All language subtitles for Ramayana-The.Legend.of.Prince.Rama.2025.1080p.HEVC.Hindi.WEB-DL.5.1.x265-HDHub4u.Tv.

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में से 12 00:01:24,130 --> 00:01:28,310 राम उनके साथमें अवतार माने जाते हैं। 13 00:01:28,310 --> 00:01:34,880 जब राम प उस समय रावन की शक्तियों ने 14 00:01:34,880 --> 00:01:41,840 संसार में हाहाकार मचा रखा था। रावन के मामा मारीज और राक्षसी ताड़का ने अयोध्या 15 00:01:41,840 --> 00:01:48,080 की सीमा के पार जंगल में रह रहे ब्रह्मरिशे विश्वमित्र और अन्य साथों को 16 00:01:48,080 --> 00:01:51,360 किया हुआ था। वो हर दिन उनके यग्यों में 17 00:01:51,360 --> 00:01:56,080 वि 18 00:02:04,970 --> 00:02:11,970 ओम अग्नि मीले पुरोहितं यद्न्यत्य देवं रुत्विजं होतारं 19 00:02:11,970 --> 00:02:18,430 रत्नधातमं ओम अग्नले त्वाहा इदं नमः अग्नि 20 00:02:18,430 --> 00:02:24,730 पूर्वे भिरुशि भिरीड्यो नूतनै रुत सदेवां एह वक्षती 21 00:02:24,730 --> 00:02:31,030 ओम अग्नले त्वाहा इदं नमः अग्नि नारै मश्णवत् 22 00:02:31,180 --> 00:02:38,040 ओषमेव दिवे दिवे यशतं वीरवत्तमं ओषमेव दिवे 23 00:02:38,040 --> 00:02:42,740 यशतं वीरवत्तमं ओषमेव दिवे दिवे यशतं 24 00:02:42,740 --> 00:02:48,820 वीरवत्तमं 25 00:03:04,330 --> 00:03:10,110 ए पालन हार भगवान विश्वनू, क्या यहाँ ऐसा कोई नहीं जो हम रिशियों को इस विपत्ती से 26 00:03:10,110 --> 00:03:11,110 बचाएं? 27 00:03:12,850 --> 00:03:19,510 उसका नाम है राम, अयोध्या नरेश का जेष्ट पुत्र वही तुम्हारी रक्षा करेगा. 28 00:04:16,490 --> 00:04:23,050 मैं धन्य हुआ महराज. आपके चरण पड़ते ही आयोध्या राजभवन धन्य हो गया. आग्या करें 29 00:04:23,050 --> 00:04:29,910 प्रभू, मेरे लिए क्या आदेश है? हे सूर्य पुत्र कुल भूषण महराज दश्रत, राक्षसों ने 30 00:04:29,910 --> 00:04:33,810 हमारी तपो भूमी को तहस नहस कर दिया है. रिशी जन संकट में है 31 00:04:44,270 --> 00:04:50,250 मैं स्वयं चल कर उन राक्षसों को धर्ती से मिटा दूँगा। ये ईश्वर का आदेश है राजन। इस 32 00:04:50,250 --> 00:04:56,910 आदेश को तुम ठुकरा नहीं सकते हैं। महराज, राम और लक्षमन को दम्मर्शि विश्वमित्र के 33 00:04:56,910 --> 00:05:00,230 साथ जाने का आदेश दीजिये। ये स्वयं दिव्यास्त्रों के 34 00:05:15,180 --> 00:05:21,180 प्रम्मरिशे, हम आपको अपनी आँखों के तारे सौप रहे हैं। आपके मार्गदर्शन में ये और 35 00:05:21,180 --> 00:05:27,800 सक्षम बनेंगे। कल्याण हो महाराश दश्रत। आपका ये निर्णे पूरे संतार की रक्षा 36 00:05:27,800 --> 00:05:31,480 हम अपने पिता के समान ही आपकी आग्या का भी पालन करेंगे 37 00:06:01,230 --> 00:06:06,770 राम नक्ष्मन, एक समय ये बड़ा ही सुन्दर उपूवन था, परन्तु अब ये नष्ट हो गया है, 38 00:06:06,770 --> 00:06:12,490 क्योंकि बहुती क्रूर, भयानक, नरभक्षी, राक्षती ताड़का, उसके पुत्र मारीच और उनकी 39 00:06:12,490 --> 00:06:15,450 दुष्ट राक्षतों की टोली के उत्पाद से यहां सब कुछ 40 00:06:15,450 --> 00:06:30,210 उज 41 00:06:29,720 --> 00:06:35,580 हमारे बाद तुहरा हमारे 42 00:06:35,580 --> 00:06:41,200 बाद 43 00:06:41,200 --> 00:06:42,700 तुहरा 44 00:07:33,740 --> 00:07:36,200 पेजी दिना कानम शब्द में पोज़े रदनाते हैं 45 00:08:14,960 --> 00:08:21,620 राम लक्ष्मन, बहुत वर्ष पूर्व यही इसी स्थान पर हमारी कड़ी तपस्या से प्रसन्न 46 00:08:21,620 --> 00:08:28,460 होकर देवताओं ने हमें भिन्न -भिन्न प्रकार के तिव्यास्त्र दिये। अब समय आके 47 00:08:28,460 --> 00:08:33,220 आये कि हम इन दैवी अस्त्रों को योग्य उत्राधिकारी को सौपे। 48 00:08:33,220 --> 00:08:39,380 इन्हें 49 00:08:39,380 --> 00:08:42,416 त्व 50 00:08:50,890 --> 00:08:55,930 अब ये तुम्हारे हैं। योग्यत समय पर इनका उपयोग करो। 51 00:08:55,930 --> 00:09:14,690 ये 52 00:09:14,690 --> 00:09:19,610 वही है। इसी ने मेरी मा को मारा है। मैं इसकी हत्या... 53 00:09:20,650 --> 00:09:23,350 अपनी मां की मृत्यु का प्रतिशोत लूँगा। 54 00:10:01,450 --> 00:10:06,390 इतनी जल्दी दिव्यास्त्रों का प्रयोग आपने कैसे सीखा भाईया? ये दिव्यास्त्र समय आने 55 00:10:06,390 --> 00:10:08,210 पर अपने आप संचालित होते हैं. 56 00:10:08,770 --> 00:10:12,050 इनके उप्योग के लिए शिक्षा की कोई आवश्यक्ता नहीं. 57 00:10:13,870 --> 00:10:17,550 गुरुदेव मुझे बताईए की इस चक्र का प्रयोग कैसे करते हैं? � 58 00:10:44,970 --> 00:10:47,770 पत्रत्यंचा कड़ाएगा महराज 59 00:11:45,770 --> 00:11:49,510 और अब अयोध्या के राजकुमार राम 60 00:12:18,380 --> 00:12:19,380 कर दो 61 00:13:08,180 --> 00:13:15,120 समय बीतने के साथ साथ अयोध्या नगरी और विक्सित और सम्रिध हो गई। राम प्रजा के 62 00:13:15,120 --> 00:13:21,500 प्रिय राजकुमार और होने वाले राजा थे। चारो भाईयों में बड़ा प्रेम था और सबका 63 00:13:21,500 --> 00:13:28,460 भविश्य उज्जवल दिख रहा था। मेरे प्रिय जनों, 64 00:13:28,460 --> 00:13:30,040 आज हमने नीन में सु� 65 00:13:32,510 --> 00:13:39,050 गुरु वशिष्ट ने उसे किसी संकट के आगमन का संकेत माना है। साथ ही हमारा 66 00:13:39,050 --> 00:13:44,370 स्वास्थ गिर रहा है। शरीर बुढ़ा हो रहा है। अब हम दुष्टों के आक्रमण का सामना 67 00:13:44,370 --> 00:13:51,330 कर सकते हैं। हमने निर्णय लिया है कि हम राम को अपना सिंघासन सौंप दें। राम 68 00:13:51,330 --> 00:13:55,952 अय 69 00:14:01,740 --> 00:14:06,880 लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करना हमें तुम पर विश्वास है आपने जो 70 00:14:06,880 --> 00:14:12,700 आदर्श थापित किये हैं मैं उन पर खरा उतरने का प्रयास करूँगा आयोध्धा की जैहो राजा 71 00:14:12,700 --> 00:14:16,920 दर्शरत की जैहो राजकुमार राम की जैहो 72 00:14:16,920 --> 00:14:27,360 चोर 73 00:14:27,360 --> 00:14:34,240 मत मचाओ उड़ो यहां ते अरे मंथरा, चिड़ियों को क्यों आप शब्द बोल 74 00:14:34,240 --> 00:14:35,240 रही हो? 75 00:14:35,280 --> 00:14:42,080 महरानी कह कही, राज में अन्होनी होने वाली है, और आप है कि यहाँ शुंगार 76 00:14:42,080 --> 00:14:45,360 करवा रही है? मंथरा, ऐसा क्यों बोल रही हो तुम? 77 00:14:49,200 --> 00:14:53,400 क्या तुम्हें पता नहीं मंथरा, कल हमारे प्रियाराम का राज्यविशेक ह 78 00:15:00,560 --> 00:15:07,040 इतनी भोली है, थोड़ा सोचिये, महाराज ने चलाकी से आपके साथ 79 00:15:07,040 --> 00:15:12,500 विश्वागात किया है। अपनी जीव पर नियंतरन रखो, हम महाराज के लिए अनुचित शब्द नहीं 80 00:15:12,500 --> 00:15:18,880 सुन सकते। परन्तु, राजकुमार भरत को महाराज ने अभी दूर क्यों भेजा, और 81 00:15:18,880 --> 00:15:19,620 राज्या 82 00:15:19,620 --> 00:15:30,540 भ 83 00:15:30,490 --> 00:15:37,370 कहीं महराज को ये सुझाओ कोशलिया ने दिया होगा। आप जानती हैं कि आप महराज की प्रिय 84 00:15:37,370 --> 00:15:43,910 राणी हैं। इसलिए कोशलिया आप से इश्चा करती है। क्यूंकि आप सबसे सुन्दर हैं। वस्त 85 00:15:43,910 --> 00:15:50,550 हैं और जवान हैं। तो मुझे क्या करना चाहिए। आप इस 86 00:15:50,550 --> 00:15:52,430 मंतरा की चतु 87 00:16:18,540 --> 00:16:19,740 क्या हुआ महरानी? 88 00:16:21,960 --> 00:16:27,480 ऐसे शुब समय में आपका ये क्रोध से भरा अशुब रूप क्या समस्या है? हम से तो कहिए. 89 00:16:27,980 --> 00:16:29,500 महराज क्या आपको याद है? 90 00:16:29,940 --> 00:16:33,020 सालों पहले जब आप युद्ध में घायल हो गए थे, 91 00:16:33,040 --> 00:16:41,920 तब 92 00:16:41,920 --> 00:16:44,520 मैंने ही आपको वहाँ से सुरक्षित निकाला था. 93 00:16:44,840 --> 00:16:48,680 और आपने मुझे दो वर्दान देने का वचन दिया था। 94 00:16:48,680 --> 00:16:55,500 आज मुझे मेरे वो दो वर्दान 95 00:16:55,500 --> 00:17:02,280 चाहिए। वो भी अभी। केवल दो वर्दान। यदि आप चाहें तो और भी ले 96 00:17:02,280 --> 00:17:08,500 सकती हैं। नहीं। मुझे मेरे वो दो वर्दान ही चाहिए। मेरा पहला वर्दान है। 97 00:17:08,500 --> 00:17:11,440 नहीं। य 98 00:17:14,960 --> 00:17:21,859 इसके बदले चाहो तो तुम पूरी संपत्ती ले लो। नहीं। फिर संसार कहेगा कि सूरे वंश का 99 00:17:21,859 --> 00:17:28,820 एक राजा वचन देकर मुकर गया। इसलिए या तो मुझे मेरे दो वरदान दीजिये या अपना यश 100 00:17:28,820 --> 00:17:35,380 कलंकित कीजिये। पहला वरदान था 101 00:17:35,380 --> 00:17:38,560 कि कैकई के पुत्र भरत को राजा 102 00:17:43,790 --> 00:17:50,390 वो भी 14 वर्ष के लिए भाईया, आप लोगों की पुकार सुन रहे हैं ना 103 00:17:50,390 --> 00:17:55,990 लक्ष्मन, मेरे भाग्य में यही लिखा है किन्तु भाईया, क्या हमें भाग्य का लिखा 104 00:17:55,990 --> 00:18:00,790 चुप बैठ जाना चाहिए और ये तलवार, क्या केवल एक अभिनेता के अभिने का सामान है 105 00:18:00,790 --> 00:18:05,470 भा 106 00:18:16,220 --> 00:18:21,520 पति पत्नी के कर्तवे अलग नहीं हो सकते हम सुख दुख में समान भागिदार हैं सत्य वचन 107 00:18:21,520 --> 00:18:28,400 अगर आत्मा एक है तो भाग्य भी एक ही होगा इसलिए भाईया मैं भी आप दोनों 108 00:18:28,400 --> 00:18:32,840 के साथ चलूंगा ठीक है 109 00:18:46,710 --> 00:18:53,270 मा, ये चौदे साल यूँ ही देखते देखते ही भीच जाएंगे. मैं फिर लोट कर इसी तरहें 110 00:18:53,270 --> 00:18:54,270 आशिर्वाद लूँगा. 111 00:18:55,070 --> 00:18:56,970 अवश्य मेरे लाल. राम, 112 00:18:57,830 --> 00:19:08,830 तुम 113 00:19:08,830 --> 00:19:13,890 वन जाने को क्यों मान गए? तुमने मेरा विरोध क्यों नहीं किया? शायद इससे मेरा 114 00:19:13,890 --> 00:19:14,890 कम हो जाता. 115 00:19:15,110 --> 00:19:20,850 मुझे ना राज्य चाहिए और ना ही सिंघासन. मेरे लिए आपका वचन इन सब से बड़ा है, 116 00:19:20,850 --> 00:19:22,570 पिताजी. आशिर्वात दीजे. 117 00:19:22,790 --> 00:19:29,370 मेरे लान, संसार में कौन पिता तुम्हारे समान संतान पाकर अभिमान न करेगा? 118 00:19:32,170 --> 00:19:35,590 तुम सूरे वंश के गौरव हो, सुरक्षित लोटना. 119 00:19:39,070 --> 00:19:40,070 मंत्री � 120 00:19:43,400 --> 00:19:49,720 राम के वन जाने के लिए हाथी, घोड़े, साज, सामान सहित संपूर्ण सेना तैयार करो। जैसी 121 00:19:49,720 --> 00:19:54,580 आपकी आग्या। पिताश्री आपके आशिर्वाद से प्रकृति हमारा ध्यान सुएम रखेगी। सेना की 122 00:19:54,580 --> 00:19:57,640 कोई आवश्यकता नहीं है। वन में राज्य की सेना का क्या काम? 123 00:20:03,780 --> 00:20:04,780 यही 124 00:20:23,620 --> 00:20:25,900 माता, अपने इस बेटे को आशिर्वात 125 00:20:25,900 --> 00:20:33,900 दीजिये। 126 00:20:33,900 --> 00:20:41,000 प्रिये 127 00:20:41,000 --> 00:20:42,080 अयोध्यावातियों, 128 00:20:42,840 --> 00:20:47,520 मुझे आपसे अपार्थ नहीं है, और जानता हूँ आपके हिर्दे में भी मेरे लिए प्रेम है। 129 00:20:47,520 --> 00:20:52,430 आपसे निवेदन है कि यही प्रेम आप मेरे भाई भरत को भी दें। वो आपकी प्रेम का सही 130 00:20:52,430 --> 00:20:58,130 उत्तराधिकारी है और आपसे अयोध्या का राजा भी मेरे प्यारे अयोध्यावातियों मेरी आप 131 00:20:58,130 --> 00:21:03,310 सभी से विनती है कि ताथ ही आप मेरे दुखी पिता का भी ध्यान रखना 132 00:21:24,520 --> 00:21:28,300 राजकुमार राम, जल्द लोटियेगा। 133 00:21:28,300 --> 00:21:35,200 राम, मेरे 134 00:21:35,200 --> 00:21:42,040 बच्चे। अपना ध्यान 135 00:21:42,040 --> 00:21:48,120 रखना, राम, लक्ष्मन, इता। आप भी अपना ध्यान रखना, और हमारे 136 00:21:48,120 --> 00:21:51,600 पिताजी की देखभाल करना। अवश्य राम। 137 00:23:02,689 --> 00:23:09,410 कई महीनों तक महराज तश्रत का महल दुख के अंधकार में डूबा रहा। 138 00:23:22,010 --> 00:23:27,250 अब महाराज दशरत संसार की कष्टों से मुक्त हो चुके हैं। 139 00:23:27,250 --> 00:23:34,250 कैकैई के पुत्र भरत, जो अपने नाना 140 00:23:34,250 --> 00:23:39,290 के हाँ कैकैई गहवे थे, उन्हें तुरंद अयोध्या वापत बुलाया गया। 141 00:24:07,799 --> 00:24:09,180 मा, मा, ये सब क्या है? 142 00:24:09,500 --> 00:24:10,500 कैसे हुआ ये? 143 00:24:10,580 --> 00:24:11,580 उत्र भारत, 144 00:24:12,140 --> 00:24:16,720 मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ. मुझे बताईए, क्या ये सत्य है? क्या पिताजी का 145 00:24:16,720 --> 00:24:17,720 निधन हो गया है? 146 00:24:19,740 --> 00:24:23,400 ए, भगवान, अर्थात ये सत्य है? 147 00:24:23,680 --> 00:24:27,460 हाँ, परन्तु वो तुम्हें आयोध्या का राज सौप कर गए हैं. � 148 00:24:35,340 --> 00:24:41,820 पापी नहीं, दुष्ट कुल खोती नहीं। कितने तुम्हारे मन में यह विश भरा है, 149 00:24:41,860 --> 00:24:48,660 बताओ। वो यही है भाईया। इतनी दुष्टा ने हमारी माँ को भ्रमित कर, उनके मन में विश 150 00:24:48,660 --> 00:24:55,640 विनाश के बीच भूए। मुझे ख्षमा कर दीजिये, ख्षमा। मैं केवल 151 00:24:55,640 --> 00:24:59,320 आप द 152 00:25:02,730 --> 00:25:08,210 वरना तुम्हारी लीप के टुकडे टुकडे कर दूँगा। रुख जाओ ब्राता, इसकी हत्या करके 153 00:25:08,210 --> 00:25:14,850 वंश की तलवार अपवित्र मत करो। आज से तुम मेरी मा नहीं हो और ये बात पूरे संसार को 154 00:25:14,850 --> 00:25:20,850 पता चलेगी। शमा कर दो पुत्र, मुझे से भूल हो गई, अपनी म 155 00:25:37,530 --> 00:25:38,530 क्या? 156 00:25:39,170 --> 00:25:41,590 ये तुम क्या कह रहे हो भरत? 157 00:25:41,850 --> 00:25:44,250 हमारे पिताजी स्वर्ग से धार गए? 158 00:25:45,190 --> 00:25:48,670 भाईया, ये हम सब के लिए कठिन समय है. 159 00:25:56,570 --> 00:26:03,310 पिताजी, पिताजी, मुझे एकशमा कर दीजिये पिताजी. आपके अंतिम समय मैं आपके 160 00:26:03,310 --> 00:26:04,310 साथ नहीं था. 161 00:26:04,570 --> 00:26:06,810 भाईया, मैं एकशमा चाहता हूँ. 162 00:26:07,050 --> 00:26:12,110 मेरी महा के सारे शडियंत्रों के लिए आप वापस अयोध्या चलिए। उस सिंहासन पर केवल 163 00:26:12,110 --> 00:26:18,730 ही अधिकार है। भरत, अब प्रश्न ये नहीं है कि माता कही ने क्या किया। याद रखो, ये 164 00:26:18,730 --> 00:26:23,310 हमारे महा अन्स्वर्गिय पिता का आधेश था कि मैं चौदर वर्षवन में � 165 00:26:36,970 --> 00:26:39,430 मैं केवल आपका प्रतिनिधी बनकर राज करूँगा. 166 00:26:39,710 --> 00:26:41,370 अपनी पादुका दीजिये. 167 00:26:44,850 --> 00:26:50,190 अपने भाई को आशिर्वाद दीजिये भाईया, ताकि मैं आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतर सको. 168 00:26:54,610 --> 00:27:01,470 मैं अगले चौदा 169 00:27:01,470 --> 00:27:04,990 सालों तक राजकात संभालूंगा, जब तक आप वापत नहीं आते. 170 00:27:06,160 --> 00:27:08,480 मेरे प्यारे भाई भाईया 171 00:28:17,740 --> 00:28:24,300 महामंत्री प्रहस्तु तुम्हारी इस तरह अजानक यहां आने का कारण। महाराज, सभी रिशी मुनी 172 00:28:24,300 --> 00:28:30,660 दंडक वन और अपने अपने आश्रमों में वापत लोट रहे हैं। उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा 173 00:28:30,660 --> 00:28:33,940 हमारी गुप्तचरुं का कहना है कि इसका कारण है 174 00:28:33,940 --> 00:28:47,620 आयोध्या 175 00:28:47,610 --> 00:28:54,070 सत्य है महाराज, परन्तु इससे पहले कि देर हो जाए हमें कुछ करना होगा। ओ 176 00:28:54,070 --> 00:28:56,490 राम, मैं तुमसे मिलने के लिए उताब... 177 00:31:10,700 --> 00:31:16,860 राजगृहं वा उटजम दीनं सघनत तरीके 178 00:31:38,280 --> 00:31:45,160 रावन की छोटी बेहन शूर्प नखा एक सुन्दर महिला का भेश बना कर राम को लुबाने के लिए 179 00:31:45,160 --> 00:31:50,580 पंचवटी में आती है। राम, मैं हूँ शूर्प 180 00:31:50,580 --> 00:31:57,240 नखा। ओ राम, 181 00:31:57,280 --> 00:32:03,740 तुम कितने सुन्दर हो और कितने शक्ति शाली हो। मैं तुम से विवा करना चाती हूँ। 182 00:32:06,090 --> 00:32:10,370 मैं तुम्हारी इच्छा का सम्मान करता हूँ, किन्तु सीता के रहते तुमसे विवा नहीं कर 183 00:32:10,370 --> 00:32:16,650 सकता। तुम मेरे भाई लक्ष्मन से पूछ लो, वो भी बहुती सुन्दर और शक्तिशाली है। 184 00:32:16,650 --> 00:32:21,890 ये भी कम सुन्दर नहीं है। जब तुम्हें भाईया राम पसंद है, और 185 00:32:21,890 --> 00:32:34,070 तुम 186 00:32:34,070 --> 00:32:40,740 � आओ पहले मैं आपका परिचे करा दूँ ये है मेरी पतनी सीता बहुत हो गया लगता है मुझे 187 00:32:40,740 --> 00:32:45,060 आब अपने अजली रूप में आना ही बड़ेगा अगर मैं सीता को मार दूँ 188 00:33:20,990 --> 00:33:22,230 क्या हुआ तुम्हें? 189 00:33:22,550 --> 00:33:25,670 अरे शुर्पनखा, ये क्या? ये किसने किया? 190 00:33:28,850 --> 00:33:34,890 राम, क्या हयोध्या के उस तुछ और वनवासी राजकुमार राम ने तुम्हारी ये तुरदशा की? 191 00:33:50,320 --> 00:33:56,860 चिंता मत करो मेरी बेहन उसे तो मैं टुकड़े टुकड़े करके चील कववों को खिला दूँगा 192 00:33:56,860 --> 00:33:59,920 प्रहरस्त मेरे भाई कुम कर्ण को जगाओ 193 00:34:24,710 --> 00:34:30,090 महाराज वही हुआ जिसका मुझे डर था। कुम्भ करण अगले छै महिने तक नहीं जागने वाली। 194 00:34:30,090 --> 00:34:36,790 काश, काश मैं उस सीता की सुन्दर्ता नश कर पाती। क्या सच में, वो इतनी सुन्दर 195 00:34:36,790 --> 00:34:42,230 है। उसके जैसी सुन्दर त्री पूरे संसार में नहीं है भाईया। 196 00:34:42,230 --> 00:34:46,489 वो स्वर्ट क 197 00:35:04,680 --> 00:35:09,800 अगर उसके कोई योग्य है तो वो तुम हो भाईया और कोई नहीं 198 00:35:42,640 --> 00:35:47,840 रावन अपने मामा मारीज के साथ सीता का अभरन करने निकलता 199 00:35:47,840 --> 00:36:07,088 है। 200 00:36:29,710 --> 00:36:36,530 इतना प्यारा है, क्या ये सत्य है, या मेरी आँखों का दोखा, ऐसा मनमोहक हिरन तो मैंने 201 00:36:36,530 --> 00:36:42,170 पहले कभी नहीं देखा, स्वामी, आप इसे मेरे लिए पकड़ सकते हैं, क्यों नहीं, अवश्य, 202 00:36:42,350 --> 00:36:44,470 लक्ष्मन, तुम सीटा का ध्यान रखना, 203 00:36:44,830 --> 00:36:52,670 भाईया, 204 00:36:52,670 --> 00:36:54,150 इस नर्जन बन में भेज 205 00:36:54,150 --> 00:36:59,690 बद 206 00:37:11,120 --> 00:37:14,060 हो सकता है ये दिव्य हिरन भी कोई राक्षत ही हो। 207 00:37:14,060 --> 00:37:24,100 मुझे 208 00:37:24,100 --> 00:37:30,540 ये तो ज्याद था कि तुम मुझे मार दोगे, लेकिन अब तुम्हारी प्रिय सीता का क्या 209 00:37:41,320 --> 00:37:45,900 वो अवश्य किसी संकट में है। तुरंत उनकी सहायता करो। आप चिंता ना करें माते। कोई 210 00:37:45,900 --> 00:37:49,600 संकट उन्हें छूँ भी नहीं सकता। ये क्या कह रहे हो लक्ष्मर। तुम चाहते हो उनकी 211 00:37:49,600 --> 00:37:54,560 मृत्यू हो जाए। मैं आपकी ब्याकुलता समझता हूँ। जैसी आपकी आग्या। 212 00:37:54,560 --> 00:38:07,220 म 213 00:38:07,770 --> 00:38:12,170 मेरी अनुपस्थिति में इस रेखा को पार ना करें इसके भीतर आप सुरक्षित हैं आज्या 214 00:38:12,170 --> 00:38:22,390 सब 215 00:38:22,390 --> 00:38:25,050 कुछ मेरी योजना अनुसार ही हो रहा है 216 00:39:14,720 --> 00:39:16,920 ये लीजिये रुशिवार 217 00:39:16,920 --> 00:39:23,720 ये कैसी रिखा है किसी ने 218 00:39:23,720 --> 00:39:28,620 तुम्हारी सुरक्षा के लिए बनाई है। मैं ऐसे पार नहीं कर सकता, पर तुम कर सकती हूँ। 219 00:39:28,620 --> 00:39:35,480 आगे आओ। नहीं, कदापी नहीं। देवी भूख है, साधु का निरादर मत करो, 220 00:39:35,540 --> 00:39:41,000 उसे भोजन दो। अन्यता तुम्हारे पिता और ससुर के वंशों का सर्वनाश हो ज 221 00:39:50,410 --> 00:39:55,310 बिना संकोच हमें भिक्षा दो और हमारा आशिर्वाद राप करो। 222 00:40:20,880 --> 00:40:24,540 तुम यहाँ क्या कर रहे हो? सीता को अकेले क्यों छोड़ाए? आपकी छीक सुनकर उन्होंने 223 00:40:24,540 --> 00:40:29,240 के लिए विवश किया. ये क्या किया? उस राक्षत ने जान भूचकर तुम्हें मेरी आवाज 224 00:40:29,240 --> 00:40:30,019 पुकारा था. 225 00:40:30,020 --> 00:40:33,220 मुझे अनुनी की आशंका हो रही है. चलो जल्दी से सीता के � 226 00:42:09,390 --> 00:42:16,050 हमारे साथ छल हुआ है। सीता को अकेली पाकर कोई दुष्ट उसे हर ले गया है। 227 00:42:16,050 --> 00:42:23,010 लक्षमन मैं उस दुष्ट को पाताल से भी खोज निकालूँगा। वो चाहे ब्रह्मान्ड 228 00:42:23,010 --> 00:42:29,350 के किसी भी कोने में छपा हो। मैं उसे पकड़ कर लाऊंगा। और उसे नष्ट कर 229 00:42:29,350 --> 00:42:30,870 दूँगा। � 230 00:42:38,160 --> 00:42:43,440 और आज आप स्वयं क्रोध में अपना धैर्य खो रही हैं। शांत मन से सोचिये कि हमें क्या 231 00:42:43,440 --> 00:42:49,480 करना चाहिए। ठीक कहा। तुम धैर्यवान हो लक्ष्मन। अब 232 00:42:49,480 --> 00:42:56,000 तुम्हें मुझे कोई रास्ता दिखाओ। अब से जैसा तुम कहोगे मैं वैसा ही करूँगा। 233 00:42:56,000 --> 00:42:57,000 लक्ष्मन, 234 00:42:57,080 --> 00:43:05,392 मुझ 235 00:43:20,040 --> 00:43:26,820 चमा करे राम, मेरे फ्रिंद पंखुस दुष्ट का सामना नहीं कर सके और वो सीता 236 00:43:26,820 --> 00:43:33,200 को ले गया। नहीं जटायू, तुम अपने आपको दोश मत दो, 237 00:43:33,300 --> 00:43:37,860 तुमने तो मेरी पतनी की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की भी परवा नहीं की। हिम्मत 238 00:43:37,860 --> 00:43:40,440 ना हारे राम, आपको सीता � 239 00:44:10,670 --> 00:44:15,550 ध्यान से सुनो। किसी ने भी सीता को हानी पहुंचाई तो हम उसे मृत्यु दंड देंगे। ये 240 00:44:15,550 --> 00:44:22,130 लंका की होने वाली महाराणी है। इनका ध्यान रखा जाए। स्रीजटा। मेरे लिए क्या आग्या 241 00:44:22,130 --> 00:44:26,330 है महाराज। हम सीता की सुरक्षा का दायित्व तुम्हें सौंपते हैं। � 242 00:45:03,880 --> 00:45:10,220 इन दिनों की चुबन से बड़ा है मेरी भूख का दर्द। तुम्हें खाने के लिए मती है तो... 243 00:46:18,959 --> 00:46:21,120 सुगरीव, वो कौन है? 244 00:46:27,320 --> 00:46:31,440 यहाँ तो जील है। लक्ष्मन, अब हम क्या करें? 245 00:46:32,000 --> 00:46:38,060 भाईया, वहाँ कोई दिख रहा है। चलिए उससे सुगरीप के बारे में पूछते हैं। हाँ, ठीक 246 00:46:38,060 --> 00:46:42,320 रुकिये। 247 00:46:44,750 --> 00:46:49,470 कपड़े तो आपने मुनियों के पहने हैं, लेकिन आप दुनों के चेहरे से राज कुमारों का 248 00:46:49,470 --> 00:46:54,990 अभास होता है। प्रकृति भी हमारे साथ अद्भुत खेल खेलती है। और हम सबको उस खेल 249 00:46:54,990 --> 00:46:59,870 अलग -अलग पात्र निभाने का अवसर मिलता है। जैसे किसी रंग मंच की 250 00:46:59,870 --> 00:47:13,730 कटप 251 00:47:13,690 --> 00:47:18,410 मेरी पत्नी सीता को खोज रहे हैं। किसी दुष्ट राक्षत ने उसका हरण कर लिया है। हम 252 00:47:18,410 --> 00:47:22,590 नहीं जानते कि वो उसे कहां ले गया। मैंने अवश्य कुछ पुन्ने किये होंगे जो मुझे 253 00:47:22,590 --> 00:47:28,010 साक्षात अयोध्या के राजकुमार राम के दर्शन हुए। आपको अपना 254 00:47:28,010 --> 00:47:39,810 परिचे 255 00:47:39,810 --> 00:47:40,810 क 256 00:47:41,280 --> 00:47:48,160 मार्ग दर्शक बन कर हमारे सामने आ गए हैं। राम, लक्ष्मन, जिन महराज दर्शरत 257 00:47:48,160 --> 00:47:52,640 का नाम पूरे संसार में आदर से लिया जाता है। उनके पुत्र राम, लक्ष्मन से मिलना 258 00:47:52,640 --> 00:47:57,320 लिए सम्मान की बात है। ये भी एक संयोग ही है कि कुछी दिन पहले मैंने एक पुकार स� 259 00:48:11,530 --> 00:48:16,470 जब वो चीख रही थी, एक छोटी सी पोटली भी उसने नीचे फेकी थी, जिसे हमने संभाल कर 260 00:48:16,470 --> 00:48:18,250 है. कहाँ है वो? कहाँ है वो? 261 00:48:21,710 --> 00:48:28,490 ओ, ये देखो लक्ष्मन, ये सीता का ही वस्तर है, ये 262 00:48:28,490 --> 00:48:33,730 कंगन और ये मनी भी. ओ, सीता, पेरी सीता. 263 00:48:34,550 --> 00:48:37,210 धीरज रखे भाईया. राम, अभी ये शो 264 00:48:39,130 --> 00:48:45,130 शीगर ही कोई निर्णय लेना होगा मैं सीता को बचाने का हर संभाव प्रयास करूँगा 265 00:48:45,130 --> 00:48:51,330 मैं आपकी पीड़ा समझ सकता हूँ क्योंकि मैं भी उसी पीड़ा से जूज रहा हूँ मेरा भाई 266 00:48:51,330 --> 00:48:57,050 बाली उसने मुझसे मेरा राज्य छीन लिया और साथ ही मेरी पत्नी को भी आज 267 00:48:57,050 --> 00:49:03,830 यदि अपने समस्त संसाधनों का उपयोग करके सीता मैया की 268 00:49:03,830 --> 00:49:08,710 खोज में लग जाता। आईए, आज से हम दोनों मित्रता के बंधन में बंध कर ये प्रण लेते 269 00:49:08,710 --> 00:49:13,390 हैं। ये अपने अपने बल के अनुसार एक दूसरे की सहायता कर सभी कश्टों को दूर करेंगे। 270 00:49:13,390 --> 00:49:15,050 अवश्य, ऐसा ही होगा 271 00:49:25,360 --> 00:49:31,020 आज से यही मेरा प्रथन धर्म है, जिसका पालन करते हुए मैं आपकी सहायता की शपत लेता 272 00:49:31,020 --> 00:49:37,840 हूँ। मैं भी शपत लेता हूँ। राम ने सुगरीव को दिया वचन निभाया, और 273 00:49:37,840 --> 00:49:42,680 शक्तिशाली बाली से युद्ध किया। बाली युद्ध में पराजित हुआ, और सुगरीव 274 00:49:42,680 --> 00:49:52,560 को 275 00:49:58,250 --> 00:50:04,530 और बारिश बंध होने के बाद जब मौसम साफ हुआ तो रिश्य मुख बार के पानी से घिरा हुआ एक 276 00:50:04,530 --> 00:50:11,290 द्वीप जैसा लग रहा था और तभी सुगरीव ने अपनी विशाल वानर सिना 277 00:50:11,290 --> 00:50:16,070 बुलाई जब तुम्हें सीता मिल जाए तो उसे ये अभूशन दे देना ताकि वो 278 00:50:16,070 --> 00:50:18,576 तुम 279 00:50:38,280 --> 00:50:42,660 ये हमारा राज सी आभूशन है, इसे जाकर सिता को दिखा दिना। 280 00:50:42,660 --> 00:50:52,180 वानर 281 00:50:52,180 --> 00:50:58,580 राज तुब्रीव ने भी राम को दिया वशन निभाटे गए, सभी दिशाओं में अपने खोजी दल भेजे। 282 00:51:36,190 --> 00:51:41,930 देखो, वहाँ, उस दिशा में, कुछ पक्षी वहाँ से निकल रहे हैं, हो सकता है कि वहाँ जल 283 00:51:41,930 --> 00:51:44,690 हो. हाँ, वहाँ जल हो सकता है, चलो सब वहीं चलते हैं. 284 00:52:26,590 --> 00:52:33,030 उनको मुझे थोड़ी रोटने दिखना ही है शेद वहाँ रात्ता हो सकता है जल्दी चलो 285 00:52:39,330 --> 00:52:45,810 दक्षिन की ओर के दल का नित्रित्व करने वाले हनमान की धेंद, रावण के हाथों मारे 286 00:52:45,810 --> 00:52:51,270 पक्षीराज जटायू के भाई संपाती से हुई। ये हम कहां आ गए? 287 00:52:59,370 --> 00:53:04,110 क्या आप जटायू के बड़े भाई संपाती हैं? 288 00:53:10,800 --> 00:53:16,040 मैं संपाती ही हूँ. क्या आप लोग मेरे भाई को जानते हैं? 289 00:53:16,260 --> 00:53:19,400 कैसा है मेरा भाई जटायू? 290 00:53:19,760 --> 00:53:22,000 वो ठीक तो है न? 291 00:53:22,640 --> 00:53:26,340 वीर जटायू का स्वर्गवास हो चुका है. 292 00:53:31,480 --> 00:53:38,040 क्या इससे बड़ा कोई दुख हो सकता है कि बड़े 293 00:53:38,040 --> 00:53:39,240 भाई के... 294 00:53:39,610 --> 00:53:46,130 जीते जी, छोटे भाई की बृत्यो हो जाए। वीर 295 00:53:46,130 --> 00:53:52,870 जटायू बहुत ही पराक्रमी और साहसी थे। उस कप्ती दुष्ट रावन थे मा थीता 296 00:53:52,870 --> 00:53:59,830 को बचाने के प्रयास में लड़ते लड़ते उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। 297 00:53:59,830 --> 00:54:03,390 तुमने रावन कहा, यही कहा 298 00:54:04,520 --> 00:54:11,520 अगर मुझे पता होता कि रावन ने मेरे भाई को मारा, तो मैं कभी भी उस दुष्ट को यहां से 299 00:54:11,520 --> 00:54:13,520 उड़कर नहीं जाने देता. 300 00:54:13,860 --> 00:54:20,360 क्या यहीं से उड़कर गया था वो? हाँ, तुम सब को समुद्र पार 301 00:54:20,360 --> 00:54:25,480 वो द्वीद दिख रहा है, वही है लंका. 302 00:54:26,540 --> 00:54:29,660 मा सीता को बंदी बना कर उस 303 00:54:29,660 --> 00:54:33,980 दु� 304 00:54:35,450 --> 00:54:41,570 अगर हम सबको समद्रे पार करना है तो उसके लिए हजारों नाव चाहिए होंगी ये कारे मैं 305 00:54:41,570 --> 00:54:47,390 सकता था परंतु अब मैं बुढ़ा हो गया हूँ यूवा अवस्था में मैंने 21 बार पृत्वी की 306 00:54:47,390 --> 00:54:54,230 परिक्रमा की थी पर अब जेवल एक है जो इस कठिन कारे 307 00:54:54,230 --> 00:54:56,350 को कर सकता है और वो ह 308 00:55:01,550 --> 00:55:07,930 फिर उड़ कर उसके पास गए और उसे निगलने का प्रियास किया था तुम्हारी शक्तियां आपार 309 00:55:07,930 --> 00:55:14,910 हैं परन्तु तुम्हें ग्यात नहीं कि इसका प्रियोग कैसे करें संसार तुम्हारी 310 00:55:14,910 --> 00:55:20,190 से भैभीत हो गया था परन्तु एक शाप के कारण तुम अपनी शक्तियों को 311 00:55:30,990 --> 00:55:35,530 समुद्र पार लंका पहुँचकर माता सीता का पता लगा सकते हो। 312 00:55:35,530 --> 00:55:41,470 ओम। ओम। 313 00:56:39,120 --> 00:56:40,640 जल्द मिलेंगे साथियों 314 00:56:40,640 --> 00:56:47,600 हनुमान सीगर 315 00:56:47,600 --> 00:56:53,280 ही लंका की ओर निकलते हैं रास्ते में समुद्री राक्षती सिमहिका उन्हें ललकारती 316 00:56:53,280 --> 00:56:57,960 ये क्या है? 317 00:57:36,300 --> 00:57:40,760 यह मैं कहां आ गया यहां से बाहर निकलना होगा 318 00:58:04,350 --> 00:58:10,950 भयंकर युद्ध में सिमहिका का वद करने के पश्चार हनुमान बिनाव लंब की लंका की ओर 319 00:58:10,950 --> 00:58:11,950 बढ़ते हैं 320 00:59:05,160 --> 00:59:06,160 हुआ है 321 01:00:11,250 --> 01:00:14,530 किन्तु इतनी बड़ी लंगा में माता सिता को डून्डू कहते है। 322 01:00:51,140 --> 01:00:57,860 आ, तुम जाग रही हो। सुबह, दुबहर, शाम, हर समय केवल तुम्हें ही 323 01:00:57,860 --> 01:01:03,240 देखना चाहते हैं। लेकिन तुम हो, जो हमें देखती भी नहीं। अब हमें लगता है, ये तभी 324 01:01:03,240 --> 01:01:10,180 संभव होगा। जब हम राम का फिर काट कर लाएंगे। आप बार -बार इसके पास क्यों आते 325 01:01:18,150 --> 01:01:21,810 याद रहे एक वर्ष समाप्त होने में थोड़े ही दिन बचे है 326 01:01:21,810 --> 01:01:29,990 ऐसा 327 01:01:29,990 --> 01:01:35,390 क्या है तुम्हें जो लंकेश तुम पर इतरे मोहित है मुझे कुछ विशेश नहीं लगता मैंने 328 01:01:35,390 --> 01:01:40,410 लंकापती से अधिक सुनर किसी को नहीं देखा पर तेरे पती को देखना चाहूँगी जिस पर तुझे 329 01:01:40,410 --> 01:01:46,320 इ 330 01:02:06,540 --> 01:02:10,880 जननिहं रामदूत हनुमान 331 01:02:10,880 --> 01:02:18,820 चरणवान 332 01:02:46,990 --> 01:02:48,750 मम प्रभु कान 333 01:03:30,440 --> 01:03:35,640 किन्तु करोती सदात अवचिंतन। 334 01:04:06,730 --> 01:04:11,490 मेरे साथ चलिये मा, मैं आपको श्रीराम के पास ले जाओंगा। मैं तुमारे साथ नहीं जा 335 01:04:11,490 --> 01:04:16,530 सकती। इस राक्षस ने बहुत से लोगों को बलपूर्वक अपहरण करके लंका में बंदी बना 336 01:04:16,530 --> 01:04:21,110 है। मेरे साथ साथ उन सब का भी यहां से मुक्त होना आवश्यक है। समझ सक 337 01:04:33,760 --> 01:04:38,980 जाके स्वामी से कहो कि वो जल्दी से मुझे बचा ले तब तक मैं उनकी राह देखूंगी जो 338 01:04:38,980 --> 01:04:45,620 आग्या माता परन्तु जाने से पहले मैं रावन और उसके लोगों को सबक सिखा कर 339 01:04:45,620 --> 01:04:46,620 जाओंगा 340 01:05:12,400 --> 01:05:14,420 योधा लग रहा है मेरे लायक। 341 01:05:14,420 --> 01:05:24,820 अगर 342 01:05:24,820 --> 01:05:31,100 मैं योधा का बंदी बन जाओं, तो ये मुझे सिधा रावन के पार ले जाएगा, और तब रावन 343 01:05:31,100 --> 01:05:35,720 सामने होगा। बचाओ, बचाओ, आगते मेरी रक्षा करो। 344 01:05:35,720 --> 01:05:42,640 वानर कौन हो तुम, अपना परिचे दो। बताओ 345 01:05:42,640 --> 01:05:48,320 तुम्हें यहाँ किस ने भेजा है। 346 01:05:48,320 --> 01:05:55,280 ए लंकेश रावन, मेरा नाम हनुमान है। 347 01:05:55,280 --> 01:06:01,640 मैं वानर राज सुग्रीम और उनके मित्र योध्या के राजकुमार प्रभू श्री राम का दूद 348 01:06:01,640 --> 01:06:07,240 यहाँ आपके सामने उपस्थित हुआ हूँ। आपने माता सीता का फरण करके ए 349 01:06:08,520 --> 01:06:14,340 गृणित और धर्म विरुद्ध कार्य किया है। जिसके कारण आपका और आपकी समस्त राक्षस 350 01:06:14,340 --> 01:06:21,140 का विनाश निश्चित है। इसलिए एकशमा मांग कर माता सीता को सम्मान के साथ प्रभू 351 01:06:21,140 --> 01:06:28,120 श्रीराम को लोटा दो। मार दो इसे। भाईया, राजनीती के अनुसार हम 352 01:06:28,120 --> 01:06:38,500 किसी 353 01:06:38,010 --> 01:06:44,870 तो हम अपने शत्रु को यहां तक कैसे लेकर आएंगे। ठीक है, इसकी पूंच 354 01:06:44,870 --> 01:06:50,470 में आग लगा दो और छोड़ दो इसे। 355 01:06:50,470 --> 01:06:56,930 अरे क्या किया, मेरी पूंच जवादी, मेरी पूंच, मेरी 356 01:06:56,930 --> 01:06:58,970 पूंच, अरे कहा जाओ। 357 01:07:51,710 --> 01:07:58,210 लंकेश, आपसे मेरी प्रार्थना है कि सीता को वापस राम के पास भेज दीजिये। अन्यथा लंका 358 01:07:58,210 --> 01:08:05,170 का सर्वनाश कोई नहीं रोग सकता। विभीचन, अगर तुम्हारे सिवा किसी 359 01:08:05,170 --> 01:08:10,790 और ने ये कहा होता, तो उसका सर कटकर हमारे पैरों में पढ़ा होता। मैं लंकापती 360 01:08:10,790 --> 01:08:21,450 राव 361 01:08:21,200 --> 01:08:23,180 निकल जाओ विश्वास खाती। 362 01:08:23,180 --> 01:08:35,500 शान्त 363 01:08:35,500 --> 01:08:41,800 हो जाओ, शान्त हो जाओ, ये सोचो कि हम समुद्र पार कैसे जा सकते हैं। इसके लिए 364 01:08:41,800 --> 01:08:46,090 हजारों नाओ की आवश्चक्ता होगी। हमें समुत्र पर फूल बनाना चाहिए। तुम्हें पता 365 01:08:46,090 --> 01:08:50,410 इतना लंबा फूल बनाने में हमें कितने वर्ष लग जाएंगे। बात केवल माता सीता को ही 366 01:08:50,410 --> 01:08:56,370 बचाने की होती। तो पलक जपकते ही मैं लंका जाता और माता को ले कर आ जाता। हमें केवल 367 01:08:56,370 --> 01:08:57,229 सीता को ही नहीं 368 01:08:57,229 --> 01:09:11,370 बचाना 369 01:09:18,380 --> 01:09:22,620 ये बहुत अच्छे व्यक्ति हैं। लंका में इन्होंने मेरे प्राणों की रक्षा की थी। 370 01:09:22,620 --> 01:09:27,200 निश्कपट सौभाव स्वैम मैंने अपनी आखों से देखा है। इनके हमारे साथाने में मुझे कोई 371 01:09:27,200 --> 01:09:33,240 दोश नहीं दिखता। मैं हनुमान से पूर्णत है सहमत हूँ। हमारे � 372 01:09:49,960 --> 01:09:55,780 राम ने दिन रात जार्थना करते हुए साथ दिनों तक समुद्र देवता का आभान 373 01:09:55,780 --> 01:10:02,460 किया। तब आठवे दिन 374 01:10:02,460 --> 01:10:05,040 समुद्र देव स्वेम प्रकट हुए। 375 01:10:25,230 --> 01:10:31,790 धर्म रक्षक राम, अपनी सेना से कहिए कि वो पत्थरों पर आपका नाम लिख कर 376 01:10:31,790 --> 01:10:38,710 समुद्र में फैक दे जाएं। आपके नाम के पत्थरों को मैं दूबने नहीं दूँगा। उनहीं 377 01:10:38,710 --> 01:10:44,110 को एक दूसरे से चोड़ते हुए आप एक सेतु का निर्मान कीजिए। इस कारे में ना 378 01:10:44,110 --> 01:10:54,170 के 379 01:10:53,980 --> 01:10:55,340 सफलता प्राप्त होगी 380 01:10:55,340 --> 01:11:01,980 मेरे 381 01:11:01,980 --> 01:11:05,680 वीरों आओ मिलकर तमुद्र पर तेतु बनाएं 382 01:13:47,950 --> 01:13:54,650 महाराज, ये युद्ध हमारे सैनिकों के लिए युद्ध नहीं, मात्र एक खेल होगा। 383 01:13:54,650 --> 01:13:59,490 इस छोटे से संकट के लिए आपको चिंतित होने की आवश्यक्ता नहीं 384 01:13:59,490 --> 01:14:08,510 है। 385 01:14:08,520 --> 01:14:15,520 धूल चटा देंगे, रावन, हमने तुमसे पहले ही कहा था, और आज फिर 386 01:14:15,520 --> 01:14:21,880 से कह रहे हैं कि, राजा को इस तरह की चापलूसियों से, हमेशा बच के रहना चाहिए, 387 01:14:22,620 --> 01:14:29,500 जिनोंने समुदर पर पुल बनाया हो, वो साधारन सेना नहीं हो सकती, रावन, हम तुमारे ही 388 01:14:29,500 --> 01:14:30,040 बलाई के 389 01:14:30,040 --> 01:14:38,500 लिए 390 01:14:38,500 --> 01:14:44,800 क आप जानते भी हैं आप क्या कह रहे हैं अगर हमने सीता को सौप दिया तो शत्रू समझेगा 391 01:14:44,800 --> 01:14:51,700 कि हम कायर हैं डरते हैं ऐसा नहीं है पुत्र केवल एक स्त्री के लिए हजारों 392 01:14:51,700 --> 01:14:57,160 को युद्ध की आग में जोंग देना उन्हें बली चड़ा देना उचित नहीं है उचित नह 393 01:15:06,010 --> 01:15:12,710 आप कायर हो गए हैं इंद्र जीत अपनी जीवा पर नियंत्र रखो मैं कायर नहीं हूँ 394 01:15:12,710 --> 01:15:18,850 परन्तो अनावशक युदल लड़ना भी कोई बुद्धिमानी नहीं है आपने मुझे याद किया 395 01:15:18,850 --> 01:15:25,710 हाँ बल्वान युवराज अंगद सुनो मैं जो कहने जा रहा हूँ उसे ध् 396 01:15:34,430 --> 01:15:41,210 वो समय हमारे स्तामने आ गया है। लेकिन फिर भी मैं गहमातान युद्ध को रोकने और 397 01:15:41,210 --> 01:15:47,230 रावन को बचने का एक अस्तर देना चाहता हूँ। इसलिए अगर रावन सीता सहित 398 01:15:47,230 --> 01:15:53,830 सभी बंधकों को हमेशा के लिए मुक्त कर दे और ख्षमा मांग ले तो ये युद्ध रुख सकता है 399 01:16:01,680 --> 01:16:06,580 लेकिन युद्ध को हमें हर हाल में रोकना चाहिए जिससे तीनों ही लोकों में सुख शामती 400 01:16:06,580 --> 01:16:12,780 बनी रहे और इसके लिए मैं रावन के सभी अपराधों को क्षमा करने के लिए तैयार हूँ 401 01:16:12,780 --> 01:16:17,260 अंगद, क्या तुम ये संदेश रावन तक पहुचातकते हो? 402 01:16:20,760 --> 01:16:22,200 मैं निश्चित रूप से 403 01:16:34,510 --> 01:16:39,670 तो तुम ये कहने के लिए यहां सकाय हो क्या नाम बताया था तुमने 404 01:16:39,670 --> 01:16:46,370 अंगल यही नाम बताया था ना तो ये रहा हमारा जवा मूर है 405 01:16:46,370 --> 01:16:53,150 एक चांती दूद के साथ इस तरह का व्यवहार आप जैसे राजा को शोभा नहीं देता 406 01:17:19,409 --> 01:17:26,090 तो आखर कार रावन युद्ध ही चाहता है ठीक है मैं तुम्हारे साहत की सराहना करता हूँ 407 01:17:26,090 --> 01:17:31,610 मैंने बहुत कोशिश की पर उस घमंडी रावन ने आपका शांती प्रतार ठुकरा दिया वो युद्ध ही 408 01:17:31,610 --> 01:17:32,610 चाहता है 409 01:17:38,720 --> 01:17:45,540 सुनों वानर वीरो भोर की पहली किरण के परवत शिकर को चूते ही हम युद्ध आरंब कर देंगे 410 01:17:45,540 --> 01:17:52,240 तो क्या आप अन्याय के विरुद लड़ाई लड़ने के लिए राम का साथ देंगे 411 01:19:15,889 --> 01:19:19,690 जय जय जय जय जय जय 412 01:19:44,240 --> 01:19:51,120 हे प्रभु मेरी पुकार सुनो रक्षा करो मेरे स्वामी की रक्षा 413 01:19:51,120 --> 01:19:54,500 करो प्रभु मेरे स्वामी की रक्षा करो 414 01:20:54,060 --> 01:20:57,920 इससे मुझे परिशानी हो रही है इससे निकाल ही देता हूँ 415 01:21:37,000 --> 01:21:43,000 युद्ध का आरंभ अति उत्तम था महाराज। हमारी और शत्रु सेना दोनों ने बराबरी की टक्कर 416 01:21:43,000 --> 01:21:48,880 दी। परन्तु अब हमारे सैनिक ठकने लगे हैं। उन सैनिकों को वहाँ से वापस बला लो। और 417 01:21:48,880 --> 01:21:53,160 थोड़ा आराम करने को कहो। आदर्णिय महाराज। ये तो पराजए 418 01:21:53,160 --> 01:22:05,940 स्व 419 01:22:05,840 --> 01:22:12,580 धूल चटा देंगे। ठीक है। सूर्यास्त के बाद जब युद्ध रुक जाएगा तब राम अपने घायल 420 01:22:12,580 --> 01:22:18,340 सैनिकों का उपचार करेगा और मृत्य सैनिकों का आंतिम सस्कार। उचित है। मैं कुंभा और 421 01:22:18,340 --> 01:22:22,780 निकुंभ को भेजता हूँ। 422 01:22:22,780 --> 01:22:28,320 कहीं भी बाग जाओ पर मेरे हाथों से 423 01:23:20,840 --> 01:23:26,700 कुम्ब के बल और पराक्रम ने त्राही त्राही मचा दी है महाराज। क्यों नहीं आखिर वो 424 01:23:26,700 --> 01:23:33,500 महामली कुम्ब करन के बेटे हैं। कई वीरों के प्रान 425 01:23:33,500 --> 01:23:36,960 चले गए और बहुत खायल भी हो गए। 426 01:24:27,820 --> 01:24:34,640 मुझे तुम पर गर्व है। आज तुम बहुत ही बहधुरी से लड़े। अब आराम करो। नहीं 427 01:24:34,640 --> 01:24:40,080 प्रभु, ये तो छोटा सा खाव है। कल सुबह मैं युद्ध के लिए तयार हो जाओंगा। 428 01:24:40,080 --> 01:24:46,740 और कश्ट मत करो। विश्राम करो। जी, जैसा आप 429 01:24:46,740 --> 01:24:47,740 कहें। 430 01:25:01,639 --> 01:25:07,100 भाईया, आप शत्रू के सेनिकों का अंतिम संस्कार हमारे अपने सेनिकों के साथ क्यों 431 01:25:07,100 --> 01:25:07,839 रहे हैं? 432 01:25:07,840 --> 01:25:12,120 नहीं, लक्ष्मन. ये हमारे या रावन के सेनिक तब तक थे जब तक जीवित थे. 433 01:25:12,720 --> 01:25:18,400 मृत्यू के बाद कोई किसी का शत्रू नहीं. इसलिए ये सभी मृत सेनिक सम्मान के 434 01:25:18,400 --> 01:25:29,500 प 435 01:25:29,520 --> 01:25:35,480 तो मैं भी क्रोध और कड़वाहट से भरा हुआ था। लेकिन लंका की यात्रा के दरान मैंने 436 01:25:35,480 --> 01:25:41,980 देखा कि हम सभी को ईश्वर की कृपा से जीवन रूपी ये अन्मोल रत्न मिला 437 01:25:41,980 --> 01:25:48,100 है। और ये अती आवश्यक है कि हम एक अच्छे क्षत्रिय होने से पहले एक अच्छे मानव हूँ 438 01:25:55,960 --> 01:26:02,900 वानर, मनुष्य, जानवर, पक्षी और मचलिया एक ही स्रोच से नहीं आये हैं। फिर 439 01:26:02,900 --> 01:26:09,260 भी हम मेंसे कुछ लोग अज्ञानता में अपने ही साथियों के विरुद अस्त्र शस्त्रों का 440 01:26:09,260 --> 01:26:13,040 उप्योग करते हैं। आज युद्ध भूमी में बहुत से लोगों ने अपने प्राण 441 01:26:13,040 --> 01:26:23,780 गव 442 01:26:24,650 --> 01:26:31,430 तो मैं उस समय एक ऐसी दुनिया के लिए प्रार्थना करूँगा, जहां फिर कभी कोई 443 01:26:31,430 --> 01:26:36,190 मनुष्य अपने भाई बंदूं पर ग्रोध में आकर शस्त्र ना उठाए। 444 01:26:36,190 --> 01:26:42,550 भाईया, मैं आपकी भावना समझ गया। 445 01:27:22,250 --> 01:27:26,130 हमसे युद करो अवश्चि नील आगे चलो 446 01:29:53,520 --> 01:30:00,400 मुझे छोड़ कर क्यों चले गए। या तुम 447 01:30:00,400 --> 01:30:06,980 ही हो वो जिसने मेरे भाई का वद किया है, बताओ। हाँ, मैं हूँ, मैं हूँ सुग्रीव, 448 01:30:07,340 --> 01:30:13,460 वानरों का राजा सुग्रीव। तुम्हारा भाई बहुत ही बलवान और सहसी योद्धा था। 449 01:30:13,460 --> 01:30:16,420 आज से पहले मेरा कभी ऐसे 450 01:30:16,420 --> 01:30:22,768 योद्धा 451 01:30:23,340 --> 01:30:28,820 ये क्या कह रहे हो इंद्रजीत, प्रहस्त और कुंब दोनों मारे गए हाँ पिताश्वी, 452 01:30:28,820 --> 01:30:35,060 से ये सच है हम सोच भी नहीं सकते कि कोई इन्हें मार सकता है 453 01:30:35,060 --> 01:30:41,900 ये जुद्ध आसान नहीं है हमें अपनी रणनिती बदलनी होगी इंद्रजीत, कुंब कर्ण को जगाओ 454 01:30:41,900 --> 01:30:53,320 प 455 01:30:52,960 --> 01:30:58,360 तत्कान उसे जगाओ ये मिरा आदेश है जी पिताश्वी जैसी आपकी आग्या 456 01:32:35,790 --> 01:32:37,090 बावन का भाई कुपकन है। 457 01:33:11,580 --> 01:33:17,600 विदीशा, धर्ती आकाश को एक करता ये विशाल योद्धा कौन है? हे राम, ये रावण का सक्त 458 01:33:17,600 --> 01:33:21,760 शक्तिशाली और पराक्रमी योद्धा और भाई कुम्भ करन है. 459 01:33:22,380 --> 01:33:28,620 अगर ये छे महिने की निद्रा पूरी कर लेता तो ये अमर हो जाता. लेकिन रावण ने समय से 460 01:33:28,620 --> 01:33:29,260 पहले ही इसे 461 01:33:29,260 --> 01:33:39,696 ज 462 01:33:39,690 --> 01:33:45,430 कुम्बकर्ण इतना शक्तिशाली है कि ये अकेला ही हमारी पूरी वानर सिना को समाप्त कर 463 01:33:45,430 --> 01:33:50,030 देगा अब केवल आप ही हैं जो इस विनाश को होने से रोक सकते हैं 464 01:33:50,030 --> 01:33:55,930 फिर तो मेरा जाना ही उचित है 465 01:35:29,290 --> 01:35:30,950 क्या नाम है तुम्हारा? 466 01:35:32,630 --> 01:35:37,650 मैं अंगद हूँ, महाराज सुग्रीव का भतीजा और वानर राज बाली का पुत्र. 467 01:35:37,950 --> 01:35:44,690 योवराज अंगद, निसंदे तुम वीर हो, लेकिन मुझसे युद्ध नहीं कर सकते, इसलिए 468 01:35:44,690 --> 01:35:47,910 मृत्यू को ललकारने की भूल मत करो. बैरो! 469 01:35:50,230 --> 01:35:51,550 मेरे बारे में क्या 470 01:35:51,550 --> 01:35:58,140 र मैं जानता हूँ तुम 471 01:35:58,140 --> 01:36:03,360 बहुत ही बल्चाली हो तो इस हनुमान के साथ अपना बाहु बला अजमाना चाहोगे 472 01:36:03,360 --> 01:36:09,720 बहुत अच्छी लेकिन हमारे युद्ध के पहले 473 01:36:09,720 --> 01:36:10,720 ये लो 474 01:36:33,680 --> 01:36:34,580 इसकी आवशक्ता 475 01:36:34,580 --> 01:36:42,980 नहीं। 476 01:36:42,980 --> 01:36:49,740 हमारा युद्ध निहत्य नहीं हो सकता। तुम गदा चिराने में कुछल हो। इसलिए ये युद्ध 477 01:36:49,740 --> 01:36:51,340 अस्त्रों के साथ होगा। 478 01:37:32,990 --> 01:37:38,250 पागिशाली हो कि मेरे हाथ में कोई अस्तर नहीं था. अब उठो और मुझसे युद्ध करो. 479 01:37:38,350 --> 01:37:40,190 जहां हो वहीं खड़े रहो. 480 01:37:40,770 --> 01:37:45,210 मैं हूँ राम, अयोध्या का राजकुमार, दश्रतनंदन राम. 481 01:38:02,250 --> 01:38:09,150 दूर रहो मुर्खों तो तुम हो रा सुना है तुम्हें 482 01:38:09,150 --> 01:38:15,870 अस्त्रविद्या का बहुत जान है दूर रहो मुझसे जाओ यहाँ से 483 01:38:15,870 --> 01:38:18,210 और जाकर वानरों से युद्ध करो 484 01:38:18,210 --> 01:38:28,090 कुम्बकरण 485 01:38:28,090 --> 01:38:34,080 जैसे महाबली के युद्ध मैदान में होते हुए भी दिन की समाप्ती तक युद्ध चला कैसे? 486 01:38:34,200 --> 01:38:39,480 पिताश्री, अब मुझे ही ये युद्ध समाप्त करने के लिए जाना होगा विजय भव इंद्र जीत, 487 01:38:39,520 --> 01:38:40,520 जाओ 488 01:39:13,290 --> 01:39:17,290 शमा करना कुम्बकरन, मैं बस अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ। 489 01:39:43,640 --> 01:39:47,420 भाईया, ये गर्व का ख्षण है, लेकिन आप ठीक तो है न, कहीं चोट तो नहीं लगी? 490 01:39:48,660 --> 01:39:55,600 हाँ, हलकिसी लगी है, लेकिन मैं ठीक हूँ, मुझे एक शमा करना भी भी शण, ये युद्ध ना 491 01:39:55,600 --> 01:39:59,400 होता, तो आज कुम्ब करण की मृत्यू मेरे हाथों ना हुई होती. 492 01:40:07,620 --> 01:40:08,820 शिरी राम के सै 493 01:40:35,470 --> 01:40:41,490 उसकी मृत्यू ने लंका की नीव हिला दी ऐसे बलशाली युद्धा का जाना 494 01:40:41,490 --> 01:40:48,470 अतेंद दुखदार बहुत बड़ी शती है पिताश्री मेरे रहते लंका का 495 01:40:48,470 --> 01:40:54,150 गौरो धूमिल नहीं होगा मैंने एक योजना बनाई है उसके अनुसार मैं रात में ही शत्रू 496 01:40:54,150 --> 01:40:55,710 सेना पर आक्रमण करके � 497 01:41:05,650 --> 01:41:09,770 जितनी जल्दी हो सके सभी घायलों को शिविर पोचाओ चलो जल्दी 498 01:41:09,770 --> 01:41:16,650 इतनी भी क्या जल्दी है अभी 499 01:41:16,650 --> 01:41:23,170 तो बहुत सारे शव मिलेंगे तुम्हे एक दुताहत का दंड उसे मिलना ही चाहिए अभी बताता हूँ 500 01:41:23,170 --> 01:41:25,290 पहरो उसके साथ कोई है 501 01:41:25,290 --> 01:41:31,470 ये क्या माता सीता 502 01:41:38,800 --> 01:41:39,800 आप ठीक तो है न? 503 01:42:46,570 --> 01:42:52,430 जल्दी आओ, सहायता करो, घेरा बनाओ। जाब 504 01:42:52,430 --> 01:42:59,170 बन। तुम्हें यमलोक पहुचाने से पहले राम, तुम्हारी पत्नी और भाई 505 01:42:59,170 --> 01:43:03,370 की मृत्यू का शोक मनाने का एक अवसर दे रहा हूँ। 506 01:43:22,360 --> 01:43:28,040 महराज, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। कहो। हमने घायलों के ऊपर जंगल में उपलब्द सभी 507 01:43:28,040 --> 01:43:32,640 जड़ी बुटियों का प्रयोग करके देख लिया। लेकिन इंद्रजीत द्वारा दिये घाव किसी भी 508 01:43:32,640 --> 01:43:34,780 जड़ी बुटी से भर ही नहीं रहे हैं। क्या कहा? 509 01:43:48,780 --> 01:43:51,248 लेकिन ये कैस 510 01:43:52,970 --> 01:43:58,890 स्वेम को संभालिये राम, अन्यता आपका ये गिरता हुआ मनोबल हमारी सेना पर शत्रु 511 01:43:58,890 --> 01:44:05,750 से भी बड़ी ख्षती पहुँचाएगा. प्रभू, आप चिंता मत कीजिये, माता सीता अवश्य जीवित 512 01:44:05,750 --> 01:44:10,810 होंगी. जीवित? लेकिन सीता की हत्या तो हमारी आखों के सामने ही क 513 01:44:21,740 --> 01:44:27,120 ताकि आप दुखी हो और आपका ध्यान भंग हो। इंद्रजीत की मायावी शक्तियों को मिटाने का 514 01:44:27,120 --> 01:44:33,760 केवल एक ही उपाय है। उस पर उस समय हमला किया जाए। जब वो युद्ध से पहले देवी 515 01:44:33,760 --> 01:44:38,240 निकुम्भिला की गुफा में तंत्र साधना करने में मगन हो। युद्ध में 516 01:44:38,240 --> 01:44:47,808 आ 517 01:44:47,800 --> 01:44:52,860 युद्ध में आने से एक दिन पहले ये विधी प्रारंभ होती है और देर रात तक चलती है 518 01:44:52,860 --> 01:44:53,860 अच्छा? 519 01:44:55,120 --> 01:45:00,500 नहीं, नहीं, नहीं हमारे बहुत से वीर और साथ ही मेरा भाई लक्ष्मन भी गायल पड़ा है 520 01:45:00,500 --> 01:45:04,920 ऐसी स्थिती में निकुंभला देवी की गुफा तक जाकर इंडर जीत पर ह 521 01:45:16,060 --> 01:45:22,900 आप विश्राम करते करते ही, बोलो जामबंद। कुछ ऐसी जड़ी बूटिया हैं जो 522 01:45:22,900 --> 01:45:29,760 हमारे घावों को ठीक कर सकती हैं, जो हिमाले पर हैं। अच्छा, हिमाले में, 523 01:45:29,780 --> 01:45:34,000 वो तो बहुत दूर है, इतनी जल्दी वहाँ से जड़ी बूटिया कौन लाएगा। 524 01:46:22,510 --> 01:46:27,650 ये तो अयोध्या है प्रभू श्रीराम का राज्य 525 01:46:27,650 --> 01:46:36,210 पहच 526 01:46:36,210 --> 01:46:42,950 गए हिमाले ओ कितना सुन्दर 527 01:46:42,950 --> 01:46:47,830 है पवित्र और अद्वत इसके भी दर्शन हो गए 528 01:47:38,080 --> 01:47:40,480 द्रोन गिरी शिकर भी मिल गया। 529 01:47:40,480 --> 01:47:50,440 और 530 01:47:50,440 --> 01:47:55,540 अब मुझे खोजनी होगी हमारी गायल सेना के लिए चमतकारी संजीवनी बूटी। 531 01:48:02,120 --> 01:48:04,060 यही है वो संजीवनी बूठी 532 01:48:04,060 --> 01:48:13,300 यह 533 01:48:13,300 --> 01:48:14,760 तो बहुत पीड़ा दाई है 534 01:48:14,760 --> 01:48:27,140 अरे 535 01:48:27,140 --> 01:48:34,060 वा मेरी चोड़ ठीक हो गई और साथी पीड़ा भी चली गई ये संजीवनी बूटी तो 536 01:48:34,060 --> 01:48:36,040 उम्मीद से भी ज्यादा चमतकारी है 537 01:48:36,040 --> 01:48:42,960 लेकिन मुठी भर 538 01:48:42,960 --> 01:48:49,400 जड़ी बूटियों से हमारी पूरी सेना आखिर कैसे ठीक हो पाएगी समझ में नहीं आ रहा 539 01:48:49,400 --> 01:48:52,520 कोई तो उपाए सोचना होगा 540 01:48:59,210 --> 01:49:03,310 ये उपाय काम करेगा इस पेड़ को खाड़ लेता हूँ 541 01:49:44,940 --> 01:49:46,400 बन गया निशान। 542 01:49:46,400 --> 01:49:57,900 और 543 01:49:57,900 --> 01:50:03,800 अब मैं उठा कर ले जाओंगा इस पूरे परवत को। 544 01:50:36,880 --> 01:50:42,880 हे प्रभो, जब तक मैं ये संजीवनी बूटी लेकर ना पहुँच जाओं, तब तक आप मेरे लक्ष्मन 545 01:50:42,880 --> 01:50:44,040 भाईया की रक्षा करना. 546 01:50:45,980 --> 01:50:50,700 लक्ष्मन भाईया, बस थोड़ी देर और आप अपना धिरज बनाए रखना. 547 01:50:58,100 --> 01:51:01,700 मेरे प्यारे लक्ष्मन धैर्य मत खोना, बस थोड़ी देर और 548 01:51:09,040 --> 01:51:15,440 मैं बस पहुची गया लक्ष्मन भाईया भाईया भाईया राम लक्ष्मन 549 01:51:15,440 --> 01:51:21,780 मैं यही हूँ वहाँ देखो हनुमान जी आ गए हैं हनुमान जी चैलो 550 01:51:21,780 --> 01:51:28,700 चैलो चैलो हनुमान जी आ गए हैं वो अपने गंधों पर कुछ ले कर आ रहे हैं लेकिन 551 01:51:28,700 --> 01:51:31,000 वो है क्या यह तो पूरा परवत ही उ� 552 01:51:53,879 --> 01:51:59,580 हनुमान जी, परवत पर जड़ी बूटियां कहा है? बताता हूँ, ठीक उसी जगा जहां मैंने पेड़ 553 01:51:59,580 --> 01:52:04,980 का तना गाड़ कर निशान बना दिया है जल्दी करो, लक्ष्मन भाईया के घाओ पर संजीवनी 554 01:52:04,980 --> 01:52:08,780 लगाओ जी हनुमान जी, हम अभी जाते हैं 555 01:52:28,720 --> 01:52:33,200 लक्ष्मन, मेरे भाई, तुम्हें होश आ गया, तुम ठीक हो गये। 556 01:52:33,200 --> 01:52:39,660 हनुमान, भाईयों की तरह तुम भी मुझे अत्यंत प्रिय हो। 557 01:53:05,450 --> 01:53:06,450 ये कौन है? 558 01:53:58,980 --> 01:53:59,980 ये क्या हुआ? 559 01:54:02,540 --> 01:54:04,840 कौन है वहाँ? मेरे सामने आओ! 560 01:54:06,480 --> 01:54:09,340 अस्चरियती बात है! तुम अभी तक जीवित हो? 561 01:54:09,660 --> 01:54:16,170 हाँ! और आज तुम्हारी तनरक्षिका देवी भी तुम्हें तुम्हारे काल से नहीं बचा पाएगी। 562 01:54:16,170 --> 01:54:23,150 आजशर्य की बात है कि तुम जैसे दुष्ट के लिए तुम्हारे दास फ्रान 563 01:54:23,150 --> 01:54:28,010 देने के लिए आतुर है। सैनिकों, मार दो इसे! 564 01:55:00,140 --> 01:55:01,400 कुछ और तोड़ना पड़ेगा 565 01:55:01,400 --> 01:55:08,500 तुम 566 01:55:08,500 --> 01:55:09,920 मुझे बाहर लेकर चलो 567 01:55:44,109 --> 01:55:50,230 इंद्रजीत। मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ, जो तुम जैसे वानर के जाल में फ़स जाओ। 568 01:55:50,230 --> 01:55:58,670 वो 569 01:55:58,670 --> 01:55:59,930 हमारे हाथ से निकल गया। 570 01:56:11,920 --> 01:56:15,900 अगर मेरी आग्या का पालन किया तो तुम्हारे प्राण नहीं लूँगा। मुझे आकाश में ले चलो 571 01:56:15,900 --> 01:56:21,220 और याद रहे। जब मैं दाएं कहूँ तो दाएं ही जाना। और बाएं कहूँ तो केबल बाएं। अगर 572 01:56:21,220 --> 01:56:24,160 चालाकी की तो तुम्हारा फिर धर्ते अलग कर दूँगा। 573 01:57:00,420 --> 01:57:04,200 इस बार नहीं, इम्रजी, मैं तुम्हें जिन्दा हूँ. 574 01:57:17,460 --> 01:57:19,180 तुम मुझे फिर नहीं... 575 01:57:45,000 --> 01:57:46,000 करते हैं 576 01:58:18,800 --> 01:58:21,020 तुम मुझे कभी नहीं मार पाओगे! 577 01:58:41,540 --> 01:58:43,480 ओ, इंद्रजीत! 578 01:58:43,760 --> 01:58:45,100 मेरे बेटे! 579 01:58:45,780 --> 01:58:47,740 वीर इंद्रजीत ने तो! 580 01:58:48,040 --> 01:58:54,120 मायावी सीता का वद्ध किया था। लेकिन मैं असली सीता को ही मार डालूँगा। जो भी राम 581 01:58:54,120 --> 01:59:00,360 बील है, उसकी मृत्यू निश्चित है। एक स्त्री की हत्या करके अपनी तलवार को क्यों 582 01:59:00,360 --> 01:59:06,540 कलंकित करते हो। बात समझो लंकेश। तुमने देखा ना। कुंब और निकुंब, 583 01:59:06,680 --> 01:59:17,168 प 584 01:59:17,160 --> 01:59:23,520 पिता हो और एक राजा भी हो, क्या तुम उनकी कीर्ती को कलंकित करोगी? समय आ गया है कि 585 01:59:23,520 --> 01:59:27,580 अब हम तुम धलवार उठाएं और अपना प्रतिशोध लिने युद्ध भूमी में उत्रें. 586 01:59:27,800 --> 01:59:33,660 यही होगा, लेकिन तब तक आप लंका की स्त्रियों और बच्चों की रक्षा कीजिए. को 587 02:00:52,490 --> 02:00:55,470 तो ऐसे लग रहे हैं जैसे गरूर पे साथ शाद भगवान विश्टु हो 588 02:01:32,720 --> 02:01:38,920 तुम्हारे और मेरे बीच का ये युद्ध आज अधर्म का विनाश कर देगा। लंका वासियों, आओ 589 02:01:38,920 --> 02:01:45,760 सुनो। तुम्हारा राजा रावन, जिसे तुम अमर शक्ती का प्रतीक मानते हो। उसे 590 02:01:45,760 --> 02:01:52,340 अब एक साधारन मानव के हाथों मरते देखो। राम, रावन के 591 02:01:52,340 --> 02:01:53,460 सामने तो फै भ 592 02:02:01,150 --> 02:02:07,810 संसार में दुशानन रावन एक ही है दूसरा ना कभी था और ना कभी होगा आओ राम 593 02:02:07,810 --> 02:02:13,190 मुझसे युद्ध करो आजाओ जैती तुम्हारी इच्छा आजाओ 594 02:03:12,720 --> 02:03:14,000 अब इसका अंत हो गया 595 02:03:14,000 --> 02:03:37,560 मुझे 596 02:03:37,560 --> 02:03:40,620 अपनी आँखों पर विश्वात नहीं हो रहा 597 02:03:44,430 --> 02:03:46,430 तुम्हें क्या लगा रावण कमात होगा या? 598 02:03:50,470 --> 02:03:51,930 रावण अजय के! 599 02:04:21,260 --> 02:04:22,580 कोई रास्ता नहीं मचा। 600 02:04:22,580 --> 02:04:41,820 असंभव 601 02:04:41,820 --> 02:04:45,900 ये कैसी शक्ति है जितने रावन के केले को दो दिया। 602 02:04:54,090 --> 02:04:56,670 आपको तो वाली गृप्यों लिखी तैराओ 603 02:06:47,310 --> 02:06:52,870 ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे, ब्राधा रावन। युद्ध का अंत 604 02:06:52,870 --> 02:06:56,390 हुआ। 605 02:06:56,390 --> 02:07:03,170 लंका के सैनिकों, रावन 606 02:07:03,170 --> 02:07:08,330 के साथ -साथ शत्रुता का भी अंत हुआ। मेरा आपसे कोई बैर नहीं। इसलिए अपने अस्तर 607 02:07:08,330 --> 02:07:11,550 -शत्र त्याग दो। और आज से अपने नए राजा विभीषण 608 02:07:17,800 --> 02:07:19,620 जो आग्या 609 02:07:19,620 --> 02:07:35,940 दीते 610 02:07:35,940 --> 02:07:37,340 द्वामी 611 02:07:49,290 --> 02:07:54,810 मैं आप सबका किस तरह से आभार प्रकट करूँ। विशेश रूप से उनका जिन्होंने मेरे लिए 612 02:07:54,810 --> 02:08:00,170 अपने प्रांट दे दिये। मैं उनके लिए दुखी हूँ और आप सबसे एक शमा चाहती हूँ। इसकी 613 02:08:00,170 --> 02:08:02,590 आवशक्ता नहीं है। युद्ध में मिली 614 02:08:02,590 --> 02:08:16,670 मृत्यु 615 02:08:16,670 --> 02:08:21,370 गौरवश पुष्पक विमान भेज किया। 616 02:08:21,370 --> 02:08:45,090 अयोध्या 617 02:08:45,090 --> 02:08:51,860 लोटते समय राम को देखते हुए, सीता जी अत्यंत प्रसन्न हो रही थी, लेकिन उन्हें 618 02:08:51,860 --> 02:08:58,740 भे था उनके लिए, जिन्होंने अपने प्राण गवाए उस युद्ध में जिसे ताला 619 02:08:58,740 --> 02:08:59,740 जा सकता था. 620 02:09:10,800 --> 02:09:16,940 अयोध्या अपने प्रिय राजा के सुरक्षित लोटने का उठ्सव मनाती है, और वे सभी आनन्द 621 02:09:16,940 --> 02:09:23,540 रहते है बहुत साल बाद राम स्वर्ग प्रख्ठान कर जाते हैं और सीता अपनी मा धर्ती के 622 02:09:23,540 --> 02:09:27,080 पास। जैहे श्रीराम। 95770

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