाईया। इतनी दुष्टा ने
हमारी माँ को भ्रमित कर, उनके मन में विश
150
00:24:48,660 --> 00:24:55,640
विनाश के बीच भूए। मुझे ख्षमा कर दीजिये,
ख्षमा। मैं केवल
151
00:24:55,640 --> 00:24:59,320
आप द
152
00:25:02,730 --> 00:25:08,210
वरना तुम्हारी लीप के टुकडे टुकडे कर
दूँगा। रुख जाओ ब्राता, इसकी हत्या करके
153
00:25:08,210 --> 00:25:14,850
वंश की तलवार अपवित्र मत करो। आज से तुम
मेरी मा नहीं हो और ये बात पूरे संसार को
154
00:25:14,850 --> 00:25:20,850
पता चलेगी। शमा कर दो पुत्र, मुझे से भूल
हो गई, अपनी म
155
00:25:37,530 --> 00:25:38,530
क्या?
156
00:25:39,170 --> 00:25:41,590
ये तुम क्या कह रहे हो भरत?
157
00:25:41,850 --> 00:25:44,250
हमारे पिताजी स्वर्ग से धार गए?
158
00:25:45,190 --> 00:25:48,670
भाईया, ये हम सब के लिए कठिन समय है.
159
00:25:56,570 --> 00:26:03,310
पिताजी, पिताजी, मुझे एकशमा कर दीजिये
पिताजी. आपके अंतिम समय मैं आपके
160
00:26:03,310 --> 00:26:04,310
साथ नहीं था.
161
00:26:04,570 --> 00:26:06,810
भाईया, मैं एकशमा चाहता हूँ.
162
00:26:07,050 --> 00:26:12,110
मेरी महा के सारे शडियंत्रों के लिए आप
वापस अयोध्या चलिए। उस सिंहासन पर केवल
163
00:26:12,110 --> 00:26:18,730
ही अधिकार है। भरत, अब प्रश्न ये नहीं है
कि माता कही ने क्या किया। याद रखो, ये
164
00:26:18,730 --> 00:26:23,310
हमारे महा अन्स्वर्गिय पिता का आधेश था कि
मैं चौदर वर्षवन में �
165
00:26:36,970 --> 00:26:39,430
मैं केवल आपका प्रतिनिधी बनकर राज करूँगा.
166
00:26:39,710 --> 00:26:41,370
अपनी पादुका दीजिये.
167
00:26:44,850 --> 00:26:50,190
अपने भाई को आशिर्वाद दीजिये भाईया, ताकि
मैं आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतर सको.
168
00:26:54,610 --> 00:27:01,470
मैं अगले चौदा
169
00:27:01,470 --> 00:27:04,990
सालों तक राजकात संभालूंगा, जब तक आप वापत
नहीं आते.
170
00:27:06,160 --> 00:27:08,480
मेरे प्यारे भाई भाईया
171
00:28:17,740 --> 00:28:24,300
महामंत्री प्रहस्तु तुम्हारी इस तरह अजानक
यहां आने का कारण। महाराज, सभी रिशी मुनी
172
00:28:24,300 --> 00:28:30,660
दंडक वन और अपने अपने आश्रमों में वापत
लोट रहे हैं। उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा
173
00:28:30,660 --> 00:28:33,940
हमारी गुप्तचरुं का कहना है कि इसका कारण
है
174
00:28:33,940 --> 00:28:47,620
आयोध्या
175
00:28:47,610 --> 00:28:54,070
सत्य है महाराज, परन्तु इससे पहले कि देर
हो जाए हमें कुछ करना होगा। ओ
176
00:28:54,070 --> 00:28:56,490
राम, मैं तुमसे मिलने के लिए उताब...
177
00:31:10,700 --> 00:31:16,860
राजगृहं वा उटजम दीनं सघनत तरीके
178
00:31:38,280 --> 00:31:45,160
रावन की छोटी बेहन शूर्प नखा एक सुन्दर
महिला का भेश बना कर राम को लुबाने के लिए
179
00:31:45,160 --> 00:31:50,580
पंचवटी में आती है। राम, मैं हूँ शूर्प
180
00:31:50,580 --> 00:31:57,240
नखा। ओ राम,
181
00:31:57,280 --> 00:32:03,740
तुम कितने सुन्दर हो और कितने शक्ति शाली
हो। मैं तुम से विवा करना चाती हूँ।
182
00:32:06,090 --> 00:32:10,370
मैं तुम्हारी इच्छा का सम्मान करता हूँ,
किन्तु सीता के रहते तुमसे विवा नहीं कर
183
00:32:10,370 --> 00:32:16,650
सकता। तुम मेरे भाई लक्ष्मन से पूछ लो, वो
भी बहुती सुन्दर और शक्तिशाली है।
184
00:32:16,650 --> 00:32:21,890
ये भी कम सुन्दर नहीं है। जब तुम्हें
भाईया राम पसंद है, और
185
00:32:21,890 --> 00:32:34,070
तुम
186
00:32:34,070 --> 00:32:40,740
� आओ पहले मैं आपका परिचे करा दूँ ये है
मेरी पतनी सीता बहुत हो गया लगता है मुझे
187
00:32:40,740 --> 00:32:45,060
आब अपने अजली रूप में आना ही बड़ेगा अगर
मैं सीता को मार दूँ
188
00:33:20,990 --> 00:33:22,230
क्या हुआ तुम्हें?
189
00:33:22,550 --> 00:33:25,670
अरे शुर्पनखा, ये क्या? ये किसने किया?
190
00:33:28,850 --> 00:33:34,890
राम, क्या हयोध्या के उस तुछ और वनवासी
राजकुमार राम ने तुम्हारी ये तुरदशा की?
191
00:33:50,320 --> 00:33:56,860
चिंता मत करो मेरी बेहन उसे तो मैं टुकड़े
टुकड़े करके चील कववों को खिला दूँगा
192
00:33:56,860 --> 00:33:59,920
प्रहरस्त मेरे भाई कुम कर्ण को जगाओ
193
00:34:24,710 --> 00:34:30,090
महाराज वही हुआ जिसका मुझे डर था। कुम्भ
करण अगले छै महिने तक नहीं जागने वाली।
194
00:34:30,090 --> 00:34:36,790
काश, काश मैं उस सीता की सुन्दर्ता नश कर
पाती। क्या सच में, वो इतनी सुन्दर
195
00:34:36,790 --> 00:34:42,230
है। उसके जैसी सुन्दर त्री पूरे संसार में
नहीं है भाईया।
196
00:34:42,230 --> 00:34:46,489
वो स्वर्ट क
197
00:35:04,680 --> 00:35:09,800
अगर उसके कोई योग्य है तो वो तुम हो भाईया
और कोई नहीं
198
00:35:42,640 --> 00:35:47,840
रावन अपने मामा मारीज के साथ सीता का अभरन
करने निकलता
199
00:35:47,840 --> 00:36:07,088
है।
200
00:36:29,710 --> 00:36:36,530
इतना प्यारा है, क्या ये सत्य है, या मेरी
आँखों का दोखा, ऐसा मनमोहक हिरन तो मैंने
201
00:36:36,530 --> 00:36:42,170
पहले कभी नहीं देखा, स्वामी, आप इसे मेरे
लिए पकड़ सकते हैं, क्यों नहीं, अवश्य,
202
00:36:42,350 --> 00:36:44,470
लक्ष्मन, तुम सीटा का ध्यान रखना,
203
00:36:44,830 --> 00:36:52,670
भाईया,
204
00:36:52,670 --> 00:36:54,150
इस नर्जन बन में भेज
205
00:36:54,150 --> 00:36:59,690
बद
206
00:37:11,120 --> 00:37:14,060
हो सकता है ये दिव्य हिरन भी कोई राक्षत
ही हो।
207
00:37:14,060 --> 00:37:24,100
मुझे
208
00:37:24,100 --> 00:37:30,540
ये तो ज्याद था कि तुम मुझे मार दोगे,
लेकिन अब तुम्हारी प्रिय सीता का क्या
209
00:37:41,320 --> 00:37:45,900
वो अवश्य किसी संकट में है। तुरंत उनकी
सहायता करो। आप चिंता ना करें माते। कोई
210
00:37:45,900 --> 00:37:49,600
संकट उन्हें छूँ भी नहीं सकता। ये क्या कह
रहे हो लक्ष्मर। तुम चाहते हो उनकी
211
00:37:49,600 --> 00:37:54,560
मृत्यू हो जाए। मैं आपकी ब्याकुलता समझता
हूँ। जैसी आपकी आग्या।
212
00:37:54,560 --> 00:38:07,220
म
213
00:38:07,770 --> 00:38:12,170
मेरी अनुपस्थिति में इस रेखा को पार ना
करें इसके भीतर आप सुरक्षित हैं आज्या
214
00:38:12,170 --> 00:38:22,390
सब
215
00:38:22,390 --> 00:38:25,050
कुछ मेरी योजना अनुसार ही हो रहा है
216
00:39:14,720 --> 00:39:16,920
ये लीजिये रुशिवार
217
00:39:16,920 --> 00:39:23,720
ये कैसी रिखा है किसी ने
218
00:39:23,720 --> 00:39:28,620
तुम्हारी सुरक्षा के लिए बनाई है। मैं ऐसे
पार नहीं कर सकता, पर तुम कर सकती हूँ।
219
00:39:28,620 --> 00:39:35,480
आगे आओ। नहीं, कदापी नहीं। देवी भूख है,
साधु का निरादर मत करो,
220
00:39:35,540 --> 00:39:41,000
उसे भोजन दो। अन्यता तुम्हारे पिता और
ससुर के वंशों का सर्वनाश हो ज
221
00:39:50,410 --> 00:39:55,310
बिना संकोच हमें भिक्षा दो और हमारा
आशिर्वाद राप करो।
222
00:40:20,880 --> 00:40:24,540
तुम यहाँ क्या कर रहे हो? सीता को अकेले
क्यों छोड़ाए? आपकी छीक सुनकर उन्होंने
223
00:40:24,540 --> 00:40:29,240
के लिए विवश किया. ये क्या किया? उस
राक्षत ने जान भूचकर तुम्हें मेरी आवाज
224
00:40:29,240 --> 00:40:30,019
पुकारा था.
225
00:40:30,020 --> 00:40:33,220
मुझे अनुनी की आशंका हो रही है. चलो जल्दी
से सीता के �
226
00:42:09,390 --> 00:42:16,050
हमारे साथ छल हुआ है। सीता को अकेली पाकर
कोई दुष्ट उसे हर ले गया है।
227
00:42:16,050 --> 00:42:23,010
लक्षमन मैं उस दुष्ट को पाताल से भी खोज
निकालूँगा। वो चाहे ब्रह्मान्ड
228
00:42:23,010 --> 00:42:29,350
के किसी भी कोने में छपा हो। मैं उसे पकड़
कर लाऊंगा। और उसे नष्ट कर
229
00:42:29,350 --> 00:42:30,870
दूँगा। �
230
00:42:38,160 --> 00:42:43,440
और आज आप स्वयं क्रोध में अपना धैर्य खो
रही हैं। शांत मन से सोचिये कि हमें क्या
231
00:42:43,440 --> 00:42:49,480
करना चाहिए। ठीक कहा। तुम धैर्यवान हो
लक्ष्मन। अब
232
00:42:49,480 --> 00:42:56,000
तुम्हें मुझे कोई रास्ता दिखाओ। अब से
जैसा तुम कहोगे मैं वैसा ही करूँगा।
233
00:42:56,000 --> 00:42:57,000
लक्ष्मन,
234
00:42:57,080 --> 00:43:05,392
मुझ
235
00:43:20,040 --> 00:43:26,820
चमा करे राम, मेरे फ्रिंद पंखुस दुष्ट का
सामना नहीं कर सके और वो सीता
236
00:43:26,820 --> 00:43:33,200
को ले गया। नहीं जटायू, तुम अपने आपको दोश
मत दो,
237
00:43:33,300 --> 00:43:37,860
तुमने तो मेरी पतनी की रक्षा करने के लिए
अपने प्राणों की भी परवा नहीं की। हिम्मत
238
00:43:37,860 --> 00:43:40,440
ना हारे राम, आपको सीता �
239
00:44:10,670 --> 00:44:15,550
ध्यान से सुनो। किसी ने भी सीता को हानी
पहुंचाई तो हम उसे मृत्यु दंड देंगे। ये
240
00:44:15,550 --> 00:44:22,130
लंका की होने वाली महाराणी है। इनका ध्यान
रखा जाए। स्रीजटा। मेरे लिए क्या आग्या
241
00:44:22,130 --> 00:44:26,330
है महाराज। हम सीता की सुरक्षा का दायित्व
तुम्हें सौंपते हैं। �
242
00:45:03,880 --> 00:45:10,220
इन दिनों की चुबन से बड़ा है मेरी भूख का
दर्द। तुम्हें खाने के लिए मती है तो...
243
00:46:18,959 --> 00:46:21,120
सुगरीव, वो कौन है?
244
00:46:27,320 --> 00:46:31,440
यहाँ तो जील है। लक्ष्मन, अब हम क्या
करें?
245
00:46:32,000 --> 00:46:38,060
भाईया, वहाँ कोई दिख रहा है। चलिए उससे
सुगरीप के बारे में पूछते हैं। हाँ, ठीक
246
00:46:38,060 --> 00:46:42,320
रुकिये।
247
00:46:44,750 --> 00:46:49,470
कपड़े तो आपने मुनियों के पहने हैं, लेकिन
आप दुनों के चेहरे से राज कुमारों का
248
00:46:49,470 --> 00:46:54,990
अभास होता है। प्रकृति भी हमारे साथ
अद्भुत खेल खेलती है। और हम सबको उस खेल
249
00:46:54,990 --> 00:46:59,870
अलग -अलग पात्र निभाने का अवसर मिलता है।
जैसे किसी रंग मंच की
250
00:46:59,870 --> 00:47:13,730
कटप
251
00:47:13,690 --> 00:47:18,410
मेरी पत्नी सीता को खोज रहे हैं। किसी
दुष्ट राक्षत ने उसका हरण कर लिया है। हम
252
00:47:18,410 --> 00:47:22,590
नहीं जानते कि वो उसे कहां ले गया। मैंने
अवश्य कुछ पुन्ने किये होंगे जो मुझे
253
00:47:22,590 --> 00:47:28,010
साक्षात अयोध्या के राजकुमार राम के दर्शन
हुए। आपको अपना
254
00:47:28,010 --> 00:47:39,810
परिचे
255
00:47:39,810 --> 00:47:40,810
क
256
00:47:41,280 --> 00:47:48,160
मार्ग दर्शक बन कर हमारे सामने आ गए हैं।
राम, लक्ष्मन, जिन महराज दर्शरत
257
00:47:48,160 --> 00:47:52,640
का नाम पूरे संसार में आदर से लिया जाता
है। उनके पुत्र राम, लक्ष्मन से मिलना
258
00:47:52,640 --> 00:47:57,320
लिए सम्मान की बात है। ये भी एक संयोग ही
है कि कुछी दिन पहले मैंने एक पुकार स�
259
00:48:11,530 --> 00:48:16,470
जब वो चीख रही थी, एक छोटी सी पोटली भी
उसने नीचे फेकी थी, जिसे हमने संभाल कर
260
00:48:16,470 --> 00:48:18,250
है. कहाँ है वो? कहाँ है वो?
261
00:48:21,710 --> 00:48:28,490
ओ, ये देखो लक्ष्मन, ये सीता का ही वस्तर
है, ये
262
00:48:28,490 --> 00:48:33,730
कंगन और ये मनी भी. ओ, सीता, पेरी सीता.
263
00:48:34,550 --> 00:48:37,210
धीरज रखे भाईया. राम, अभी ये शो
264
00:48:39,130 --> 00:48:45,130
शीगर ही कोई निर्णय लेना होगा मैं सीता को
बचाने का हर संभाव प्रयास करूँगा
265
00:48:45,130 --> 00:48:51,330
मैं आपकी पीड़ा समझ सकता हूँ क्योंकि मैं
भी उसी पीड़ा से जूज रहा हूँ मेरा भाई
266
00:48:51,330 --> 00:48:57,050
बाली उसने मुझसे मेरा राज्य छीन लिया और
साथ ही मेरी पत्नी को भी आज
267
00:48:57,050 --> 00:49:03,830
यदि अपने समस्त संसाधनों का उपयोग करके
सीता मैया की
268
00:49:03,830 --> 00:49:08,710
खोज में लग जाता। आईए, आज से हम दोनों
मित्रता के बंधन में बंध कर ये प्रण लेते
269
00:49:08,710 --> 00:49:13,390
हैं। ये अपने अपने बल के अनुसार एक दूसरे
की सहायता कर सभी कश्टों को दूर करेंगे।
270
00:49:13,390 --> 00:49:15,050
अवश्य, ऐसा ही होगा
271
00:49:25,360 --> 00:49:31,020
आज से यही मेरा प्रथन धर्म है, जिसका पालन
करते हुए मैं आपकी सहायता की शपत लेता
272
00:49:31,020 --> 00:49:37,840
हूँ। मैं भी शपत लेता हूँ। राम ने सुगरीव
को दिया वचन निभाया, और
273
00:49:37,840 --> 00:49:42,680
शक्तिशाली बाली से युद्ध किया। बाली युद्ध
में पराजित हुआ, और सुगरीव
274
00:49:42,680 --> 00:49:52,560
को
275
00:49:58,250 --> 00:50:04,530
और बारिश बंध होने के बाद जब मौसम साफ हुआ
तो रिश्य मुख बार के पानी से घिरा हुआ एक
276
00:50:04,530 --> 00:50:11,290
द्वीप जैसा लग रहा था और तभी सुगरीव ने
अपनी विशाल वानर सिना
277
00:50:11,290 --> 00:50:16,070
बुलाई जब तुम्हें सीता मिल जाए तो उसे ये
अभूशन दे देना ताकि वो
278
00:50:16,070 --> 00:50:18,576
तुम
279
00:50:38,280 --> 00:50:42,660
ये हमारा राज सी आभूशन है, इसे जाकर सिता
को दिखा दिना।
280
00:50:42,660 --> 00:50:52,180
वानर
281
00:50:52,180 --> 00:50:58,580
राज तुब्रीव ने भी राम को दिया वशन निभाटे
गए, सभी दिशाओं में अपने खोजी दल भेजे।
282
00:51:36,190 --> 00:51:41,930
देखो, वहाँ, उस दिशा में, कुछ पक्षी वहाँ
से निकल रहे हैं, हो सकता है कि वहाँ जल
283
00:51:41,930 --> 00:51:44,690
हो. हाँ, वहाँ जल हो सकता है, चलो सब वहीं
चलते हैं.
284
00:52:26,590 --> 00:52:33,030
उनको मुझे थोड़ी रोटने दिखना ही है शेद
वहाँ रात्ता हो सकता है जल्दी चलो
285
00:52:39,330 --> 00:52:45,810
दक्षिन की ओर के दल का नित्रित्व करने
वाले हनमान की धेंद, रावण के हाथों मारे
286
00:52:45,810 --> 00:52:51,270
पक्षीराज जटायू के भाई संपाती से हुई। ये
हम कहां आ गए?
287
00:52:59,370 --> 00:53:04,110
क्या आप जटायू के बड़े भाई संपाती हैं?
288
00:53:10,800 --> 00:53:16,040
मैं संपाती ही हूँ. क्या आप लोग मेरे भाई
को जानते हैं?
289
00:53:16,260 --> 00:53:19,400
कैसा है मेरा भाई जटायू?
290
00:53:19,760 --> 00:53:22,000
वो ठीक तो है न?
291
00:53:22,640 --> 00:53:26,340
वीर जटायू का स्वर्गवास हो चुका है.
292
00:53:31,480 --> 00:53:38,040
क्या इससे बड़ा कोई दुख हो सकता है कि
बड़े
293
00:53:38,040 --> 00:53:39,240
भाई के...
294
00:53:39,610 --> 00:53:46,130
जीते जी, छोटे भाई की बृत्यो हो जाए। वीर
295
00:53:46,130 --> 00:53:52,870
जटायू बहुत ही पराक्रमी और साहसी थे। उस
कप्ती दुष्ट रावन थे मा थीता
296
00:53:52,870 --> 00:53:59,830
को बचाने के प्रयास में लड़ते लड़ते
उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
297
00:53:59,830 --> 00:54:03,390
तुमने रावन कहा, यही कहा
298
00:54:04,520 --> 00:54:11,520
अगर मुझे पता होता कि रावन ने मेरे भाई को
मारा, तो मैं कभी भी उस दुष्ट को यहां से
299
00:54:11,520 --> 00:54:13,520
उड़कर नहीं जाने देता.
300
00:54:13,860 --> 00:54:20,360
क्या यहीं से उड़कर गया था वो? हाँ, तुम
सब को समुद्र पार
301
00:54:20,360 --> 00:54:25,480
वो द्वीद दिख रहा है, वही है लंका.
302
00:54:26,540 --> 00:54:29,660
मा सीता को बंदी बना कर उस
303
00:54:29,660 --> 00:54:33,980
दु�
304
00:54:35,450 --> 00:54:41,570
अगर हम सबको समद्रे पार करना है तो उसके
लिए हजारों नाव चाहिए होंगी ये कारे मैं
305
00:54:41,570 --> 00:54:47,390
सकता था परंतु अब मैं बुढ़ा हो गया हूँ
यूवा अवस्था में मैंने 21 बार पृत्वी की
306
00:54:47,390 --> 00:54:54,230
परिक्रमा की थी पर अब जेवल एक है जो इस
कठिन कारे
307
00:54:54,230 --> 00:54:56,350
को कर सकता है और वो ह
308
00:55:01,550 --> 00:55:07,930
फिर उड़ कर उसके पास गए और उसे निगलने का
प्रियास किया था तुम्हारी शक्तियां आपार
309
00:55:07,930 --> 00:55:14,910
हैं परन्तु तुम्हें ग्यात नहीं कि इसका
प्रियोग कैसे करें संसार तुम्हारी
310
00:55:14,910 --> 00:55:20,190
से भैभीत हो गया था परन्तु एक शाप के कारण
तुम अपनी शक्तियों को
311
00:55:30,990 --> 00:55:35,530
समुद्र पार लंका पहुँचकर माता सीता का पता
लगा सकते हो।
312
00:55:35,530 --> 00:55:41,470
ओम। ओम।
313
00:56:39,120 --> 00:56:40,640
जल्द मिलेंगे साथियों
314
00:56:40,640 --> 00:56:47,600
हनुमान सीगर
315
00:56:47,600 --> 00:56:53,280
ही लंका की ओर निकलते हैं रास्ते में
समुद्री राक्षती सिमहिका उन्हें ललकारती
316
00:56:53,280 --> 00:56:57,960
ये क्या है?
317
00:57:36,300 --> 00:57:40,760
यह मैं कहां आ गया यहां से बाहर निकलना
होगा
318
00:58:04,350 --> 00:58:10,950
भयंकर युद्ध में सिमहिका का वद करने के
पश्चार हनुमान बिनाव लंब की लंका की ओर
319
00:58:10,950 --> 00:58:11,950
बढ़ते हैं
320
00:59:05,160 --> 00:59:06,160
हुआ है
321
01:00:11,250 --> 01:00:14,530
किन्तु इतनी बड़ी लंगा में माता सिता को
डून्डू कहते है।
322
01:00:51,140 --> 01:00:57,860
आ, तुम जाग रही हो। सुबह, दुबहर, शाम, हर
समय केवल तुम्हें ही
323
01:00:57,860 --> 01:01:03,240
देखना चाहते हैं। लेकिन तुम हो, जो हमें
देखती भी नहीं। अब हमें लगता है, ये तभी
324
01:01:03,240 --> 01:01:10,180
संभव होगा। जब हम राम का फिर काट कर
लाएंगे। आप बार -बार इसके पास क्यों आते
325
01:01:18,150 --> 01:01:21,810
याद रहे एक वर्ष समाप्त होने में थोड़े ही
दिन बचे है
326
01:01:21,810 --> 01:01:29,990
ऐसा
327
01:01:29,990 --> 01:01:35,390
क्या है तुम्हें जो लंकेश तुम पर इतरे
मोहित है मुझे कुछ विशेश नहीं लगता मैंने
328
01:01:35,390 --> 01:01:40,410
लंकापती से अधिक सुनर किसी को नहीं देखा
पर तेरे पती को देखना चाहूँगी जिस पर तुझे
329
01:01:40,410 --> 01:01:46,320
इ
330
01:02:06,540 --> 01:02:10,880
जननिहं रामदूत हनुमान
331
01:02:10,880 --> 01:02:18,820
चरणवान
332
01:02:46,990 --> 01:02:48,750
मम प्रभु कान
333
01:03:30,440 --> 01:03:35,640
किन्तु करोती सदात अवचिंतन।
334
01:04:06,730 --> 01:04:11,490
मेरे साथ चलिये मा, मैं आपको श्रीराम के
पास ले जाओंगा। मैं तुमारे साथ नहीं जा
335
01:04:11,490 --> 01:04:16,530
सकती। इस राक्षस ने बहुत से लोगों को
बलपूर्वक अपहरण करके लंका में बंदी बना
336
01:04:16,530 --> 01:04:21,110
है। मेरे साथ साथ उन सब का भी यहां से
मुक्त होना आवश्यक है। समझ सक
337
01:04:33,760 --> 01:04:38,980
जाके स्वामी से कहो कि वो जल्दी से मुझे
बचा ले तब तक मैं उनकी राह देखूंगी जो
338
01:04:38,980 --> 01:04:45,620
आग्या माता परन्तु जाने से पहले मैं रावन
और उसके लोगों को सबक सिखा कर
339
01:04:45,620 --> 01:04:46,620
जाओंगा
340
01:05:12,400 --> 01:05:14,420
योधा लग रहा है मेरे लायक।
341
01:05:14,420 --> 01:05:24,820
अगर
342
01:05:24,820 --> 01:05:31,100
मैं योधा का बंदी बन जाओं, तो ये मुझे
सिधा रावन के पार ले जाएगा, और तब रावन
343
01:05:31,100 --> 01:05:35,720
सामने होगा। बचाओ, बचाओ, आगते मेरी रक्षा
करो।
344
01:05:35,720 --> 01:05:42,640
वानर कौन हो तुम, अपना परिचे दो। बताओ
345
01:05:42,640 --> 01:05:48,320
तुम्हें यहाँ किस ने भेजा है।
346
01:05:48,320 --> 01:05:55,280
ए लंकेश रावन, मेरा नाम हनुमान है।
347
01:05:55,280 --> 01:06:01,640
मैं वानर राज सुग्रीम और उनके मित्र
योध्या के राजकुमार प्रभू श्री राम का दूद
348
01:06:01,640 --> 01:06:07,240
यहाँ आपके सामने उपस्थित हुआ हूँ। आपने
माता सीता का फरण करके ए
349
01:06:08,520 --> 01:06:14,340
गृणित और धर्म विरुद्ध कार्य किया है।
जिसके कारण आपका और आपकी समस्त राक्षस
350
01:06:14,340 --> 01:06:21,140
का विनाश निश्चित है। इसलिए एकशमा मांग कर
माता सीता को सम्मान के साथ प्रभू
351
01:06:21,140 --> 01:06:28,120
श्रीराम को लोटा दो। मार दो इसे। भाईया,
राजनीती के अनुसार हम
352
01:06:28,120 --> 01:06:38,500
किसी
353
01:06:38,010 --> 01:06:44,870
तो हम अपने शत्रु को यहां तक कैसे लेकर
आएंगे। ठीक है, इसकी पूंच
354
01:06:44,870 --> 01:06:50,470
में आग लगा दो और छोड़ दो इसे।
355
01:06:50,470 --> 01:06:56,930
अरे क्या किया, मेरी पूंच जवादी, मेरी
पूंच, मेरी
356
01:06:56,930 --> 01:06:58,970
पूंच, अरे कहा जाओ।
357
01:07:51,710 --> 01:07:58,210
लंकेश, आपसे मेरी प्रार्थना है कि सीता को
वापस राम के पास भेज दीजिये। अन्यथा लंका
358
01:07:58,210 --> 01:08:05,170
का सर्वनाश कोई नहीं रोग सकता। विभीचन,
अगर तुम्हारे सिवा किसी
359
01:08:05,170 --> 01:08:10,790
और ने ये कहा होता, तो उसका सर कटकर हमारे
पैरों में पढ़ा होता। मैं लंकापती
360
01:08:10,790 --> 01:08:21,450
राव
361
01:08:21,200 --> 01:08:23,180
निकल जाओ विश्वास खाती।
362
01:08:23,180 --> 01:08:35,500
शान्त
363
01:08:35,500 --> 01:08:41,800
हो जाओ, शान्त हो जाओ, ये सोचो कि हम
समुद्र पार कैसे जा सकते हैं। इसके लिए
364
01:08:41,800 --> 01:08:46,090
हजारों नाओ की आवश्चक्ता होगी। हमें
समुत्र पर फूल बनाना चाहिए। तुम्हें पता
365
01:08:46,090 --> 01:08:50,410
इतना लंबा फूल बनाने में हमें कितने वर्ष
लग जाएंगे। बात केवल माता सीता को ही
366
01:08:50,410 --> 01:08:56,370
बचाने की होती। तो पलक जपकते ही मैं लंका
जाता और माता को ले कर आ जाता। हमें केवल
367
01:08:56,370 --> 01:08:57,229
सीता को ही नहीं
368
01:08:57,229 --> 01:09:11,370
बचाना
369
01:09:18,380 --> 01:09:22,620
ये बहुत अच्छे व्यक्ति हैं। लंका में
इन्होंने मेरे प्राणों की रक्षा की थी।
370
01:09:22,620 --> 01:09:27,200
निश्कपट सौभाव स्वैम मैंने अपनी आखों से
देखा है। इनके हमारे साथाने में मुझे कोई
371
01:09:27,200 --> 01:09:33,240
दोश नहीं दिखता। मैं हनुमान से पूर्णत है
सहमत हूँ। हमारे �
372
01:09:49,960 --> 01:09:55,780
राम ने दिन रात जार्थना करते हुए साथ
दिनों तक समुद्र देवता का आभान
373
01:09:55,780 --> 01:10:02,460
किया। तब आठवे दिन
374
01:10:02,460 --> 01:10:05,040
समुद्र देव स्वेम प्रकट हुए।
375
01:10:25,230 --> 01:10:31,790
धर्म रक्षक राम, अपनी सेना से कहिए कि वो
पत्थरों पर आपका नाम लिख कर
376
01:10:31,790 --> 01:10:38,710
समुद्र में फैक दे जाएं। आपके नाम के
पत्थरों को मैं दूबने नहीं दूँगा। उनहीं
377
01:10:38,710 --> 01:10:44,110
को एक दूसरे से चोड़ते हुए आप एक सेतु का
निर्मान कीजिए। इस कारे में ना
378
01:10:44,110 --> 01:10:54,170
के
379
01:10:53,980 --> 01:10:55,340
सफलता प्राप्त होगी
380
01:10:55,340 --> 01:11:01,980
मेरे
381
01:11:01,980 --> 01:11:05,680
वीरों आओ मिलकर तमुद्र पर तेतु बनाएं
382
01:13:47,950 --> 01:13:54,650
महाराज, ये युद्ध हमारे सैनिकों के लिए
युद्ध नहीं, मात्र एक खेल होगा।
383
01:13:54,650 --> 01:13:59,490
इस छोटे से संकट के लिए आपको चिंतित होने
की आवश्यक्ता नहीं
384
01:13:59,490 --> 01:14:08,510
है।
385
01:14:08,520 --> 01:14:15,520
धूल चटा देंगे, रावन, हमने तुमसे पहले ही
कहा था, और आज फिर
386
01:14:15,520 --> 01:14:21,880
से कह रहे हैं कि, राजा को इस तरह की
चापलूसियों से, हमेशा बच के रहना चाहिए,
387
01:14:22,620 --> 01:14:29,500
जिनोंने समुदर पर पुल बनाया हो, वो साधारन
सेना नहीं हो सकती, रावन, हम तुमारे ही
388
01:14:29,500 --> 01:14:30,040
बलाई के
389
01:14:30,040 --> 01:14:38,500
लिए
390
01:14:38,500 --> 01:14:44,800
क आप जानते भी हैं आप क्या कह रहे हैं अगर
हमने सीता को सौप दिया तो शत्रू समझेगा
391
01:14:44,800 --> 01:14:51,700
कि हम कायर हैं डरते हैं ऐसा नहीं है
पुत्र केवल एक स्त्री के लिए हजारों
392
01:14:51,700 --> 01:14:57,160
को युद्ध की आग में जोंग देना उन्हें बली
चड़ा देना उचित नहीं है उचित नह
393
01:15:06,010 --> 01:15:12,710
आप कायर हो गए हैं इंद्र जीत अपनी जीवा पर
नियंत्र रखो मैं कायर नहीं हूँ
394
01:15:12,710 --> 01:15:18,850
परन्तो अनावशक युदल लड़ना भी कोई
बुद्धिमानी नहीं है आपने मुझे याद किया
395
01:15:18,850 --> 01:15:25,710
हाँ बल्वान युवराज अंगद सुनो मैं जो कहने
जा रहा हूँ उसे ध्
396
01:15:34,430 --> 01:15:41,210
वो समय हमारे स्तामने आ गया है। लेकिन फिर
भी मैं गहमातान युद्ध को रोकने और
397
01:15:41,210 --> 01:15:47,230
रावन को बचने का एक अस्तर देना चाहता हूँ।
इसलिए अगर रावन सीता सहित
398
01:15:47,230 --> 01:15:53,830
सभी बंधकों को हमेशा के लिए मुक्त कर दे
और ख्षमा मांग ले तो ये युद्ध रुख सकता है
399
01:16:01,680 --> 01:16:06,580
लेकिन युद्ध को हमें हर हाल में रोकना
चाहिए जिससे तीनों ही लोकों में सुख शामती
400
01:16:06,580 --> 01:16:12,780
बनी रहे और इसके लिए मैं रावन के सभी
अपराधों को क्षमा करने के लिए तैयार हूँ
401
01:16:12,780 --> 01:16:17,260
अंगद, क्या तुम ये संदेश रावन तक
पहुचातकते हो?
402
01:16:20,760 --> 01:16:22,200
मैं निश्चित रूप से
403
01:16:34,510 --> 01:16:39,670
तो तुम ये कहने के लिए यहां सकाय हो क्या
नाम बताया था तुमने
404
01:16:39,670 --> 01:16:46,370
अंगल यही नाम बताया था ना तो ये रहा हमारा
जवा मूर है
405
01:16:46,370 --> 01:16:53,150
एक चांती दूद के साथ इस तरह का व्यवहार आप
जैसे राजा को शोभा नहीं देता
406
01:17:19,409 --> 01:17:26,090
तो आखर कार रावन युद्ध ही चाहता है ठीक है
मैं तुम्हारे साहत की सराहना करता हूँ
407
01:17:26,090 --> 01:17:31,610
मैंने बहुत कोशिश की पर उस घमंडी रावन ने
आपका शांती प्रतार ठुकरा दिया वो युद्ध ही
408
01:17:31,610 --> 01:17:32,610
चाहता है
409
01:17:38,720 --> 01:17:45,540
सुनों वानर वीरो भोर की पहली किरण के परवत
शिकर को चूते ही हम युद्ध आरंब कर देंगे
410
01:17:45,540 --> 01:17:52,240
तो क्या आप अन्याय के विरुद लड़ाई लड़ने
के लिए राम का साथ देंगे
411
01:19:15,889 --> 01:19:19,690
जय जय जय जय जय जय
412
01:19:44,240 --> 01:19:51,120
हे प्रभु मेरी पुकार सुनो रक्षा करो मेरे
स्वामी की रक्षा
413
01:19:51,120 --> 01:19:54,500
करो प्रभु मेरे स्वामी की रक्षा करो
414
01:20:54,060 --> 01:20:57,920
इससे मुझे परिशानी हो रही है इससे निकाल
ही देता हूँ
415
01:21:37,000 --> 01:21:43,000
युद्ध का आरंभ अति उत्तम था महाराज। हमारी
और शत्रु सेना दोनों ने बराबरी की टक्कर
416
01:21:43,000 --> 01:21:48,880
दी। परन्तु अब हमारे सैनिक ठकने लगे हैं।
उन सैनिकों को वहाँ से वापस बला लो। और
417
01:21:48,880 --> 01:21:53,160
थोड़ा आराम करने को कहो। आदर्णिय महाराज।
ये तो पराजए
418
01:21:53,160 --> 01:22:05,940
स्व
419
01:22:05,840 --> 01:22:12,580
धूल चटा देंगे। ठीक है। सूर्यास्त के बाद
जब युद्ध रुक जाएगा तब राम अपने घायल
420
01:22:12,580 --> 01:22:18,340
सैनिकों का उपचार करेगा और मृत्य सैनिकों
का आंतिम सस्कार। उचित है। मैं कुंभा और
421
01:22:18,340 --> 01:22:22,780
निकुंभ को भेजता हूँ।
422
01:22:22,780 --> 01:22:28,320
कहीं भी बाग जाओ पर मेरे हाथों से
423
01:23:20,840 --> 01:23:26,700
कुम्ब के बल और पराक्रम ने त्राही त्राही
मचा दी है महाराज। क्यों नहीं आखिर वो
424
01:23:26,700 --> 01:23:33,500
महामली कुम्ब करन के बेटे हैं। कई वीरों
के प्रान
425
01:23:33,500 --> 01:23:36,960
चले गए और बहुत खायल भी हो गए।
426
01:24:27,820 --> 01:24:34,640
मुझे तुम पर गर्व है। आज तुम बहुत ही
बहधुरी से लड़े। अब आराम करो। नहीं
427
01:24:34,640 --> 01:24:40,080
प्रभु, ये तो छोटा सा खाव है। कल सुबह मैं
युद्ध के लिए तयार हो जाओंगा।
428
01:24:40,080 --> 01:24:46,740
और कश्ट मत करो। विश्राम करो। जी, जैसा आप
429
01:24:46,740 --> 01:24:47,740
कहें।
430
01:25:01,639 --> 01:25:07,100
भाईया, आप शत्रू के सेनिकों का अंतिम
संस्कार हमारे अपने सेनिकों के साथ क्यों
431
01:25:07,100 --> 01:25:07,839
रहे हैं?
432
01:25:07,840 --> 01:25:12,120
नहीं, लक्ष्मन. ये हमारे या रावन के सेनिक
तब तक थे जब तक जीवित थे.
433
01:25:12,720 --> 01:25:18,400
मृत्यू के बाद कोई किसी का शत्रू नहीं.
इसलिए ये सभी मृत सेनिक सम्मान के
434
01:25:18,400 --> 01:25:29,500
प
435
01:25:29,520 --> 01:25:35,480
तो मैं भी क्रोध और कड़वाहट से भरा हुआ
था। लेकिन लंका की यात्रा के दरान मैंने
436
01:25:35,480 --> 01:25:41,980
देखा कि हम सभी को ईश्वर की कृपा से जीवन
रूपी ये अन्मोल रत्न मिला
437
01:25:41,980 --> 01:25:48,100
है। और ये अती आवश्यक है कि हम एक अच्छे
क्षत्रिय होने से पहले एक अच्छे मानव हूँ
438
01:25:55,960 --> 01:26:02,900
वानर, मनुष्य, जानवर, पक्षी और मचलिया एक
ही स्रोच से नहीं आये हैं। फिर
439
01:26:02,900 --> 01:26:09,260
भी हम मेंसे कुछ लोग अज्ञानता में अपने ही
साथियों के विरुद अस्त्र शस्त्रों का
440
01:26:09,260 --> 01:26:13,040
उप्योग करते हैं। आज युद्ध भूमी में बहुत
से लोगों ने अपने प्राण
441
01:26:13,040 --> 01:26:23,780
गव
442
01:26:24,650 --> 01:26:31,430
तो मैं उस समय एक ऐसी दुनिया के लिए
प्रार्थना करूँगा, जहां फिर कभी कोई
443
01:26:31,430 --> 01:26:36,190
मनुष्य अपने भाई बंदूं पर ग्रोध में आकर
शस्त्र ना उठाए।
444
01:26:36,190 --> 01:26:42,550
भाईया, मैं आपकी भावना समझ गया।
445
01:27:22,250 --> 01:27:26,130
हमसे युद करो अवश्चि नील आगे चलो
446
01:29:53,520 --> 01:30:00,400
मुझे छोड़ कर क्यों चले गए। या तुम
447
01:30:00,400 --> 01:30:06,980
ही हो वो जिसने मेरे भाई का वद किया है,
बताओ। हाँ, मैं हूँ, मैं हूँ सुग्रीव,
448
01:30:07,340 --> 01:30:13,460
वानरों का राजा सुग्रीव। तुम्हारा भाई
बहुत ही बलवान और सहसी योद्धा था।
449
01:30:13,460 --> 01:30:16,420
आज से पहले मेरा कभी ऐसे
450
01:30:16,420 --> 01:30:22,768
योद्धा
451
01:30:23,340 --> 01:30:28,820
ये क्या कह रहे हो इंद्रजीत, प्रहस्त और
कुंब दोनों मारे गए हाँ पिताश्वी,
452
01:30:28,820 --> 01:30:35,060
से ये सच है हम सोच भी नहीं सकते कि कोई
इन्हें मार सकता है
453
01:30:35,060 --> 01:30:41,900
ये जुद्ध आसान नहीं है हमें अपनी रणनिती
बदलनी होगी इंद्रजीत, कुंब कर्ण को जगाओ
454
01:30:41,900 --> 01:30:53,320
प
455
01:30:52,960 --> 01:30:58,360
तत्कान उसे जगाओ ये मिरा आदेश है जी
पिताश्वी जैसी आपकी आग्या
456
01:32:35,790 --> 01:32:37,090
बावन का भाई कुपकन है।
457
01:33:11,580 --> 01:33:17,600
विदीशा, धर्ती आकाश को एक करता ये विशाल
योद्धा कौन है? हे राम, ये रावण का सक्त
458
01:33:17,600 --> 01:33:21,760
शक्तिशाली और पराक्रमी योद्धा और भाई
कुम्भ करन है.
459
01:33:22,380 --> 01:33:28,620
अगर ये छे महिने की निद्रा पूरी कर लेता
तो ये अमर हो जाता. लेकिन रावण ने समय से
460
01:33:28,620 --> 01:33:29,260
पहले ही इसे
461
01:33:29,260 --> 01:33:39,696
ज
462
01:33:39,690 --> 01:33:45,430
कुम्बकर्ण इतना शक्तिशाली है कि ये अकेला
ही हमारी पूरी वानर सिना को समाप्त कर
463
01:33:45,430 --> 01:33:50,030
देगा अब केवल आप ही हैं जो इस विनाश को
होने से रोक सकते हैं
464
01:33:50,030 --> 01:33:55,930
फिर तो मेरा जाना ही उचित है
465
01:35:29,290 --> 01:35:30,950
क्या नाम है तुम्हारा?
466
01:35:32,630 --> 01:35:37,650
मैं अंगद हूँ, महाराज सुग्रीव का भतीजा और
वानर राज बाली का पुत्र.
467
01:35:37,950 --> 01:35:44,690
योवराज अंगद, निसंदे तुम वीर हो, लेकिन
मुझसे युद्ध नहीं कर सकते, इसलिए
468
01:35:44,690 --> 01:35:47,910
मृत्यू को ललकारने की भूल मत करो. बैरो!
469
01:35:50,230 --> 01:35:51,550
मेरे बारे में क्या
470
01:35:51,550 --> 01:35:58,140
र मैं जानता हूँ तुम
471
01:35:58,140 --> 01:36:03,360
बहुत ही बल्चाली हो तो इस हनुमान के साथ
अपना बाहु बला अजमाना चाहोगे
472
01:36:03,360 --> 01:36:09,720
बहुत अच्छी लेकिन हमारे युद्ध के पहले
473
01:36:09,720 --> 01:36:10,720
ये लो
474
01:36:33,680 --> 01:36:34,580
इसकी आवशक्ता
475
01:36:34,580 --> 01:36:42,980
नहीं।
476
01:36:42,980 --> 01:36:49,740
हमारा युद्ध निहत्य नहीं हो सकता। तुम गदा
चिराने में कुछल हो। इसलिए ये युद्ध
477
01:36:49,740 --> 01:36:51,340
अस्त्रों के साथ होगा।
478
01:37:32,990 --> 01:37:38,250
पागिशाली हो कि मेरे हाथ में कोई अस्तर
नहीं था. अब उठो और मुझसे युद्ध करो.
479
01:37:38,350 --> 01:37:40,190
जहां हो वहीं खड़े रहो.
480
01:37:40,770 --> 01:37:45,210
मैं हूँ राम, अयोध्या का राजकुमार,
दश्रतनंदन राम.
481
01:38:02,250 --> 01:38:09,150
दूर रहो मुर्खों तो तुम हो रा सुना है
तुम्हें
482
01:38:09,150 --> 01:38:15,870
अस्त्रविद्या का बहुत जान है दूर रहो
मुझसे जाओ यहाँ से
483
01:38:15,870 --> 01:38:18,210
और जाकर वानरों से युद्ध करो
484
01:38:18,210 --> 01:38:28,090
कुम्बकरण
485
01:38:28,090 --> 01:38:34,080
जैसे महाबली के युद्ध मैदान में होते हुए
भी दिन की समाप्ती तक युद्ध चला कैसे?
486
01:38:34,200 --> 01:38:39,480
पिताश्री, अब मुझे ही ये युद्ध समाप्त
करने के लिए जाना होगा विजय भव इंद्र जीत,
487
01:38:39,520 --> 01:38:40,520
जाओ
488
01:39:13,290 --> 01:39:17,290
शमा करना कुम्बकरन, मैं बस अपना कर्तव्य
निभा रहा हूँ।
489
01:39:43,640 --> 01:39:47,420
भाईया, ये गर्व का ख्षण है, लेकिन आप ठीक
तो है न, कहीं चोट तो नहीं लगी?
490
01:39:48,660 --> 01:39:55,600
हाँ, हलकिसी लगी है, लेकिन मैं ठीक हूँ,
मुझे एक शमा करना भी भी शण, ये युद्ध ना
491
01:39:55,600 --> 01:39:59,400
होता, तो आज कुम्ब करण की मृत्यू मेरे
हाथों ना हुई होती.
492
01:40:07,620 --> 01:40:08,820
शिरी राम के सै
493
01:40:35,470 --> 01:40:41,490
उसकी मृत्यू ने लंका की नीव हिला दी ऐसे
बलशाली युद्धा का जाना
494
01:40:41,490 --> 01:40:48,470
अतेंद दुखदार बहुत बड़ी शती है पिताश्री
मेरे रहते लंका का
495
01:40:48,470 --> 01:40:54,150
गौरो धूमिल नहीं होगा मैंने एक योजना बनाई
है उसके अनुसार मैं रात में ही शत्रू
496
01:40:54,150 --> 01:40:55,710
सेना पर आक्रमण करके �
497
01:41:05,650 --> 01:41:09,770
जितनी जल्दी हो सके सभी घायलों को शिविर
पोचाओ चलो जल्दी
498
01:41:09,770 --> 01:41:16,650
इतनी भी क्या जल्दी है अभी
499
01:41:16,650 --> 01:41:23,170
तो बहुत सारे शव मिलेंगे तुम्हे एक दुताहत
का दंड उसे मिलना ही चाहिए अभी बताता हूँ
500
01:41:23,170 --> 01:41:25,290
पहरो उसके साथ कोई है
501
01:41:25,290 --> 01:41:31,470
ये क्या माता सीता
502
01:41:38,800 --> 01:41:39,800
आप ठीक तो है न?
503
01:42:46,570 --> 01:42:52,430
जल्दी आओ, सहायता करो, घेरा बनाओ। जाब
504
01:42:52,430 --> 01:42:59,170
बन। तुम्हें यमलोक पहुचाने से पहले राम,
तुम्हारी पत्नी और भाई
505
01:42:59,170 --> 01:43:03,370
की मृत्यू का शोक मनाने का एक अवसर दे रहा
हूँ।
506
01:43:22,360 --> 01:43:28,040
महराज, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। कहो।
हमने घायलों के ऊपर जंगल में उपलब्द सभी
507
01:43:28,040 --> 01:43:32,640
जड़ी बुटियों का प्रयोग करके देख लिया।
लेकिन इंद्रजीत द्वारा दिये घाव किसी भी
508
01:43:32,640 --> 01:43:34,780
जड़ी बुटी से भर ही नहीं रहे हैं। क्या
कहा?
509
01:43:48,780 --> 01:43:51,248
लेकिन ये कैस
510
01:43:52,970 --> 01:43:58,890
स्वेम को संभालिये राम, अन्यता आपका ये
गिरता हुआ मनोबल हमारी सेना पर शत्रु
511
01:43:58,890 --> 01:44:05,750
से भी बड़ी ख्षती पहुँचाएगा. प्रभू, आप
चिंता मत कीजिये, माता सीता अवश्य जीवित
512
01:44:05,750 --> 01:44:10,810
होंगी. जीवित? लेकिन सीता की हत्या तो
हमारी आखों के सामने ही क
513
01:44:21,740 --> 01:44:27,120
ताकि आप दुखी हो और आपका ध्यान भंग हो।
इंद्रजीत की मायावी शक्तियों को मिटाने का
514
01:44:27,120 --> 01:44:33,760
केवल एक ही उपाय है। उस पर उस समय हमला
किया जाए। जब वो युद्ध से पहले देवी
515
01:44:33,760 --> 01:44:38,240
निकुम्भिला की गुफा में तंत्र साधना करने
में मगन हो। युद्ध में
516
01:44:38,240 --> 01:44:47,808
आ
517
01:44:47,800 --> 01:44:52,860
युद्ध में आने से एक दिन पहले ये विधी
प्रारंभ होती है और देर रात तक चलती है
518
01:44:52,860 --> 01:44:53,860
अच्छा?
519
01:44:55,120 --> 01:45:00,500
नहीं, नहीं, नहीं हमारे बहुत से वीर और
साथ ही मेरा भाई लक्ष्मन भी गायल पड़ा है
520
01:45:00,500 --> 01:45:04,920
ऐसी स्थिती में निकुंभला देवी की गुफा तक
जाकर इंडर जीत पर ह
521
01:45:16,060 --> 01:45:22,900
आप विश्राम करते करते ही, बोलो जामबंद।
कुछ ऐसी जड़ी बूटिया हैं जो
522
01:45:22,900 --> 01:45:29,760
हमारे घावों को ठीक कर सकती हैं, जो
हिमाले पर हैं। अच्छा, हिमाले में,
523
01:45:29,780 --> 01:45:34,000
वो तो बहुत दूर है, इतनी जल्दी वहाँ से
जड़ी बूटिया कौन लाएगा।
524
01:46:22,510 --> 01:46:27,650
ये तो अयोध्या है प्रभू श्रीराम का राज्य
525
01:46:27,650 --> 01:46:36,210
पहच
526
01:46:36,210 --> 01:46:42,950
गए हिमाले ओ कितना सुन्दर
527
01:46:42,950 --> 01:46:47,830
है पवित्र और अद्वत इसके भी दर्शन हो गए
528
01:47:38,080 --> 01:47:40,480
द्रोन गिरी शिकर भी मिल गया।
529
01:47:40,480 --> 01:47:50,440
और
530
01:47:50,440 --> 01:47:55,540
अब मुझे खोजनी होगी हमारी गायल सेना के
लिए चमतकारी संजीवनी बूटी।
531
01:48:02,120 --> 01:48:04,060
यही है वो संजीवनी बूठी
532
01:48:04,060 --> 01:48:13,300
यह
533
01:48:13,300 --> 01:48:14,760
तो बहुत पीड़ा दाई है
534
01:48:14,760 --> 01:48:27,140
अरे
535
01:48:27,140 --> 01:48:34,060
वा मेरी चोड़ ठीक हो गई और साथी पीड़ा भी
चली गई ये संजीवनी बूटी तो
536
01:48:34,060 --> 01:48:36,040
उम्मीद से भी ज्यादा चमतकारी है
537
01:48:36,040 --> 01:48:42,960
लेकिन मुठी भर
538
01:48:42,960 --> 01:48:49,400
जड़ी बूटियों से हमारी पूरी सेना आखिर
कैसे ठीक हो पाएगी समझ में नहीं आ रहा
539
01:48:49,400 --> 01:48:52,520
कोई तो उपाए सोचना होगा
540
01:48:59,210 --> 01:49:03,310
ये उपाय काम करेगा इस पेड़ को खाड़ लेता
हूँ
541
01:49:44,940 --> 01:49:46,400
बन गया निशान।
542
01:49:46,400 --> 01:49:57,900
और
543
01:49:57,900 --> 01:50:03,800
अब मैं उठा कर ले जाओंगा इस पूरे परवत को।
544
01:50:36,880 --> 01:50:42,880
हे प्रभो, जब तक मैं ये संजीवनी बूटी लेकर
ना पहुँच जाओं, तब तक आप मेरे लक्ष्मन
545
01:50:42,880 --> 01:50:44,040
भाईया की रक्षा करना.
546
01:50:45,980 --> 01:50:50,700
लक्ष्मन भाईया, बस थोड़ी देर और आप अपना
धिरज बनाए रखना.
547
01:50:58,100 --> 01:51:01,700
मेरे प्यारे लक्ष्मन धैर्य मत खोना, बस
थोड़ी देर और
548
01:51:09,040 --> 01:51:15,440
मैं बस पहुची गया लक्ष्मन भाईया भाईया
भाईया राम लक्ष्मन
549
01:51:15,440 --> 01:51:21,780
मैं यही हूँ वहाँ देखो हनुमान जी आ गए हैं
हनुमान जी चैलो
550
01:51:21,780 --> 01:51:28,700
चैलो चैलो हनुमान जी आ गए हैं वो अपने
गंधों पर कुछ ले कर आ रहे हैं लेकिन
551
01:51:28,700 --> 01:51:31,000
वो है क्या यह तो पूरा परवत ही उ�
552
01:51:53,879 --> 01:51:59,580
हनुमान जी, परवत पर जड़ी बूटियां कहा है?
बताता हूँ, ठीक उसी जगा जहां मैंने पेड़
553
01:51:59,580 --> 01:52:04,980
का तना गाड़ कर निशान बना दिया है जल्दी
करो, लक्ष्मन भाईया के घाओ पर संजीवनी
554
01:52:04,980 --> 01:52:08,780
लगाओ जी हनुमान जी, हम अभी जाते हैं
555
01:52:28,720 --> 01:52:33,200
लक्ष्मन, मेरे भाई, तुम्हें होश आ गया,
तुम ठीक हो गये।
556
01:52:33,200 --> 01:52:39,660
हनुमान, भाईयों की तरह तुम भी मुझे अत्यंत
प्रिय हो।
557
01:53:05,450 --> 01:53:06,450
ये कौन है?
558
01:53:58,980 --> 01:53:59,980
ये क्या हुआ?
559
01:54:02,540 --> 01:54:04,840
कौन है वहाँ? मेरे सामने आओ!
560
01:54:06,480 --> 01:54:09,340
अस्चरियती बात है! तुम अभी तक जीवित हो?
561
01:54:09,660 --> 01:54:16,170
हाँ! और आज तुम्हारी तनरक्षिका देवी भी
तुम्हें तुम्हारे काल से नहीं बचा पाएगी।
562
01:54:16,170 --> 01:54:23,150
आजशर्य की बात है कि तुम जैसे दुष्ट के
लिए तुम्हारे दास फ्रान
563
01:54:23,150 --> 01:54:28,010
देने के लिए आतुर है। सैनिकों, मार दो
इसे!
564
01:55:00,140 --> 01:55:01,400
कुछ और तोड़ना पड़ेगा
565
01:55:01,400 --> 01:55:08,500
तुम
566
01:55:08,500 --> 01:55:09,920
मुझे बाहर लेकर चलो
567
01:55:44,109 --> 01:55:50,230
इंद्रजीत। मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ, जो
तुम जैसे वानर के जाल में फ़स जाओ।
568
01:55:50,230 --> 01:55:58,670
वो
569
01:55:58,670 --> 01:55:59,930
हमारे हाथ से निकल गया।
570
01:56:11,920 --> 01:56:15,900
अगर मेरी आग्या का पालन किया तो तुम्हारे
प्राण नहीं लूँगा। मुझे आकाश में ले चलो
571
01:56:15,900 --> 01:56:21,220
और याद रहे। जब मैं दाएं कहूँ तो दाएं ही
जाना। और बाएं कहूँ तो केबल बाएं। अगर
572
01:56:21,220 --> 01:56:24,160
चालाकी की तो तुम्हारा फिर धर्ते अलग कर
दूँगा।
573
01:57:00,420 --> 01:57:04,200
इस बार नहीं, इम्रजी, मैं तुम्हें जिन्दा
हूँ.
574
01:57:17,460 --> 01:57:19,180
तुम मुझे फिर नहीं...
575
01:57:45,000 --> 01:57:46,000
करते हैं
576
01:58:18,800 --> 01:58:21,020
तुम मुझे कभी नहीं मार पाओगे!
577
01:58:41,540 --> 01:58:43,480
ओ, इंद्रजीत!
578
01:58:43,760 --> 01:58:45,100
मेरे बेटे!
579
01:58:45,780 --> 01:58:47,740
वीर इंद्रजीत ने तो!
580
01:58:48,040 --> 01:58:54,120
मायावी सीता का वद्ध किया था। लेकिन मैं
असली सीता को ही मार डालूँगा। जो भी राम
581
01:58:54,120 --> 01:59:00,360
बील है, उसकी मृत्यू निश्चित है। एक
स्त्री की हत्या करके अपनी तलवार को क्यों
582
01:59:00,360 --> 01:59:06,540
कलंकित करते हो। बात समझो लंकेश। तुमने
देखा ना। कुंब और निकुंब,
583
01:59:06,680 --> 01:59:17,168
प
584
01:59:17,160 --> 01:59:23,520
पिता हो और एक राजा भी हो, क्या तुम उनकी
कीर्ती को कलंकित करोगी? समय आ गया है कि
585
01:59:23,520 --> 01:59:27,580
अब हम तुम धलवार उठाएं और अपना प्रतिशोध
लिने युद्ध भूमी में उत्रें.
586
01:59:27,800 --> 01:59:33,660
यही होगा, लेकिन तब तक आप लंका की
स्त्रियों और बच्चों की रक्षा कीजिए. को
587
02:00:52,490 --> 02:00:55,470
तो ऐसे लग रहे हैं जैसे गरूर पे साथ शाद
भगवान विश्टु हो
588
02:01:32,720 --> 02:01:38,920
तुम्हारे और मेरे बीच का ये युद्ध आज
अधर्म का विनाश कर देगा। लंका वासियों, आओ
589
02:01:38,920 --> 02:01:45,760
सुनो। तुम्हारा राजा रावन, जिसे तुम अमर
शक्ती का प्रतीक मानते हो। उसे
590
02:01:45,760 --> 02:01:52,340
अब एक साधारन मानव के हाथों मरते देखो।
राम, रावन के
591
02:01:52,340 --> 02:01:53,460
सामने तो फै भ
592
02:02:01,150 --> 02:02:07,810
संसार में दुशानन रावन एक ही है दूसरा ना
कभी था और ना कभी होगा आओ राम
593
02:02:07,810 --> 02:02:13,190
मुझसे युद्ध करो आजाओ जैती तुम्हारी इच्छा
आजाओ
594
02:03:12,720 --> 02:03:14,000
अब इसका अंत हो गया
595
02:03:14,000 --> 02:03:37,560
मुझे
596
02:03:37,560 --> 02:03:40,620
अपनी आँखों पर विश्वात नहीं हो रहा
597
02:03:44,430 --> 02:03:46,430
तुम्हें क्या लगा रावण कमात होगा या?
598
02:03:50,470 --> 02:03:51,930
रावण अजय के!
599
02:04:21,260 --> 02:04:22,580
कोई रास्ता नहीं मचा।
600
02:04:22,580 --> 02:04:41,820
असंभव
601
02:04:41,820 --> 02:04:45,900
ये कैसी शक्ति है जितने रावन के केले को
दो दिया।
602
02:04:54,090 --> 02:04:56,670
आपको तो वाली गृप्यों लिखी तैराओ
603
02:06:47,310 --> 02:06:52,870
ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे, ब्राधा
रावन। युद्ध का अंत
604
02:06:52,870 --> 02:06:56,390
हुआ।
605
02:06:56,390 --> 02:07:03,170
लंका के सैनिकों, रावन
606
02:07:03,170 --> 02:07:08,330
के साथ -साथ शत्रुता का भी अंत हुआ। मेरा
आपसे कोई बैर नहीं। इसलिए अपने अस्तर
607
02:07:08,330 --> 02:07:11,550
-शत्र त्याग दो। और आज से अपने नए राजा
विभीषण
608
02:07:17,800 --> 02:07:19,620
जो आग्या
609
02:07:19,620 --> 02:07:35,940
दीते
610
02:07:35,940 --> 02:07:37,340
द्वामी
611
02:07:49,290 --> 02:07:54,810
मैं आप सबका किस तरह से आभार प्रकट करूँ।
विशेश रूप से उनका जिन्होंने मेरे लिए
612
02:07:54,810 --> 02:08:00,170
अपने प्रांट दे दिये। मैं उनके लिए दुखी
हूँ और आप सबसे एक शमा चाहती हूँ। इसकी
613
02:08:00,170 --> 02:08:02,590
आवशक्ता नहीं है। युद्ध में मिली
614
02:08:02,590 --> 02:08:16,670
मृत्यु
615
02:08:16,670 --> 02:08:21,370
गौरवश पुष्पक विमान भेज किया।
616
02:08:21,370 --> 02:08:45,090
अयोध्या
617
02:08:45,090 --> 02:08:51,860
लोटते समय राम को देखते हुए, सीता जी
अत्यंत प्रसन्न हो रही थी, लेकिन उन्हें
618
02:08:51,860 --> 02:08:58,740
भे था उनके लिए, जिन्होंने अपने प्राण
गवाए उस युद्ध में जिसे ताला
619
02:08:58,740 --> 02:08:59,740
जा सकता था.
620
02:09:10,800 --> 02:09:16,940
अयोध्या अपने प्रिय राजा के सुरक्षित
लोटने का उठ्सव मनाती है, और वे सभी आनन्द
621
02:09:16,940 --> 02:09:23,540
रहते है बहुत साल बाद राम स्वर्ग प्रख्ठान
कर जाते हैं और सीता अपनी मा धर्ती के
622
02:09:23,540 --> 02:09:27,080
पास। जैहे श्रीराम।
95770
Can't find what you're looking for?
Get subtitles in any language from opensubtitles.com, and translate them here.